बुधवार, 22 दिसंबर 2010

क्रिसमस पार्टी दाग हूल Dag Hol के साथ

क्रिसमस पार्टी दाग हूल Dag Hol के साथ






रविवार १९ दिसंबर को ओस्लो में मशहूर पेंटर और लेखक दाग हूल (Dag Hol) के घर पर एक सांस्कृतिक क्रिसमस पार्टी हुई जिसमें शास्त्रीय संगीत के अलावा कहानी वाचन हुआ। इसमें भारतीय राजदूत के अलावा पत्रकार, टीवी पत्रकार, लेखक, कलाकार और चित्रकार उपस्थित थे। भारतीय मूल के अनेक लोगों में नार्वे में भारतीय मूल की नेता नाजमा जी भी मौजूद थीं।
इस कार्यक्रम में क्रिसमस पर बहुत ही आकर्षक गीत गाये रूस की मशहूर ओपेरा गायिका ने और डेनमार्क के एच सी अन्दरसन की कथा लड़की माचिस वाली पढ़ीं मशहूर फिल्म कलाकार एलेफ्सेन ने।
कार्यक्रम में दाग हूल के अलावा, पत्रकार क्रिस्टिन मू और उनके जिगरी दोस्त हेन्लिंगसेन भी मौजूद थे जिनसे मेरी बातचीत हुई। क्रिस्टिन मू ने मेरा साक्षात्कार टीवी नोर्गे में सन २००० में लिया था जब मेरा पहला नार्वेजीय भाषा में काव्य संग्रह Fremmede fugler अनजान पंछी प्रकाशित हुआ था।

रविवार, 5 दिसंबर 2010

११ दिसंबर को ओस्लो में नोबेल पुरस्कार की ख़ुशी में कार्यक्रम -शरद आलोक

११ दिसंबर को ओस्लो में नोबेल पुरस्कार की ख़ुशी में कार्यक्रम -शरद आलोक

नोबेल पुरस्कार पर गोष्ठी

Forfatterkafe'

आप सादर आमंत्रित हैं
कविता और शुभकामनाओं के साथ
मुख्य वक्ता: डॉ बोन्दाल और स्थानीय मेयर थूर स्टाइन विन्गेर
समय : 11।12।10 शाम चार बजे (Kl। 16:00)
स्थान: Familesenter på Veitvetsenter, Oslo
आयोजक: नार्वेजीय - भारतीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम
(Indisk-Norsk Informasjons -og Kulturforum)
निशुल्क प्रवेश

नोबेल पुरस्कार विजेता आन सन सूची को पिछले महीने वर्मा में घर में नजरबंदी से मुक्ति मिली है। चीन में प्रजातंत्र की बहाली के लिए जेल में बंद और नोबेल पुरस्कार के लिए नामित शुआबाओ के लिए एक लेखक गोष्ठी का आयोजन वाईटवेत परिवार केंद्र, ओस्लो ( Familesenter på Veitvetsenter i Oslo) में कार्यक्रम हो रहा है। आप सभी सादर आमंत्रित हैं। कार्यक्रम बच्चों और परिवार के लिए है जिसमें जलपान का भी प्रबंध किया गया है। प्रवेश निशुल्क है।

११ दिसंबर को ओस्लो में नोबेल पुरस्कार की ख़ुशी में कार्यक्रम -शरद आलोक

११ दिसंबर को ओस्लो में नोबेल पुरस्कार को समर्पित लेखक गोष्ठी -शरद आलोक

नोबेल पुरस्कार पर गोष्ठी Forfatterkafe'
कविता और शुभकामनाओं के साथ
मुख्य वक्ता: डॉ बोन्दाल और स्थानीय मेयर थूर स्टाइन विन्गेर
समय : 11.12.10 शाम चार बजे (Kl. 16:00)
स्थान: Familesenter på Veitvetsenter, Oslo

आयोजक: नार्वेजीय - भारतीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम
(Indisk-Norsk Informasjons -og Kulturforum)

निशुल्क प्रवेश

नोबेल पुरस्कार विजेता आन सन सूची को पिछले महीने वर्मा में घर में नजरबंदी से मुक्ति मिली है। चीन में प्रजातंत्र की बहाली के लिए जेल में बंद और नोबेल पुरस्कार के लिए नामित शुआबाओ के लिए एक लेखक गोष्ठी का आयोजन वाईटवेत परिवार केंद्र, ओस्लो ( Familesenter på Veitvetsenter i Oslo)
में कार्यक्रम हो रहा है। आप सभी सादर आमंत्रित हैं।
कार्यक्रम बच्चों और परिवार के लिए है जिसमें जलपान का भी प्रबंध किया गया है। प्रवेश निशुल्क है।

नार्वे में गाँधी और नेहरु जयंती संपन्न -शरद आलोक


महात्मा गाँधी का जन्म दिन मनाया गया। चित्र में इंदरजीत पल और सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' गांधी जी
के चित्र पर मायार्पण करते हुए तथा साथ में अन्य गणमान्य व्यक्ति खड़े हैं।


बाएं से स्थानीय मेयर थूर सताइन विन्गेर, शरद आलोक और राजकुमार भट्टी नेहरु जयंती पर
नार्वे में गाँधी और नेहरु जयंती संपन्न -शरद आलोक
भारतीय नार्वेजीय सूचना और सांस्कृतिक फोरम की और से २ अक्टूबर को Stikk Innom वाइतवेत सेंटर ओस्लो में गाँधी जयंती और १४ नवम्बर को वाइतवेत कल्चर हाउस, ओस्लो में नेहरु जयंती धूमधाम से मनाई गयी।

पढ़ा रहे आग उठ रहा धुंआ -सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

पढ़ा रहे आग, उठ रहा धुंआ


लेखक मित्रों के साथ क्रिसमस पार्टी में लेखक Julebord, Oslo, 27.11.10
सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

तुम्हारी स्मृतियों के सहारे
सर पर ईंट, पाँव से सानते गारे
कितने ही भवनों में लगा खून-पसीना.
श्रमिकों को हराम, चैन से जीना.

कितने निस्सहाय, निरुत्साह हैं
शरण में आये हुए ठेकेदार.
रात्रि होटलों में पकड़ी गयी बेटियां,
खा रहे मजदूरनियों की बोटियाँ.

स्वयं इंसानी हवस मिटाने
माता-पिता का बोझ उठाने
लाल-बत्ती चौराहों पर आ गयी
कोबरा दंश सहलाती संताने.

बाजारभाव कर रही शहजादी,
यह अरब देश का शौर्य या बरवादी?
मानवता की उड़ रही खिल्ली
हर घंटे नीलम हुई आजादी.

औरत पाँव की जूती,
प्रवासी दोहरे नागरिक.
धर्म तुरुप का पत्ता,
बिच्छू का बिल, बर्रैया का छत्ता.

कट्टर देश की धार्मिक मधुशाला.
धर्म का नंगापन, गुप्त चकला.
हाथी के दांत, मुख में पुती कालिख,
मुख में राम, बगल में छूरी.

आदर्श बना कैसा जुआँ
धर्म के ठेकेदार, मौत का कुआं.
कोल्हू का बैल, आँखों में पट्टी
पढ़ा रहे आग, उठ रहा धुंआ.
(ओस्लो, ०५ दिसंबर २०१० )

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

हिंदी वालों और भारतीय भाषाओँ के खिलाफ षड्यंत्र अच्छी बात नहीं - शरद आलोक

हिंदी वालों और भारतीय भाषाओँ के खिलाफ षड्यंत्र अच्छी बात नहीं - शरद आलोक
सिविल सेवा परीक्षा प्रणाली में संशोधन के कारण गैर अंग्रेजी भाषी छात्रों की असफलता निश्चित है - डा विजय अग्रवाल
सिविल सेवा परीक्षा प्रणाली के लिए संघ लोक सेवा आयोग ने सन 2000 में वाईके अलघ के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई थी, जिसने अक्टूबर 2001 में अपनी रिपोर्ट यूपीएससी को सौंपी थी। अलघ कमेटी ने प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा में कुछ परिवर्तन सुझाए थे। इन सुझावों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सरकार ने 2011 की प्रारंभिक परीक्षा के स्वरूप में बदलाव की घोषणा की है। फिलहाल मुख्य परीक्षा को नहीं छेड़ा गया है। प्रारंभिक परीक्षा के दूसरे प्रश्नपत्र के रूप में जहां परीक्षार्थी को किसी एक विषय का चुनाव करना पड़ता था, वहीं अब उसकी जगह सिविल सर्विस एप्टीट्यूट टेस्ट देना होगा। इस पेपर को शामिल किए जाने के पक्ष में एक सामान्य तर्क तो यही है कि इससे परीक्षार्थियों के चरित्र, निर्णय लेने की क्षमता, तार्किक क्षमता, समस्याओं के समाधान, मानसिक योग्यता व दृढ़ता, कम्यूनिकेशन स्किल्स, सामान्य समझ तथा गणित की सामान्य योग्यता आदि की जांच की जा सकेगी। यह पेपर बहुत कुछ कैट की परीक्षा जैसा ही है। इस प्रश्नपत्र को लागू किए जाने के पीछे मुख्य कारण यह है कि वैकल्पिक पेपर में स्केलिंग की पद्धति लागू की जाती थी, ताकि किसी विषय विशेष के विद्यार्थी को न तो अतिरिक्त लाभ मिल सके और न ही किसी को कोई नुकसान उठाना पड़े। सूचना के अधिकार के तहत यूपीएससी से उसकी स्केलिंग पद्धति की जानकारी मांगी गई थी, जो वह अभी तक नहीं दे सकी है। निश्चित रूप से इससे आयोग की स्केलिंग पद्धति संदेह के घेरे में आ जाती है। अब प्रारंभिक परीक्षा में वैकल्पिक विषय को ही समाप्त करके इस संदेह से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति पाने का प्रयास किया गया है। लेकिन यह संदेह तब तक पूरी तरह खत्म नहीं होगा जब तक कि सरकार इसकी मुख्य परीक्षा में भी अलघ कमेटी के सुझाव को लागू न करे, क्योंकि उसमें जब तक वैकल्पिक विषय रहेंगे, तब तक स्केलिंग पद्धति रहेगी और जब तक यह पद्धति रहेगी तब तक संदेह भी बना रहेगा। मैं सिविल सर्विस एप्टीट्यूट टेस्ट में शामिल उस खतरनाक तथ्य की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा, जो हमें एक बार फिर से लार्ड मैकाले की याद दिलाता है। इस एप्टीट्यूट टेस्ट के सात मुख्य बिंदु हैं। इनमें अंतिम और सातवां बिंदु है-इंग्लिश लैंग्वेज कम्प्रीहेंसिव स्किल्स। सामान्यतया प्रारंभिक परीक्षा के प्रश्नपत्र में वस्तुनिष्ठ किस्म के 150 प्रश्न पूछे जाते हैं। इस पेपर में प्रत्येक बिंदु से औसतन 20 प्रश्न पूछे जाएंगे। इस परीक्षा के जानकार लोगों को अच्छी तरह मालूम है कि जिस परीक्षा में हर साल लगभग चार लाख विद्यार्थी बैठते हों और जिसमें औसतन बारह हजार विद्यार्थियों का चयन होता हो, वहां एक-एक नंबर का अंतर कितना मायने रखता है। इस पेपर का एक प्रश्न दो नंबर का होता है। इस तरह यदि किसी विद्यार्थी की अंग्रेजी अच्छी नहीं है उसके चालीस नंबर पहले ही खत्म हो चुके होंगे। यहां मुद्दा यही है कि अच्छी अंग्रेजी न जानने वाले विद्यार्थी के चयन की संभावना बची ही नहीं रह जाएगी। एप्टीट्यूट टेस्ट के समर्थकों का कहना है कि इसके लिए अंग्रेजी ज्ञान का स्तर केवल दसवीं कक्षा तक का है। यह सही नहीं है। जिस व्यक्ति को बहुत अच्छी अंग्रेजी नहीं आती, उसके लिए इसे हल कर पाना संभव नहीं है। अंग्रेजी के समर्थकों का यह भी कहना है कि अंग्रेजी जाने बिना केंद्र और राज्य का पत्राचार मुश्किल है। इस दलील में भी दम नहीं है। अपने 26 वर्ष के प्रशासकीय जीवन में मैंने 17 साल राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति भवन जैसी सर्वोच्च संस्थाओं में बिताए हैं और मुझे यह कहने में गर्व व आत्मसंतोष का अनुभव हो रहा है कि अंग्रेजी ज्ञान का अभाव मेरे रास्ते में कोई बाधा खड़ा नहीं कर सका। इस संबंध में प्रशासनिक चिंतक फ्रेडरिक रिग्स के विचारों को जानना जरूरी है। उन्होंने प्रशासन के संबंध में पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण की बात कही थी और जिसे पूरी दुनिया ने विशेषकर विकासशील देशों ने खूब सराहा और लागू भी किया। रिग्स के अनुसार किसी भी देश की प्रशासनिक प्रणाली वहां की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों से पैदा होनी चाहिए। इसलिए उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि विकसित देशों का प्रशासनिक स्वरूप विकासशील देशों के लायक नहीं हो सकता। अंग्रेजी का ज्ञान और प्रशासन की योग्यता के समानुपातिक संबंध का सिद्धांत न केवल मूर्खतापूर्ण है, बल्कि घोर षड्यंत्रकारी भी है। सन 1979 से सिविल सेवा परीक्षा के दरवाजे हिंदी एवं भारतीय भाषाओं के लिए खोल दिए गए थे। 2008 की मुख्य परीक्षा के आंकड़ों पर दृष्टिपात करने पर पता चलता है कि सभी के लिए अनिवार्य विषय सामान्य ज्ञान के प्रश्नपत्र में कुल 11,320 विद्यार्थी बैठे थे। इनमें से 5,117 विद्यार्थी हिंदी माध्यम के थे, 5,822 विद्यार्थी अंग्रेजी माध्यम के थे और शेष विद्यार्थी अन्य भाषाओं के थे। ये आंकड़े बताते हैं कि अब हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षा देने वाले परीक्षार्थियों की संख्या आधे से अधिक हो गई है। अंतिम रूप से चयनित विद्यार्थियों का अनुपात भी यही है। स्पष्ट है कि अब जो एप्टीट्यूट टेस्ट लागू किया जा रहा है, उसमें इंग्लिश लैंग्वेज कम्प्रीहेंसिव स्किल को चुपचाप बड़े खूबसूरत तरीके से शामिल कर इन पचास प्रतिशत विद्यार्थियों को हमेशा-हमेशा के लिए बाहर कर देने का एक बौद्धिक षड्यंत्र रचा गया है। सरकार को अपने इस निर्णय पर फिर से विचार करना चाहिए ताकि भारतीय प्रशासन का स्वरूप न बिगड़ जाए और भारतीय प्रशासन भारतीयों के द्वारा और भारतीयों के लिए ही रहे। (लेखक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं)

रविवार, 28 नवंबर 2010

साठे कालेज, मुंबई में राम साहित्य पर अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में आये सभी लोगों को हार्दिक बधाई और धन्यवाद.-शरद आलोक

शुभकामनाएं और बधाई
रामकथा पर आयोजित २ से ४ दिसंबर तक के इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में सभी लोगों का मैं हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ और आप सभी को कार्यक्रम में उपस्थित होने और योगदान के लिए हार्दिक धन्यवाद देता हूँ. साठे कालेज, मुंबई का यह अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार जिसका विषय है 'लोकतंत्र और भारतीय भाषाओँ में राम साहित्य' एक सामयिक प्रेरणात्मक और अनेक उपलब्धियों भरा है जिसने देश-विदेश के बहुत से विद्वतजनों को परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से जोड़ा है, जिससे साठे कालेज का यह अभियान वैश्विक हो गया है, जिसके लिए भी मैं आप सभी का आभारी हूँ. यह एक अंतर्राष्ट्रीय शुरुआत है जो आगे भविष्य में भी जारी रहेगी. इस कार्यक्रम को इतनी संख्या में देश विदेश के विद्वानों, हमारे आदरणीय मंत्रियों, शिक्षकगणों, शोधार्थियों, मीडिया कर्मियों और फिल्म कर्मियों के सम्मिलित होने से इसे विभिन्न रंगों के एक गुलदस्ते में पिरो दिया है जिसकी सुगंध और छटा आगामी सम्मलेन तक बिखरती रहेगी.
मैं नार्वे में रहने वाले भारतीयों और नार्वेजीय मित्रों की तरफ से अपनी संस्था 'भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम' और नार्वे से प्रकाशित पत्रिका 'स्पाइल - दर्पण' की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ. आशा करता हूँ कि आप सभी तीनो दिन उपस्थित रहकर इसे अपने सहयोग से सफल बनायेंगे.

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
अध्यक्ष, भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम
और
संपादक, स्पाइल-दर्पण
Post Box 31, Veitvet
0518 - Oslo
NORWAY
ई-पता: speil.nett@gmail.com
ब्लाग:http://sureshshukla.blogspot.com/

सोमवार, 22 नवंबर 2010

पुराना चित्र नयी यादें -सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

२३ नवम्बर को कानपुर में चन्द्र प्रकाश की शादी और अमृतसर में उल्लास के विवाहोत्सव प़र पार्टी है , बहुत बहुत बधाई-शरद आलोक
चन्द्र प्रकाश का पूजन सफल होगा
चित्र में बाएँ से खड़े चन्द्र प्रकाश के पिता और मेरे भाई रमेश चन्द्र शुक्ल, बहन शैल, दादी किशोरी देवी और नीचे बैठे दीपावली पर पूजा कर रहे चन्द्र प्रकाश जिनका 23 नवम्बर २०१० को विवाह है।

पुराना चित्र नयी यादें
मेरी अपनी शादी का चित्र मई १९७७ का है। ऊपर खड़े हुए बाएँ से मेरी बड़ी चाची (स्वर्गीय), सावित्री बुआ, मेरी भाभी किरण (स्वर्गीय) और बितानिया बुआ नीचे बैठे हुए बाएँ से बड़ी रामरती बुआ, बड़े फूफा राम कुमार अवस्थी, मेरी पत्नी माया और स्वयं मैं
पुराना चित्र नयी यादें
मेरे बचपन में अनेक मित्र थे पर सभी बिछड़ गए। कोई बुलंद शहर , उत्तर प्रदेश में, कोई लखीमपुर खीरी में, तो कोई अमरीका में, तो कोई इस दुनिया से विदा हो गए जिनमें विजय सिंह और पंकज सिंह। ये सभी मित्र लखनऊ के ऐशबाग पुरानी श्रमिक बस्ती में मेरे साथ खेला करते थे। जो नहीं होता है वह अधिक याद आता है और जो पास होता है उसे हम भूल जाते हैं। यह कोई नयी बात नहीं है।
ज्ञानयुग के कर्म आंगन में हम चिडयों की तरह दाने भी नहीं चुग पाते और परेशान रहते हैं की मेरे आँगन से दूसरा दाना न चुग जाए। अभी कल की बात है ओस्लो स्थित गुरुद्वारा में गुरुनानक देव जी का जन्मदिन मनाया जा रहा था। मैं भी वहाँ उपस्थित था। एक ग्रन्थी जी ने प्रवचन में गुरुनानक देव जी की एक घटना सुनाई। शायद वह घटना कुछ इस तरह थी। बाबा गुरुनानक देव जी को एक अमीर आदमी ने आदर पूर्वक बुलाया जिसने बहुत धन - दौलत एकत्र कर रखी थी। जाते समय उस अमीर आदमी ने गुरुनानक देव जी से कहा, मुझे कोई ऐसा उपहार दीजिये जिसे मैं अपने साथ सदा रख सकूं।' गुरुनानक देव जी ने उसे एक सुई दी और कहा, 'यह सुई जब तुम दुनिया से विदा होना तो इसे भी साथ लेते जाना।' कहकर वह चलने लगे ।
उस व्यक्ति ने थोड़ा विचार किया। कैसे संभव है? मरते समय सुई मैं साथ ले जा सकूंगा ? कैसे याद रखूंगा और कैसे ले जा सकूंगा? वह व्यक्ति गुरुनानक देव जी की ओर दौड़कर गया और पूछा ,'महाराज कैसे मैं सुई साथ ले जा सकूंगा। मुझे तो अपना ही होश नहीं रहेगा।'
तब गुरुनानक देव जी ने कहा, 'जो तुमने इतना धन कमाया और अपने निजी सबंधियों के पास जोड़कर रखा क्या उसे साथ ले जा सकोगे? यदि हाँ तो मेरी सुई भी लेते जाना।' उस अमीर आदमी को समझ में आ गया।
गुरुनानक देव सबसे बड़े शिक्षक थे।
मैंने नार्वे से भारत जाने का टिकट आरक्षित करा रखा था। पर अवकाश के न मिलने के कारण २१ को भारत में उल्लास की शादी में और २३ को चन्द्र प्रकाश की शादी में नहीं जा सका। समय-समय की बात होती है। समय से सीखना चाहिए न ही उसे टटोलना चाहिए। समय एक सा नहीं रहता और किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।
चन्द्र प्रकाश अपना वैवाहिक जीवन आरम्भ करें, सुखी रहें, संघर्ष करें और आत्मनिर्भर बनें। बिना आत्मनिर्भरता के स्वाभिमान और स्वतंत्रता से व्यक्ति नहीं जी सकता। कभी-कभी हमको उन लोगों के बंधन में रहना पड़ता है जो खुद दूसरों के गुलाम होते हैं। क्षणिक सुख और दोहरी सोच: जैसे अपने लिए आजादी और दूसरों के लिए बंधन पूर्ण जीवन। विवाह का समय आत्ममंथन का समय होता है। धन से कोई किसी को नहीं खरीद सकता है। बीमार होने पर अपने ही परिजन आपसे आपके चेक में आपकी इच्छा के मुताबिक हस्ताक्षर करने देंगे। कर्म, कृपा और ज्ञान का ऐसा समुद्र यदि हम अपने आपमें भर सकें तो अवश्य ही धनी से बेहतर सोच और अधिक उपकारी हो सकते हैं जिससे मन में स्वच्छता और शान्ति ख़ुशी प्रदान करेगी।
व्यक्ति को अपने प्रयोग भी करने चाहिए। सौ-सौ चूहे बहुतों ने मारे हैं पर वह अच्छे उपदेशी या हमारे नायक नहीं हो सकते। हम अपने नायक स्वयं बन सकते हैं। दूसरों पर अपनी सोच थोप नहीं सकते।
ख़ुशी के माहौल में, परिवार के साथ होने से कितना सुखकर लगता है, काश वे जो इस दुनिया में नहीं हैं पर इच्छा होती है काश वे भी साथ-साथ होते तो क्या कहना था। जो आज साथ हैं कल साथ छोड़ देंगे। स्वयं या समय के साथ आदमी बूढा होता है। नवविवाहित प्राय हमेशा साथ रहते हैं शेष लोग तो आते जाते रहेंगे। जैसे चन्द्र प्रकाश और नयी जीवन संगिनी के साथ अपना सुखी जीवन बिताएंगे।
उल्लास जी भी अपने उदार मातापिता के साथ अपनी सांस्कृतिक मूल्यों के साथ हंसी ख़ुशी जीवन जियेंगे। हमने तो एक ही खतरनाक रात उल्लास के साथ उनके पिता प्रोफ़ेसर बेदीजी, दिवाकर जी के साथ बिताई थी जिसमें संजय भी साथ थे। आदमी को जीवन में सुख -दुःख की अनगिनत रातें अपने जीवनसाथी के साथ बितानी होती हैं। जो संयम से उन्हें बिता लेता है वही सफल होता है।
छिप-छिपकर तो अपने प्रेमी से सभी मिलते होंगे। पर सभी को पता होता है बस मन का भ्रम और आडम्बर दूसरे के लिए नहीं पर अपने लिए होता है।
मेरे बाबा (दादा) कहा करते थे की राजनीति और नेतागिरी घर से शुरू करनी चाहिए। कोई भी सुधार अपने घर से शुरू होता है। मेरे बाबा ने अपने गावं में कुआं और मंदिर बनवाया जबकि उनके पास इतने पैसे नहीं थे। उनकी नयी पीढ़ी ने न ही उनके नाम से या अपने वा जनता के लिए कुछ ठोस किया है जबकि सभी अपने-अपने तरीके से समृद्धि वाले हैं। यहाँ तक हमारे बाप दादा का दिया हुआ हमारे परिजनों के पास बहुत है। मेरे पास भी उनका कम आशीष नहीं है जिनकी प्रेरणा से समय -समय पर उनके नाम से गरीबों और प्रतिभाशाली लोगों को सम्मानित कर अपने कम ज्ञान पर पर्दा डालता रहता हूँ।
अपनी गोदावरी बुआ, बड़ी चाची, अपनी किरण भाभी जी, अपनी माँ और पिताजी तब बहुत याद आते हैं जब परिवार में किसी घर में काम -काज होता है। तीज त्यौहार होते हैं। माँ आ नहीं सकती पर लगता है की मुसीबत के समय पुकारूँगा तब वह रक्षा करेगी। यही है अंतर्मन के विचार का क्रम।

रविवार, 21 नवंबर 2010

शातानोफ़ में संगीत का कार्यक्रम जान दित्ता के साथ-सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

शातानोफ़ में संगीत का कार्यक्रम जान दित्ता के साथ

शातानोफ़, मयुरस्तुआ, ओस्लो में गीत संगीत का कार्यक्रम के बाद लिया चित्र
चित्र में बाएँ से उस्ताद शब्बीर हुसैन, बाल कलाकार, जान दित्ता, पंडित पुरुषोत्तम मेहता और पीछे श्री गणेश कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए
19 नवम्बर को शातानोफ़ में एक कार्यक्रम के बाद बाएँ से एक सोमालिया के गिटारवादक, गणेश श्री लंका के सितारवादक, पकिस्तान के प्रसिद्ध तबला वादक शब्बीर हुसैन, जन दित्ता 'दीवाना', पंडित पुरुषोत्तम मेहता, रोगर एवंस, सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक ' और राय भट्टी
१९ नवम्बर की शाम को ही एक संगीत का कार्यक्रम संपन्न हुआ। नार्वे में रहने वाले प्रवासी भारतीय जान दित्ता जो एक गायक हैं और संगीतकार हैं उसके संयोजक थे। इस कार्यक्रम में भारत के जाने माने संगीतकार-सितारवादक पंडित पुरुषोत्तम मेहता और पाकिस्तान के जाने माने तबला वादक उस्ताद शब्बीर हुसैन जी थे। नार्वे में रहने वाले एक अन्य गिटार वादक श्री गनेस थे जो श्री लंका मूल के थे।
जान दित्ता
ने अनेक कार्यक्रमों में गजल -गीत सत्स्वर गाये और महान संगीतकारों ने उनकी शानदार संगत की। कार्यक्रम ने सबका मन मोह लिया। उस समय तो कार्यक्रम अपनी बहुत उंचाई पर था जब पंडित पुरुषोत्तम जी के सितार का तार टूट गया और वह बिना श्रोताओं के मसूस किये हुए संगीत का अति सुन्दर राग झोंझाटी बजाते रहे। इसमें कोई शक नहीं पंडित पुरुषोत्तम मेहता एक बड़े संगीतकार हैं जिनका सम्बन्ध भारत के पंजाब प्रान्त से है। पाकिस्तान के शब्बीर हुसैन ने मुझे बताया, की वह भारत और पाकिस्तान की दोस्ती को मजबूत करने और शान्ति के लिए कार्यक्रम देने आये हैं जिन्होंने बहुत खूबसूरती से संगत दी।
कार्यक्रम में रोगर एवंस, सुरेशचन्द्र शुक्ल, राजकुमार और राय भट्टी जी के साथ -साथ बहुत संख्या में दर्शक गण उपस्थित थे।

नार्वे में नानक जयंती धूमधाम से संपन्न- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

महान गुरुनानक देव जी सबसे बड़े अध्यापक थे


ओस्लो में शब्द कीर्तन करते ग्रन्थी जन


चित्र में ओस्लो के गुरुद्वारे में भक्तजन जिसमें बहुत से नार्वेजीय विद्यार्थी भी दिखाई दे रहे हैं
नार्वे में नानक जयंती धूमधाम से संपन्न- शरद आलोक
आज पूरे विश्व में गुरुनानक जयंती मनाई जा रही है। ओस्लो और द्रामिन स्थित गुरुद्वारों में सभी ने महान गुरु गुरुनानक देव जी का जन्मदिन कीरत, भजन और शब्-वाणी के साथ मनाया। वास्तव में गुरुनानक देव जी सबसे बड़े अध्यापक थे। उन्होंने बिना भेदभाव के सभी को बहुत सरलता और प्रभावशाली ढंग से नम्रता और कृपालु होते हुए शिक्षा दी और जिससे बहुत से मनुष्यों और समाज का भला हुआ। सभी को बहुत बहुत बधाई।
कुछ चित्र ओस्लो के गुरुनानक देव गुरुद्वारा में आज लिए गए हैं यहाँ प्रस्तुत हैं।

Øst Norskebokdag i Oslo पूर्व नार्वेजीय पुस्तक दिवस ओस्लो में -शरद आलोक

पूर्व नार्वेजीय पुस्तक दिवस ओस्लो में -शरद आलोक Øst norske bokdag i Olso
चित्र में बाएँ से इनग्रीद अन्नेस्ताद, सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक ', थूरगाइर रेबोलेदो पेदेरसेन, लेने बौगस्त्यो, थूर स्योरहाइम और विग्दिस युर्ट ( Fra venstre Ingrid Z Aanestad, Suresh Chandra Shukla, Torgeir Rebolledo Pedersen, Linebaugstø, Thor Sørheim og Vigdis Hjort)
१९ से २० नवम्बर तक पूर्व नावेजीय पुस्तक दिवस ओस्लो के लिटरेचर हॉउस में मनाया गया। पुस्ताक्दिवास में उस वर्ष छपी पुस्तकों के लेखकों द्वारा अपनी पुस्तक से कुछ अंश पढ़ने का अवसर मिलता है। इसका आयोजन नार्वेजीय लेखक सेंटर ने किया था।

शनिवार, 20 नवंबर 2010

१९ नवम्बर, इंदिरा गाँधी जी का जन्मदिन है. इंदिरा जी को कभी भुला नहीं सकता-शरद आलोक

१९ नवम्बर को इंदिरा गांधी का जन्म दिन है -शरद आलोक






इंदिरा जी को कभी भुला नहीं सकता-शरद आलोक
चालीस वर्षों पहले की बात है, सन १९७० की। मेरे बड़े भाई अभी साईकिल की विश्व यात्रा पर निकले थे। कोलकाता से वह लखनऊ आये थे। उसके बाद उनके कुछ मित्र उन्हें कानपुर तक छोड़ने गए थे। मैं भी उन्हें अमौसी तक छोड़ने गया था। अमौसी हवाई अड्डे पर हम गए। उस समय अमौसी हवाई अड्डे पर आप बिना रोक-टोक के आप हवाई पट्टी तक जा सकते थे जहाँ निजी जहाज उतरते थे। या यह कहें की हम बिना रोक टोक के एक मित्र के साथ उस ओर बढे थे जहां कुछ लोग एकत्र थे एक हेलीकाप्टर आकर रुका था। पता चला था कि श्रीमती इंदिरा गाँधी जी आयी हैं। जब पास पहुंचा तो सुरक्षा कर्मचारी से बातचीत कर रहा था। और उनसे इच्छा प्रकट की की उनसे मिलना चाहता हूँ। मैं बड़ा भाग्यशाली अपने आपको समझ रहा था जब मुझे उनसे हाथ मिलाने की अनुमति मिल गयी। एक तरफ बड़े भाई से छूटने का दुःख था तो दूसरी तरफ इंदिरा जी से मिलने की ख़ुशी थी। इसके पहले इंदिरा जी को लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में भाषण देते हुए सुना था।
इसके बाद जब मैं सन १९७१ में रेलवे अस्पताल चारबाग में इलाज करा रहा था। पता चला इंदिराजी अस्पताल के बाहर से होकर गुजरेंगी। प्रातः पांच बजे इंदिरा जी को फूल भेंट करने का अवसर मिला था। तीसरी बार इंदिरा जी जब नार्वे आयी थीं तब उनसे मिलने का अवसर मिला था। सन १९८३ की बात है उस समय मेरा एक चित्र आदरणीय इंदिरा जी और नार्वे के तत्कालीन प्रधानमंत्री आदरणीय कोरे विलोक के साथ यहाँ के सबसे बड़े समाचारपत्र अफतेन में छपा था। मैं उस समय नार्वे में प्रवासी भारतीयों की पत्रिका 'परिचय' का संपादक था ।
सदी की नौंवी सबसे शक्तिशाली महिला इंदिरा गांधी
दुनिया के किसी भी देश की सबसे लंबे समय तक महिला प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी को टाइम पत्रिका ने पिछली सदी की सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची में नौंवे स्थान पर रखा है। इस सूची में मदर टेरेसा भी शामिल हैं।
सूची 25 मोस्ट पॉवरफुल वुमेन ऑफ द पास्ट सेंचुरी में शीर्षस्थ स्थान पर जेन एडम्स को रखा गया है। नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली अमेरिकी महिला जेन महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर मुखरता से बोलने वाली वकील हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन को छठे स्थान पर रखा गया है।
इस सूची में इंदिरा गांधी और मदर टेरेसा को छोड़कर भारतीय उपमहाद्वीप से और कोई महिला स्थान नहीं बना सकी। मदर टेरेसा को 22वें स्थान पर रखा गया है।पत्रिका ने कहा है, वह देश की बेटी थीं, जिनका लालन-पालन अपने पिता और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की देखरेख में हुआ।
इंदिरा गांधी 1966 में जब प्रधानमंत्री बनीं थीं तो टाइम पत्रिका ने अपने लेख का शीर्षक दिया था, समस्याग्रस्त भारत की कमान एक महिला के हाथ में। टाइम ने कहा है कि उन सधे हुए हाथों ने भारत को चलाया, मंदी, अकाल, देश का पहला परमाणु बम विस्फोट, एक भ्रष्टाचार कांड और पड़ोसी देश पाकिस्तान में गृह युद्ध, इसके बाद भी उनके नेतृत्व में एक नए देश बांग्लादेश का निर्माण हुआ।
पत्रिका के मुताबिक जिस समय इंदिरा की हत्या हुई, उस समय वह सबसे लंबे समय तक राज करने वाली महिला थीं, ऐसा ताज, जिस पर वह आज तक काबिज हैं। सूची में मैरी क्यूरी, मैडोना, गोल्डा मेयर, एंजेला मर्केल, मार्गेट्र थैचर, ओपरा विन्फ्रे और वर्जीनिया वूल्फ को भी जगह मिली है।

नार्वे में नेहरु जयंती -शरद आलोक


नार्वे में नेहरु जयंती -शरद आलोक

१४ नवम्बर, वाइतवेत कल्चर सेंटर (सांस्कृतिक केंद्र) ओस्लो, नार्वे में नेहरु जयंती बहुत धूमधाम से मनाई गयी।
स्थानीय मेयर थूरस्ताइन विंगेर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे जिन्होंने नेहरु जी के जीवन पर प्रकाश डाला और कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम के अध्यक्ष सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ने की। नेहरूजी का जन्मदिन बालदिवस के रूप में भी मनाया जाता है। बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम में उपस्थित सभी बच्चों को ५० क्रोनर उपहार स्वरूप दिए गए।

सोमवार, 15 नवंबर 2010

(बर्मा) आंग सन सू ची की रिहाई से पूरे संसार में ख़ुशी- शरद आलोक


आंग सन सू ची की नजरबंदी से 13 नवम्बर को रिहाई होने से पूरे विश्व में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। आंग सन सू ची अब गांधी जी की राह पर चलेंगी और शान्तिपूर्ण क्रांति चाहती हैं बर्मा की लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि वो शांतिपूर्ण क्रांति चाहती हैं.
आंग सान सू ची को शनिवार को सात साल की नज़रबंदी के बाद रिहा कर दिया गया था.
उन्होंने कहा कि वो ये मानती हैं कि बर्मा में लोकतंत्र आएगा लेकिन वो ये नहीं जानती हैं कि इसमें कितना वक़्त लगेगा.
सू ची ने कहा कि वो बर्मा की सत्ता चला रहे जनरल अगर चाहेंगे तो वो उनसे भी बात करना चाहेंगी.
उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि उनकी रिहाई को लेकर कोई शर्त नहीं थी और उनकी गतिविधियों पर कोई प्रतिबंध नहीं है.
साथ ही सू ची ने कहा कि अगर सरकार उन्हें दोबारा बंद करना चाहेगी तो वो उसके लिए तैयार हैं.
उनका कहना था, “मैं ये नहीं सोचती कि मैं ऐसा नहीं करूंगी या वैसा नहीं करूंगी क्योंकि वो फिर मुझे नज़रबंद कर देंगे. लेकिन मैं जानती हूं कि ऐसी संभावना हमेशा रहेगी कि मुझे फिर से गिरफ़्तार कर लिया जाए.”
जनता से संवाद
शनिवार को उन्होंने कहा था कि अगला क़दम उठाने से पहले वो ये जानना चाहेंगी कि बर्मा की जनता क्या चाहती है.
आंग सान सू ची
उन्होंने कहा था, “मुझे सबसे पहला काम ये करना है कि बर्मा के लोगों की बात सुननी है. मैं दूसरे देशों की बात भी सुनना चाहती हूं कि वो हमारे लिए क्या कर सकते हैं. उसके बाद ऐसा रास्ता निकालना है जो अधिकतर लोगों को स्वीकार्य हो.”
नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी की नेता सू ची ने कहा कि उनकी पार्टी हाल में हुए चुनाव में धांधली के आरोपों की जांच कर रही है.
उनका कहना था, “जैसा मैंने सुना है कि इस चुनाव की निष्पक्षता के बारे में बहुत से सवाल उठाए जा रहे हैं और मतदान में धांधली के भी कई आरोप हैं. एनएलडी की एक समिति का गठन किया गया है जो इन आरोपों की जांच करेगी और अपनी रिपोर्ट प्रकाशित करेगी."
ये पूछे जाने पर कि क्या उनकी पार्टी का चुनाव में हिस्सा न लेने का निर्णय सही था, उन्होंने कहा कि उनके विचार में ये फ़ैसला सही था.

रविवार, 7 नवंबर 2010

14 नवम्बर को समय अपरान्ह तीन (15:00) बजे नेहरु जयंती वाइतवेत, ओस्लो में

आमंत्रण पत्र INVITASJON
जवाहर लाल नेहरु जयंती Forfatterkafe markerer Nehrus fødselsdag
भारतीय-नार्वेजीय सूचना और सांस्कृतिक फोरम आपको भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के जन्मदिवस पर सादर आमंत्रित करता है।
14 जनवरी 15:00 बजे से 18:00 बजे तक
स्थान : SFO/Veitvetkultursenter (वाइतवेत स्कूल के पीछे), ओस्लो Oslo
अधिक सूचना के लिए आप संपर्क कीजिये:
Suresh Chandra Shukla फोन नंबर- 22 25 51 57

वाइतवेत, ओस्लो में दीवाली - शरद आलोक

वाइतवेत, ओसलो, नार्वे में ६ नवम्बर को दीवाली पर्व धूमधाम से मनाया गया . कुछ चित्र प्रेषित हैं :
बाल-युवाओं का नृत्य, प्रश्नोत्तरी और अन्त्याक्षरी मुख्य आकर्षण के केंद्र बिंदु थे।


शरद आलोक बाल-युवाओं के साथ


अनुराग विद्यार्थी का प्रस्तुतिकरण सराहनीय रहा

विशिष्ट परिधानों में महिलायें सबसे आगे थीं


कार्यक्रम के फोटोग्राफर और क्रिकेट खिलाडी आशीष मिश्र के साथ
धन्यवाद की आपने ब्लॉग देखने के लिए समय निकाला।

बिना जमानत बन्द जेल में,जमानत लें वह भाई चाहिए- सुरेश चन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

आज भी दुनिया की जेल में हजारों इंसान जेलों में इस लिए बन्द हैं कि उनकी जमानत लेने वाला कोई नहीं है। उनकी सुधी लेने वाला उन्हें न्याय दिलाने वाला कोई नहीं है। उनमे अधिकांश संख्या बहनों की है।
आज भैया दूज पर उन्हीं बहनों का स्मरण करते हुए उन्हें ही समर्पित कर्ता हूँ ढेरों सारी शुभकामनाएं.

दुनिया में जिनका कोई नहीं
उन बहनों को भाई चाहिए!

बिना जमानत बन्द जेल में,
उन बहनों को मुक्ति चाहिए।
भाई-दूज, रक्षा बंधन को

जमानत लें वे भाई चाहिए।।

इस बार मैं उन सभी बहनों को नमन कर्ता हूँ जो हिम्मत से अपनी बहुत कष्टमय जिन्दगी बिता रही हैं। विशेषकर जो दुनिया की तमाम जेलों में बन्द हैं, बंधक मजदूर हैं उन्हें बहुत बहुत -बहुत शुभकामनाएं और उनकी मुक्ति के लिए इश्वर से प्रार्थना और उन बहनों को धैर्य और हिम्मत मिले अपनी मुक्ति के संघर्ष में।
भैयादूज पर उन सभी बहनों को कारागारों में बन्द हैं, अस्पताल में भर्ती हैं या दुखी हैं उन्हें रक्षा बंधन पर बधाई।
सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
ओस्लो, नार्वे

जिनके घर में न दीप न बाती, उनके घर में दीप जलाना- शरद आलोक

जिनके घर में न दीप न बाती, उनके घर में दीप जलाना- शरद आलोक
दीपावली पर्व पर सपरिवार आपका हमारी शुभ कामना है!
जिनके घर में, न दीप न बाती
उनके घर भी दीप जलाना
जीवन में नव खुशिया लाये
पर्व प्रकाश का तिमिर हटाये.
अपनों को तुम भूल न जाना
दीन-दुखी को गले लगाना.
जिनके घर में, न दीप न बाती
उनके घर भी दीप जलाना
महाशक्ति लघु होते देखा
घमंड का सर नीचा देखा।
दीप तले अंधियारा रहता,
देता उजियारा अनजाना।
जिनके घर में, न दीप न बाती
उनके घर भी दीप जलाना!!
आप अपने परिवार के साथ सदा सुखी एवं प्रसन्न रहें, इसी मंगल कामना के साथ,
सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ओस्लो, नार्वे

शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

भारत में प्रेस स्वतंत्रता- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

भारत में प्रेस स्वतंत्रता- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' (लेख नीचे दिया है)
सोहन लाल सुखाड़िया विश्व विद्यालय में हिंदी दिवस (१४ सितम्बर) पर आयोजित गोष्ठी

मंच पर बाएँ से डॉ आशीष सिसोदिया, प्रो नवीन नंदवाना शरद आलोक और माइक पर प्रो नीतू परमार
अधिक चित्र देखने के लिए कृपया नीचे दिए लिंक पर दबाएँ:
http://picasaweb।google.no/speil.nett/2010KanpurAurUdaypurUniversity#
क्षत्रपति साहूजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर में
भावी पत्रकारों (शिक्षार्थियों) और मीडियाकर्मियों के साथ
कानपुर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में २१ सितम्बर २०१० को व्याख्यान के बाद प्रो अरविन्द सिंह के कक्ष में चित्र
भारत में प्रेस स्वतंत्रता- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
भारत एक प्रजातंत्र है। संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबन्ध के लिए तो अनेक उपाय बताये गए हैं जबकि प्रेस स्वतंत्रता का अलग कोई अध्याय नहीं है। संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में दिए गए १९ ग के अंतर्गत बोलने की आजादी की तरह प्रेस स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। भारतीय संविधान में भी प्रेस की स्वतंत्रता का एक अलग अध्याय होता तो क्या कहने थे। जो भी हो भारत में अच्छी खासी प्रेस स्वतंत्रता है।
प्रेस आजादी में भारत १२२ वें स्थान पर
मुझे कानपुर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग में प्रोअरविन्द सिंह और डॉ योगेन्द्र प्रताप सिंह के सानिध्य में २१ सितम्बर २०१० को और १४ सितम्बर को हिंदी दिवस पर मोहन लाला सुखाड़िया विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रो नवीन नन्दवाना के सानिध्य में हिंदी पत्रकारिता और उसमें निरंतर बढ़ रहे पाठकों की संख्या पर विचार रखने का अवसर मिला। शिक्षार्थियों के अतिरिक्त अध्यापकों का भी उत्साह देखते नहीं बनता था जो हिंदी को रोजगार की भविष्य की भाषा बनाने में सहयोग देगी।
हिंदी का प्रचार-प्रसार देश विदेश में बहुत तेजी से बढ़ रहा है जो उसके लिए उज्जवल भविष्य का संकेत है।
पत्रकार संगठन रिपोर्टर विदाउट बोर्डर्स ने कुछ यूरोपीय देशों में प्रेस पर बढ़ते नियंत्रण की आलोचना की है, लेकिन छह देशों की प्रेस स्वतंत्रता के लिए सराहना की है। प्रेस की आजादी पर न्यूयार्क से रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर्स ने कहा है कि फिनलैंड, आइसलैंड, नीडरलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और स्विट्जरलैंड 2002 में सूची की शुरू होने के बाद से ही चोटी पर है। पत्रकार संगठन का कहना है कि इसके साथ वे पत्रकारों के सम्मान और मीडिया की सुरक्षा में अनुकरणीय उदाहरण हैं।पत्रकार संगठन का कहना है कि इसके विपरीत यूरोपीय संघ मीडिया की आजादी के सवाल पर नेतृत्व खोने के खतरे में है। हालाँकि यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों में से 13 रिपोर्टर विदाउट बोर्डर्स की सूची में पहले 20 में शामिल हैं, लेकिन बाकी 14 सूची में बहुत नीचे हैं।यूरोपीय संघ के महत्वपूर्ण सदस्यों में शामिल फ्रांस 44वें, इटली 49वें, रुमानिया 52वें और ग्रीस तथा बुल्गारिया बेनिनकेन्या और कोमोरोन के साथ 70वें स्थान पर हैं। जर्मनी की स्थिति पिछले साल के मुकाबले सुधरी है और वह 17वें स्थान पर पहुँच गया है जबकि अमेरिका 20वें स्थान पर है। भारत 17 स्थान गिरकर 122वें स्थान पर पहुँच गया है।रिपोर्टर विदाउट बोर्डर्स के महासचिव जाँ फ्रांसोआ यूलियार्ड का कहना है कि प्रेस की आजादी की रक्षा एक संघर्ष बना हुआ है। पुराने यूरोप के लोकतांत्रिक देशों में चौकन्ना रहने का संघर्ष और विश्व भर के निरंकुश शासनों में दमन और अन्याय के खिलाफ संघर्ष।उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और ब्लॉगरों की स्थिति संस्था के लिए स्थायी चिंता की वजह है। जूलियार्ड ने चीन से नोबेल पुरस्कार विजेता लिऊ शियाओबो को रिहा करने की माँग की। 178 देशों की सूची में चीन 171वें स्थान पर है।

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

Oslo 12 October ओस्लो में आम सभा - शरद आलोक

ओस्लो में आमसभा
हाइकी होल्मोस Heikki Holmås, शरद आलोक, औदुन लीसबाकेन Audun Lysbakken एक प्रतिनिधि

नार्वे के विदेश मंत्री से हाथ मिलाते हुए सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
आज ओस्लो में आम सभा में नार्वे के विदेशमंत्री यूनास गाह्र स्त्योरे, बाल विकास और समन्वय मंत्री औदुन लीसबाकेन, ओस्लो नगर सरकार के स्तियान बर्गेर और बहुत से लोगों ने हिस्सा लिया। नार्वे के विकास, बहुसंस्कृति, समय और समाधान पर बातें की गयीं। पूरा हाल भरा था। संवाद बहुत महत्त्वपूर्ण और आवश्यक था। भारत में भी ऐसी बैठकें होनी चाहिए जहाँ आपस में ईमानदारी से संवाद हो और समस्याओं पर विचार किया जाए और उन्हें हाल करने का रास्ता मिलकर निकाला जाए। विदेश मंत्री, बाल एवं समन्वय मंत्री तथा सांसद और डिप्टी मिनिस्टर हैकि से बातचीत हुई जो बहुत सार्थक रही।
हाइकी हमारे लेखक सेमिनार में आये थे।



सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

चीन के जेल में बन्द लू शिआबो को शान्ति का नोबेल पुरस्कार मिलेगा-शरद आलोक

चीन के जेल में बन्द लू शिआबो को शान्ति का नोबेल पुरस्कार मिलेगा-शरद आलोक

लू शिआबो को शान्ति का नोबेल पुरस्कार मिलेगा, यह सूचना नार्वे में नोबेल शान्ति समिति के अध्यक्ष और यूरोपीय समूह के महामंत्री थूरब्योर्न याग्लंद ने १० अक्टूबर को ग्यारह बजे एक प्रेस कांफ्रेंस में दी।
इसका जोरदार विरोध चीन ने किया है जो सरासर गलत है। एक तरफ चीन सुपर ताकत बनना चाहता है पर सुपर पावर जैसी हरकत नहीं कर रहा। मानवाधिकार का सम्मान और दूसरे स्वतन्त्र संस्थाओं में दखलंदाजी अशोभनीय है जो चीन को भारत से सीखना चाहिए।

पत्नी भी नज़रबंद
इस बीच लू श्याबाओ की पत्नी को भी नज़रबंद कर दिया गया है जबकि श्याबाओ ख़ुद चीन की जेल में बंद हैं, उन्होंने नोबेल पुरस्कार थ्येन आन मन चौक की गोलीबारी मारे गए 'शहीदों के नाम' कर दिया है.
श्याबाओ की पत्नी लू च्याई के वकील ने कहा है कि उनसे संपर्क करना संभव नहीं हो पा रहा है क्योंकि उनके घर का फ़ोन काट दिया गया है और उनके घर के बाहर मौजूद पत्रकारों को उनसे बात करने की अनुमति नहीं है.
चीन ने श्याबाओ को नोबेल पुरस्कार दिए जाने की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि "यह नोबेल सम्मान के मूल सिद्धांतों के विपरीत निर्णय है".
नामांकन की ख़बर आने के बाद ही चीन ने नॉर्वे के राजदूत को बुलाकर चेतावनी दी थी कि अगर श्याबाओ को नोबेल पुरस्कार दिया गया तो इससे दोनों देशों के संबंध ख़राब हो सकते हैं.
श्याबाओ को 2009 में ग्यारह वर्ष के कारावास की सज़ा सुनाई गई थी, उन पर देश में विद्रोह भड़काने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया है।
चीन का विरोध गलत - दलाई लामा
चीन की सरकार ने कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की आवाजाही पर रोक लगाई है और देश में नोबेल पुरस्कार के बारे में किसी तरह के इंटरनेट चैट पर पाबंदी लगा दी गई है.
तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा को नोबेल पुरस्कार दिए जाने पर भी चीन ने कड़ा एतराज़ जताया था।
नोबेल पुरस्कार समिति का दफ़्तर नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में है लेकिन नोबेल समिति नॉर्वे की सरकार के नियंत्रण से बाहर है, नोबेल पुरस्कार समिति कह चुकी है कि वह अपने निर्णय किसी के दबाव में नहीं करेगी.
तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा ने मानवाधिकार कार्यकर्ता लू श्याबाओ को नोबेल पुरस्कार दिए जाने पर चीन के विरोध को ग़लत ठहराया है.
निर्वासन में भारत में रहने वाले दलाई लामा ने कहा, "चीन अलग तरह के विचारों का सम्मान नहीं करता है."
एक जापानी समाचार पत्र को दिए गए इंटरव्यू में दलाई लामा ने कहा कि "अगर चीन एक खुले समाज का निर्माण करता है तभी सबका भला हो सकता है।"
नार्वे के साथ चीन की बैठक रद्द
नार्वे की मंत्री चीन जाने वाली थीं और उनकी बैठक चीन के उच्च स्तर के राजनयिकों से होनी थी। पर विश्ववस्थ सूत्रों से ज्ञात हुआ है की अब यह बैठक फिलहाल रुक गयी है।

पेरू के मारियो वर्गास लिओसा को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिलेगा-शरद आलोक

स्टाकहोम, ८ अक्टूबर २०१० स्वीडीय अकादमी (साहित्य) ने घोषणा की है की मारियो लिओसा को साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार दिया जाएगा। - शरद आलोक
यह एक अच्छा निर्णय है। इससे लेटीन अमरीकी (दक्षिण अमेरिकाई देशों) देशों में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी है। मेरी अग्रिम बधाई।
पेरू के लेखक मारियो वर्गास लिओसा को इस साल साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है। 74 वर्षीय लिओसा उपन्यासकार, समालोचक और पत्रकार हैं।वो लातिन अमेरिका के सबसे लोकप्रिय साहित्यकारों में से एक हैं। नोबेल समिति ने उनके साहित्यिक योगदान की जमकर तारीफ की है और उन्हें जन्मजात प्रतिभाशाली कहानी लेखक बताया है।उसका कहना है कि उनका लेखन पाठकों के दिल को छू जाता है। मारियो वर्गास लिओसा ने कहा कि उन्हें पुरस्कार का समाचार पाकर थोड़ा अचंभा हुआ क्योंकि इसके पहले भी उन्हें कई बार इसके लिए नामांकित किया गया था।उनका कहना था कि उन्होंने सोचा कि शायद ये एक मजाक हो। लिओसा टाइम ऑफ द हीरो और कंवेर्शेसन इन कैथ्रेडल जैसे रचनाओं से 1960 में दुनिया की नजर में आए।उन्होंने 30 से अधिक उपन्यास और लेख लिखे हैं। इसके अलावा एक स्तंभकार के रूप में भी उन्होंने वंचित तबके को स्वर देने की कोशिश की है।एक दौरे में वो पेरू में राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल थे, लेकिन 1993 में उन्होंने स्पेन की नागरिकता ग्रहण कर ली।

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

दूसरा दौर बरेली में /ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता अखलाख शहरयार और ओ एन वी कुरूप को बहुत-बहुत बधाई- शरद आलोक

दूसरा दौर बरेली में -सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'


गोयल जी के दूसरे अभिनन्दन ग्रन्थ का लोकार्पण बरेली में
मैं बरेली, (उत्तर प्रदेश) में एक दिन रेलवे स्टेशन पर रेल से उतरा देखा कि फिल्म उमराव जान में गीत लिखने वाले शायर की जन्मभूमि के नगर बरेली में पानी बरस रहा है। उस दिन बरेली के एक दूसरे शायर राम प्रकाश गोयल के दूसरे अभिनन्दन ग्रन्थ का विमोचन और उनके युवा पुत्र विवेक गोयल कि स्मृति में पुरस्कार दिया जाना है। मुझे विशिष्ट अतिथि और गुरुनानक देव विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी प्रोफ़ेसर हर्मेन्द्र सिंह बेदी मुख्य अतिथि थे। मुरादाबाद के जाने माने साहित्यकार महेश दिवाकर भी इस कार्यक्रम में भाग लेने आये थे। यह मेरा बरेली आने का दूसरा मौका था। मेरे मन से अचानक कविता की पंक्तियाँ फूटने लगीं।
'बरेली की भीगी सारी गली,
तिपहिये में बैठे ढूँढें
मझधार में भीगे
बादल गरजे, बिजली चमकी,
सुबह के खाए
शाम के भूखे
मेहमानों की खातिरदारी खली
अपनों से ज्यादा पड़ोसी को फिकर
आँचल में छिपाए महुआ भली
दिवाकर जी के आँगन में बारिश
आदर में सूखी डली।

अपने कोसमझ महा प्राण 'निराला'
भूख गयी सिमटी।
(कार्यक्रम हुआ रेडियो में विदेशों में हिंदी पर साक्षात्कार लिया गया । कार्यक्रम अच्छा था भले ही कार्यक्रम के बाद हवापानी का नाश्ता करके आगे बढ़ना हमारी मजबूरी थी बेदी जी से और दिवाकर जी से बातचीत करने का जो मोह पाल रखा था।)
मोरलिया जी के लोकगीतों की गोरी
ज्यों सावन (साजन) को तरसी
आठ घंटे काली रात में
मार्ग अटपटे, उबड़ -खाबड़
मोटर गिरी मिलीं
बाढ़ नहीं वह काली रात थी
मेहमानों पर गुजरी
उल्लास साथ थे फिर भी
रो हंस रातभर खूब छीटाकशी।

गोयल जी को चैन नींद की
बजी मेरी वंशी
अच्छा होता
पैदल चलते फुटपात छानते
कम से कम वह साथ बिठाते
बचपन के दिन लौट आते तब
उन अमीरन और तुलसी के
फिर चरण धुलाकर
उन्हें पोछते
ऊंचों से ना कभी मिली है
आशा, पानी की गगरी
क्या जाने वह गैरों का मन
जिसने फुत्पात पर ना रात गुजारी.
इसी लिए थी मति गयी मारी
मोटर के आगे रिक्शे छोड़ कर
जब आठ घंटों में सफ़र तय किया
हाय बरेली
अलविदा मुरादाबाद दो पल साथ सही।
जब कभी मिलेंगे
मिलते ही कहेंगे अलविदा।
क्योंकि संगम
मिलन -विरह का मापदंड है
प्रेम की मिली सजा।
हाय बाय का संगम जीवन
सारी दुनिया तारी।
दूसरा दौर बरेली में, रेल में रात गुजारी।
शहरयार बरेली अपना
पर ना करना इससे यारी ।

यह तो बात थी उस रात की जब हमने मुरादाबाद तक जाने में ८ घंटे लगाये और मौत से बार-बार बचे।
आइये कुछ अच्छी खुशहाली की बात करते हैं अपने दोस्त शायर अखलाख मुहम्मद खान शहरयार को और कुरूप जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए नामित किये जाने के लिए बहुत-बहुत बधाई।
उर्दू के नामचीन शायर अखलाक मुहम्मद खान शहरयार को 44वां ज्ञानपीठ पुरस्कार



देने की शुक्रवार को घोषणा की गई। उन्हें यह पुरस्कार वर्ष 2008 के लिए दिया जाएगा। साथ ही मलयालम के प्रसिद्ध कवि व साहित्यकार ओ.एन.वी. कुरुप को वर्ष 2007 के लिए 43वां ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाएगा।
जाने-माने लेखक और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता डॉ. सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता में ज्ञानपीठ चयन समिति की बैठक में दोनों साहित्यकारों को पुरस्कृत करने का निर्णय लिया गया। चयन समिति में प्रो. मैनेजर पांडे, डॉ. के. सच्चिदानंदन, प्रो. गोपीचंद नारंग, गुरदयाल सिंह, केशुभाई देसाई, दिनेश मिश्रा और रवींद्र कालिया शामिल थे। उर्दू के जाने-माने शायर शहरयार का जन्म 1936 में आंवला [बरेली, उत्तरप्रदेश] में हुआ। इस 74 वर्षीय शायर का पूरा नाम कुंवर अखलाक मुहम्मद खान है, लेकिन इन्हें इनके उपनाम शहरयार से ही ज्यादा पहचाना जाना जाता है।
वर्ष 1961 में उर्दू में स्नातकोत्तर डिग्री लेने के बाद उन्होंने 1966 में अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू के लेक्चरर के तौर पर काम शुरू किया। वह यहीं से उर्दू विभाग के अध्यक्ष के तौर पर सेवानिवृत्त भी हुए। बॉलीवुड की कई हिट हिंदी फिल्मों के लिए गीत लिखने वाले शहरयार को सबसे ज्यादा लोकप्रियता 1981 में आई उमराव जान से मिली। इस वक्त की उर्दू शायरी को गढने में अहम भूमिका निभाने वाले शहरयार को उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, दिल्ली उर्दू पुरस्कार और फिराक सम्मान सहित कई पुरस्कारों से नवाजा गया।
वर्ष 2007 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले कुरुप का जन्म 1931 में कोल्लम जिले में हुआ। वह समकालीन मलयालम कविता की आवाज बने। उन्होंने प्रगतिशील लेखक के तौर पर अपने साहित्य सफर की शुरुआत की और वक्त के साथ मानवतावादी विचारधारा को सुदृढ किया। साथ ही सामाजिक सोच और सरोकारों का दामन भी थामे रखा। बाल्मीकि, कालीदास और टैगोर से प्रभावित कुरुप की उज्जयिनी और स्वयंवरम जैसी कविताओं ने मलयालम कविता को समृद्ध किया। उनकी कविता में संगीतमयता के साथ मनोवैज्ञानिक गहराई भी है। कुरुप के अब तक 20 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और उन्होंने गद्य लेखन भी किया है। उनको केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, वयलार पुरस्कार और पद्मश्री से नवाजा गया है।
[शुक्रवार, 24 सितंबर 2010]

सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

रोमन स्कूल, ओस्लो में आमसभा १२ अक्टूबर को नार्वेजीय विदेश मंत्री एवं बाल और समन्वय मंत्री के साथ

रोमन स्कूल, ओस्लो में आमसभा १२ अक्टूबर को शाम 18:00 बजे

नार्वे के विदेश मंत्री यूनास गाह्र स्त्योरे के साथ सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
नार्वेजीय विदेश मंत्री Jonas Gahr Støre एवं बाल और समन्वय मंत्री Audun Lysbakken तथा byrådsleder Stian Berger Røsland के साथ
Folkemøte i Groruddalen
रोमन स्कूल, ओस्लो में आमसभा १२ अक्टूबर को 18:00 नार्वेजीय विदेश मंत्री एवं बाल और समन्वय मंत्री के साथ
Tidspunkt: 12। oktober 2010 kl 18:00 - 20:00Barne-, likestillings- og inkluderingsminister Audun Lysbakken inviterer til folkemøte i Groruddalen। Statsråden ønsker seg meninger, innspill og ideer fra folk som bor i Groruddalen। - Hvordan er det å bo i dalen, hva opptar dere og lever dere godt sammen, spør Lysbakken. Lysbakken ønsker alle interesserte velkomne til debatt for å diskutere hvilken integreringspolitikk vi bør ha. Han ønsker at ulike stemmer og synspunkter kommer fram.- Jeg er opptatt av at alle barn deltar i barnehagen og klarer seg bra på skolen. Jeg ønsker debatt rundt hvordan vi kan bryte ned klasseskillene i Oslo, men også diskusjon rundt mer kontroversielle temaer som bussing og skolegrenser, sier statsråden. Utenriksminister og leder av Aps integreringsutvalg Jonas Gahr Støre og byrådsleder Stian Berger Røsland (H) har så langt takket ja til å sitte i et panel sammen med Audun Lysbakken på folkemøtet. Asta Busingye Lydersen er debattleder.- På folkemøtet er det åpen mikrofon. Jeg vil høre nettopp dine erfaringer og konkrete innspill på utfordringer som dere møter i hverdagen, oppfordrer ministeren.Folkemøtet er på Rommen skole og kultursenter tirsdag 12. oktober kl. 18-20. Det er kapasitet til 300 deltakere.
Røde Kors Ressurssenter tilbyr barnetilsyn under møtet.

Public meeeting at Romman School in Oslo (Folkemøte i Groruddalen)

Folkemøte i Groruddalen
fra venstre en representant fra AUF, minister Audun Lysbakken og Suresh Chandra Shukla
Public meeeting at Romman School in Oslo
Tidspunkt: 12. oktober 2010 kl 18:00 - 20:00
Meet norwegian ministers: Audun Lysbakken (SV), Jonas Gahr Støre(Ap), and byrådsleder Stian Berger Røsland (H)
Folkemøte i Groruddalen Tidspunkt: 12. oktober 2010 kl 18:00 - 20:00Barne-, likestillings- og inkluderingsminister Audun Lysbakken inviterer til folkemøte i Groruddalen. Statsråden ønsker seg meninger, innspill og ideer fra folk som bor i Groruddalen. - Hvordan er det å bo i dalen, hva opptar dere og lever dere godt sammen, spør Lysbakken. Lysbakken ønsker alle interesserte velkomne til debatt for å diskutere hvilken integreringspolitikk vi bør ha. Han ønsker at ulike stemmer og synspunkter kommer fram.- Jeg er opptatt av at alle barn deltar i barnehagen og klarer seg bra på skolen. Jeg ønsker debatt rundt hvordan vi kan bryte ned klasseskillene i Oslo, men også diskusjon rundt mer kontroversielle temaer som bussing og skolegrenser, sier statsråden. Utenriksminister og leder av Aps integreringsutvalg Jonas Gahr Støre og byrådsleder Stian Berger Røsland (H) har så langt takket ja til å sitte i et panel sammen med Audun Lysbakken på folkemøtet. Asta Busingye Lydersen er debattleder.- På folkemøtet er det åpen mikrofon. Jeg vil høre nettopp dine erfaringer og konkrete innspill på utfordringer som dere møter i hverdagen, oppfordrer ministeren.

रविवार, 3 अक्तूबर 2010

ओस्लो में महात्मा गाँधी जी का जन्मदिन मनाया गया

ओस्लो में महात्मा गाँधी जी का जन्मदिन मनाया



भारतीय नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम के तत्वाधान में २ अक्टूबर को ओस्लो में महात्मा गाँधी जी का जन्मदिन मनाया गया। सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ने महात्मा गाँधी पर अपना व्याख्यान दिया और उपस्थित लेखकों में जिन्होंने अपनी कवितायें सुनाई उनमें खास थे राय भट्टी, इन्दरजीत पाल, राजकुमार भट्टी, अनुराग विद्यार्थी, संगीता शुक्ल सीमोनसेन, इंगेर मारिये लिल्लेएन्गेन, माया भारती, शाहेदा बेगम और अन्य ने गांधी जी से सम्बंधित अपने विचार साझा किये।

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

ओस्लो, नार्वे में महात्मा गाँधी का जन्मदिन

आज 2 अक्टूबर को महात्मा गाँधी जी के जन्मदिन पर आप सादर आमंत्रित हैं।



स्थान: Stikk innom स्तिक इनोम , वाइतवेत सेंटर ओस्लो में
समय: शनिवार 2 अक्टूबर को शाम सवा छ बजे 18:15
भवदीय
सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक '
भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम
Indisk-Norsk Informasjons -og Kulturforum
Postboks 31, Veitvet, 0518-Oslo
टेलीफोन : 22 25 51 57

Writers meet celebrate Mahatma Gandhis birthday in Oslo

Mahatma Gandhi


Welcome to writer meet
we celebrete Mahatma Gandhis birth day 2 October.
at Stikk Innom, Veitvet senter, Oslo
Saturday on 2 October 18:15 PM
With Regards
Indo-Norwegian Informations and Cultural Forum
(Indisk-Norsk Informasjons-og Kulturforum
Postboks 31, Veitvet, 0518-oslo, Norway
Mahatma Gandhi

Mohandas Karamchand Gandhi (hindi: मोहनदास करमचन्द गांधी; vanligvis kjent som Mahatma Gandhi; født 2. oktober 1869 i Porbandar i Gujarat, død 30. januar 1948 i New Delhi) var en indisk frigjøringsleder og statsmann, kjent for sin rolle i Indias kamp for uavhengighet fra Storbritannia. Han huskes først og fremst for sin bruk av ikke-voldelige metoder som sivil ulydighet i frigjøringskampen. Den moderne pasifismen bygger i stor grad på Gandhis ikkevoldsfilosofi.
Gandhi regnes som den indiske nasjons far, og hans fødselsdag, 2. oktober, er nasjonal helligdag over hele India.
Innhold
1 Oppvekst
2 Jurist
3 Sør-Afrika
4 Indias frigjøringskamp
5 Satyagraha
5.1 Fredskjempernes moralske kode
5.2 Satyagrahakampanjens steg
5.3 Tre grunnleggende prinsipper i Satyagraha
6 Gandhis død
7 Tilnavnet «Mahatma»
8 Jødeforfølgelser og ikkevold
9 Klassiske sitater
10 Nobels fredspris
11 Utmerkelser
12 Referanser
13 Eksterne lenker




Oppvekst
Mahatma Gandhi ble født i en kjøpmannskaste med troende hinduer. Han ble oppdratt som vegetarianer og giftet seg 13 år gammel med Kasturba (omtales også som Kasturbai eller bare Ba), som han etterhvert fikk fem barn med.
I 1888 forlot Gandhi sin familie og reiste til England for å studere juss. Her fant han en vegetarisk restaurant der han kom i kontakt med tankestrømninger som Madame Blavatskys teosofi som han forteller viste ham dybden i Indias egen religiøse tradisjon. Han ble også interessert i anarkismen til Kropotkin og Tolstoj. Stort inntrykk på ham gjorde dessuten det lille heftet Unto this Last av John Ruskin, som hevder at hvert individ har ansvar for alle sine medskapninger.
Jurist
Gandhi ble sakfører og praktiserte først i Bombay, senere i landsbyen Rajkot. Etter en konfrontasjon med britiske myndigheter valgte han å forlate Britisk India for å ta imot en stilling i Natal i Sørafrika.
Sør-Afrika
I 1893 reiste Gandhi til Sør-Afrika, der han opplevde raseskillepolitikken på nært hold, og begynte å utvikle sine teorier om ikkevold som den mest virkningsfulle form for kamp. Han opprettet organisasjoner som kjempet for indernes rettigheter, og ble ved en anledning nesten drept av en hvit lynsjemobb.
Da regjeringen i Transvaal i 1906 la fram et lovforslag om registrering av innbyggernes etniske tilhørighet, lanserte Gandhi den første omfattende kampanjen basert på sivil ulydighet. Hans tilhengere brøt åpenlyst loven, blant annet ved å nekte å registrere seg, ved å brenne registreringskort, og ved å akseptere myndighetenes straffetiltak uten å svare med vold. Kampanjen varte i 9 år og involverte mange tusen mennesker.
Den politiske kampen var for Gandhi en form for selv-realisering. Som hindu var han overbevist om at alt levende er uløselig knyttet sammen. Enhver vold mot et levende vesen ville derfor være vold også mot ham.
Samtidig som han utviklet sine metoder for ikkevoldelig konfliktløsning, forsøkte Gandhi også å realisere en livsførsel som ikke innebar bruk av vold, og var konsekvent vegetarianer.
Indias frigjøringskamp
I 1915 vendte Gandhi tilbake til India der han ble engasjert i Kongresspartiet, en organisasjon som arbeidet for å frigjøre subkontinentet fra britisk overherredømme. Med sin sterke personlighet kom han snart til å dominere hele bevegelsen, og i 1925 ble han valgt til partiets leder.
Gandhis personlige styrke kom til uttrykk i hans konsekvente og enkle livsstil. Han ville ikke ha personlige eiendeler, spiste enkel kost og gikk bare med et enkelt tøystykke på seg, vevd av tråd han selv hadde spunnet. Han eide lite mer enn en seng, rokken han spant egne klær på, og et par briller.
Parallelt med kampanjene mot britene, sørget Gandhi for at Kongresspartiet organiserte et konstruktivt program; hans mål var å opprette en parallell økonomi slik at inderne kunne slippe å kjøpe britiske varer eller betale skatt til britene. Spesielt berømt er saltmarsjen i 1930. Han ledet da titusener av indere som gikk til fots 400 kilometer fra Ahmedabad til stranda ved Dandi. Der bøyde Gandhi seg ned og plukket opp en håndfull salt. Dette var en direkte provokasjon mot engelskmennene som krevde inn en svært upopulær saltskatt.
Gandhi ble mange ganger arrestert av britene, men i 1931 ble han invitert til å forhandle med den britiske regjering i London. Der oppsøkte han britiske tekstilarbeidere for å forklare at den indiske frigjøringskampen ikke var rettet mot dem. Forhandlingene førte ikke til enighet, og Gandhi fortsatte sin kamp mot britene til uavhengigheten ble oppnådd i 1947.
Satyagraha
Gandhi betegnet sin ikkevoldsteknikk som satyagraha hvilket betyr "å holde fast ved sannheten". (Hans selvbiografi heter "The Story of My Experiments With Truth") [1] Satyagrahabegrepet knytter seg til det spirituelle fundamentet for hans ikkevoldsfilosofi. Det var formulert som en pragmatisk teknikk, en vei som forener politisk kamp med individuell åndelig utvikling.[1].
Satyagraha er sammensatt av Sanskritordene Satya (sannhet[2] [3]] og Graha (fastholde[4]). For Mahatma Gandhi betød Satyagraha mye mer enn passiv motstand og ble uttrykk for styrken i praksisen av ikke-voldelig metoder. Med hans ord:
Sannhet (Satya) innbefatter kjærlighet, og fasthet (agraha) som danner grunnlaget for og tjener som synonym for kraft (motstandskraft). Jeg begynte derfor med å kalle den indiske bevegelsen for Satyagraha, det vil si kraften som er født av Sannhet og Kjærlighet, eller ikke-vold (Ahimsa), og oppga bruken a fraser som «passiv motstand», i forbindelse med det, til en slik grad at vi også i engelsk som oftest unngikk å bruke denne frasen, og brukte heller ordet 'Satyagraha'... «Truth (satya) implies love, and firmness (agraha) engenders and therefore serves as a synonym for force. I thus began to call the Indian movement Satyagraha, that is to say, the Force which is born of Truth and Love or non-violence, and gave up the use of the phrase “passive resistance”, in connection with it, so much so that even in English writing we often avoided it and used instead the word “satyagraha”..».[5]
Fredskjempernes moralske kode
Følgende punkt ble framlagt for de frivillige i bevegelsen av 1930 som kan sies å markere begynnelsen på den ikkevoldelige motstandsbevegelsen mot koloniveldet. Sivil ulydighet forsvares moralsk med disse punktene.
1 La ikke sinne få feste seg, men kjenn smerten av motstanderens sinne. Nekt å svare med samme mynt på motstanderens angrep.
2 Følg ikke noen som helst ordre gitt i opprørthet eller sinne.
3 Unnlat å bruk fornærmelser, nedlatenheter eller bannskap.
4 Beskytt motstanderen fra fornærmelser eller angrep, selv om det skulle være på bekostning av eget liv.
5 Ikke gjør motstand mot arrest eller urettmessig tilegnelse av eiendom.
6 Nekt å oppgi eiendom som andre i tillit har overlatt til din varetekt, om så med ditt liv, men innenfor rammen av ikke-vold.
7 Om du blir tatt i fangenskap, vis eksemplarisk oppførsel.
8 Som medlem i en Satyagrahaenhet, ha glede av å lyde ordre som Satyagrahalederne gir, men gå fullstendig ut av enheten hvis det oppstår seriøs uenighet.
9 Forvent ikke, og la ikke deltakelsen i fredsarbeidet være betinget av at andre skal sørge for dine nødvendigheter. La ikke din delaktighet i kampanjer være avhengig av andre, og sørg for at andre ikke blir skadelidende om du skulle bli satt i fangenskap. Forvent ikke slik støtte, vær uavhengig.
Satyagrahakampanjens steg
Disse ni punktene for den enkelte er de ni stegene Mahatma Gandhi satte opp i tilknytning til ikke-voldelige frigjøringskamper. Skissen menes anvendelig for enhver bevegelse som vokser ut av misnøye med en etablert politisk orden eller andre konfliktsituasjoner. Punktene kan forstås som en kampanjes åpne agenda. Skjult agenda aksepteres ikke, Gandhi mente åpenhet om egne mål og egen taktikk var en viktig del av satyagrah-teknikken.
Disse stegene er framholdt som overførbare til alle former for konfliktsituasjoner med, og frigjøring fra overmakt:
1 Forhandling og megling med nøytral tredjepart.
2 Forbereding av grupper for direkte aksjoner.
3 Agitasjon (kalle folkemengdene til bevegelse).
4 Utledelse av ultimatum. Gi uttrykk for hva en er villig til å ofre.
5 Mane til selvberging - Svadesji: «Å mane forbrukerne til å nytte sin forbrukermakt, være seg bevisst på den volden man forårsaker ved å støtte industri som forårsaker fattigdom, som slavebinder og volder skade på arbeidere, mennesker, dyr og andre levende vesener.» [6]. I mer generelle termer innbefatter disse aksjonsformene økonomisk boikott og streik, men det bør påpekes at Svadesji faktisk i prinsippet ikke er midlertidige sanksjonsformer. Svadesji er selvets land (det frigjorte landet), eller forklart som selvstyrets (Svaraj) sjel.[7]
6 Ikke samarbeid med undertrykkelse og urettferdighet er en intens protest mot både uvitende og uvillet deltagelse i bestialiteten som undertrykkelse og urettferdighet innebærer... Ikke samarbeid med ondskap er like mye en plikt som samarbeid med det gode.[8] Prinsippet om ikke-samarbeid er altså ikke en passiv motstand, men et prinsipp i mobiliseringen av ikke-voldelige motstandskampanjer.
7 Sivil ulydighet. Kreative aksjonsformer slik som Salt marsen[9]
8 Overtagelse av regjeringens funksjoner av hjemmestyre (Svaraj)[10]
9 Parallelt styre til regjering. Etablering av en ny/parallell offentlighet.
Tre grunnleggende prinsipper i Satyagraha
I. «Sat» --- Som innebærer åpenhet, ærlighet og rettferdighet med skjønn: Sannhet
A) Hver enkelts mening og tro representerer aspekter av sannheten
B) For å se mer av sannheten er det nødvendig å dele sine erfaringer og sannheter i støttende samarbeid.
C) Ovennevnte punkter forutsetter vilje til kommunikasjon og insistering på å få det til, som følgelig krever utvikling og foredling av relevante kommunikasjonsevner.
D) Å bestemme seg for å komme til og erkjenne sannhet i så stor utstrekning som mulig betyr at man ikke har råd til å kategorisere hverken seg selv eller andre i generelle vendinger.
II. «Ahimsa» --- Å nekte påføre andre vold, skade eller død.
A) Ahimsa ledes av bestemmelsen, insisteringen på kommunikasjon og meddelelsen av hver og ens bit av sannheten. Vold og truethet stenger kommunikasjonskanalene mellom folk, og alle vesener.
B) Idéen om Ahimsa, ikke-vold er framtredende i alle verdensreligionene, altså er det foreslått, om enn ikke praktisert, for alle mennesker som ideal.
C) Ahimsa er et uttrykk for alle menneskers opptatthet av at egen og andres menneskelighet skal bli manifestert og respektert.
D) For å praktisere Ahimsa trenger vi lære å oppriktig elske våre fiender og motstandere.
III. «Tapasya» --- Villighet til selvoppofrelse.
A) En Satyagrahi (en som praktiserer satyagraha) trenger være villig til å øve fram et hvilket som helst offer som omstendighetene til den kampen hun eller han har tatt initiativ til, heller enn å puffe et slikt offer eller en slik smerte på sine motstandere. Med mindre enn følger en slik metode havner den potensielle maktutøveren, motstanderen i en avmaktssituasjon, dermed forsvinner dennes tilgang til sannheten og vold vil med all sannsynlighet bli utøvd.
B) En Satyagrahi bør alltid søke å gi en vei ut for motstanderne, den potensielle maktutøveren. Målet er å oppdage et stadig videre perspektiv på sannhet og rettferdighet. Det er ikke et mål å vinne over motstanderen, seire på bekostning av noen.
Gandhis død
Gandhi arbeidet for å fjerne motsetninger mellom tilhengere av ulike religioner. Han var forferdet over massakrene som fulgte delingen av subkontinentet i de to statene Pakistan (for muslimer) og India (for hinduer). Han oppsøkte et muslimsk strøk i Calcutta og overnattet der for å hindre hinduer i å angripe området. Han gikk også flere ganger til sultestreik for å tvinge folk til å stanse de blodige opptøyene.
Mange ytterliggående hinduer mente han var for ettergivende og ville ha ham fjernet. Den 30. januar 1948 ble han etter sin daglige morgenbønn skutt med tre skudd i brystkassen av Nathuram Godse, som var medlem av en nasjonalistisk hinduorganisasjon. Gandhis siste ord var "Hē Ram", (Devanagari: हे ! राम eller, He Rām), ( Å Gud). Han ble kremert i Delhi ved bredden av floden Jamuna. Dette stedet er nå et minnested over Gandhi.
Den store lille mannen som døde 30. januar 1948, inspirerte en hel verden og ble et stort forbilde for mange, ikke minst for borgerrettighetsforkjemperne Martin Luther King og Nelson Mandela. Albert Einstein sa følgende om Gandhi etter hans død: «Kommende generasjoner vil ikke tro at en sånn mann – av kjøtt og blod – har vandret på vår jord.»
Tilnavnet «Mahatma»
Mahatma er ikke et vanlig personnavn, slik mange tror, men et tilnavn. Betegnelsen kommer fra sanskrit og betyr "Stor sjel" eller "stor ånd" eller "åndskjempe". Gandhi fikk tilnavnet i 1915 av sin nære venn og beundrer Rabindranath Tagore, som hadde vunnet Nobelprisen i litteratur i 1913. Gandhi ble ofte tiltalt som «bapu» som betyr «far».
Jødeforfølgelser og ikkevold
Gandhi tok sterk avstand fra nazismen, liksom fra alle andre former for systematisk undertrykkelse og nedverdigelse, som for eksempel britisk rasisme og imperialistisk undertrykkelse. Han skreiv i 1941 et personlig brev til Adolf Hitler der han oppfordret ham til å stanse krigføringa.[11]
Gandhi var forferdet over nazistenes jødeforfølgelser, som han anså som "uten parallell i historien", men selv ikke mot Hitlers regime ville Gandhi akseptere bruk av våpen. Han skreiv :"Kunne man noen gang forsvare en krig i menneskehetens navn og til menneskehetens forsvar, måtte det være en krig mot Tyskland for å hindre den nådeløse forfølgelsen av et helt folkeslag. Men jeg tror ikke på noen som helst krig." [12]
Gandhi oppfordret derfor også jødene til å bruke satyagraha, i sin motstand mot nasjonalsosialismen. Militante jøder mener dette viser hans manglende innsikt i nasjonalsosialismens vesen. [13]
I 1948 gjentok Gandhi oppfordringen til jødene om holde seg til ikkevoldelige midler, denne gangen i striden om Palestina. Han advarte dem mot å bruke makt for å tvinge fram en jødisk stat og skreiv at jødene "kan slå seg ned i Palestina bare gjennom arabisk godvilje. De bør søke å omvende det arabiske hjerte ... Jeg forsvarer ikke arabiske overgrep; jeg ønsker at de hadde valgte den ikkevoldelige veien i sin motstand





Klassiske sitater

Gandhi i september 1944.
«The world has enough for everybody's need, but not for everybody's greed.»
«Live as if you were to die tomorrow. Learn as if you were to live forever.»
«Nonviolence is the greatest force at the disposal of mankind. It is mightier than the mightiest weapon of destruction devised by the ingenuity of man.»
«It is the quality of our work which will please God and not the quantity.»
«Happiness is when what you think, what you say, and what you do are in harmony.»
«Freedom is not worth having if it does not include the freedom to make mistakes.»
«To believe in something, and not to live it, is dishonest.»
«If we Indians could only spit in unison, we would form a puddle big enough to drown 3,000,000 Englishmen.»
«An eye for an eye will only end up making the whole world blind.»
«Strength does not come from physical capacity. It comes from an indomitable will.»
«You must be the change you wish to see in the world.»
«Fear is not a disease of the body; fear kills the soul.»
«The only tyrant I accept in this world is the still voice within.»
«Faith is not something to grasp, it is a state to grow into.»
«First they ignore you, then they ridicule you, then they fight you, then you win.»
«I have nothing new to teach the world, thruth and non-violence are as old as the hills.»
Nobels fredspris [rediger]
Gandhi fikk aldri Nobels fredspris, selv om han var nominert hele fem ganger. Mange nordmenn har følt at dette har vært en skamplett for Nobelkomiteens renommé, så kanskje var det grunnen til at Nobelkomiteens formann i 1989, Egil Aarvik, under prisutdelingen til Dalai Lama sa at komiteen ikke hadde noe imot om fredsprisen også ble oppfattet som en heder til Mahatma Gandhis minne.

शनिवार, 25 सितंबर 2010

नंदन जी नहीं रहे. दिनकर सा तेज और पन्त सी कोमलता थी कन्हैया लाल नंदन में-शरद आलोक

आधुनिक हिंदी पत्रकारिता के युग के एक और पुरोधा कन्हैया लाल नंदन नहीं रहे। दिनकर सा तेज और पन्त सी कोमलता थी कन्हैया लाल नंदन में-शरद आलोक

विश्व हिंदी सम्मलेन न्यूयार्क, अमरीका २००७ के एक चित्र में कन्हैया लाल नंदन जी बाएं से अशोक चक्रधर, शरद आलोक, शेर बहादुर सिंह, शमशेर अहमद खान, प्रो कालीचरण स्नेही और कन्हैया लाल नंदन
७७ वर्ष की आयु में आज दिल्ली में हमारे प्रिय मित्र साथी अपने परिवार में दो बेटियों पत्नी और सभी हिंदी प्रेमियों को सदा के लिए छोड़कर चले गए। दिनमान, सारिका, पराग, नवभारत टाइम्स, सन्डे मेल , बहुत सी पत्र पत्रिकाओं के सलाहकार, अतिथि संपादक और अनेकों देश - विदेश की संस्थाओं के पदाधिकारी आदर्श लेखक, संवेदनशील कवि और पत्रकार कन्हैया लाल नंदन के जाने से हिंदी जगत को बहुत धक्का लगा है। डॉ कमल किशोर गोयनका जी की तरह नंदन जी का संपादन विश्व हिंदी सम्मलेन में 'गगनांचल' और अन्य परिकाओं -स्मारिकाओं में अद्वितीय था। वर्तमान समय में उनके जैसा दूसरा हिंदी लेखक नहीं है। वह अपने आप में अनोखे थे।
अभी परसों की बात
अभी परसों यानि २२ सितम्बर को अपने लेखक मित्र और चंडीगढ़, पंजाब से निकलने वाली पत्रिका 'प्रथम इम्पैक्ट' के राजनीति-संपादक कृपाशंकर जी के साथ अंसारी रोड दरिया गंज में टहल रहा था। मैं भी ' प्रथम इम्पैक्ट' पाक्षिक पत्रिका में विशेष संवाददाता हूँ। कृपाशंकर जी ने बताया और कहा कि वह देखो पहले यहाँ 'सारिका' और 'दिनमान' पत्रिका का कार्यालय हुआ करता था। तो मैंने उन्हें बताया कि यहाँ मैं सन १९८५ में कन्हैया लाल नंदन से मिलने आया था। और १९८६ में यहाँ पर ही सारिका के संपादक अवध नारायण मुदगल से मिलने आया था। मुदगल जी के साथ-साथ आगरा में कैंट होटल में एक साथ ठहरा था और एक बार मेरा और मुदगल जी का लखनऊ में 'नवभारत टाइम्स' में साक्षात्कार भी लिया गया था। पता चला कि मुदगल जी भी आजकल बीमार चल रहे हैं। इसी अवसर पर एक और रोचक बात कहना चाहता हूँ। सन १९८५ में मेरी विदेशी नार्वेजीय युवती पर आधारित कहानी 'आसमान छोटा है' सारिका में छपने के लिए स्वीकृत हुई थी। मेरी मुलाकात तत्कालीन कादंबिनी के संपादक राजेंद्र अवस्थी से हुई। अवस्थी जी ने मुझसे सारिका से कहानी वापस लेकर अपने यहाँ कहानी विशेषांक में छापने का आश्वाशन दिया। मैंने कहानी की दूसरी प्रति कादम्बिनी में दे दी । व्यस्तता के कारण मैं सारिका से संपर्क नहीं कर सका और फलस्वरूप यह कहानी दोनों पत्रिकाओं में छप गयी। इस पर मेरे पास बहुत से पत्र आये। मुदगल जी जिस दौर में सारिका के संपादक बने थे वह हिंदी कहानी में उतार - चढ़ाव का दौर था।
घनिष्ट सम्बन्ध नंदन जी से मेरा परिचय पुराना है। पर उनसे मेरे सम्बन्ध लन्दन में होने वाले छठे विश्व हिंदी सम्मलेन से अधिक घनिष्ट हुए। अक्सर मेरी बातचीत यानि तीन या छ महीने में एक बार हुआ करती थी वह भी फोन पर। इसी वर्ष मेरी उनसे अंतिम बातचीत उनके लन्दन में एक साहित्यिक कार्यक्रम के आगमन पर हुई थी। वह कहते थे कि प्रवासी लेखकों को भी सम्मान मिले। इसपर उन्होंने मुझसे भी बातचीत की थी। लन्दन में डॉ सत्येन्द्र श्रीवास्तव उनके अच्छे मित्रों में थे।
नंदन जी विश्व हिंदी सम्मलेन में रात के समय अक्सर लन्दन में अपने मित्र के घर चले जाते थे। मुझे जिन हिंदी के लेखकों ने विश्व हिंदी सम्मलेन में प्रभाव डाला उसमें नामवर सिंह, कमलेश्वर, कन्हैया लाल नंदन, नरेन्द्र मोहन (जागरण के संपादक) और विद्या निवास मिश्र प्रमुख थे। मेरे कमरे में कमलेश्वर, विजय प्रकाश बेरी, गंगा प्रसाद 'विमल', जगदीश चतुर्वेदी, विदेशों और दक्षिण भारत के अनगिनत विद्वान आते थे क्योंकि वे अपनी उपस्थिति के रूप में मुझे अपना आशीष देना चाहते थे। मैं सोचता था उत्तर भारत के विद्वान तो मुझे कभी न कभी मिल ही जायेंगे पर विदेशी हिंदी सेवी और अहिन्दी भाषी भार- तीय विद्वान इतनी आसानी से नहीं मिलेंगे जिनका हिंदी के अंतर्राष्ट्रीय प्रचार-प्रसार में बहुत महत्व है।
एक वाक्या मुझे छठे विश्व हिंदी सम्मलेन का स्मरण आ रहा है। उद्घाटन सत्र था। जिसमें विद्या निवास मिश्र, दैनिक जागरण के मेरे मित्र नरेन्द्र मोहन, विदेश राज्य मंत्री विजय राजे सिंधिया, डॉ लक्ष्मी मल सिंघवी, प्रकाशक विजय प्रकाश बेरी, नामवर सिंह, रुपर्ट स्नेल, डॉ विद्याविन्दु सिंह, राजेंद्र अवस्थी और बहुत से हिंदी सेवी और विद्वान मौजूद थे। यह एक बहुत अच्छा विश्व हिंदी सम्मलेन था। उद्घाटन सत्र में फोटो खीचना माना था क्योंकि फोटो खीचने से आग लगने का अलार्म बोलने का खतरा था। ऐसा बताया गया था। मैंने और अन्य लोगों ने फोटो खीचना जारी रक्खा । कार्यक्रम का संचालन मेरे अग्रज मित्र प्रो महेंद्र के वर्मा कर रहे थे।
मंच और फोटो खीचने वालों में संवाद शुरू हो गया। नंदन जी मेरे पीछे वाली सीट पर बैठे थे। उन्होंने कहा सुरेश जी आप इस सम्मलेन के अंतर्राष्ट्रीय समिति के सदस्य हैं और आपही जब संवाद करेंगे तो क्या असर पड़ेगा। आयोजक समिति के लन्दन के पदाधिकारियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। मुझे उनकी बात एक बार में समझ में आ गयी। तब मैंने भी औरों को भी फोटो खीचने के सम्बन्ध में संवाद करने से मना किया और शान्ति की स्थापना हुई। नंदन जी ने धन्यवाद दिया।
इस विश्व हिंदी सम्मलेन में मुझे एक सत्र की अध्यक्षता, एक की सह-अध्यक्षता और एक का सह-संचालन करने का अवसर मिला था। नरेन्द्र मोहन और सिंघवी जी कि कृपा से मेरे काव्यसंग्रह का लोकार्पण भारतीय हाई कमीशन में विजय राजे सिंधिया के द्वारा हुआ था।
इसी सम्मलेन में अपने आयोजक सदस्यों के सहयोग से एक सत्र असंतुष्टों का अतिरिक्त कराने की अनुमति मिल गयी थी। काश यदि इसी प्रकार अमेरिका में होने वाले हिंदी सम्मलेन में प्रवासी विषयों पर हुए सत्रों में उन्हें सही प्रतिनिधित्व न मिलने पर उनका यदि एक सत्र और आयोजित होता और विदेशों से आये प्रवासी साहित्यकारों और लेखकों की बात सुनने का सुनहरा अवसर सभी को मिलता। आशा है कि भारत सरकार आने वाले सम्मलेन में इसका ध्यान रखेगी। नंदन जी के बहाने हम हिंदी की ही बात कर रहे हैं।
नंदन जी के साथ-साथ दो बार मैं यू के में होने वाले अनेकों कवि सम्मेलनों में सम्मिलित हो चुका हूँ। मैनचेस्टर और लन्दन में साथ-साथ कवितायेँ पढ़ने का अवसर मिला। मैं और नंदन जी मैनचेस्टर में एक कमरे में घंटों रहे। नंदन जी एक अच्छे मंच संचालक भी थे।
न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र संघ के बड़े हाल में नंदन जी द्वारा सम्पादित विश्व हिंदी विशेषांक का लोकार्पण मंत्री आनन्द शर्मा जी ने किया था। हमारे राजदूत महामहिम निरुपम सेन, रोनेन सेन और अनेक लोग वहाँ उपस्थित थे।मैंने भी नंदन जी की तस्वीर खीची थी और अपनी पत्रिका भी भेंट की थी।
यहाँ लोकार्पण समारोह में माननीय गिरिजा व्यास के साथ मंच पर उपस्थित रहकर बहुत सी पुस्तकों, पत्रिकाओं और ग्रंथों के लोकार्पण का साक्षात् गवाह बन गया था। यहाँ पर ही अपनी टिप्पणियों के कारण संवाद में अलग-थलग दिखे विद्वान डॉ कमल किशोर गोयनका का साथ देकर लेखकीय साथ निभाया था परन्तु लोकार्पण में मंच पर मुझे देख कर शायद गोयनका जी को लगा की एक जूनियर लेखक किस तरह लोकार्पण के मंच पर आसीन है और वह मेरे द्वारा दिए गए साथ को कुछ देर तक भूल गए थे पर बाद में अहसास हुआ तो उन्होंने मुझे धन्यवाद भी दिया।
भारतीय विद्या भवन न्यूयार्क और विदेश विभाग के प्रतिनिधियों के सहयोग के कारण मेरी मंच पर उपस्थिति संभव हो सकी थी क्योंकि विदेशों में मेरी हिंदी सेवा से वे प्रभावित थे जिसका मैं प्रतिनिधित्व कर रहा था। नंदन जी ने अनेकों विश्व हिंदी सम्मेलनों में गगनांचल पत्रिका का संपादन किया। गगनांचल के संपादक आजकल अजय कुमार गुप्ता जी हैं।
नंदन जी अनेकों पत्र पत्रिकाओं के सफल संपादक रहे हैं और हिंदी पत्रकारिता में शालीनता का परिचय दिया। वह एक अच्छे कवि और चिन्तक लेखक थे। उनकी कविताओं में रामधारी सिंह दिनकर सा ओज था और पन्त जैसी पृकृति कि सुकुमारिता थी नंदन जी कि कविता में। नंदन जी काफी समय से पेसमेकर के साथ चल रहे थे।
जब मैंने कुछ महीने पूर्व नार्वे आने का निमंत्रण दिया तो उन्होंने कहा यदि आप मेरे पेसमेकर का स्पांसर बन जाएं तो मैं आपके कार्यक्रम में आ सकता हूँ। मैंने नार्वे कि सरकार के साथ बातचीत कि थी पर आगामी वर्ष के पहले यह संभव नहीं था। क्या पता था कि नंदन जी नार्वे में हमारे कार्यक्रम में आये बिना ही चले जायेंगे।
उन्होंने मेरे अभिनन्दन ग्रन्थ में अपनी शुभकामनाएं भेजी थीं जो विश्व पुस्तक प्रकाशन नयी दिल्ली से छपा था। उन्होंने मेरी रचनाएं अपनी पत्र पत्रिकाओं में भी प्रकाशित की थीं।
दस बारह साल पहले तक राजेंद्र अवस्थी से दोस्ती होने के कारण मुझे उसके कुछ फायदे हुए तो उसके नुक्सान भी बहुत उठाने पड़े। मेरे व्यव्हार, चरित्र और लेखन के तरीके और राजेंद्र अवस्थी जी के लेखन में कहीं भी समानता नहीं थी। बहुत से दिल्ली के साहित्यकार मुझसे दूर रहे। दस -बारह साल से मैं दिल्ली के लेखकों के किसी गुट में भी नहीं हूँ। बल्कि सभी का हूँ, मानवतावादी हूँ। गांधीवादी हूँ विष्णु प्रभाकर और सोहन लाल द्विवेदी कि तरह। नार्वे में सोशलिस्ट लेफ्ट पार्टी की तरफ से ओस्लो नगर पार्लियामेंट का सदस्य भी २००३ से २००७ तक रहा पर कभी भी अपने भारतीय प्रगतिशील लेखकों का कभी भी आमंत्रण नहीं आया। यदि किसी ने याद किया तो रंगमंच की संस्था इप्टा, भारत सरकार की तरफ से प्रवासी दिवस में, विश्वविद्यालयों और निजी संस्थाओं ने।
मेरी रचनाएं ही सभी गुटों को मोहने का सामर्थ्य रखती हैं। वैसे ही नंदन जी भी गुट से परे एक सच्चे पत्रकार और निर्भीक और शालीन लेखक थे। दिल्ली तक हिंदी के सिकुड़ने के भय से मैं दूसरे प्रदेशों के कार्यक्रम को भी दिल्ली से कम महत्त्व नहीं देता। अभी नयी तकनीकी और अत्य आधुनिक संसाधनों से हिंदी के जुड़ने से दो बहुत बड़ी खुशखबरी है हिंदी के विश्व में तेजी से विस्तार और प्रवासी लेखकों की रचनाओं का स्वतन्त्र मूल्यांकन के लिए ।
नंदन जी ने मेरी और अन्य प्रवासी साहित्यकारों की प्रतिभा पहचानी थी।
नार्वे से निकलने वाली २२ वर्ष पुरानी हिंदी और नार्वेजीय भाषा की पत्रिका 'स्पाइल -दर्पण' को विश्व हिंदी सम्मलेन, न्यूयार्क मारीशस से निकलने वाली विश्व हिंदी सचिवालय की पत्रिका 'विश्व हिंदी पत्रिका' आदि पहचानती नहीं है जबकि भारतीय विश्विद्यालय में इस पर शोध हो चुका है। इस पत्रिका ने यूरोप और अमेरिका में रहने वाले अनेक प्रतिष्ठित प्रवासी लेखकों कि प्रथम रचना छपने का सौभाग्य प्राप्त किया है। नार्वे में पिछले छ वर्षों से एक मात्र नियमित पत्रिका है। हम यह सदा सोचते हैं कि हिंदी हमारी अस्मिता की पहचान है। हिंदी के लिए हम क्या कर सकते हैं उस पर ध्यान देना चाहिए। और इस भाषा को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में देखने के लिए प्रयत्नशील हूँ मुझे उम्मीद है कि मेरा यह सपना साकार होगा। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह नंदन जी के परिवार को इस अपार दुःख सहने की शक्ति दें और उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें।