रविवार, 25 सितंबर 2011

लखनऊ की खुशबू और लैटिन अमरीकी नृत्य का आकर्षण -सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'

लखनऊ की खुशबू और लैटिन अमरीकी नृत्य का आकर्षण -शरद  आलोक  
नीचे चित्र में जगदीश गांधी जी अपने सम्मान में यूनेस्को द्वारा दिए लंच में वक्तव्य देते हुए (२३.०९.११, ओस्लो)






ओस्लो में लखनऊ की खुशबू



मेरी अनेक रचनाओं में लखनऊ की सरगर्मी, मौसम की  रवानी, ममता में जवानी और पहले आप, पहले आप कहकर कितनी ही रेलें जाने दी होंगी, यह याद नहीं.

जगदीश गांधी जी  से  नार्वे में 36-37  वर्षों मिलने के बाद न जाने क्यों लगा की ओस्लो की धरती वाइतवेत, ओस्लो में लखनऊ की भीनी-भीनी खुशबू आने लगी है. 

नीचे लेटिन अमरीकी नृत्य प्रस्तुत करते हुए चिली देश के कलाकार
चौक, चारबाग,ऐशबाग, यहियागंज, महानगर, मोहनलालगंज आदि के रहने वाले लखनऊ वासियों के साथ साथ पांच धर्मों और सात देशवासियों ने मिलकर 'भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम  की ओर  से आयोजित कार्यक्रम में  जगदीश गांधी जी को अपनी श्रद्धा अर्पित करके हम सभी का गौरव बढाया.  
परसों जगदीश गांधी जी को भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम द्वारा दो महान नोबेल पुरस्कार विजेताओं: साहित्य में रबीन्द्र नाथ टैगोर और शांति में नार्वे के फ्रित्योफ़ नानसेन  विद्वानों
की १५० वें  जन्म वर्ष (डेढ़ शती) के अवसर पर नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम द्वारा
संस्कृति पुरस्कार से पुरस्कृत किया  गया.
मेरे मन में उदगार उठने लगे. आज एक बड़े कार्यक्रम की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है. Poetry evning काव्य संध्या इसमें अनेक भाषाओँ में कविताएँ पढी जायेंगी. पर कवी हूँ अपनी भावनाओं को नहीं रोक पा रहा हूँ. और एक कविता मेरे अंतर से जन्म लेती दिखाई दे रही है. बहुत सी बातें एक साथ खलबली मचाकर कलम द्वारा कागज़ पर उतरना चाहती है, हाल ही में लखनऊ से बहन डॉ. विद्याविन्दु सिंह, डॉ. कैलाश देवी सिंह, गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के विस्वविद्यालय शान्तिनिकेतन से प्रो. रामेश्वर और डॉ शकुन्तला मिश्र उर माया भारती के साथ पानी के जहाज से चौबीस घंटे की यात्रा पर गए थे. ओस्लो से फ्रेडरिक्सहाव्न (डेनमार्क) गए थे.  लेटिन अमरीकी गीत नृत्य उत्सव में ओस्लो में भी रातभर रहे और आनंद लिया तथा  पत्रकार धर्म निभाया.  ओस्लो को मैं उत्सव का नगर मानता हूँ और लखनऊ को तहजीब और कलानगर. कविता की बहती पंक्तियों का आप भी आनंद उठाइए: 

'जिन्दगी खूबसूरत नहीं तो क्या कहूं,  
फूल की खुशबू का वह दीदार हूँ .
अंतर ह्रदय से प्रेम कर देखो सही, 
सांस में हवा का एहसास हूँ. 

चारदीवारी बनाकर क्या रोक सके, 
सपनों में बेखटक आते-जाते रहे..
कितने ही अनजान, अनजाने न रहे.
नदी में खींच कर लकीर -फकीर हो गए.

अब दीवार और परदे  से क्या छिपता हुस्न है
सामाजिक मीडिया से घर में, 
मस्तिष्क का पहरा  छोड़कर
कितने ही परम्परा के फाटक तोड़कर.

कितने ही अद्भुत रिश्ते जोड़कर
प्रेम की वह नूर की परी लगती रही
बे चित्र, सिनेमा के दृश्यों सा झकझोर कर 
दिन-रात, रसोंई से लेकर शयनकक्ष तक,

बस, रेल और जहाज पर बैठे हुए
कम्प्युटर पर सैर करते हुए,नाम बदले पतों को ढूंढते
फेसबुक, आर्कुट न जाने कितने पते 
ख़त लिखने का चल अब लौट कर.

बिछड़ों को ढूढ़ते- ढूढ़ते, दूसरों का घर बसाने
आये थे खुद बसेरा बना बैठे नगर में,
लखनऊ आये हो, आया करो
कुछ प्रेम भी देकर मुझे जाया करो!

सड़क पर बैठे हुए, पार्क पर आसमान तकते,
मस्जिदों में सर झुकाते, गुरुद्वारों में लंगर खाते 
और न जाने कितने उत्सव-पर्वों के बाद 
घूमते -हम तुमको मिल जायेंगे 
पर मुझे पहचान पाओगे की नहीं? (लखनऊ में)

दो सप्ताह पहले हम भी बहुत नांचे थे
लेटिन अमरीकी उत्सव में
बहुत नांचे, बहुत झूमे रात भर,
उर्गुआई, चिली, पेरू, ब्रासील 
न जाने कितने देशों  के सुन्दर बदन
नांच-नांच कर बेहोश करदें आपके क्षण. (ओस्लो में)

कवियों को गीत गाता देखकर,
उनकी भाषा के तेवर देखकर
उनके पांवों की थिरकन देखकर
कत्थक- भारत नाट्यम भूलकर
खो गए ऐसे समूचे कुछ समय.
  
सारे देशों की सीमा तोड़कर
सिमट जाती एक बिंदु पर कभी
न जहाँ  आरम्भ अथवा अंत है 
संस्कृति आजादी का ही मन्त्र है

पानी के जहाज पर देखो कभी,
रात-भर  पक्षी  साथ-साथ उड़ते रहे 
नांचकर  थककर छत पर बैठकर
बिछड़े हुए साथी तकते रहे..  (ओस्लो से डेनमार्क यात्रा करते समय)

परसों २३ सितम्बर की बात   है.  जगदीश गांधी जी को संस्कृति पुरस्कार से पुरस्कृत किया जाना था. मुझे पुँरानी बातें याद आ गयीं.  
सन १९७१ का लखनऊ उतना ही  खूबसूरत  लगता था जितना की आज. 
तब आर्थिक संसाधन नहीं थे, पर लोगों में आज की तरह ही मेलजोल था, भाईचारा था और लखनऊ की अपनी तहजीब है कि घर में चाहे खाने के लिए न भी हो पड़ोस से उधर लेकर पान खिलाने और चाय पिलाने का रिवाज था.  मेहमान-नेवाजी ऐसी कि अपने मेहमान को प्राथमिकता देते हैं जैसे पश्चिम देशों में बच्चों और महिलाओं को प्राथमिकता देते हैं और भारत (पूरे भारत) में बुजुर्गों और महिलाओं को पहला स्थान देते हैं. पर लखनऊ कि बात ही कुछ और है. चाहे बच्चा हो या बुजुर्ग, आदमी हो या औरत, गरीब हो या अमीर पर 'पहले  आप' वाली संस्कृति आज भी लखनऊवासियों  के खून में रची बसी है. हमारे शरीर को भौगोलिक बदलाव को सहन करने में पीढियां लग जाती हैं, परन्तु लखनऊ में लखनऊ-वासी बनकर देखिये आप दस साल में ही लखनऊ की संस्कृति आपके नस-नस में हवा सी बहने लगेगी. 
लखनऊ की प्रतिष्ठा और संस्कृति को दूसरे प्रदेश और देश से आये लोगों ने इसे और रंगबिरंगा कर दिया है.
हाँ लखनऊ-वासी परदेशियों और अनजान लोगों को भी गले लगते हैं, और वह जानते हैं कि एक दिन वह भी लखनऊ का होकर रह जाएगा. पर मल्टीनेशनल कंपनियों ने अब लखनऊ वासियों की जेब को स्वास्थ और पानी जैसी  बुनियादी चीजों से महरूम कर दिया है और लखनऊ  का पैसा बहुत गलत हाथों में आ रहा है. लखनऊ ने कभी परवाह नहीं की की उसकी धरती में कौन रोजी-रोटी कमाता है, पर अब अब लखनऊ-वाइयों से सेवा मुफ्त में लेकर अमीर- बेदर्दों ने बुखार ठीक करने के बदले गरीग का पूरा घर गिरवी रखने लगे हैं. भले ही अभी यह कहावत है, पर आने वाले दिनों में यदि लखनऊ में बहुत से दरियादिलों ने ध्यान नहीं दिया तो बहुत से इंसान अपनी जवानी में ही बुढ़ापा देखने को मजबूर हो जायेंगे अभी दिल देकर काम चल जाता है पर बाद में खून देकर या बेचकर ही गुजारा चलेगा जिसकी एक सीमा होती है. 
मैंने देश में भी विदेश में भी देखा है, किसी भी विदेशी संस्थान में लखनऊ के लोग मिले तो देखते ही महसूस हुआ कि बिछड़े हुए भाई-बहन, पडोसी और दूकानदार मिल गए हैं.  विदेशों में तो मुझे पंजाबियों यानी पंजाब प्रांत  से आये लोगों का भी इतना प्यार मिला कि मुझे ओस्लो नार्वे में चुनाव जिताने में उन्होंने मुझे बहुत वोट देकर जिताया था. 
पहले शिक्षा के संस्थानों का अभाव था.  आज शिक्षा पहले से बेहतर हैं पर प्रयाप्त नहीं हैं.
पहले से बेहतर है. लखनऊ में इस बेहतरी में योगदान देले वालों में जगदीश गांधी  और भारती गांधी हैं.   

२३ सितम्बर को दोपहर 'आकरहूस फेस्तनिंग' (भारत के लाल किले जैसा महत्त्व)  के पास बैंक प्लेस,  ओस्लो  में यूनेस्को ने जगदीश गांधी जी को लंच के लिए आमंत्रित किया था. मुझे गांधी जी ने आमंत्रित किया था. वहां अनेक चिरपरिचित नार्वे के महत्वपूर्ण लोग सम्मिलित हुए थे. वहां भी गांधी जी का शिक्षा के जरिये शांति पर वक्तव्य अच्छा लगा.
जगदीश गांधी जी को ओस्लो में कुछ दूरी पैदल चलाया ताकि जगदीश गांधी जी के साथ पैदल ओस्लो में चलकर लखनऊ की यादें तजा कर सकूं और उन्हें ओस्लो का कुछ पलों का पैदल चलने का क्षण याद रहे.  नार्वे के स्तूरटिंग (पार्लियामेंट), नेशनल थिएटर, फिर उनके होटल रीका से पैदल वापस 
नेशनल थिएटर तक वहां से मित्रो द्वारा वाइतवेत, ओस्लो तक जहाँ कार्यक्रम होना था, साथ-साथ आये. 
एक हमेशा याद रखने वाला दिन था मेरे लिए वह भी आदरणीय जगदीश गांधी जैसे महँ व्यक्ति के साथ. उनके साथ शिशिर श्रीवास्तव जी बी थे जो उनकी यात्रा को सुखमय बना रहे थे. 
फिर कभी लिखूंगा. आज २५ सितम्बर को काव्यसंध्या एवं सांस्कृतिक महोत्सव  Poesikveld og Kulturfest कार्यक्रम की जिम्मेदारी है जो गांधी जी अपने नगर में वैश्विक स्तर का करते रहे हैं. अब विदा दें, फिर मिलेंगे. अपने विचार लिखिए इस बलाग पर. आभार सहित.
                                                                                 - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' Oslo, 25.09.11
                                                                                                                                                    speil.nett@gmail.com
माया भारती को घड़ी पर गणेश जी भेंट कटे हुए उनके घर में  

बाएं से लेटिन अमरीकी कवि उर्गुआइ की गायिका बेनदिक्ते, शरद अलोक, कलाकार और लेटिन अमरीकी उत्सव की आयोजक सदस्य वेरोनिका और नार्वे में चिली देश  के महामहिम राजदूत  

शनिवार, 24 सितंबर 2011

आज के गाँधी- जगदीश गाँधी नार्वे में पुरस्कृत - शरद आलोक

पुरस्कार समारोह के बाद एक सामूहिक चित्र, स्तिक   इन्नोम, वाईतवेत सेंटर, ओस्लो में  


आज के गांधी जगदीश गाँधी 

ओस्लो, नार्वे में पुरस्कृत.





बाएं से भारतीय दूतावास के प्रथम सचिव दिनेश कुमार नंदा, श्रीमती नंदा, जगदीश गाँधी पुरस्कार ग्रहण करते हुए दायें स्थानीय मेयर थूर स्ताइन विन्गेर से और सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक '



शांति के लिए सर्वांगीण शिक्षा जरूरी - जगदीश गाँधी
अपने जीवन को अपने सत्कर्मों से आकाश तक छूने वाले महान समाजसेवी डॉ. जगदीश गाँधी जी को वाईतवेत,  ओस्लो नार्वे में संस्कृत-पुरस्कार से सम्मानित किया गया. स्थानीय मेयर थूरस्ताइन  विंगेर ने भारतीय- नार्वेजिय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम, नार्वे  की ओर से संस्कृति-पुरस्कार प्रदान किया.  श्रीमती नंदा जी ने प्रमाणपत्र  दिया और भारतीय दूतावास ओस्लो के  प्रथम सचिव दिनेश कुमार नंदा जी ने शाल ओढ़ाकर  सम्मानित किया.
श्रीमती भारती गाँधी जी से मेरी पहली मुलाकात सन १९७१ में हुई थी. आदरणीय दीदी  भारती गाँधी जी ने मेरी मुलाकात डॉ. जगदीश गाँधी से कराई थी. जगदीश गांधी लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य और सिटी मोंटेसरी स्कूल लखनऊ और  अनेकों संस्थाओं के संस्थापक हैं.  सन १९७१ में  जब वह पुराणी श्रमिक बस्ती, ऐशबाग लखनऊ में युवक सेवा संगठन द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थीं. और उन्होंने कला प्रदर्शनी का उद्घाटन किया था.  फिर सन १९७२ से १९७४ तक डॉ जगदीश गांधी जी से संपर्क बना रहा. 
जगदीश गांधी एक कर्मयोगी हैं और वह युवापीढी के लिए प्रेरणा हैं.  उनका जीवन संघर्ष किसी को भी ऊँचाइयों तक ले जा सकता है.   बशर्ते वह व्यक्ति अपने संघर्ष और सेवा भाव में पूरी निष्ठां और दृढता से जुड़ा रहे.
जगदीश गांधी ने बच्चों की शिक्षा पर एक बहुत सारगर्भित व्याख्यान दिया.  मुझे ऐसा लगा कि सन १९७४ से कोई महान बिछड़ा भाई मिल गया हो.  ऐसे महान व्यक्तित्व को बार-बार शीश झुकाने को मन करता है.

जगदीश गाँधी के साथ सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' कार्ल युहान सड़क ओस्लो पर जहाँ पीछे पार्लियामेंट भवन दिखाई दे रहा है.  

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

23 सितम्बर 2011 को नार्वे में डॉ जगदीश गांधी का सम्मान & 25 सितम्बर को हिंदी दिवस पर

आमंत्रण Invitasjon

२३  सितम्बर २०११  को जगदीश गांधी का सम्मान

आपको २३ सितम्बर को वाइतवेत सेंटर में स्तिक इन्नोम में

भारतीय समाजसेवी डॉ. जगदीश गांधी को सम्मानित किया जाएगा और

आपको सपरिवार भोज में आमंत्रित किया जाता है.

इस अवसर पर आपको आमंत्रित किया जाता है.

कार्यक्रम 18:00 बजे आरम्भ होगा.

आप उपस्थित होकर हमारा उत्साह वर्धन करें. आने  की  सूचना फोन पर अवश्य दीजिये: +४७ ९० ०७ ०३ १८

रविवार 25 सितम्बर को हिंदी दिवस पर


17:30 बजे कविता और नृत्य महोत्सव

भारतीय -नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम कि ओर से

कविता और नृत्य महोत्सव का आयोजन रविवार 25 सितम्बर को 17:30 बजे

वाइतवेत सालेन, वाइतवेत सेंटर, ओस्लो में

आयोजित हो रहा है. आप सभी आमंत्रित है.


कृपया आप और परिवार कार्यक्रम में उपस्थित होकर हमको गौरवान्वित करें.

सादर

सुरेशचन्द्र शुक्ल

Suresh Chandra Shukla

Indisk-Norsk Informasjons -og Kulturforum

भारतीय -नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम

Pb 31, Veitvet, 0518 Oslo

Phone: 22 25 51 57

Mobil: 90 07 03 18

रविवार, 11 सितंबर 2011

नार्वे में कम्यून के चुनाव 12 सितम्बर को. चुनाव में अपना वोट जरूर दें

12 सितम्बर  को  होने  वाले चुनाव में अपना वोट जरूर दें. - सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद अलोक'  नार्वे में कम्यून के चुनाव
माया भारती को फूल देते हुए प्रधानमंत्री स्तोलतेनबर्ग
10 -11 सितम्बर को नार्वे में राजनैतिक सरगर्मी रही. सभी राजनैतिक पार्टियाँ जन संपर्क करके जनता को अपना वोट देने का आवेदन कर रही हैं. 10  सितम्बर को लिंदेरूद शापिंग सेंटर में  प्रधानमंत्री येन्स  स्तोलतेनबर्ग ने जनता से अपील करते हुए कहा की कोई भी राजनैतिक
पार्टी परफैक्ट नहीं है पर फिर भी अपनी अरबाईदर  पार्टी Ap (श्रमिक पार्टी) को वोट देने को कहा और अपनी पार्टी के चिन्ह गुलाब बांटे. नार्वे  में चुनाव चिन्ह नहीं हटा है पर हर पार्टी का लोगो या चिन्ह होता है.
उसके बाद सोशलिस्ट लेफ्ट पार्टी (SV एस वे) के नेता  और मंत्री बोर्ड वेगार सूलयेर  ने भी भाषण दिया और लोगों के प्रश्नों के उत्तर दिए.
मारित नीबाक श्रमिक पार्टी में उप लोकसभा अध्यक्ष हैं उन्होंने मुझे नेशनल थिएटर के सामने फूल भेंट किया.
आप सभी  नार्वे में रहने वालों से निवेदन है की आप अपना वोट जरूर दें और प्रजातंत्र का हिस्सा बनें. ओस्लो कम्यून चुनाव में भारतीय उम्मीदवारोंमें  श्रमिक पार्टी से प्रब्नीत कौर, सोशलिस्ट लेफ्ट पार्टी     से बलविंदर कौर और फ्रेमक्रित्स  पार्टी से ओमबीर उपाध्याय हैं. 
मारित नीबाक मुझे (सुरेशचंद्र शुक्ल ) को गुलाब भेंट करते हुए


शनिवार, 10 सितंबर 2011

आजाद भारत के गांधी अन्ना हजारे

आजाद भारत के गांधी अन्ना हजारे -सुरेशचन्द्र शुक्ल
छोटी सी कद काठी और हाथ में लाठी लिए आजकल भ्रष्टाचार के खिलाफ और इससे निपटने के लिए सख्त लोकपाल विधेयक की मांग कर अनशन पर बैठने वाले अन्ना हजारे को सभी जानते हैं. लेकिन यह जानकारी सिर्फ इसलिए है क्योंकि वह आज देश की संसद के कुछ दूरी पर एक ऐसी मांग के लिए अनशन पर बैठे हैं जिससे हो सकता है देश की तकदीर संवर जाए, भ्रष्टाचार की दीमक का इलाज हो सके.
अन्ना हजारे गांधीवादी विचारधारा पर चलने वाले एक समाजसेवक हैं जो किसी राजनीतिक पार्टी की जगह स्वतंत्र रुप से काम करते हैं. अन्‍ना हजारे का वास्‍तविक नाम किसन बाबूराव हजारे है. 15 जून 1938 को महाराष्ट्र के अहमद नगर के भिंगर कस्बे में जन्मे अन्ना हजारे का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा. पिता मजदूर थे, दादा फौज में थे. अन्ना हजारे के छह भाई हैं. दादा की पोस्टिंग भिंगनगर में थी. अन्ना का पुश्‍तैनी गांव अहमद नगर जिले में स्थित रालेगन सिद्धि में था. दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया.


अन्ना हजारे का बचपन बेहद गरीबी में बीता. उनके परिवार की गरीबी को देख कर अन्ना हजारे की बुआ उन्हें अपने साथ मुंबई ले गईं. अन्ना हजारे ने मुंबई में सातवीं तक पढ़ाई की और फिर कुछ पैसे कमाने के लिए एक फूल की दुकान पर काम किया. साठ के दशक में अन्ना ने भी अपने दादा की तरह फौज में भर्ती ली और बतौर ड्राइवर पंजाब में काम किया. फौज में काम करते हुए अन्ना पाकिस्तानी हमलों से बाल-बाल बचे थे.


इसी दौरान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से उन्होंने विवेकानंद की एक पुस्‍तक कॉल टू द यूथ फॉर नेशन‘ खरीदी और उसको पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी समाज को समर्पित कर दी. उन्होंने गांधी और विनोबा को भी पढ़ा और उनके शब्दों को अपने जीवन में ढ़ाल लिया. अन्ना हजारे ने इसके बाद 1970 में आजीवन अविवाहित रहने का निश्चय किया. 1975 में उन्होंने फौज की नौकरी से वीआरएस ले लिया और गांव में जाकर बस गए.


अन्ना हजारे का मानना था कि देश की असली ताकत गांवों में है और इसीलिए उन्होंने गांवो में विकास की लहर लाने के लिए मोर्चा खोल दिया. यहां तक की उन्होंने खुद अपनी पुस्तैनी जमीन बच्चों के हॉस्टल के लिए दे दी.
अन्ना हजारे ने 1975 से सूखा प्रभावित रालेगांव सिद्धि में काम शुरू किया. वर्षा जल संग्रह, सौर ऊर्जा, बायो गैस का प्रयोग और पवन ऊर्जा के उपयोग से गांव को स्वावलंबी और समृद्ध बना दिया. यह गांव विश्व के अन्य समुदायों के लिए आदर्श बन गया है.


1998 में अन्ना हजारे उस समय अत्यधिक चर्चा में आ गए थे जब उन्होंने बीजेपी-शिवसेना वाली सरकार के दो नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा उन्हें गिरफ्तार करने के लिए आवाज उठाई थी. और इसी तरह 2005 में अन्ना हजारे ने कांगेस सरकार को उसके चार भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए प्रेशर डाला था. अन्ना की कार्यशैली बिलकुला गांधी जी की तरह है जो शांत रहकर भी भ्रष्टाचारियों पर जोरदार प्रहार करती है.


अन्ना हजारे की समाजसेवा और समाज कल्याण के कार्य को देखते हुए सरकार ने उन्हें 1990 में पद्मश्री से सम्मानित किया था और 1992 में उन्हें पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया जा चुका है.


आज अन्ना हजारे जन लोकपाल विधेयक को लागू कराने के उद्देश्य के साथ आमरण अनशन पर बैठे हैं और वह अकेले नहीं हैं बल्कि उनके साथ समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग जुड़ चुका है. मीडिया, प्रेस और नेता सबका ध्यान अन्ना हजारे पर है. हमेशा लाइम लाइट से दूर रहने वाले अन्ना हजारे आमरण अनशन पत क्या बैठे कांग्रेस सरकार की तो जैसे नींद ही उड़ गई है. जिस बिल को कल तक सरकार अपने फायदे के लिए लाने की सोच रही थी उसकी असलियत दिखा अन्ना ने जता दिया कि आज भी देश में कुछ लोग हैं जो भारत की चिंता करते हैं.


कभी अपने जीवन से तंग आ चुके अन्ना हजारे ने कई जिंदगियों को आगे बढ़ने का मौका दिया है और अगर आज उनकी यह मुहिम भी सफल रही तो देश में रामराज आने का संकेत जरुर मिल जाएगा.

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

हिंदी की शिक्षा के लिए अपने बच्चों को हिंदी स्कूल में प्रवेश दिलाइये -शरद आलोक

HINDISKOLE  हिंदी स्कूल  हिंदी की शिक्षा के लिए अपने बच्चों को हिंदी स्कूल में प्रवेश दिलाइये  - शरद आलोक

Hindi språkopplæring og kulturformidling står bak hindiskolen.
(हिंदी स्कूल में बच्चे भाषा और भारतीय संस्कृति सीखते हैं जिससे  आत्म विश्ववास  और ज्ञान बढ़ता  है.   - सुरेशचंद्र शुक्ल संपादक, स्पाइल- दर्पण) 
Dette er en organisasjon som er nøytral mht politikk og religion.
Her kan alle komme og lære hindi
Lørdager 12:15-15:00
Veitvet kulturhus / Veitvet aktivitetsskole (Veitvet SFO)
(På baksiden av Veitvet skole)
Veitvet veien 17, 0596 Oslo

For påmelding kontakt oss på mail med hele navnet på barnet og foreldre / foresatte, fødselsdato, telefonnr, mobilnr, adresse og e-mail adresse; eller ring. Vi ønsker å ha et møte med nye elever før oppstart.
E-mail: hindiskole@gmail.com
Tlf: 92 45 14 12 / 980 31 262 / 92297847