पिता जी की याद में:
[कल 26 अप्रैल को मेरे पिताजी स्व. डॉ. बृजमोहन शुक्ल की पुण्य तिथि है।]
पूज्य पिता तुम्हारी स्मृति में
रोज विचरण करता हूँ।
तुम्हारे संघर्षों से सीखा मैंने
कोटि वन्दन करता हूँ।
जो स्वाभिमान आज जीवित है,
आज तक नहीं भूल पाया हूँ।
जिनका आशीष सदा पाया था,
मैं उस पिता वृक्ष की छाया हूँ।
कभी साइकिल कभी स्कूटर में
हम संग संग कारख़ाने जाते थे।
अपने सपने, अपने क़िस्से
पिताजी रास्ते में हमें सुनाते थे।
छूटा कालेज, दोस्त छूटे थे,
लेकिन हौंसला पिता से मिलता।
पैसों की तंगी की दरार भरने हम
साथ नौकरी करने जाते थे।
मोहल्ले में सांस्कृतिक कार्यक्रम
कालेज में छात्रसंघ चुनाव लड़ा था।
पिता ने सामाजिक विकास में
नहीं रोका, उनका दिल बड़ा था।
अपने से कमजोर की रक्षा करना,
पिता ने मुझे सिखाया था।
स्वाभिमान और दया प्रेम उनके
संघर्ष के जीवन से पाया था।
सत्य से समन्वय बड़ा कठिन है,
पत्थर दिल पिघलना सिखाया था।
किसी जान अगर बचाने में,
समझौता करना सिखाया था।
अकड़-अकड़ कर भूखा न मरना,
चरित्र हत्या कभी न करना।
कम खाना, झुकना, नहीं हारना,
पिता ने दुनिया को देखा था।
दूध के धुले नहीं थे पिताजी,
पर दुनिया की परख बड़ी थी।
मारल पुलिस नहीं थे पिताजी,
जीवन जादू की छड़ी बड़ी है।
विधवा विवाह के बड़े पक्षधर,
अपने असहायों को छत देते थे।
रोम-रोम में बसे मेरे पिताजी,
छुआछूत को नहीं मानते थे।
गंगाधर गुप्ता, भारती गाँधी बहना से
मैंने सुख-दुःख त्याग बहुत सीखा था।
मुझे लिखा पत्र लौट आओ विदेश से,
मेडिकल हाल बनाना सपना था।
अखबार निकालो, सुनो जनता की,
गरीबों का अस्पताल खोल दो।
यहाँ न अपना न कोई पराया है,
सांप्रदायिकता हटाकर प्रेम घोल दो।
हे पिताजी तुम निराश न होना,
25 पुण्य तिथि हुई अब कुछ होगा।
अखबार शुरू बस क्लिनिक बाकी,
कमर कसी है, अब सब कुछ होगा।
- सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’
ओस्लो, 25.04.26
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें