बुधवार, 27 मई 2026

किचन बंदी (कहानी) - सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’

 किचन बंदी (कहानी) 

- सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक

दादी ने घर और गाँव में कोहराम मचा रखा है। वह कह रही हैं कि कमरतोड़ मंहगाई से गैस और तेल के दाम भी दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं। इस डायन मंहगाई का इलाज करना चाहिये।

दादी मन ही मन अपने आपसे से बातें करके धीमी आवाज में बातें कर रही हैं, “जबसे अमेरिका और फादरलैंड ने ईरान पर हमला किया है तब से मध्यपूर्व एशिया में तेल पेट्रोल का यातायात बंद है। अपने बाप का राज बना रखा है। न तो सरकार अपनी संसद  से सलाह लेती है, न ही अपने मंत्रिमंडल से। विपक्ष का नाम सुनकर तो जैसे साँप ही सूँघ जाता है।”
मैंने पूछा,
“ दादी! घर में गैस नहीं है। खाना कैसे बनेगा?”
“आँगन के एक कोने पर दस -बारह ईंट रख दो मैं आती हूँ, टेंपेररी चूल्हा बना दूँगी। देखो बेटी! तुम कहती थी कि बरोठे (घर में बाहर द्वार से पहले लंबा कमरा) में क्यों लकड़ी क्यों इकट्ठा (एकत्र) कर रखी है। बरोठा गंदा कर रखा है। देखना वही बरोठे में जमा लकड़ियाँ मुसीबत में हमारे काम आयेंगी।”

मैंने घर के बाहर एक कोने में जमा ईंटों को दादी के कहे अनुसार आँगन में रख दिया और कुँए से दादी के लिए दो बाल्टी में पानी भरके स्नानघर में रख दिया है। पुराने जमाने की दादी ने घर के बाहर एक तरफ़ कुँआ को पाटने नहीं दिया, बस उसमें मोटी जाली से ढक दिया कि कोई जानवर या बच्चा उसमें गिर न जाए। पर दादी अनपढ़ नहीं है। रोज अख़बार भी पढ़ती है और अख़बार वालों को झूठी खबरों को छापने के लिए कोसती भी है।
मैंने दादी से पूछा,
“ दादी! आप कुँआ क्यों नहीं बंद करवा देती हो। हैंडपंप या सरकारी नल से नहा धो लिया करो।” मैंने दादी से पूछा। दादी कई बार कुँआ साफ़ करा चुकी हैं।
दादी ने जवाब दिया,
“बेटी! कुँआ तालाब बहुत ज़रूरी है। हमको आत्मनिर्भर होना चाहिये और पर्यावरण का ध्यान रखना चाहिए। तालाब रहने से आसपास हरा भरा रहता है। तालाब और कुँएँ के आसपास पेड़-पौधे रहते हैं। हवा शुद्ध रहती है।”

कुछ भी कहो हमारी दादी लाखों में एक है। वह घर की वैद्य है। पर्यावरण एक्टिविस्ट है। मजाल क्या कि घर में बोतल का पानी आ जाये। दादी कहती है कि देश में पानी बिल्कुल भी नहीं बिकना चाहिये। पानी, तालाब, जंगल सब देश की सम्पत्ति है इसका उपयोग बिना रोकटोक देशवासियों के लिए निशुल्क होना चाहिये।

नल से पानी नहीं आ रहा था। नल खोलने पर वह धीरे-धीरे हवा से सीटी बजा रहा था। मैंने पूछा,
“दादी! पानी की बोतल खरीद कर ले आयें, नल में पानी नहीं आ रहा।”
दादी ने कहा,
“ख़बरदार जो प्लास्टिक की बोतल का पानी ख़रीदा। एक तो प्लास्टिक से बीमारी का ख़तरा दूसरा प्रदूषण का ख़तरा।
कुँएँ से पानी निकाल कर पियो। तुम उसे उबालकर उसे सामान्य ठंडा करके पियो।”
इतना ही नहीं जब दादी बोलने लगती हैं तो पूरे सेमिनार का एक लेक्चर ही दे डालती हैं। वह कहती हैं कि जनता के पानी, तेल, ज़मीन और जंगल पर कारपोरेटरों और भ्रष्ट लोगों की नज़र गिद्धों की तरह लगी है। और इसे बचाना जनता का फर्ज है।

दादी ने चूल्हा बनाकर सभी के लिए चाय बनाकर थर्मस में रख दिया है और नाश्ता बना रही हैं। गाँव वाले कई बार उन्हें प्रधान के चुनाव में उम्मीदवार बनने के लिए कह चुके हैं।
दादी कहती हैं,
“जबसे अमेरिका और प्रधान के फादरलैंड ने ईरान पर हमला किया है तब से मध्यपूर्व एशिया में तेल पेट्रोल का यातायात बंद है। जब तक यह समस्या नहीं सुलझती खाना चूल्हे पर बनाओ। फिर से जनता के कुँएँ तालाब फिर से आबाद करो।”

चारो तरफ शोर मच गया है कि नोटबंदी की तरह किचनबंदी होने वाली है। किचनबंदी के बारे में सुनते ही सभी चिंतित हैं जिन्होंने नोटबंदी की मार झेली है। वही जानते हैं। तुलसीदास जी ने लिखा है,
“जाके पाँव न फटे बेवाईं।
वो का जाने पीर पराई।।”
दादी कभी-कभी हमसे पूछती है जैसे हम ज़िम्मेदार हैं,
“देश का व्यापर तेल, पेट्रोल, शस्त्र सुरक्षा उद्योग सबका निजीकरण किया बिना संसद और कैबिनेट से पूछे, अपनी मनमर्ज़ी से सरकार ने कारपोरेटर को सौंप दिया है जो असंवैधानिक है।”
मैं उनसे कहती,
“दादी? यह काम संसद का है। हमको अपने काम से काम रखना चाहिये।” दादी जवाब देतीं और अनेक दूसरी समस्याओं की तरफ़ इशारा करतीं,
“हमसे ही संसद है। हम जनता हैं। सरकार ने चुनावी चन्दा और इलेक्टोरल बाण्ड से कारपोरेटरों से भारी चन्दा लेकर उन्हें ठेके, ग़ैरक़ानूनी लोन बैंकों से दिलाया है। कारपोरेटर ने सरकार को एवं राजनीतिक पार्टी को भ्रष्ट बना दिया है। न्यायालय ने इसे असंवैधानिक तो कहा पर इस पर रोक न लगाकर अपने देश और जनता के पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली हैं।”

मैंने दादी को समझाया,
“दादी! धीरे बोला करो। विरोध और प्रखर स्वरों को सरकार सहन नहीं कर रही बिना मुक़दमे और रिपोर्ट के किसी को भी जब चाहे उन्हें गिरफ़्तार कर लेती है और न्यायालय से न्याय मिले उससे पहले उनपर, विरोधियों के घर पर बुलडोजर चला देती है। दादी मेरे लिये चुप रहा करो।
जब मैं सात साल की थी और मेरे पापा मम्मी का सड़क दुर्घटना में मौत ही गयी थी। तब से दादी तुम्हीं मुझे सम्भाल रही हो। और कोविड-19 कोरोना में नक़ली वैक्सीन से भैया भी चल बसे थे। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती। जब मैं बड़ी हो गई हूँ तो मुझे सारे काम सम्भालने दो।”

दादी ने जवाब दिया,
“बेटी ! शायद तुम ठीक कहती हो। (दादी ने तुलसीदास रचित दोहा पढ़ा और चुप हो गयीं)
‘भलो भलाइहि पे लहइ, लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराइअ अमरता, गरल सराहिअ मीचु।।’
हम प्रशंसा करेंगे। उस जहर की प्रशंसा करेंगे जिसके छूने मात्र से प्राण छूट जाये और प्राण लौट आये। हर एक की प्रशंसा अलग-अलग ढंग से की जाती है। इन नेताओं की प्रशंसा भी की जानी चाहिए कि इन्होंने लोकतंत्र के विनाश का ऐसा प्रकरण चलाया कि लोकतंत्र दिन पर दिन विछिप्त हो रहा है। इसे बचाओ!”
मैंने दादी को परेशान देखा और नाश्ते को मेज पर लगा दिया और कहा,
“अब चुप भी हो जाओ दादी। नाश्ता साथ करते हैं।”

27.06.26 

बुधवार, 13 मई 2026

आज बालकवि बैरागी जी की पुण्य तिथि 13 मई है।

आज बालकवि बैरागी जी की पुण्य तिथि है।

उनका जन्म 10 फरवरी 1931 को हुआ था और उनकी मृत्यु मृत्यु 13 मई 2018 को हुई थी।

मेरा जन्मदिन भी 10 फरवरी के दिन हुआ था।
उनके साथ मेरी अनेक यादें जुड़ी हुई हैं। उनके साथ मुझे भारत, यू. के. और दक्षिण अफ्रीका में मंच साझा करने का अवसर मिला था। यू के में हम साथ- साथ घूमें। एक बार जिस गाड़ी में हमने साथ- साथ यात्रा की उसमें डॉ. लक्ष्मी मल सिंघवी भी साथ थे और मैंने डॉ. सिंघवी जी का साक्षात्कार लिया था।
हमनें अनेक मंचों पर साथ-साथ कविताएं पढ़ी थीं।
अनेक संस्करण उन्होंने साझा किए थे।
एक बार तो उन्होंने अपनी आपबीती सुनाते हुए लंदन में कवि सम्मेलन में सभी को रुला दिया था। उन्होंने बताया था जब वह अपने पिताजी के साथ भीख माँगते थे। वह एक महान इंसान थे और अपनी तरह के एक बड़े साहित्यकार थे।
उन्होंने मुझे बहुत प्रभावित किया था। हमारे साथ अनेक साहित्यकार थे। !जिनमें डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी, डॉ रामदरश मिश्र, डॉ जगदीश चतुर्वेदी, दाऊजी गुप्ता और मैनचेस्टर यू. के. से राम पाण्डेय, डॉ. रंजीत सुमरा आदि स्मरणीय हैं।
बालकवि बैरागी जी केंद्र में मंत्री भी रहे हैं।
जब मैंने डॉ. ज्ञानवती दीक्षित जी की पोस्ट देखी और तब बालकवि बैरागी जी की अनेक बातें याद आ गईं।
उन्हें सादर प्रणाम।
अन्य संस्करण फिर कभी...
- सुरेश चन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

सोमवार, 11 मई 2026

देश के पास नहीं हैं दाने, जनता! अम्मा चली भुनाने - सुरेश चंद्र शुक्ला 'शरद आलोक'


 देश के पास नहीं हैं दाने, जनता! अम्मा चली भुनाने।

सुरेश चंद्र शुक्ला 'शरद आलोक'


देश को कंगाल करके बंधु,
मन्दिर में पूजन करते हैं।
जैसे कोई अपराधी बंधु!
सत्ता में अकड़कर बैठे हैं।

देश में भय फैलाकर बंधु,
मन्दिर में पूजन पाठ कर रहे।
बेरोजगारी भुखमरी बढ़ाकर 
मंत्री गवर्नर गुमराह कर रहे।

देश की समस्याओं पर क्यों,
गोदी मीडिया मौन हो गया।
ऐप्सटीन फ़ाईल वाला मंत्री,
लोकतंत्र का कत्ल कर रहा।

भय के जरिए भ्रम फैलाया 
भ्रम के जरिए लूट।
विदेश नीति में फेल हुए हैं,
घरेलू अपराधी को खुली छूट।

सत्ता के बल पर  मोदी शाह को
क्यों है हर अपराध करने की छूट।
हम कितने  खुद्दार, करने देते,
आर एस एस, अदानी-अंबानी को लूट।

प्रतिदिन यहाँ पर झूठ बोलता,
जिसका यहाँ प्रधान।
स्वर्ग से सुंदर देश हमारा,
अपना प्यारा हिंदुस्तान। 

बेरोजगारी बढ़ा-बढ़ा कर 
किया देश का सपना चूर।
विपक्ष से मिलकर न कर पाये,
देश के संकट दूर।

पूजा पाठ और  किया रोड शो,
वायुसेना करे प्रदर्शन क्यों?
जनता के मुद्दों से भागकर प्रधान 
रैली, मन्दिर, विदेशी यात्रा क्यों?

प्रधानमंत्री रोड शो करते,
देश के पास नहीं हैं दाने।
पहले से भुखमरी देश में,
अम्मा! जनता चली भुनाने। 

ओस्लो, 11.05.20