मंगलवार, 21 जुलाई 2026

लघुकथा 'टूटे घड़े का पानी' - सुरेश चंद्र शुक्ला शरद आलोक’

टूटे घड़े का पानी -  सुरेश चंद्र शुक्ला शरद आलोक’ 


 मुझे नौकरी के लिए आज परीक्षा देने जाना है। तैयार होकर प्रात: काल अपनी बिल्डिंग से नीचे आया तो देखा पार्क में बुजुर्ग पुरुष लोग एक समूह में बैठे टी वी के समाचारों और वार्ट्सऐप यूनिवर्सिटी की खबरों की चर्चा कर रहे हैं, वरना ये लोग घर में और आसपास पड़ोस में लड़ाई लगवाते और आपस में चर्चा करके अपना मन न बहलाते। कहा गया है कि खाली समय शैतान का घर होता है। 

 मेट्रो से गंतव्य स्टेशन तक पहुँचा, मेट्रो स्टेशन बाहर एक गली से निकला तो देखा तो मैंने देखा कि एक दुबला पतला आदमी जमीन पर गिरे मोटे आदमी को मार रहा था। मोटा तगड़ा आदमी शराब के नशे में जमीन में गिरा हुआ बड़बड़ा रहा है। उसके आसपास लोग खड़े हैं और शोर मचा रहे हैं। 

तमाशा देख रहे लोग आश्चर्य कर रहे हैं कि इस दुबले-पतले आदमी में हिम्मत कहाँ से आ गई है। दुबला-पतला आदमी रो रहा था और कह रहा था कि इस मोटे शराबी आदमी ने मेरी भेल पूरी की टोकरी पलट दी है जो पास में नाले के खुले हिस्से में गिर गई है। अब कैसे रोटी खाऊँगा, इसने आज की कमाई खत्म कर दी। भीड़ दुबले आदमी को उकसा रही थी और उससे अपना मनोरंजन कर रही थी। लोग आपस चर्चा करने लगे,
“कमाल है।  ताकतवर आदमी से लड़ने के लिए इस दुबले-पतले आदमी की हिम्मत की दाद देने लगे । 

 मैं जब परीक्षा स्थल पर पहुँचा तो कार्यालय बंद कर दिया गया था। आज युवाओं का संसद के लिए मार्च था। 

 मैंने मेट्रो लेकर किसी तरह जंतर मंतर पहुँचा।  मुझे देखकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ पुलिस भारी संख्या में पुलिस और साथ में  वहाँ आर पी एफ़ के जवान की वर्दी से उनकी पुलिस का बिल्ला और नेमप्लेट ग़ायब थी।  मेरा माथा ठनका कि पुलिस की मौजूदगी में सादी वर्दी में लाठी लिए जो लोग थे वे कौन थे?

 दिनों से भूख हड़ताल कर रहे युवा नेताओं नेहा, मनीष और अमीन की भूख हड़ताल अभिनेत्री शबाना आज़मी ने पानी पिलाकर तुड़वा दी थी। 700 किसान आंदोलन में शहीद हो गए। सरकार टूटे घड़े की तरह है। भूख हड़ताल करना जैसे टूटे घड़े में पानी रखना है जो बह जाएगा। 

शनिवार, 18 जुलाई 2026

नक़ली तिलचट्टे (लघुकथा) - सुरेशचंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’

 

नक़ली तिलचट्टे (लघुकथा) - सुरेशचंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’

तिलचट्टों ने कवि सम्मेलन कराया।
कवि तिलचट्टों के लिए हिट लेकर गया था। चौदह साल पहले भी कवि सम्मेलन कराया था। उस समय जो कवि के साथ व्यवहार हुआ जिसके कारण कवि आज भी दर-दर कवि सम्मेलनों, शादी-ब्याह में सेहरा पढ़ने तक दरबार में अपनी जगह तलाश रहा है।
कवि विश्वास के साथ कविता पढ़कर कवि सम्मेलन से भागने के पहले अपने मुख में मास्क और सर पर हेलमेट लगाकर मंच पर जोरदार हिट छिड़ककर जाने लगा तो कवि देखकर हैरान था कि आयोजक तिलचट्टे का सरदार उसी के साथ निकल गया।
कवि हैरान कि तिलचट्टे को हिट का असर नहीं जैसे नेता को अपने ही वायदों का पता नहीं होता कि उसने कौन से वायदे किए हैं।
मंच से तिलचट्टे बिखर गए और आयोजक तिलचट्टे कवि के साथ निकल गए कहीं आराम फरमाने, नक़ली तिलचट्टे हिट से कहाँ डरने वाले।
18.07.26

बदलती भूमिका (लघुकथा) - सुरेश चंद्र शुक्ला 'शरद आलोक'

बदलती भूमिका - सुरेश चंद्र शुक्ला 'शरद आलोक' 

- “देखो पिताजी! अख़बार में बेरोज़गारी, मंहगाई, पेपर लीक और पार्टी तोड़ने से लेकर सांसद चोरी आदि लोकतन्त्र पर तानाशाही की मार की ख़बर अचानक ग़ायब हो गई है।  बेमतलब के समाचार मंदिर चढ़ावा चोरी, ईरान और अमेरिका युद्ध की खबरें और सरकारी प्रोपेगंडा भरा विज्ञापन सच्चाई को चिढ़ाता हुआ नजर आ रहा है।”
मैंने अपने पिताजी को अखबार देते हुए कहा जो घर के भीतर पीछे के कमरे में कुर्सी पर बैठे हुए चाय की चुस्की ले रहे थे। पिताजी ने चाय का प्याला रखते हुए मेरे हाथों से अखबार लिया और पढ़ने लगे।

पहले पिताजी ड्राइंग रूम में बैठते थे। जब तक पिताजी के पास नौकरी थी, कमाते थे ड्राइंग रूम में बैठते थे।  अब उनको पीछे बना कमरा मिल गया है जहाँ वह अकेले इत्मीनान से दिन भर रहते हैं। 
मैं अपने पिताजी से अपने मित्रों से मिलवाता था,
“मीट माई फादर।”

जबसे मेरी नौकरी लगी और मैं आत्मनिर्भर हो गया मैंने पिताजी से कहा,
“पिताजी! आप रिटायर हो गए हैं, अब आराम करिये। अपना काम करिए। काम करने का मतलब आप पार्क में जाइए।”

पिताजी सुबह शाम पार्क में चले जाते हैं।  वहाँ उनके हम उम्र अंकलों से गपशप और वाट्सऐप यूनिवर्सिटी के समाचारों पर चर्चा में हिस्सा लेते।  हम पिताजी की पेंशन, प्रोविडेंट फंड आदि को भी हम संभाल लेते।

एक दिन पिताजी मुझसे बोले,
“मैं चाहता था कि तुम्हारे लिए ढेर सारा पैसा छोड़ जाऊँ पर तुम्हें और तुम्हारी बहन को पढ़ाने के लिए मैंने कर्ज लिया।  अब मुझ बूढ़े को कौन और कर्ज देगा।”

मैंने पिताजी को सांत्वना देते हुए कहा,
“न नौ मन तेल होगा न राधा नाँचेगी। पिताजी रिटायर आदमी को कौन कर्ज देगा?”
मुझे लगा कि पिताजी को यह बात बुरी लगी। उनके चेहरे के भाव बदले-बदले लगे। उन्होंने गिलास को मेज से उठाकर पानी के घूँट पीते हुए कहा,
“मैं अस्पताल में भर्ती मरीज की तरह हूँ। क़र्ज़ लेने की बात छोड़ो, कर्ज वापस लेने वाला भी कहेगा। इसे थोड़ा ठीक हो जाने दो। कर्जा वापस लेने वाले कहते हैं कि इसे ठीक हो जाने दो। बीमार आदमी कैसे कर्ज वापस करेगा।  कर्जा देने वाले भी मरीज से मिलने नहीं आते। वह डाक्टर से पूछते हैं कि मरीज कब ठीक होगा। बाकी वे मरीज के पास जाना बंद कर देते हैं।”

पड़ोसी से इतना आदमी नहीं डरता जितना कि अपने पापा से डरता है।  पड़ोसी चाहे जितना ताकतवर क्यों न हो।  पापा की आँख की नजरों से डर लगता है। 

पापा देश दुनिया की खबरों से अपडेट हैं । अब यू ट्यूब चैनल ज्यादा देखने लगे हैं। उनका कहना है इस समय बड़े चैनल प्रोपेगंडा में लगे रहते हैं। लोग उन्हें गोदी मीडिया कहने लगे हैं। 

जगह-जगह मंदिर में  चढ़ावा और चंदा चोरी पर बहस हो रही है।
कोई कह रहा था मंदिर में चोरी हुई वह इतनी बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात यह है कि चोरी पकड़ी गई।

जेन जी (युवा) जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे हैं, धरना दे रहे हैं । बुंदेलखंड में आदिवासी लोग उनकी जमीन और जंगल छीने जाने के विरोध में नदी-तालाब में सारा दिन खड़े होकर प्रदर्शन कर रहे हैं।  

चुनाव आ गया है।  चुनाव का प्रचार जोरों पर है।  
जो द्वार-द्वार मंदिर के लिए चंदा माँग रहे थे वही भगवा गमछा उतारकर वोट माँग मांगने घर-घर जा रहे हैं।  सड़कों पर नारे लग रहे हैं।

“घर-घर मंदिर! घर-घर चंदा! किसका धंधा!”
अचानक चंदा चोर 
मंदिर का चंदा मांगने वाले जब वोट माँगने आये। 
जनता अचानक उन्हें  चंदा चोर, कहकर लोग उन्हें घर से भगाने लगी।  लोग भागने लगे।  
पुलिस के लोग जनता की तरफ लाठियाँ चलाने लगी। भगदड़ मच गयी।

शनिवार, 4 जुलाई 2026

बीमार आदमी -- सुरेश चन्द्र शुक्ल

 


बीमार आदमी - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

"पिताजी! मैं भीड़ नहीं हूँ, कि आपकी सारी बात मान लूँ।" विप्लव ने अपने पिता से कहा। पिता ने कहा

"बेटा, पिता की आज्ञा आज्ञा भी नहीं मानोगे?" 

"पिता की जैसी आज्ञा? परन्तु पिता की आज्ञा क्या किसी दबाव में दी जा रही है। उसमें जनहित जुड़ा है। आज्ञा या निवेदन नैतिक और न्यायसंगत है, यह भी देखना जरुरी है।" विप्लव ने जवाब दिया।  पिता ने कहा,

"बेटा विप्लव! अब तुम वयस्क हो गए हो। तुम अपना निर्णय खुद लो।" पिता ने विप्लव के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।  विप्लव ने उत्तर देते हुए कहा,

"छह साल पहले मैं छोटा था। तब मैं निर्णय नहीं ले सकता था। गलत वैक्सीन के कारण मेरी माँ का निधन हो गया था। आज जब देश में पेट्रोल में सरकारी मिलावट पेट्रोल में मिलाकर जनता को बेचा जा रहा है। जो सही नहीं है, इससे मोटर, कारों में गड़बड़ी आ रही है। भूटान ने इथेनॉल मिला तेल लेने से मना कर दिया है। यूरोप को हम शुद्ध पेट्रोल और बहुत सस्ता पेट्रोल बेच रहे हैं।  क्या हमारे देशवासियों के पास चुनने की आजादी नहीं होनी चाहिए। इथेनॉल मोटर गाड़ी के लिए जहर है?"

 

"पिताजी, जनता सब सह रही है और मौन है, तो हमारा शासक जनता को बीमार समझता है, शासक समझता है कि शायद वह आई सी यू में जाने वाली है।  परिवार के लोग प्राय: आईसीयू में जाने पर लोग समझते हैं कि अब सब हो गया। बीमार व्यक्ति से जमीन जायदाद, वसीयत आदि लिखाई जानी शुरू हो जाती है।  सरकार समझती है कि सब कुछ अब उसका है।  कई बार तो मरीज वेंटिलेटर से भी वापस बाहर आ जाता है। लग रहा है कि हम फिर से गुलाम बनने जा रहे हैं।विप्लव ने कहा। 

पिताजी ने कहा,

"मैं अकेला क्या कर सकता हूँ?"

"आप ठीक कहते हैं पिताजी! भीड़ बनना आसान है पर भीड़ जब वह सत्य की तरफ नहीं है तो वह आत्महत्या की तरह है।" विप्लव ने जवाब दिया।

पिताजी ने कहा,

"जो लोग करेंगे वही मैं करूँगा।"

विप्लव ने कहा,

"पिताजी! शासक बीमार, अयोग्य और कमजोर है। इसलिए वह अपना खूब प्रचार करता है। अपने श्रेष्ठ और शक्तिशाली होने का ढिंढोरा पीटता है।  येन केन प्रकारेण वह अपना गुणगान कराता है। भीड़ आसानी से उसके प्रभाव में आ जाती है।"

पिता ने कहा,

"ठीक है बेटा विप्लव! मैं अब तुम्हें नहीं रोकूँगा। मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। बूढ़े लोग अपने घर में यात्री होते हैं।

विप्लव ने पिता से आगे कहा,

"पिताजी बीमार शासक के पास सत्ता की कितनी भी शक्ति क्यों न हो वह सत्य कहने वाले सच्चे आदमी से डरता है", कहते हुए पिताजी को चाय पीने  के लिए मेज पर रख दी। 

पिता ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा,

"इसका अर्थ यह हुआ कि सरकार  जनता को अपनी शक्ति से डरा रही है और सरकार से ज्यादा शक्तिशाली ताकत सरकार की नस दबाकर उसे डरा रही है। हम सभी एक दूसरे की जाल में फंसे हुए हैं।"

विप्लव ने अपना चाय का प्याला मेज पर रखते हुए कहा,

"मैं नहीं फंसा हूँ पिताजी! बस एक जज हिम्मत से सत्य के पक्ष में फैसला सुना दे, अधिकारी उस फैसले को हिम्मत से फैसला लागू करवा दें तो सब बदल जाएगा।  लोकतंत्र बच जाएगा। जनता फिर से ताकतवर हो जायेगी।"

पिता ने कहा,

"मुझे पता है कि बीमार की असली बीमारी और दवा चिकित्सक बेहतर कर सकता है। बीमारी का इलाज हो सकता है कि नहीं चिकित्सक बेहतर बता सकता है।"

"फिर क्या उपाय है बेटा विप्लव!" पिता ने चिंता व्यक्त की।   

"पिताजी! असत्य के साथ सत्ता के नशे में शासक अपनी बीमारी नहीं समझ रहा। शक्ति और अहंकार उसे मनमानी करने देते हैं।" विप्लव ने कहा। 

"मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है बेटा। तुम सत्य का साथ दो।" 

"पिताजी! सत्य के साथ अकेला व्यक्ति भी भीड़ और सत्ता दोनों पर भारी पड़ सकता है। अंत में जनता सत्य का साथ ही देती है।" विप्लव ने कहकर गहरी सांस ली और एकटक महात्मा गांधी की तस्वीर की तरफ देखने लगा।

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

लघुकथा मुखौटा – सुरेश चन्द्र शुक्ल

 

लघुकथा मुखौटा सुरेश चन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

जब से मंदिर से रत्न के मुकुट की चोरी हुई तब से सब जगह इसकी चर्चा है। लोग पहेलियां बुझा रहे हैं। कोई कहता चोर-चोर मौसेरे भाई। कोई कहता बिल्ली को दूध की रखवाली दी गयी तो भला दूध का क्या हाल होगा? पर खुलकर लोग नहीं बोल रहे हैं। अफवाहों का बाजार गर्म है।

निगरानी के लिए लगे कैमरे की फुटेज मिल गयी है। कोर्ट में पेशी हुई और आरोपी मुखौटा पहने थे। कैमरे की फुटेज का एक हिस्सा न्यायालय में दिखाया गया। देखते ही सन्नाटा छा गया। 

यह तो राजा का मुखौटा पहने है। सभी एक दूसरे को देखने लगे। 

न्यायाधीश ने कहा: केस स्थगित किया जाता है और फैसला सुरक्षित रखा जाता है। 

ओस्लो, 02.07.26

मंगलवार, 30 जून 2026

अंधभक्त (लघुकथा) - सुरेश चंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'

अंधभक्त - सुरेश चंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'

मम्मी जब घर के बाहर झाड़ू लगाने निकलीं तो उन्होंने द्वार से गेरुआ ध्वज उतार कर पिताजी की मेज पर रख दिया दिया और तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज लगा दिया। 

पिताजी सुबह सैर करके आये तो गेरुआ ध्वज को अपनी मेज पर देखा और व्यंग्य करते हुए बोले,

"क्या हो गया भगवान! बड़ी देशभक्त हो गयी हो।"   

 

"मुझे तो कुछ नहीं हुआ है, मुझे आपकी चिंता है कि कहीं आप बीमार न हो जायें। बेकार की दौड़धूप। कभी आप किसी के दरवाजे रोटी मांगने जा रहे हैं और कभी खिचड़ी खाने, जो मैं खाना बनाकर रखती हूँ मुझे और बेटी गीता को बासी खाना पड़ता है।" अम्मा ने पिताजी से कहते हुए आगे कहा,

"गीता बेटी! चाय पी ले और तैयार हो जा गैस लेने चलना है।"  

"अरे मम्मी! किसका मुंह देखकर उठी हो जो सुबह से ही बहुत नाराज हो रही हो।" मैंने मम्मी से आगे कहा

"पहले चाय पी लेते हैं फिर चलते हैं।"       

एक मेज के किनारे पड़ी कुर्सियों पर बैठकर सभी चाय पीते हैं पर अम्मा चुपचाप चाय पीती हैं।

पिताजी पर एक नजर डालती हैं और चल देती हैं।

रास्ते में एक बड़ा हुजूम युवाओं का चला आ रहा है। युवा जुलूस में जोर-जोर के नारे लगा रहे हैं,

"पेपर लीक, वोट चोरी, सांसद डकैती, दान चोरी बंद करो। प्रजातंत्र बहाल करो।" आदि-आदि।

" बेटी गीता!  इन युवाओं की मांगें तो सही हैं। जैसे लोग कान में रुई डाले हैं और सुनकर अनजान बन रहे हैं।

"हाँ, मम्मी।" कहकर मैंने मम्मी का हाथ पकड़ा और तेजी से जुलुस के दूसरी ओर चली गयी।


ई-रिक्शा से गैस लेकर घर पहुँच कर मम्मी पिताजी के पास आकर बैठ गयीं और पिताजी से बोलीं,

"देखो जी। देश के हालात बिगड़ रहे हैं मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाओ। पारदर्शिता ख़तम हो गयी है। ऐसा ही रहा तो देश में भुखमरी बढ़ेगी, हालत बेकाबू हो जाएंगे।"

"अच्छा भागवान! तुम्हीं बताओ क्या करूँ?" पिताजी बड़ी नम्रता से बोले।

मम्मी ने पिताजी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,

"कल सुबह शाखा में जाना तो लोगों को समझाना कि अंधभक्ति छोड़ दें। आपको तो पता है, चुनाव आयोग, ईडी, सी बी आई, न्यायपालिका, कार्यपालिका सभी सरकार के काबू में हैं। सरकार से अब कुछ नहीं होना है। जैसे सावन के अंधे को सब कुछ दिखाई देता है, उसका वैसा ही हाल है।"

पिताजी बोले, "हम कैसे समझा सकते हैं, शाखा में तो केवल आदेश आता है और कुछ कहो तो उत्तर नहीं मिलता है।" 


मम्मी ने धीरे से कहा

"देखो! आपको शाखा में या जहाँ कहीं अंधभक्त मिले तो उनसे कहना कि वह अंध भक्ति छोड़ दें। उनका मकसद पूरा हो गया है। लोकतंत्र बेहाल हो गया है और देश बरबाद हो गया है।"

मम्मी की बात सुनकर पिताजी ने कंधे पर अंगोछा लिया और और लाठी उठाकर बाहर चले गए। पिताजी ने मेरी ओर देखा और मैंने मुस्करा कर विदा किया। 

रविवार, 28 जून 2026

लघुकथा 'कागज' - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक’


लघुकथा  'कागज'  - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक’
यू ट्यूब चैनल पर खबर आ रही है, “अमेरिका और ईरान ने शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।” कमला अम्मा सुबह-सुबह अपने फ़ोन पर सुनती जा रही हैं और घर का काम भी करती जा रही हैं। तभी खबर अफवाह की तरह उड़ती आती है,

“ट्रंप के नाम से हैदराबाद में एक सड़क का नाम रखा गया है।।”
कमला अम्मा अपने आपसे बात करती हैं,
“काम करना नहीं, नाम बदलने में लगे हुए हैं ।”

द्वार की घंटी बजती है।  वह द्वार खोलती हैं। लाठी खटखटाते उनके पति आते हैं कहते हैं,
“जानती हो कमला! अब युद्ध खत्म हो जाएगा। अब शांति आ जाएगी।” 

“जानती हूँ, पर तुम्हारा फादरलैंड अभी भी पड़ोसी देश पर हमला करने में लगा हुआ है। ऐसा रहा तो युद्ध फिर से शुरू हो जाएगा बस युद्ध के खिलाड़ी बदल जायेंगे। मैं तो कहती हूँ अब तुम्हारा डरपोक विश्वगुरु अपने फादरलैंड से सारे व्यापार खत्म कर ले, युद्ध में लगने वाला समान लेना और देना बंद करदे। नहीं तो भविष्य में कहीं आफत/युद्ध का रूख हमारी तरफ न हो जाए ।”

“हमारा नेता विश्व गुरु है, उसके रहते हमारे देश से कभी युद्ध नहीं होगा। देखना मेरी पार्टी का जहाँ दो तिहाही बहुमत संसद में हुआ नहीं कि फिर एक देश, एक पार्टी का राज हो जाएगा। तुमने देखा नहीं कि विपक्ष की एक पार्टी के बीस सांसद एक ऐसी पार्टी में मिल गए जिन्हें जनता ने केवल सात सौ वोट दिए थे। इसी तरह और दल भी टूटेंगे तब कभी हमारी पार्टी की सरकार को संकट नहीं होगा।  रही बात नैतिकता की वह अब राजनीति में कहाँ रही?”

कमला अम्मा ने सर से साड़ी का पल्लू संभालते हुए कहा, 
“अच्छा सरकार भी तुम्हारी और विपक्ष भी तुम्हारा। पर क्या जनता इजाजत देगी। अगर जनता सड़क पर जवाब मांगने आ गई तो।”
कमला अम्मा के तर्क के आगे उनके पति के तर्क ज्यादा टिक न सके। 

दूसरे दिन प्रातः काल का समय है। कमला अम्मा घर का काम कर रही है।
तभी उनके पति लाठी लिए खाखी हाफ पैन्ट पहने घर में घुसे ही थे कि वह बोले,
“जरा चाय मिल जाती तो…” बीच में ही कमला अम्मा ने झाड़ू से बहारते हुए कहा,
“चाय थर्मस में रखी है। सुनो! घर में पानी नहीं है और रसोई गैस खत्म हो गई है।”

“बेटा अमन कहाँ है? उससे मँगा लो।”
“वह जेन जी युवाओं की बैठक में गया है। उसने पहले ही बता दिया था। आप ही ले आओ। गैस वाला सुबह ही पार्क के द्वार पर आ जाता है।” 
“मैं शाखा में गया था।” गोदी लाल ने अपनी पत्नी कमला से कहा।”

“देखो अब शाखा-वाखा छोड़ो। आपको पता नहीं कर्नाटक के मंत्री ने तुम्हारी शाखा-वाखा से कागज माँगे हैं। 
अगर पार्क के पास के लोगों ने कागज माँग लिए तो मुसीबत हो जाएगी। तुम्हारी खाखी नेकर खिसक जाएगी और लाठी अपने ही ठूँठ में सिमट जाएगी।” 
कमला अम्मा ने कहा।

रेडियो में मन की बात कार्यक्रम चल रहा था। फोटोजनिक पर्ची-जनिक ज्ञान प्रसारित हो रहा था।
कमला अम्मा कूड़ा करकट कचरे के डिब्बे में डालने लगीं।
…..
18.06.26