अंधभक्त - सुरेश चंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'
मम्मी
जब घर के बाहर झाड़ू लगाने निकलीं तो उन्होंने द्वार से गेरुआ ध्वज उतार कर पिताजी
की मेज पर रख दिया दिया और तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज लगा दिया।
पिताजी
सुबह सैर करके आये तो गेरुआ ध्वज को अपनी मेज पर देखा और व्यंग्य करते हुए बोले,
"क्या
हो गया भगवान! बड़ी देशभक्त हो गयी हो।"
"मुझे
तो कुछ नहीं हुआ है,
मुझे आपकी चिंता है कि कहीं आप बीमार न हो जायें। बेकार की
दौड़धूप। कभी आप किसी के दरवाजे रोटी मांगने जा रहे हैं और कभी खिचड़ी
खाने, जो मैं खाना बनाकर रखती हूँ मुझे और बेटी गीता को बासी खाना पड़ता है।"
अम्मा ने पिताजी से कहते हुए आगे कहा,
"गीता बेटी! चाय पी ले और तैयार हो जा गैस लेने चलना है।"
"अरे
मम्मी! किसका मुंह देखकर उठी हो जो सुबह से ही बहुत नाराज हो रही हो।" मैंने
मम्मी से आगे कहा,
"पहले
चाय पी लेते हैं फिर चलते हैं।"
एक मेज
के किनारे पड़ी कुर्सियों पर बैठकर सभी चाय पीते हैं पर अम्मा चुपचाप चाय पीती हैं।
पिताजी पर एक नजर डालती हैं और चल देती हैं।
रास्ते
में एक बड़ा हुजूम युवाओं का चला आ रहा है। युवा जुलूस में जोर-जोर के नारे लगा रहे
हैं,
"पेपर
लीक, वोट चोरी, सांसद डकैती,
दान चोरी बंद करो। प्रजातंत्र बहाल करो।" आदि-आदि।
" बेटी गीता!
इन युवाओं की मांगें तो सही हैं। जैसे लोग कान में रुई डाले
हैं और सुनकर अनजान बन रहे हैं।"
"हाँ, मम्मी।"
कहकर मैंने मम्मी का हाथ पकड़ा और तेजी से जुलुस के दूसरी ओर चली गयी।
ई-रिक्शा
से गैस लेकर घर पहुँच कर मम्मी पिताजी के पास आकर बैठ गयीं और
पिताजी से बोलीं,
"देखो जी। देश के हालात बिगड़ रहे हैं मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाओ। पारदर्शिता ख़तम हो गयी है। ऐसा ही रहा तो देश में भुखमरी बढ़ेगी, हालत बेकाबू हो जाएंगे।"
"अच्छा भागवान! तुम्हीं बताओ क्या करूँ?" पिताजी बड़ी नम्रता से बोले।
मम्मी
ने पिताजी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,
"कल सुबह शाखा में जाना तो लोगों को समझाना कि अंधभक्ति छोड़ दें। आपको तो पता है, चुनाव आयोग, ईडी, सी बी आई, न्यायपालिका, कार्यपालिका सभी सरकार के काबू में हैं। सरकार से अब कुछ नहीं होना है। जैसे सावन के अंधे को सब कुछ दिखाई देता है, उसका वैसा ही हाल है।"
पिताजी
बोले, "हम कैसे समझा सकते हैं,
शाखा में तो केवल आदेश आता है और कुछ कहो तो उत्तर नहीं
मिलता है।"
मम्मी
ने धीरे से कहा,
"देखो!
आपको शाखा में या जहाँ कहीं अंधभक्त मिले तो उनसे कहना कि वह अंध भक्ति छोड़ दें।
उनका मकसद पूरा हो गया है। लोकतंत्र बेहाल हो गया है और देश बरबाद हो गया
है।"
मम्मी
की बात सुनकर पिताजी ने कंधे पर अंगोछा लिया और और लाठी उठाकर बाहर चले गए। पिताजी
ने मेरी ओर देखा और मैंने मुस्करा कर विदा किया।



