मंगलवार, 16 जून 2026

प्रतिरोध की शक्ति: 2024 हम हारे नहीं थे, 2029 हम जीतेंगे - राहुल गांधी


प्रतिरोध की शक्ति: 2024 हम हारे नहीं थे, 2029 हम जीतेंगे  - राहुल गांधी

भारत (INDIA) गठबंधन की बैठक में राहुल गांधी का भाषण
8 जून

मैं आप सभी का यहाँ स्वागत करता हूँ। आने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

कई वर्ष पहले मेरी अपने एक बहुत अच्छे मित्र से बहस हो गई थी। मैंने उनसे कहा कि जो आप कर रहे हैं, वह अन्यायपूर्ण है। उन्होंने मुझे जवाब दिया, "दुनिया अन्यायपूर्ण है, इसकी आदत डाल लो।"

आज कांग्रेस पार्टी के बारे में जो बातें कही गईं, उनका जवाब देना मेरा काम नहीं है। मेरा काम तो, शैव परंपरा की तरह, सब कुछ अपने भीतर समाहित कर लेना है। जैसे भगवान शिव ने समस्त विष का पान किया और नीलकंठ कहलाए।

आप जो भी कहना चाहते हैं, मेरे बारे में या कांग्रेस पार्टी के बारे में जितनी भी आलोचना करना चाहते हैं—हम उसे स्वीकार करेंगे, और मुस्कुराते हुए स्वीकार करेंगे। हम आपको प्रसन्न करने की पूरी कोशिश करेंगे, क्योंकि हमारी भूमिका मूल रूप से आप सबसे अलग है।

मैं यह बात अहंकार से नहीं कह रहा हूँ। हमारी भूमिका, जैसा कि आपमें से कई लोगों ने कहा, आप सभी को प्रेम और स्नेह के साथ एकजुट करना है।

मैं 2004 से कांग्रेस पार्टी का सांसद हूँ, जब मैंने अपना पहला चुनाव लड़ा था।

हमारी पार्टी भारत की अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों से मूल रूप से अलग तरीके से संगठित है—और मैं यह बात पूरी विनम्रता के साथ कह रहा हूँ।

क्यों?

हम मूल रूप से आरएसएस की विचारधारा के विरोधी हैं। हम मर जाएंगे—हम कांग्रेस पार्टी में रहते हुए मर जाएंगे—लेकिन भाजपा या आरएसएस के साथ कभी न खड़े होंगे और न ही उनसे कोई समझौता करेंगे। यदि ऐसा कराना है, तो पहले हमारे सिर काटने होंगे। मैं इस देश के लाखों-लाख कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जानता हूँ, जो कहेंगे: हमारे सिर काट दो, लेकिन हम आरएसएस के सामने कभी नहीं झुकेंगे।

मुझे यह कहते हुए खेद है कि इस समूह में एक भ्रम है। यह भ्रम यह है कि आप—समाजवादी पार्टी (एसपी), तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) आदि—मानते हैं कि अब तक जिन राजनीतिक तरीकों का आपने इस्तेमाल किया है, वे आगे भी काम करेंगे। वे केवल तब तक काम करते थे, जब तक भारतीय राज्य एक निष्पक्ष मैदान उपलब्ध कराता था। अब वह मैदान मौजूद नहीं है।

भाजपा ने राज्य की संस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है। भाजपा न्याय व्यवस्था को नियंत्रित करती है। भाजपा नौकरशाही को नियंत्रित करती है। भाजपा खुफिया एजेंसियों को नियंत्रित करती है। यहाँ तक कि चुनाव आयोग भी उसके प्रभाव में है।

टीएमसी में मेरे कई मित्र हैं। उन्हें पूरा विश्वास था कि वे चुनाव में भारी जीत हासिल करने वाले हैं। मैं लगातार उनसे कहता रहा: आप भ्रम की दुनिया में जी रहे हैं। मैंने यह सब गुजरात में देखा है, मध्य प्रदेश में देखा है, छत्तीसगढ़ में देखा है, हरियाणा और महाराष्ट्र में भी देखा है। फिर भी आपमें से बहुत से लोग अभी तक आश्वस्त नहीं हैं।

कांग्रेस पार्टी प्रतिरोध की पार्टी है। उसे काम करने के लिए भारतीय राज्य की तटस्थता की आवश्यकता नहीं है। बल्कि, भारतीय राज्य की संस्थाओं का जितना अधिक गला घोंटा जाएगा, कांग्रेस पार्टी उतनी ही अधिक दृढ़ता और आक्रामकता के साथ संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष करेगी।

हम सभी कांग्रेस पार्टी के आदर्शों को साझा करते हैं। वे आदर्श क्या हैं? सत्य, अहिंसा और करुणा।

यहाँ मुख्य मुद्दा क्या है? मुझे आपसे लड़ने में कोई रुचि नहीं है। यदि मैं अचानक उठकर कहूँ कि मैं आपसे लड़ने जा रहा हूँ, तो मैं पागल कहलाऊँगा—क्योंकि आप हमारे सहयोगी हैं, हमारे मित्र हैं, और वे लोग हैं जिन्हें हम अपना मानते हैं।

कृपया समझिए: हमने 2024 का चुनाव जीता था। हमने 2024 का चुनाव नहीं हारा।

आप पूछते हैं कि नीतीश जी क्यों चले गए। इसका कारण न मैं था और न ही कांग्रेस।

और मैं आपको बताता हूँ कि निकट भविष्य में वे कुछ राजनीतिक साधन भी काम करना बंद कर देंगे, जो अब तक किसी तरह काम कर रहे थे, क्योंकि भाजपा और आरएसएस भारतीय राज्य पर अपनी पकड़ लगातार मजबूत करते जा रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी ने ठीक इसी प्रकार का निर्णय सौ वर्ष से भी अधिक पहले लिया था। 1927 से पहले हम एक राजनीतिक संगठन थे। जिस दिन महात्मा गांधी ने कहा कि हमें स्वतंत्रता चाहिए, उसी दिन हम एक प्रतिरोध आंदोलन बन गए।

क्योंकि यह पार्टी उस समय एक प्रतिरोध आंदोलन (Resistance Movement) के रूप में शुरू हुई थी, जब आधुनिक भारत का अस्तित्व भी नहीं था। अन्य राजनीतिक दलों के विपरीत, कांग्रेस पार्टी भारतीय राज्य की संरचना और संरक्षण के सहारे नहीं बनी। कांग्रेस पार्टी उस विचार की रक्षा करने वाला एक प्रतिरोध आंदोलन है कि भारत का हर नागरिक समान है।

हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा के मूल रूप से विरोधी हैं। कांग्रेस पार्टी में हम मर जाना स्वीकार करेंगे, लेकिन भाजपा या आरएसएस के साथ खड़े नहीं होंगे और न ही कोई समझौता करेंगे। ऐसा करवाने के लिए आपको हमारे सिर काटने पड़ेंगे।

मैं इस देश के लाखों-लाख कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जानता हूँ, जो कहेंगे—"हमारे सिर काट दो, लेकिन हम आरएसएस के सामने कभी नहीं झुकेंगे।"

बुधवार, 10 जून 2026

डूबता जहाज (लघुकथा) - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

 

डूबता जहाज (लघुकथा) - 

सुरेशचन्द्र शुक्ल शरद आलोक'

आल इंडिया रेडियो में राजनेता सम्बोधित कर रहे थे, "आज दो राज्य में चुनाव है, आप लोग अपने वोट का प्रयोग करें। हम विश्व की सबसे बड़ी व्यवस्था बनने जा रहे हैं. तेल की आपूर्ति करने वाले मध्य पूर्व एशिया के देशों में तेल का ट्रांसपोर्ट कम हो गया है. वहाँ में युद्ध चल रहा है, लेकिन हमारे पास तेल भंडार की कोई कमी नहीं है."  दादी रेडियो में राजनेता की बात बड़े ध्यान से सुन रही है. दादी को रेडियो पर अपने मन की बात कर रहे नेता की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था. दादी को शक हुआ. उसने सोचा कि कुछ तो गड़बड़ है. क्योंकि तेल का ट्रांसपोर्ट कम हुआ और तेल के मूल्य  विदेशी बाजार में बढ़ रहे हैं. फिर  नेता क्यों कह रहा है कि बचत करो. सोने के गहने मत खरीदो।  चुनाव समाप्त हुआ और रिजल्ट आ गया। 

प्रधान राज नेता की पार्टी चुनाव जीत गयी। विपक्ष का नेता कह रहा था, "देश में आर्थिक सुनामी आने वाली है क्योंकि सरकार ने आपातकाल में खर्च करने वाला धन खर्च कर दिया है। जरुरत से ज्यादा देश के उद्योगों का निजीकरण किया जा रहा है और व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं है।" 

दादी को पहले ही शक था।  दादी को याद है उसने डूबे पानी के जहाज टाइटैनिक के बारे में पढ़ा था।जब टाइटैनिक जहाज डूब रहा था, जहाज का कैप्टन परेशान था। उसने जहाज में यात्रियों को बचने के लिए सिग्नल दिया ताकि लोगों को बचाया जा सके।  जहाज की ऊपर वाली मंजिल में लोग अभी भी संगीत बज रहा था लोग नृत्य कर रहे थे. पार्टी चल रही थी. लोग जहाज की यात्रा का पूरा आनन्द ले रहे थे। कैप्टन को छोड़कर बहुत अच्छा वातावरण था ऊपर की मंजिल में।  दादी ने कहा," देश का जहाज की तरह आर्थिक संकट से डूब रहा है।  डूबते जहाज की सूचना हमारे नेता ने जनता को नहीं दी इसलिए जनता ठीक से तैयारी नहीं कर सकी।  कैप्टन की भूमिका निभाने की जगह हमारा नेता चूहे की तरह परेशां होकर इधर-उधर भाग रहा है इसीलिए कभी कुछ कहता है कभी कुछ।"अब क्या होगा सभी परेशान हैं. अब कैप्टन /राजनेता  बदला जाए तभी आगे कुछ हो सकता है क्योंकि उसे कोई दूसरा चला रहा है।" 

पौत्री ने दादी से कहा,

"यह देखो अख़बार में दादी! मंत्री के पति का लेख छपा है।  लिखा है कि चुनाव में गड़बड़ी हुई है। कैसे हो सकता है कि एक वोटर ने औसत 40-50  सेकेण्ड में वोट दे दिया।  हमारे देश में सरे मतदाता साक्षर नहीं हैं।  मतदाता केंद्र में पहले लाइन लगो, द्वार पर प्रवेश करते समय अपना पहचान पात्र दिखाओ, फिर वहां कर्मचारी देखता है कि पहचान पत्र सही है और फिर मतदाता सूची में नाम है कि नहीं, फिर वोट देने की के लिए वोटिंग मशीन पर जाना और अंगुली में स्याही लगवाना आदि में केवल चालीस सेकण्ड लगते हैंक्यों नहीं चुनाव आयोग अथवा सुप्रीम कोर्ट संज्ञान ले और डमी दिखये कि कितना समय लगता है।  कभी भी नब्बे प्रतिशत वोट पड़े।" दादी ने सहमति व्यक्त करते हुए कहा,

"तेरे दादा भी कई बार बात नहीं मानते थे। तेरे दादा कहते थे कि कान में सरसों के तेल की बूंदें डालने में चार  सेकण्ड लगते हैं।  खुद करना पड़े तब पता चले. हमने अपने तीन बच्चे ऐसे ही थोड़े बड़े किये।  अगर कान में  तेल डालने की बात ही करें तो पहले कान में देखेंगे फिर उसे पकड़ कर हिलायेंगे। रुई के फाहे को तेल में थोड़ा भिगोयेंगे और देखकर एक -एक बूँद डालेंगे।  बोलो यह यह चार सेकेण्ड में हो सकता है?"

अखबार के एक कोने में खबर छपी थी कि भारतीय जहाज में ओमान के पास हमला हुआ, जहाज में आग लग गयी।  

कल अमेरिका ने ओमान के पास भारतीय जहाज में हमला किया तीन लोग मारे गए। जब हमारे जहाज पर हमले हो रहे हैं हमारा राजनेता शान से जश्न मना रहा है। जब रोम जल रहा था नीरो बांसुरी बजा रहा था। 
" देश का जहाज आर्थिक संकट से डूब रहा है।  डूबते जहाज की सूचना हमारे नेता ने जनता को नहीं दी इसलिए जनता ठीक से तैयारी नहीं कर सकी।  कैप्टन की भूमिका निभाने की जगह हमारा नेता चूहे की तरह परेशां होकर इधर-उधर भाग रहा है इसीलिए कभी कुछ कहता है कभी कुछ।"

"हमारा नेता चुप है लगता है जिम्मेदारी से भाग रहा है. देश का जहाज संभाल नहीं पा रहा है।" कहकर पौत्री ने द्वार की तरफ देखा।  ट्रैफिक के शोर के साथ नारों की मिली जुली आवाजें  आ रही थीं।    

12.06.26, Oslo

शुक्रवार, 5 जून 2026

काकरोच (कहानी) - सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'

 काकरोच (कहानी) - सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'


मँहगाई, बेरोजगारी और पेपरलीक पर जेनजी (युवाओं) द्वारा प्रदर्शन करने पर पुलिस युवाओं को गिरफ्तार करके थाने ले आयी है। 

थाने को घेर कर खड़ी भीड़ रह रहकर शोर मचा रही है।  इन्हीं के बीच से निकलती बूढ़ी अम्मा सरकार, राजनेता  और कार्पोरेटर हो या जज सभी को गरिया (गाली  दे) रही हैं और बद्दुआ दे रही हैं,

"सत्यानाश हो लाट साहब का,  देश में समस्याओं की आग लगी है, कहता है सोना नहीं खरीदना।  जहाज पर यात्रा नहीं करना।  नाशकाटे से पूछो! वह विदेश में क्यों गुलछर्रे उड़ा रहा है  लोग कहते हैं कि वह कैसा देश का राजनेता है जो जनता के सवालों का कभी जवाब नहीं देता  कभी प्रेस कांफ्रेंस नहीं करता कि का उससे सवाल-जवाब कर सकें अपने ठेकेदार कार्पोरेटर दोस्त का एम्बेसडर बना दुनिया भर में घूमता फिरता है।"


हवलदार ने डंडा पटकते हुए पूछा, "क्या बात है बुढ़िया! काहे को आसमान सर पर उठा रखा है।"

"देखो थानेदार साहब!  हमसे जरा इज्जत से बात करना।  मैं तुम्हारी दादी की उम्र की हूँ। तुम्हारे दादा प्रधान थे। मैं रपट लिखाने आयी हूँ।  एक नहीं दो- दो के खिलाफ। " बूढ़ी अम्मा ने एक हाथ से लाठी और दूसरे हाथ से डोरी से बंधा चश्मा नाक पर नीचे करके कहा  हवलदार बोला किसके खिलाफ रिपोर्ट लिखाने आई हो।"

"अरे वो जो दिन में चार बार सूट (कपड़े) बदलता है  इटली में टाफी खिलाने गया था।  हम सबको कंगाल कर दिया। खुद मटरगस्ती करता है। वही जो चोर से कहता है चोरी करो और शाह से कहे जागो।" लम्बी सांस भरते हुए बूढ़ी अम्मा ने कहा। हवलदार ने आश्चर्य से देखते हुए पूछा,

"जानती हो बूढ़ी अम्मा, तुम किसकी बात कर रही हो। वह सबसे बड़ा नेता है। तुम्हारे पास क्या प्रूफ है? कोई गवाही है?" हवालदार ने कड़क कर कहा।


बूढ़ी अम्मा पीछे भीड़ की तरफ मुड़ी और भीड़ से पूछा, 

"बोलो मंहगाई है?"

"हाँ।" भीड़ ने जोर आवाज में हामी भरी।  फिर बूढी अम्मा ने भीड़ से पूछा,

"बोलो बेरोजगारी है?"

"हाँ।" भीड़ ने जोर आवाज में फिर हामी भरी।

"प्रधान सवालों का जवाब नहीं देता है?" बूढ़ी अम्मा ने भी जोश में जोर से पूछा।

"हाँ।" भीड़ ने जोर आवाज में फिर हामी भरी।

"क्या भीड़ में सब गवाह बनेंगे? यदि हाँ तो सबके आधार कार्ड लेकर आओ।" हवालदार बोला।

"वाह भाई वाह! संसद में ध्वनि मत से प्रस्ताव और कानून पारित कर लेते हो? तुम्हें भीड़ में इन लोगों की आवाज नहीं सुनाई दे रही है? लिख लो कि भीड़ ने ध्वनिमत से गवाही दी है?" 


बूढ़ी अम्मा ने आगे कहा,

"रपट लिखो, पेपर लीक पर सरकार इस्तीफा नहीं देती।  दूसरे एक सर्वोच्च अदालत के जज ने हमारे बेरोजगार युवाओं बेरोजगार को काक्रोच कहा उससे माफी मंगवाओ, उसे कुर्सी से हटाओ। हम तो कहते हैं कि उसे और   प्रधान को थाने में बुलाकर पूछताछ करो, जहाँ चार डंडे पड़ेंगे सब शेखी भूल जाएंगे।"


"जानती हो तुम किस पर सवाल उठा रही हो? बहुत बड़े लोग हैं?"

"तो क्या हुआ हमारा संविधान हमें बराबरी का दर्जा देता है। यहाँ सभी बराबर हैं?"

"न्यायालय में जज हमारे बच्चों को कॉकरोच कहते हैं और जब ये युवा सड़क पर आकर आवाज उठाते हैं तो पुलिस उन्हें बर्बरता से पीटती है।" 

थाने के सभी बड़े अफसर दूर खड़े होकर सुन रहे थे। तभी थानेदार ने सभी युवाओं को रिहा करने की बात कही।  सभी युवा बाहर आ गए। पर बूढ़ी अम्मा ने थानेदार और सभी पुलिस वालों को एकटक देखा और बिना धन्यवाद दिए वहां से चुपचाप चली गयी। अचानक बूढ़ी अम्मा चुप हो गयी और वापस मुड़कर चली गयी। उसकी चुप्पी ऐसे लग रही थी जैसे किसी तूफ़ान के आने के पहले की चुप्पी हो।

बुधवार, 27 मई 2026

किचन बंदी (कहानी) - सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’

 किचन बंदी (कहानी) 

- सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक

दादी ने घर और गाँव में कोहराम मचा रखा है। वह कह रही हैं कि कमरतोड़ मंहगाई से गैस और तेल के दाम भी दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं। इस डायन मंहगाई का इलाज करना चाहिये।

दादी मन ही मन अपने आपसे से बातें करके धीमी आवाज में बातें कर रही हैं, “जबसे अमेरिका और फादरलैंड ने ईरान पर हमला किया है तब से मध्यपूर्व एशिया में तेल पेट्रोल का यातायात बंद है। अपने बाप का राज बना रखा है। न तो सरकार अपनी संसद  से सलाह लेती है, न ही अपने मंत्रिमंडल से। विपक्ष का नाम सुनकर तो जैसे साँप ही सूँघ जाता है।”
मैंने पूछा,
“ दादी! घर में गैस नहीं है। खाना कैसे बनेगा?”
“आँगन के एक कोने पर तीन ईंट रख दो मैं आती हूँ, टेंपेररी चूल्हा बना दूँगी। देखो बेटी! तुम कहती थी कि बरोठे (घर में बाहर द्वार से पहले लंबा कमरा) में क्यों लकड़ी क्यों इकट्ठा (एकत्र) कर रखी है। बरोठा गंदा कर रखा है। देखना वही बरोठे में जमा लकड़ियाँ मुसीबत में हमारे काम आयेंगी।”

मैंने घर के बाहर एक कोने में जमा ईंटों को दादी के कहे अनुसार तीन ईंटों को आँगन में रख दिया और कुँए से दादी के लिए दो बाल्टी में पानी भरके स्नानघर में रख दिया है। पुराने जमाने की दादी ने घर के बाहर एक तरफ़ कुँआ को पाटने नहीं दिया, बस उसमें मोटी जाली से ढक दिया कि कोई जानवर या बच्चा उसमें गिर न जाए। पर दादी अनपढ़ नहीं है। रोज अख़बार भी पढ़ती है और अख़बार वालों को झूठी खबरों को छापने के लिए कोसती भी है।

मैंने दादी से पूछा,
“ दादी! आप कुँआ क्यों नहीं बंद करवा देती हो। हैंडपंप या सरकारी नल से नहा धो लिया करो।” मैंने दादी से पूछा। दादी कई बार कुँआ साफ़ करा चुकी हैं।
दादी ने जवाब दिया,
“बेटी! कुँआ तालाब बहुत ज़रूरी है। हमको आत्मनिर्भर होना चाहिये और पर्यावरण का ध्यान रखना चाहिए। तालाब रहने से आसपास हरा भरा रहता है। तालाब और कुँएँ के आसपास पेड़-पौधे रहते हैं। हवा शुद्ध रहती है।”

कुछ भी कहो हमारी दादी लाखों में एक है। वह घर की वैद्य है। पर्यावरण एक्टिविस्ट है। मजाल क्या कि घर में बोतल का पानी आ जाये। दादी कहती है कि देश में पानी बिल्कुल भी नहीं बिकना चाहिये। पानी, तालाब, जंगल सब देश की सम्पत्ति है इसका उपयोग बिना रोकटोक देशवासियों के लिए निशुल्क होना चाहिये।

नल से पानी नहीं आ रहा था। नल खोलने पर वह धीरे-धीरे हवा से सीटी बजा रहा था। मैंने पूछा,
“दादी! पानी की बोतल खरीद कर ले आयें, नल में पानी नहीं आ रहा।”
दादी ने कहा,
“ख़बरदार जो प्लास्टिक की बोतल का पानी ख़रीदा। एक तो प्लास्टिक से बीमारी का ख़तरा दूसरा प्रदूषण का ख़तरा।
कुँएँ से पानी निकाल कर पियो। तुम उसे उबालकर उसे सामान्य ठंडा करके पियो।”
इतना ही नहीं जब दादी बोलने लगती हैं तो पूरे सेमिनार का एक लेक्चर ही दे डालती हैं। वह कहती हैं कि जनता के पानी, तेल, ज़मीन और जंगल पर कारपोरेटरों और भ्रष्ट लोगों की नज़र गिद्धों की तरह लगी है। और इसे बचाना जनता का फर्ज है।

दादी ने चूल्हा बनाकर सभी के लिए चाय बनाकर थर्मस में रख दिया है और नाश्ता बना रही हैं। गाँव वाले कई बार उन्हें प्रधान के चुनाव में उम्मीदवार बनने के लिए कह चुके हैं।
दादी कहती हैं,
“जबसे अमेरिका और प्रधान के फादरलैंड ने ईरान पर हमला किया है तब से मध्यपूर्व एशिया में तेल पेट्रोल का यातायात बंद है। जब तक यह समस्या नहीं सुलझती खाना चूल्हे पर बनाओ। फिर से जनता के कुँएँ तालाब फिर से आबाद करो।”

चारो तरफ शोर मच गया है कि नोटबंदी की तरह किचनबंदी होने वाली है। किचनबंदी के बारे में सुनते ही सभी चिंतित हैं जिन्होंने नोटबंदी की मार झेली है। वही जानते हैं। तुलसीदास जी ने लिखा है,
“जाके पाँव न फटे बेवाईं।
वो का जाने पीर पराई।।”
दादी कभी-कभी हमसे पूछती है जैसे हम ज़िम्मेदार हैं,
“देश का व्यापर तेल, पेट्रोल, शस्त्र सुरक्षा उद्योग सबका निजीकरण किया बिना संसद और कैबिनेट से पूछे, अपनी मनमर्ज़ी से सरकार ने कारपोरेटर को सौंप दिया है जो असंवैधानिक है।”
मैं उनसे कहती,
“दादी? यह काम संसद का है। हमको अपने काम से काम रखना चाहिये।” दादी जवाब देतीं और अनेक दूसरी समस्याओं की तरफ़ इशारा करतीं,
“हमसे ही संसद है। हम जनता हैं। सरकार ने चुनावी चन्दा और इलेक्टोरल बाण्ड से कारपोरेटरों से भारी चन्दा लेकर उन्हें ठेके, ग़ैरक़ानूनी लोन बैंकों से दिलाया है। कारपोरेटर ने सरकार को एवं राजनीतिक पार्टी को भ्रष्ट बना दिया है। न्यायालय ने इसे असंवैधानिक तो कहा पर इस पर रोक न लगाकर अपने देश और जनता के पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली हैं।”

मैंने दादी को समझाया,
“दादी! धीरे बोला करो। विरोध और प्रखर स्वरों को सरकार सहन नहीं कर रही, बिना मुक़दमे और रिपोर्ट के किसी को भी जब चाहे उन्हें गिरफ़्तार कर लेती है और न्यायालय से न्याय मिले उससे पहले उनपर, विरोधियों के घर पर बुलडोजर चला देती है। दादी मेरे लिये चुप रहा करो।
जब मैं सात साल की थी और मेरे पापा मम्मी का सड़क दुर्घटना में मौत ही गयी थी। तब से दादी तुम्हीं मुझे सम्भाल रही हो। और कोविड-19 कोरोना में नक़ली वैक्सीन से भैया भी चल बसे थे। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती। जब मैं बड़ी हो गई हूँ तो मुझे सारे काम सम्भालने दो।”

दादी ने जवाब दिया,
“बेटी ! शायद तुम ठीक कहती हो। (दादी ने तुलसीदास रचित दोहा पढ़ा और चुप हो गयीं)
‘भलो भलाइहि पे लहइ, लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराइअ अमरता, गरल सराहिअ मीचु।।’
हम प्रशंसा करेंगे। उस जहर की प्रशंसा करेंगे जिसके छूने मात्र से प्राण छूट जाये और प्राण लौट आये। हर एक की प्रशंसा अलग-अलग ढंग से की जाती है। इन नेताओं की प्रशंसा भी की जानी चाहिए कि इन्होंने लोकतंत्र के विनाश का ऐसा प्रकरण चलाया कि लोकतंत्र दिन पर दिन विछिप्त हो रहा है। इसे बचाओ!”
मैंने दादी को परेशान देखा और नाश्ते को मेज पर लगा दिया और कहा,
“अब चुप भी हो जाओ दादी। नाश्ता साथ करते हैं।”

27.06.26 

बुधवार, 13 मई 2026

आज बालकवि बैरागी जी की पुण्य तिथि 13 मई है।

आज बालकवि बैरागी जी की पुण्य तिथि है।

उनका जन्म 10 फरवरी 1931 को हुआ था और उनकी मृत्यु मृत्यु 13 मई 2018 को हुई थी।

मेरा जन्मदिन भी 10 फरवरी के दिन हुआ था।
उनके साथ मेरी अनेक यादें जुड़ी हुई हैं। उनके साथ मुझे भारत, यू. के. और दक्षिण अफ्रीका में मंच साझा करने का अवसर मिला था। यू के में हम साथ- साथ घूमें। एक बार जिस गाड़ी में हमने साथ- साथ यात्रा की उसमें डॉ. लक्ष्मी मल सिंघवी भी साथ थे और मैंने डॉ. सिंघवी जी का साक्षात्कार लिया था।
हमनें अनेक मंचों पर साथ-साथ कविताएं पढ़ी थीं।
अनेक संस्करण उन्होंने साझा किए थे।
एक बार तो उन्होंने अपनी आपबीती सुनाते हुए लंदन में कवि सम्मेलन में सभी को रुला दिया था। उन्होंने बताया था जब वह अपने पिताजी के साथ भीख माँगते थे। वह एक महान इंसान थे और अपनी तरह के एक बड़े साहित्यकार थे।
उन्होंने मुझे बहुत प्रभावित किया था। हमारे साथ अनेक साहित्यकार थे। !जिनमें डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी, डॉ रामदरश मिश्र, डॉ जगदीश चतुर्वेदी, दाऊजी गुप्ता और मैनचेस्टर यू. के. से राम पाण्डेय, डॉ. रंजीत सुमरा आदि स्मरणीय हैं।
बालकवि बैरागी जी केंद्र में मंत्री भी रहे हैं।
जब मैंने डॉ. ज्ञानवती दीक्षित जी की पोस्ट देखी और तब बालकवि बैरागी जी की अनेक बातें याद आ गईं।
उन्हें सादर प्रणाम।
अन्य संस्करण फिर कभी...
- सुरेश चन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

सोमवार, 11 मई 2026

देश के पास नहीं हैं दाने, जनता! अम्मा चली भुनाने - सुरेश चंद्र शुक्ला 'शरद आलोक'


 देश के पास नहीं हैं दाने, जनता! अम्मा चली भुनाने।

सुरेश चंद्र शुक्ला 'शरद आलोक'


देश को कंगाल करके बंधु,
मन्दिर में पूजन करते हैं।
जैसे कोई अपराधी बंधु!
सत्ता में अकड़कर बैठे हैं।

देश में भय फैलाकर बंधु,
मन्दिर में पूजन पाठ कर रहे।
बेरोजगारी भुखमरी बढ़ाकर 
मंत्री गवर्नर गुमराह कर रहे।

देश की समस्याओं पर क्यों,
गोदी मीडिया मौन हो गया।
ऐप्सटीन फ़ाईल वाला मंत्री,
लोकतंत्र का कत्ल कर रहा।

भय के जरिए भ्रम फैलाया 
भ्रम के जरिए लूट।
विदेश नीति में फेल हुए हैं,
घरेलू अपराधी को खुली छूट।

सत्ता के बल पर  मोदी शाह को
क्यों है हर अपराध करने की छूट।
हम कितने  खुद्दार, करने देते,
आर एस एस, अदानी-अंबानी को लूट।

प्रतिदिन यहाँ पर झूठ बोलता,
जिसका यहाँ प्रधान।
स्वर्ग से सुंदर देश हमारा,
अपना प्यारा हिंदुस्तान। 

बेरोजगारी बढ़ा-बढ़ा कर 
किया देश का सपना चूर।
विपक्ष से मिलकर न कर पाये,
देश के संकट दूर।

पूजा पाठ और  किया रोड शो,
वायुसेना करे प्रदर्शन क्यों?
जनता के मुद्दों से भागकर प्रधान 
रैली, मन्दिर, विदेशी यात्रा क्यों?

प्रधानमंत्री रोड शो करते,
देश के पास नहीं हैं दाने।
पहले से भुखमरी देश में,
अम्मा! जनता चली भुनाने। 

ओस्लो, 11.05.20

रविवार, 26 अप्रैल 2026

26 अप्रैल-स्व. डॉ. बृजमोहन शुक्ल की पुण्य तिथि

 पिता जी की याद में:

[कल 26 अप्रैल को मेरे पिताजी स्व. डॉ. बृजमोहन शुक्ल की पुण्य तिथि है।]

पूज्य पिता तुम्हारी स्मृति में
रोज विचरण करता हूँ।
तुम्हारे संघर्षों से सीखा मैंने
कोटि वन्दन करता हूँ।

जो स्वाभिमान आज जीवित है,
आज तक नहीं भूल पाया हूँ।
जिनका आशीष सदा पाया था,
मैं उस पिता वृक्ष की छाया हूँ।

कभी साइकिल कभी स्कूटर में
हम संग संग कारख़ाने जाते थे।
अपने सपने, अपने क़िस्से 
पिताजी रास्ते में हमें सुनाते थे। 

छूटा कालेज, दोस्त छूटे थे,
लेकिन हौंसला पिता से मिलता।
पैसों की तंगी की दरार भरने हम 
साथ नौकरी करने जाते थे।

मोहल्ले में सांस्कृतिक कार्यक्रम 
कालेज में छात्रसंघ चुनाव लड़ा था। 
पिता ने  सामाजिक विकास में 
नहीं रोका, उनका दिल बड़ा था।

अपने से कमजोर की रक्षा करना,
पिता ने मुझे सिखाया था। 
स्वाभिमान और दया प्रेम उनके
संघर्ष के जीवन से पाया था।

सत्य से समन्वय बड़ा कठिन है,
पत्थर दिल पिघलना सिखाया था।
किसी जान अगर बचाने में,
समझौता करना सिखाया था।

अकड़-अकड़ कर भूखा न मरना,
चरित्र हत्या कभी न करना।
कम खाना, झुकना, नहीं हारना,
पिता ने दुनिया को देखा था।

दूध के धुले नहीं थे पिताजी,
पर दुनिया की परख बड़ी थी।
मारल पुलिस  नहीं थे पिताजी,
जीवन जादू की छड़ी बड़ी है।

विधवा विवाह के बड़े पक्षधर,
अपने असहायों को छत देते थे।
रोम-रोम में बसे मेरे पिताजी,
छुआछूत को नहीं मानते थे।

गंगाधर गुप्ता, भारती गाँधी बहना से
मैंने सुख-दुःख त्याग बहुत सीखा था।
मुझे लिखा पत्र लौट आओ विदेश से,
मेडिकल हाल बनाना सपना था।

अखबार निकालो, सुनो जनता की,
गरीबों का अस्पताल खोल दो।
यहाँ  न अपना न कोई पराया है,
सांप्रदायिकता हटाकर प्रेम घोल दो।

हे पिताजी तुम निराश न होना,
25 पुण्य तिथि हुई अब कुछ होगा।
अखबार शुरू बस क्लिनिक बाकी,
कमर कसी है, अब सब  कुछ होगा। 

- सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’
        ओस्लो, 25.04.26