लाल किले पर जेन जी (लघुकथा ) - सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'
मेरी माँ के बचपन में गुजर जाने के बाद पिताजी और दादी ने मुझे पालपोसकर बड़ा ही नहीं किया बल्कि उसने मुझे विदेश में पढ़ाया है।
आज जब मैं पढ़ाई पूरी करके स्वदेश लौटा हूँ। घर पर दादी अनेक कार्य खुद करती है। दादी आँगन में लकड़ी के तख्त पर बैठी हैं।
पुराने तरह से खुले बोरे से से गेहूँ लेकर छननी से छान रही हैं। वह आज भी गांव से आर्गेनिक (बिना केमिकल खाद के) गेहूँ मंगाती हैं और गेहूँ धोकर उसे सुखाकर चक्की से पिसाती हैं। वह गेहूँ छान रही हैं और घुन निकलकर बाहर भाग रहे हैं।
आज भी दादी गांव में एक मात्र कोल्हू से तेल खरीदती हैं।
मैंने दादी से कहा,
“दादी क्यों तकलीफ़ करती हो। फ़ोन से आर्डर कर दूँ तो सामान घर पहुँच जाएगा।”
दादी ने कहा,
“बेटा सरसों का तेल समाप्त होने वाला है। जाओ कोल्हू से पेरा हुआ तेल ले आओ। एक तो तेल शुद्ध दूसरा वह आर्गेनिक दूसरा तथा लघु उद्योग को भी बचाना है। सारा व्यापार कॉर्पोरेट को नहीं देना है।”
मैंने कहा,
“वाह दादी! तू तो महात्मा गांधी की तरह सोचती है। स्वदेशी और लघु उद्योग को बढ़ावा दे रही है।”
दादी ने कहा,
“बेटा! अपना उत्पादन और आत्मनिर्भरता बहुत जरूरी है।”
दादी ने कहा,
“कल 15 अगस्त है। मैंने झंडे निकाल कर रख दिए हैं। प्रेस करके उसे कल द्वार पर लगाना है।”
मैंने दादी से कहा,
“दादी कल मैं दिल्ली के लाल किला पर जाऊँगा, वहाँ जेन जी Z मित्रों के साथ शामिल होऊंगा। जहाँ प्रधान मंत्री जंतर-मंतर पर हुए युवा आंदोलन में हिंसा के शिकार और युवाओं के खिलाफ पुलिस में दर्ज शिकायतों (एफ आई आर) की वापसी का एलान करेंगे।”
दादी ने कहा,
“संसद के सदन में तो ना प्रधान मंत्री चर्चा करने आये न विपक्ष के पूछने पर कोई जवाब ही दिया। विपक्ष क्या पूरा जेन जी Z जी भी उन वायदों को पूरा होते देखना चाहता है जिसपर दो मंत्रियों ने युवा प्रतिनिधि से बातचीत में वायदा किया था।”
मैंने दादी से कहा,
“दादी! पुरानी पीढ़ी हम युवाओं को मूर्ख समझती है। सोशल मीडिया द्वारा हमको थोड़े समय में ही पता चल जाता है कि क्या हो रहा है और क्या होने वाला है। “
दादी ने कहा,
“तू अकेला क्या कर लेगा। जब 12 सालों से समस्या का हल नहीं हुआ।”
मैंने दादी के पास बैठकर कहा,
“आज से तू घर के काम नहीं करेगी। अब तक तू ने और पिता जी ने बहुत किया। अब जेन जी की बारी है। मैं तेरा जेन जी हूँ।
रही बाद दादी देश को बदलने की तो जान लो दादी! मैं अकेले नहीं हूँ। देश की चालीस प्रतिशत आबादी यानि पचास करोड़ युवा अर्थात जेन जी हैं। हम अगली बार अपनी सरकार बनायेंगे तब लाल किला पर जेन जी तिरंगा फहरवायेंगे।”
कहकर मैंने दादी के हाथ से छननी माँगकर ली और गेहूँ की बोरी को एक कोने पर रख दिया।
दादी ने कहा,
“मुझे तुझ पर गर्व है बेटा! अब घर की जिम्मेदारी संभाल।”
मैंने कहा,
“दादी अब सब आसान हो गया है। मुश्किल तो आजका सिस्टम है जो सड़ गल गया है। नई पीढ़ी सब संभाल लेगी। दादी! जिंदा कौमें इंतजार नहीं करतीं। अगली बार लाल किला पर जेन जी मिलेगा।”
दादी ने मेरा माथा चूमा और आसमान पर उड़ते पंछी को देखने लगी और मैं स्वाधीनता दिवस की तैयारी में लग गया।
ओस्लो, 14.08.26
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