तू जेन जी से कम है के
सुरेश चंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'
प्रातः का समय है एक हरियाणवी परिवार में आँगन में सभी आपने-अपने काम में व्यस्त हैं और बातचीत हो रही है।
“दादी मैं अब पहलवानी न करूँगी। मैं अखाड़े पर नहीं जाऊँगी। अब मुझे पहलवान नहीं बनना,”
पौत्री रूपा ने कहा और चमकीले गत्ते को पकड़े थी जिसमें नारा लिखा था,
‘सबको शिक्षा सबको काम।
जेन जी! तुझको मेरा सलाम।’
दादी ने पूछा,
“वहाँ तू के करेगी (तब तुम क्या करोगी)?”
रूपा ने पलटकर जवाब दिया,
“मैं जेन जी आंदोलन में शामिल होऊँगी।”
दादी ने इलेक्ट्रिक मथानी से मक्खन मथते हुए पूछा,
“ये जेन जी के होवे है?”
“दादी 14 साल से 29 के लड़के, लड़कियाँ होती हैं।” रूपा ने कहा।
दादी ने कहा,
“सीधे बोल कि जब जवानी आवे है।”
“हाँ, दादी! अब तो देश में हमारी जवानी बेकार जा रही है। पढ़ाई परीक्षा में घपला, नौकरी खत्म हो गई हैं। भ्रष्टाचार बढ़ गया है।
सरकार में किसी की जवाबदेही नहीं है”, पौत्री रूपा ने जवाब दिया।
दादी कहा,
“सरकार तो कुंभकरण की नींद सो रही है। क्या वह जागेगी?”
रूपा ने कहा,
“सरकार क्यों नहीं जागेगी। यह जनता की सरकार है। उसके घर की जायदाद नहीं। उनको जगाने वाला चाहिए। उसे जगाने वाला देश का पचास प्रतिशत नौजवान है, ये जेन जी है। देश की 60 करोड़ आबादी हमारी है।”
रूपा तैयार होकर कंधे पर थैला रक्खे हाथ में पोस्टर लेकर घर से बाहर जाने लगी तो दादी ने कहा,
“मेरी जेन जी! कोई बात हो, मेरी जरूरत हो तो मुझे साथ ले चलो।”
रूपा ने दादी को गले लगाते हुए कहा,
“दादी, तू जेन जी से कम है के?” और द्वार से बाहर निकल गई।
