तू जेन जी से कम है के
गुरुवार, 6 अगस्त 2026
तू जेन जी से कम है के (लघुकथा)- सुरेश चंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'
रविवार, 26 जुलाई 2026
ताश पत्ते का महल - सुरेश चंद्र शुक्ला 'शरद आलोक’
ताश पत्ते का महल (सम सामयिक कहानी) - सुरेश चंद्र शुक्ला 'शरद आलोक’
मंगलवार, 21 जुलाई 2026
लघुकथा 'टूटे घड़े का पानी' - सुरेश चंद्र शुक्ला शरद आलोक’
टूटे घड़े का पानी - सुरेश चंद्र शुक्ला शरद आलोक’
शनिवार, 18 जुलाई 2026
नक़ली तिलचट्टे (लघुकथा) - सुरेशचंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’
नक़ली तिलचट्टे (लघुकथा) - सुरेशचंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’
बदलती भूमिका (लघुकथा) - सुरेश चंद्र शुक्ला 'शरद आलोक'
बदलती भूमिका - सुरेश चंद्र शुक्ला 'शरद आलोक'
मैं अपने पिताजी से अपने मित्रों से मिलवाता था,
शनिवार, 4 जुलाई 2026
बीमार आदमी -- सुरेश चन्द्र शुक्ल
बीमार आदमी - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
"पिताजी!
मैं भीड़ नहीं हूँ,
कि आपकी सारी बात मान लूँ।" विप्लव ने अपने पिता से
कहा। पिता ने कहा,
"बेटा, पिता की
आज्ञा आज्ञा भी नहीं मानोगे?"
"पिता की
जैसी आज्ञा? परन्तु पिता की आज्ञा क्या किसी दबाव में दी जा रही है। उसमें जनहित जुड़ा है।
आज्ञा या निवेदन नैतिक और न्यायसंगत है, यह भी देखना जरुरी है।"
विप्लव ने जवाब दिया।
पिता ने कहा,
"बेटा
विप्लव! अब तुम वयस्क हो गए हो। तुम अपना निर्णय खुद लो।" पिता ने विप्लव के
कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
विप्लव ने उत्तर देते हुए कहा,
"छह साल
पहले मैं छोटा था। तब मैं निर्णय नहीं ले सकता था। गलत वैक्सीन के कारण मेरी माँ
का निधन हो गया था। आज जब देश में पेट्रोल में सरकारी मिलावट पेट्रोल में मिलाकर
जनता को बेचा जा रहा है। जो सही नहीं है, इससे मोटर, कारों
में गड़बड़ी आ रही है। भूटान ने इथेनॉल मिला तेल लेने से मना कर दिया है। यूरोप को
हम शुद्ध पेट्रोल और बहुत सस्ता पेट्रोल बेच रहे हैं। क्या
हमारे देशवासियों के पास चुनने की आजादी नहीं होनी चाहिए। इथेनॉल मोटर गाड़ी के लिए
जहर है?"
"पिताजी, जनता सब
सह रही है और मौन है,
तो हमारा शासक जनता को बीमार समझता है, शासक
समझता है कि शायद वह आई सी यू में जाने वाली है। परिवार के लोग प्राय:
आईसीयू में जाने पर लोग समझते हैं कि अब सब हो गया। बीमार व्यक्ति से जमीन
जायदाद, वसीयत आदि लिखाई जानी शुरू हो जाती है।
सरकार समझती है कि सब कुछ अब उसका है। कई बार
तो मरीज वेंटिलेटर से भी वापस बाहर आ जाता है। लग रहा है कि हम फिर से गुलाम बनने
जा रहे हैं।" विप्लव ने कहा।
पिताजी
ने कहा,
"मैं
अकेला क्या कर सकता हूँ?"
"आप ठीक
कहते हैं पिताजी! भीड़ बनना आसान है पर भीड़ जब वह सत्य की तरफ नहीं है तो वह
आत्महत्या की तरह है।" विप्लव ने जवाब दिया।
पिताजी
ने कहा,
"जो लोग
करेंगे वही मैं करूँगा।"
विप्लव
ने कहा,
"पिताजी!
शासक बीमार, अयोग्य और कमजोर है। इसलिए वह अपना खूब प्रचार करता है। अपने श्रेष्ठ और शक्तिशाली होने का ढिंढोरा
पीटता है। येन केन प्रकारेण वह अपना गुणगान कराता है। भीड़ आसानी से उसके प्रभाव में आ
जाती है।"
पिता ने
कहा,
"ठीक है
बेटा विप्लव! मैं अब तुम्हें नहीं रोकूँगा। मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। बूढ़े लोग अपने
घर में यात्री होते हैं।"
विप्लव
ने पिता से आगे कहा,
"पिताजी
बीमार शासक के पास सत्ता की कितनी भी शक्ति क्यों न हो वह सत्य कहने वाले सच्चे
आदमी से डरता है",
कहते हुए पिताजी को चाय पीने के लिए मेज पर रख दी।
पिता ने
चाय की चुस्की लेते हुए कहा,
"इसका
अर्थ यह हुआ कि
सरकार जनता को अपनी शक्ति से डरा रही है और सरकार से
ज्यादा शक्तिशाली ताकत सरकार की नस दबाकर उसे डरा रही है। हम सभी एक दूसरे
की जाल में फंसे हुए हैं।"
विप्लव
ने अपना चाय का प्याला मेज पर रखते हुए कहा,
"मैं नहीं
फंसा हूँ पिताजी! बस एक जज हिम्मत से सत्य के पक्ष में फैसला सुना दे, अधिकारी
उस फैसले को हिम्मत से फैसला लागू करवा दें तो सब बदल जाएगा। लोकतंत्र
बच जाएगा। जनता फिर से ताकतवर हो जायेगी।"
पिता ने
कहा,
"मुझे पता
है कि बीमार की असली बीमारी और दवा चिकित्सक बेहतर कर
सकता है। बीमारी का इलाज हो सकता है कि नहीं चिकित्सक बेहतर बता सकता
है।"
"फिर क्या
उपाय है बेटा विप्लव!" पिता ने चिंता व्यक्त की।
"पिताजी!
असत्य के साथ सत्ता के नशे में शासक अपनी बीमारी नहीं समझ रहा। शक्ति और अहंकार
उसे मनमानी करने देते हैं।" विप्लव ने कहा।
"मेरा
आशीर्वाद तुम्हारे साथ है बेटा। तुम सत्य का साथ दो।"
"पिताजी!
सत्य के साथ अकेला व्यक्ति भी भीड़ और सत्ता दोनों पर भारी पड़ सकता है। अंत में
जनता सत्य का साथ ही देती है।" विप्लव ने कहकर गहरी सांस ली और एकटक महात्मा
गांधी की तस्वीर की तरफ देखने लगा।
गुरुवार, 2 जुलाई 2026
लघुकथा मुखौटा – सुरेश चन्द्र शुक्ल
लघुकथा मुखौटा - सुरेश चन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
जब से मंदिर से रत्न के मुकुट की चोरी हुई तब से सब जगह इसकी चर्चा है। लोग पहेलियां बुझा रहे हैं। कोई कहता चोर-चोर मौसेरे भाई। कोई कहता बिल्ली को दूध की रखवाली दी गयी तो भला दूध का क्या हाल होगा? पर खुलकर लोग नहीं बोल रहे हैं। अफवाहों का बाजार गर्म है।
निगरानी के लिए लगे कैमरे की फुटेज मिल गयी है। कोर्ट में पेशी हुई और आरोपी मुखौटा पहने थे। कैमरे की फुटेज का एक हिस्सा न्यायालय में दिखाया गया। देखते ही सन्नाटा छा गया।
यह तो राजा का मुखौटा पहने है। सभी एक दूसरे को देखने लगे।
न्यायाधीश ने कहा: केस स्थगित किया जाता है और फैसला सुरक्षित रखा जाता है।
ओस्लो, 02.07.26
मंगलवार, 30 जून 2026
अंधभक्त (लघुकथा) - सुरेश चंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'
अंधभक्त - सुरेश चंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'
मम्मी
जब घर के बाहर झाड़ू लगाने निकलीं तो उन्होंने द्वार से गेरुआ ध्वज उतार कर पिताजी
की मेज पर रख दिया दिया और तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज लगा दिया।
पिताजी
सुबह सैर करके आये तो गेरुआ ध्वज को अपनी मेज पर देखा और व्यंग्य करते हुए बोले,
"क्या
हो गया भगवान! बड़ी देशभक्त हो गयी हो।"
"मुझे
तो कुछ नहीं हुआ है,
मुझे आपकी चिंता है कि कहीं आप बीमार न हो जायें। बेकार की
दौड़धूप। कभी आप किसी के दरवाजे रोटी मांगने जा रहे हैं और कभी खिचड़ी
खाने, जो मैं खाना बनाकर रखती हूँ मुझे और बेटी गीता को बासी खाना पड़ता है।"
अम्मा ने पिताजी से कहते हुए आगे कहा,
"गीता बेटी! चाय पी ले और तैयार हो जा गैस लेने चलना है।"
"अरे
मम्मी! किसका मुंह देखकर उठी हो जो सुबह से ही बहुत नाराज हो रही हो।" मैंने
मम्मी से आगे कहा,
"पहले
चाय पी लेते हैं फिर चलते हैं।"
एक मेज
के किनारे पड़ी कुर्सियों पर बैठकर सभी चाय पीते हैं पर अम्मा चुपचाप चाय पीती हैं।
पिताजी पर एक नजर डालती हैं और चल देती हैं।
रास्ते
में एक बड़ा हुजूम युवाओं का चला आ रहा है। युवा जुलूस में जोर-जोर के नारे लगा रहे
हैं,
"पेपर
लीक, वोट चोरी, सांसद डकैती,
दान चोरी बंद करो। प्रजातंत्र बहाल करो।" आदि-आदि।
" बेटी गीता!
इन युवाओं की मांगें तो सही हैं। जैसे लोग कान में रुई डाले
हैं और सुनकर अनजान बन रहे हैं।"
"हाँ, मम्मी।"
कहकर मैंने मम्मी का हाथ पकड़ा और तेजी से जुलुस के दूसरी ओर चली गयी।
ई-रिक्शा
से गैस लेकर घर पहुँच कर मम्मी पिताजी के पास आकर बैठ गयीं और
पिताजी से बोलीं,
"देखो जी। देश के हालात बिगड़ रहे हैं मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाओ। पारदर्शिता ख़तम हो गयी है। ऐसा ही रहा तो देश में भुखमरी बढ़ेगी, हालत बेकाबू हो जाएंगे।"
"अच्छा भागवान! तुम्हीं बताओ क्या करूँ?" पिताजी बड़ी नम्रता से बोले।
मम्मी
ने पिताजी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,
"कल सुबह शाखा में जाना तो लोगों को समझाना कि अंधभक्ति छोड़ दें। आपको तो पता है, चुनाव आयोग, ईडी, सी बी आई, न्यायपालिका, कार्यपालिका सभी सरकार के काबू में हैं। सरकार से अब कुछ नहीं होना है। जैसे सावन के अंधे को सब कुछ दिखाई देता है, उसका वैसा ही हाल है।"
पिताजी
बोले, "हम कैसे समझा सकते हैं,
शाखा में तो केवल आदेश आता है और कुछ कहो तो उत्तर नहीं
मिलता है।"
मम्मी
ने धीरे से कहा,
"देखो!
आपको शाखा में या जहाँ कहीं अंधभक्त मिले तो उनसे कहना कि वह अंध भक्ति छोड़ दें।
उनका मकसद पूरा हो गया है। लोकतंत्र बेहाल हो गया है और देश बरबाद हो गया
है।"
मम्मी
की बात सुनकर पिताजी ने कंधे पर अंगोछा लिया और और लाठी उठाकर बाहर चले गए। पिताजी
ने मेरी ओर देखा और मैंने मुस्करा कर विदा किया।
रविवार, 28 जून 2026
लघुकथा 'कागज' - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक’
मंगलवार, 16 जून 2026
प्रतिरोध की शक्ति: 2024 हम हारे नहीं थे, 2029 हम जीतेंगे - राहुल गांधी
प्रतिरोध की शक्ति: 2024 हम हारे नहीं थे, 2029 हम जीतेंगे - राहुल गांधी
भारत (INDIA) गठबंधन की बैठक में राहुल गांधी का भाषण
8 जून
मैं आप सभी का यहाँ स्वागत करता हूँ। आने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
कई वर्ष पहले मेरी अपने एक बहुत अच्छे मित्र से बहस हो गई थी। मैंने उनसे कहा कि जो आप कर रहे हैं, वह अन्यायपूर्ण है। उन्होंने मुझे जवाब दिया, "दुनिया अन्यायपूर्ण है, इसकी आदत डाल लो।"
आज कांग्रेस पार्टी के बारे में जो बातें कही गईं, उनका जवाब देना मेरा काम नहीं है। मेरा काम तो, शैव परंपरा की तरह, सब कुछ अपने भीतर समाहित कर लेना है। जैसे भगवान शिव ने समस्त विष का पान किया और नीलकंठ कहलाए।
आप जो भी कहना चाहते हैं, मेरे बारे में या कांग्रेस पार्टी के बारे में जितनी भी आलोचना करना चाहते हैं—हम उसे स्वीकार करेंगे, और मुस्कुराते हुए स्वीकार करेंगे। हम आपको प्रसन्न करने की पूरी कोशिश करेंगे, क्योंकि हमारी भूमिका मूल रूप से आप सबसे अलग है।
मैं यह बात अहंकार से नहीं कह रहा हूँ। हमारी भूमिका, जैसा कि आपमें से कई लोगों ने कहा, आप सभी को प्रेम और स्नेह के साथ एकजुट करना है।
मैं 2004 से कांग्रेस पार्टी का सांसद हूँ, जब मैंने अपना पहला चुनाव लड़ा था।
हमारी पार्टी भारत की अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों से मूल रूप से अलग तरीके से संगठित है—और मैं यह बात पूरी विनम्रता के साथ कह रहा हूँ।
क्यों?
हम मूल रूप से आरएसएस की विचारधारा के विरोधी हैं। हम मर जाएंगे—हम कांग्रेस पार्टी में रहते हुए मर जाएंगे—लेकिन भाजपा या आरएसएस के साथ कभी न खड़े होंगे और न ही उनसे कोई समझौता करेंगे। यदि ऐसा कराना है, तो पहले हमारे सिर काटने होंगे। मैं इस देश के लाखों-लाख कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जानता हूँ, जो कहेंगे: हमारे सिर काट दो, लेकिन हम आरएसएस के सामने कभी नहीं झुकेंगे।
मुझे यह कहते हुए खेद है कि इस समूह में एक भ्रम है। यह भ्रम यह है कि आप—समाजवादी पार्टी (एसपी), तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) आदि—मानते हैं कि अब तक जिन राजनीतिक तरीकों का आपने इस्तेमाल किया है, वे आगे भी काम करेंगे। वे केवल तब तक काम करते थे, जब तक भारतीय राज्य एक निष्पक्ष मैदान उपलब्ध कराता था। अब वह मैदान मौजूद नहीं है।
भाजपा ने राज्य की संस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है। भाजपा न्याय व्यवस्था को नियंत्रित करती है। भाजपा नौकरशाही को नियंत्रित करती है। भाजपा खुफिया एजेंसियों को नियंत्रित करती है। यहाँ तक कि चुनाव आयोग भी उसके प्रभाव में है।
टीएमसी में मेरे कई मित्र हैं। उन्हें पूरा विश्वास था कि वे चुनाव में भारी जीत हासिल करने वाले हैं। मैं लगातार उनसे कहता रहा: आप भ्रम की दुनिया में जी रहे हैं। मैंने यह सब गुजरात में देखा है, मध्य प्रदेश में देखा है, छत्तीसगढ़ में देखा है, हरियाणा और महाराष्ट्र में भी देखा है। फिर भी आपमें से बहुत से लोग अभी तक आश्वस्त नहीं हैं।
कांग्रेस पार्टी प्रतिरोध की पार्टी है। उसे काम करने के लिए भारतीय राज्य की तटस्थता की आवश्यकता नहीं है। बल्कि, भारतीय राज्य की संस्थाओं का जितना अधिक गला घोंटा जाएगा, कांग्रेस पार्टी उतनी ही अधिक दृढ़ता और आक्रामकता के साथ संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष करेगी।
हम सभी कांग्रेस पार्टी के आदर्शों को साझा करते हैं। वे आदर्श क्या हैं? सत्य, अहिंसा और करुणा।
यहाँ मुख्य मुद्दा क्या है? मुझे आपसे लड़ने में कोई रुचि नहीं है। यदि मैं अचानक उठकर कहूँ कि मैं आपसे लड़ने जा रहा हूँ, तो मैं पागल कहलाऊँगा—क्योंकि आप हमारे सहयोगी हैं, हमारे मित्र हैं, और वे लोग हैं जिन्हें हम अपना मानते हैं।
कृपया समझिए: हमने 2024 का चुनाव जीता था। हमने 2024 का चुनाव नहीं हारा।
आप पूछते हैं कि नीतीश जी क्यों चले गए। इसका कारण न मैं था और न ही कांग्रेस।
और मैं आपको बताता हूँ कि निकट भविष्य में वे कुछ राजनीतिक साधन भी काम करना बंद कर देंगे, जो अब तक किसी तरह काम कर रहे थे, क्योंकि भाजपा और आरएसएस भारतीय राज्य पर अपनी पकड़ लगातार मजबूत करते जा रहे हैं।
कांग्रेस पार्टी ने ठीक इसी प्रकार का निर्णय सौ वर्ष से भी अधिक पहले लिया था। 1927 से पहले हम एक राजनीतिक संगठन थे। जिस दिन महात्मा गांधी ने कहा कि हमें स्वतंत्रता चाहिए, उसी दिन हम एक प्रतिरोध आंदोलन बन गए।
क्योंकि यह पार्टी उस समय एक प्रतिरोध आंदोलन (Resistance Movement) के रूप में शुरू हुई थी, जब आधुनिक भारत का अस्तित्व भी नहीं था। अन्य राजनीतिक दलों के विपरीत, कांग्रेस पार्टी भारतीय राज्य की संरचना और संरक्षण के सहारे नहीं बनी। कांग्रेस पार्टी उस विचार की रक्षा करने वाला एक प्रतिरोध आंदोलन है कि भारत का हर नागरिक समान है।
हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा के मूल रूप से विरोधी हैं। कांग्रेस पार्टी में हम मर जाना स्वीकार करेंगे, लेकिन भाजपा या आरएसएस के साथ खड़े नहीं होंगे और न ही कोई समझौता करेंगे। ऐसा करवाने के लिए आपको हमारे सिर काटने पड़ेंगे।
मैं इस देश के लाखों-लाख कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जानता हूँ, जो कहेंगे—"हमारे सिर काट दो, लेकिन हम आरएसएस के सामने कभी नहीं झुकेंगे।"







