शनिवार, 4 जुलाई 2026

बीमार आदमी -- सुरेश चन्द्र शुक्ल

 


बीमार आदमी - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

"पिताजी! मैं भीड़ नहीं हूँ, कि आपकी सारी बात मान लूँ।" विप्लव ने अपने पिता से कहा। पिता ने कहा

"बेटा, पिता की आज्ञा आज्ञा भी नहीं मानोगे?" 

"पिता की जैसी आज्ञा? परन्तु पिता की आज्ञा क्या किसी दबाव में दी जा रही है। उसमें जनहित जुड़ा है। आज्ञा या निवेदन नैतिक और न्यायसंगत है, यह भी देखना जरुरी है।" विप्लव ने जवाब दिया।  पिता ने कहा,

"बेटा विप्लव! अब तुम वयस्क हो गए हो। तुम अपना निर्णय खुद लो।" पिता ने विप्लव के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।  विप्लव ने उत्तर देते हुए कहा,

"छह साल पहले मैं छोटा था। तब मैं निर्णय नहीं ले सकता था। गलत वैक्सीन के कारण मेरी माँ का निधन हो गया था। आज जब देश में पेट्रोल में सरकारी मिलावट पेट्रोल में मिलाकर जनता को बेचा जा रहा है। जो सही नहीं है, इससे मोटर, कारों में गड़बड़ी आ रही है। भूटान ने इथेनॉल मिला तेल लेने से मना कर दिया है। यूरोप को हम शुद्ध पेट्रोल और बहुत सस्ता पेट्रोल बेच रहे हैं।  क्या हमारे देशवासियों के पास चुनने की आजादी नहीं होनी चाहिए। इथेनॉल मोटर गाड़ी के लिए जहर है?"

 

"पिताजी, जनता सब सह रही है और मौन है, तो हमारा शासक जनता को बीमार समझता है, शासक समझता है कि शायद वह आई सी यू में जाने वाली है।  परिवार के लोग प्राय: आईसीयू में जाने पर लोग समझते हैं कि अब सब हो गया। बीमार व्यक्ति से जमीन जायदाद, वसीयत आदि लिखाई जानी शुरू हो जाती है।  सरकार समझती है कि सब कुछ अब उसका है।  कई बार तो मरीज वेंटिलेटर से भी वापस बाहर आ जाता है। लग रहा है कि हम फिर से गुलाम बनने जा रहे हैं।विप्लव ने कहा। 

पिताजी ने कहा,

"मैं अकेला क्या कर सकता हूँ?"

"आप ठीक कहते हैं पिताजी! भीड़ बनना आसान है पर भीड़ जब वह सत्य की तरफ नहीं है तो वह आत्महत्या की तरह है।" विप्लव ने जवाब दिया।

पिताजी ने कहा,

"जो लोग करेंगे वही मैं करूँगा।"

विप्लव ने कहा,

"पिताजी! शासक बीमार, अयोग्य और कमजोर है। इसलिए वह अपना खूब प्रचार करता है। अपने श्रेष्ठ और शक्तिशाली होने का ढिंढोरा पीटता है।  येन केन प्रकारेण वह अपना गुणगान कराता है। भीड़ आसानी से उसके प्रभाव में आ जाती है।"

पिता ने कहा,

"ठीक है बेटा विप्लव! मैं अब तुम्हें नहीं रोकूँगा। मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। बूढ़े लोग अपने घर में यात्री होते हैं।

विप्लव ने पिता से आगे कहा,

"पिताजी बीमार शासक के पास सत्ता की कितनी भी शक्ति क्यों न हो वह सत्य कहने वाले सच्चे आदमी से डरता है", कहते हुए पिताजी को चाय पीने  के लिए मेज पर रख दी। 

पिता ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा,

"इसका अर्थ यह हुआ कि सरकार  जनता को अपनी शक्ति से डरा रही है और सरकार से ज्यादा शक्तिशाली ताकत सरकार की नस दबाकर उसे डरा रही है। हम सभी एक दूसरे की जाल में फंसे हुए हैं।"

विप्लव ने अपना चाय का प्याला मेज पर रखते हुए कहा,

"मैं नहीं फंसा हूँ पिताजी! बस एक जज हिम्मत से सत्य के पक्ष में फैसला सुना दे, अधिकारी उस फैसले को हिम्मत से फैसला लागू करवा दें तो सब बदल जाएगा।  लोकतंत्र बच जाएगा। जनता फिर से ताकतवर हो जायेगी।"

पिता ने कहा,

"मुझे पता है कि बीमार की असली बीमारी और दवा चिकित्सक बेहतर कर सकता है। बीमारी का इलाज हो सकता है कि नहीं चिकित्सक बेहतर बता सकता है।"

"फिर क्या उपाय है बेटा विप्लव!" पिता ने चिंता व्यक्त की।   

"पिताजी! असत्य के साथ सत्ता के नशे में शासक अपनी बीमारी नहीं समझ रहा। शक्ति और अहंकार उसे मनमानी करने देते हैं।" विप्लव ने कहा। 

"मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है बेटा। तुम सत्य का साथ दो।" 

"पिताजी! सत्य के साथ अकेला व्यक्ति भी भीड़ और सत्ता दोनों पर भारी पड़ सकता है। अंत में जनता सत्य का साथ ही देती है।" विप्लव ने कहकर गहरी सांस ली और एकटक महात्मा गांधी की तस्वीर की तरफ देखने लगा।

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