शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

लोकतंत्र बचाओ रैली? -सुरेश चंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'

 लोकतंत्र बचाओ रैली? 

-सुरेश चंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' 

प्रातः काल का समय है नवविवाहित मैं अंकिता, मेरे ससुर भगवत और दादी सास चंदा रसोई में अपने कार्य में व्यस्त हैं। मैं  नवविवाहित बहू हूँ।  
मैंने अपनी दादी सास चंदा से कहा,
"दादी! पराठे बन गए हैं, पिताजी (ससुर जी) को नाश्ता लगा दो, वह लोकतंत्र बचाओ रैली में जाने वाले हैं।" 
दादी चंदा ने कहा,
"बेटा भगवत! तू किस रैली में जाने वाला है। तू तो उसी पार्टी में है जिसकी सरकार है। फिर क्या अपनी सरकार के खिलाफ रैली में जा रहा है?"
भगवत किचन की मेज के समीप पड़ी कुर्सी पर बैठकर अख़बार पढ़ते हुए कहा,
"जब विपक्ष के नेता विशाल रैली कर सकते हैं जिन्हें बड़ी मुश्किल से रैली की अनुमति मिली है तो हम रैली क्यों नहीं कर सकते हमारी तो सरकार भी है।"
दादी ने कहा,
"पर मेरी समझ से बाहर है। जिसकी सरकार होवे है, उसी का फर्ज होवे कि सब कुछ ठीक रहे। असंतुष्ट और विपक्ष से संवाद करती रहे सरकार। पर अपनी सरकार होते हुए प्रदर्शन और रैली मेरी समझ में न आवे है।"
अंकिता ने कहा,
"दादी! शायद कोई और बात है। पिताजी को रैली का सही कारण पता नहीं या उन्होंने अपने नेता से पूछा नहीं।"
चंदा ने कहा,
"बेटा भगवत! मुझे तो दाल में काला लगे है।  लोकतंत्र किससे बचाओ? क्या न्यायालय, चुनाव आयोग या पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन है?"
भगवत ने कहा,
"बात चुनाव आयोग की नहीं है। ये तो विपक्षी हमारी सरकार और पार्टी पर आरोप लगाते हैं कि चुनाव आयोग के साथ बेईमानी करके हमने चुनाव जीता था। न्यायालय हमारी सरकार के खिलाफ नहीं जा सकती। ज्यादती पुलिस करती है और विपक्ष हमारे मंत्री का इस्तीफा मांगती है।"
चंदा ने कहा,
"बेटा! बस इतनी सी बात। सरकार तुम्हारी है इसमें सोचने की क्या बात है। विपक्ष के साथ बैठक करो। तुम्हारे पिताजी प्रधान थे। विपक्षी और उनके दल के लोग सब बारी बारी हमारे घर आया करते थे। चाय पीते, जलपान करते थे और बातचीत करके समाधान ढूँढ़ते थे। सभी संतुष्ट तो नहीं होते थे पर वे खुश थे कि उनकी बात सुनी गयी।" 

भगवत ने कहा,
"बहू अंकिता! तुम निष्पक्ष होकर बताओ। अगर हमने लोकतंत्र बचाओ रैली नहीं की तो जनता क्या सोचेगी कि हममें क्षमता नहीं है। जनता विपक्ष के बहकावे में आ रही है और बिना परमिशन की रैली में भी जनता बहुत बड़ी संख्या में भाग ले रही है।"
अंकिता ने कहा,
"पिताजी! लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष दोनों जरूरी है। विपक्ष का काम है आलोचना करना और सरकार का काम है सुनना और वाजिब मांग को पूरी करना है।"
भगवत ने बहू अंकिता को जवाब दिया,
"विपक्ष बेकाबू है। वह सरकार से सहमत नहीं है। नेता विपक्ष तो हाय! हाय!  विदेशी सहायता से वह हमारी सरकार को गिराना चाहता है।"
चंदा ने कहा, 
"बेटा! सरकार तुम्हारी पार्टी की है। पुलिस तुम्हारी है जांच कराओ और दोषी के खिलाफ कार्यवाही करो, पर अपनी पार्टी की सरकार होते हुए लोकतंत्र बचाने के लिए रैली और मार्च मुझे ढोंग लागे है।
जा तू रैली में जा। मैं तो धनतेरस के लिए बहू अंकिता के साथ खरीदारी करने जा रही हूँ।"
बहू अंकिता ने पूछा,
"पिताजी! आपके लिए क्या लाना है बता दीजिए हम लोग लेते आएंगे।"
पिताजी भगवत बोलते कि दादी माँ चंदा ने कहा,
"तुम्हारे लिए भारत का संविधान ले आउंगी।"
भगवत ने नाश्ता किया और काली टोपी लगाई और कहा,
"आओ मैं आप लोगों को कार से छोड़ देता हूँ।"
दादी ने कहा,
"हम तिपहिये से खुद चले जाएंगे। तुम रैली में अपना ध्यान रखना।"
पिताजी डकार लेते हुए घर से निकल गए। 
दादी! आप भी तैयार हो जाओ और मैं तैयार होकर आती हूँ। 
दोनों तैयार होकर तिपहिया लेकर  बाजार थोड़ी देर में ही पहुँच गए।
दादी ने कहा,
"अगर यहाँ रैली होती तो इतनी जल्दी नहीं आ पाते।"
अंकिता ने कहा,
"छोड़ो दादी रैली की बातें! अब हम अपनी मर्जी से खरीदारी करते हैं। वो देखो चाट वाला। दोनों चटपटी चाट कहते हैं और दादी तुम्हें तो गोलगप्पे बहुत पसंद हैं।"
दोनों खरीदारी और गोलगप्पे खाने में मस्त हो गए हैं। त्यौहार में खरीदारी का मजा ही और है।