श्राद्ध और मोक्ष
- सुरेश चंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’
सास रामरती और बहू नयना श्राद्ध की तैयारी व्यस्त हैं। पितृ पक्ष चल रहे हैं। नयना ने पूछा,
"अम्मा यह बताओ श्राद्ध क्या होता है?"
रामरती ने कहा,
"यह हिंदू धर्म में किया जाने वाला एक विशेष कर्म है, जिसके माध्यम से दिवंगत माता-पिता और पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति की कामना की जाती है।"
"पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं।"
नयना ने पूछा,
"अम्मा! आप श्राद्ध के लिए क्या प्रार्थना करती है?"
रामरती ने कहा,
"हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रपितामह आपको भी बारम्बार प्रणाम। आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें।"
तभी पौत्र गौतम आया और कहने लगा,
"दादी! दादी आपने श्राद्ध के लिए खीर बनाई है। मुझे खीर दो!
रामरती ने कहा,
"बेटा! पहले द्वार पर रखेंगे ताकि कौआ उसे खाये। फिर तुम्हें भी देते हैं।"
पौत्र गौतम ने कहा,
"दादी! दादा जी आपकी खीर खाने जरूर आते होंगे।"
नयना ने कहा,
"परेशान न करो दादी को। यह हमारी परंपरा है जैसा हमारे बुजुर्गों ने सिखाया है, वैसा ही हम करते है।"
गौतम ने कहा,
"दादी! श्राद्ध करना बंद कर दो। जब तक दादा जी खीर खाने आते रहेंगे तब तक दादा जी को मोक्ष नहीं मिलेगा।"
नयना और रामरती दोनों को हंसी आ गयी। गौतम को दादी ने खीर परोस दी और कहा,
"पहले तू खा ले।"
दोनों सोचने लगे अब गौतम बड़ा हो गया है और ज्ञान की बातें करने लगा है।

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