लखनऊ की चाशनी कहाँ गयी? - शरद आलोक
लखनऊ का पान,
वह सुहूर, प्रेम पकवान
जहाँ बेला, चमेली, सितारा और चाँदनी
बन जाती हैं जान।
पुरानी बस्तियों की हवा सुहानी है,
नई बस्तियों में हवा बहानी है
जीवन में प्रेम न किया
यह कैसी नादानी है?
प्रेम स्पर्श ही नही,
प्रेम पीर ही सही,
प्रेम मरकर लोग करते हैं
वही प्रेम के पुजारी हैं
जो जीकर भी प्रेम करते हैं,
प्रेम देना है, लेना है ही नहीं,
यही तो लखनऊ की कहानी है।
कितने साल है पुराना है यह आकर्षण
हर कोई खिंचा चला आता है।
समय मिले पूछना स्वयं से
ह्रदय में कौन छिपा चाँद सा नगीना,
छुपाते क्यों हो मुझसे सावन का महीना
दोनों भीगे थे, बरसे थे बादल
चुरा लिया होगा नयनों से सुरमा
यह हीरा है मोती सा नग
लखनऊ तुम धरती का ध्रुवतारा हो
नमस्ते लखनऊ तुम्हें,
नमन करता हूँ, शीश झुकाता हूँ
विश्वास नहीं होगा तुमको
देश - विदेश कहीं भी रहूँ
खून से गहरा नाता तुमसे।
तेरे प्रेम में की चर्चा करूं तो कैसे
हर रोज तेरी गलियों में लौट आता हूँ।
मैंने शिक्षा दी है यहाँ अमीरन और तुलसी को
पाँव धोये हैं सड़क पर घूमते बच्चों के
कायल हूँ उन लाखों सुंदर अँगुलियों का
टांकें हैं सितारे चुनरियों पर
चिकन के सितारें हैं, कला के गौरव
संवारे हैं अनगिनत जोड़े जिसने
कौडियों के भावः किया काम हमनें
व्यापारियों का दिल कभी पसीजेगा
लखनऊ की कला का कोई वारिस होगा।
इस बार बारिश में नहीं भीगे हम
अपनों ने न जाने क्या जादू किया
दूसरों ने भी बाहों में नहीं भरा मुझको?
वह प्रीत की परी, वह सोंन मछली
गले में अटका है न जाने वह क्या है?
जिन्दगी दो कदम आगे ही सही
नई परियों से महके आँगन तेरे
लखनऊ की चाशनी कहाँ गयी?
ओस्लो, २२.०१.०९
kitne साल पुराना, फ़िर भी तरोताजा
हर गली में एक कविता और कवि
भोर होते ही गोमती सरिता में मुख धोता है रवि
गुरुवार, 22 जनवरी 2009
बुधवार, 21 जनवरी 2009
अमृतसर से वापसी-शरद आलोक
अमृतसर से वापसी-शरद आलोक
४५ वर्षों बाद अमृतसर नगर की यात्रा ने मेरे मन में अनेक प्रश्नों ने जन्म लिया। अमृतसर
को किस नाम से पुकारूँ ? इसमें भी अनेकों दृष्टिकोण उभर के सामने आए। आइये अपनी आपबीती आपतक पहुंचाने का प्रयास करता हूँ।
अमृतसर का स्मरण करते ही सभी के मन में एक बात पहले सामने आएगी वह है ऐतिहासिक परिपेक्ष। दूसरा धार्मिक महत्व। दोनो ही इस स्नेहनगरी को विशेष बना दोते हैं। वैसे तो आपकी दृष्टि भी बहुत है इसको दोखने की, इसमें अपने रंग भरने की या इसके रंग में डूब जाने की। जैसी दृष्टि वैसी सोंच।
दिवाकर जी के साथ रेल में यात्रा का अपना अनुभव रहा। हम दोनों दो विचारधाराओं के दो व्यक्तित्व थे जो अपनी दृष्टि से सब कुछ देख रहे थे। सबका अपना सच है। सबके अपने-अपने आईने हैं। कोई परम्परा के चश्मे देखते हैं? सभी ठीक है अपनी-अपनी परिधि में।
व्यास नगर और नदी गुजर चुकी थी। व्यास नदी ने न जाने कितनी तलवारें धोई होंगी। कितनी ही चुनरिया यहाँ लहराई होंगी। कितनों ने साथ-साथ रहने कि क़समें खाई होंगी।
रेल में एक व्यक्ति मिले। उन्होंने बताया कि बहुत से प्रवासी युवकों ने यहाँ पंजाब में युवतियों से ब्याह रचाया पर अपनी ब्याहता को लेने नहीं आए। रेल में तरह- तरह कि बातों में यात्रा का पता नहीं चला।
रात ग्यारह बजे रेल अमृतसर के रेलवे स्टेशन पर रुकी।
-लो हर महेंद्र का अमृतसर आ गया।
-हाँ, देखिये जरूर वेदी जी आए होंगे। मैं कुछ ही पलों में मानो तीन-चार दशक पीछे लौट गया।
बहुतों ने यहाँ बहुत से लोगों को विदा किया होगा। क्या सभी लौट कर आए। कुछ को बहुत देर हो गयी।
मुझे भी तो चार दशक लग गए। सम्भव है कि कुछ लोग अभी भी प्रतीक्षा कर रहे हों।
अमृतसर के आते ही पता नहीं क्यों अमृता प्रीतम क्यों याद आ गयीं जिनके साथ मैंने ओस्लो नार्वे में तीन दिन बिताये थे एक अन्तराष्ट्रीय कविता महोत्सव में। अमृता प्रीतम के साथ तीन दिनों तक साथ-साथ कविता पढ़ी थी एक ही मंच पर। अहमद फराज भी उस कार्यक्रम में भाग लेने आए थे जो धुम्रपान निषेध होने पर भी स्वरस्वती वंदना के समय सिगरेट पर सिगरेट पिए जा रहे थे जिनका व्यक्तित्व मुझे अजीब और बोकस सा लगा था।
उनकी बातचीत में पंजाब और अमृतसर का वर्णन आया था। मैंने उनसे कुछ सवाल पूछे। कुछ के जवाब मिले और कुछ बिना जवाब ही रह गए। वह गुमसुम सी थी। मानो कह रहीं थी कि अमृतसर को जानना है तो वहा जाओ। पंजाब के नगर और गावं से तुम भी पूछो। पंजाब बताने कि नहीं महसूस करने की जगह है। अमृतसर हो या जालंधर या फ़िर वह भूला -बिसरा व्यास।
मेरे मन से कुछ पंक्तियाँ निकली और कविता का रूप ले बैठीं
" अमृतसर की भोर शेफाली,
उत्सव से उल्लास नगर में
मधुर हवा संगीत सुनाये
कोयल डाली-डाली।
हर गली यहाँ कथा कहती है
होली और दीवाली,
युवा यहाँ खुशी मनाते
राजा बने सवाली।
लोरी और वैसाखी धरती
खेत बने दुल्हन से
मक्के और साग सरसों का
मौसम के रंग बरसें.
ऊँचे मार्ग सेतु नीचे
रातोरात बन रही मस्जिद
शासन आंकें मूंदे।
ये कैसी उन्नति है बाबू !
अमृतसर है, इसे बचाओ
बहुत हो चुके दंगे
जात-पात का भेद भुलाओ
इस धरती को गले लगाओ,
बहुत हो चुके नंगे।
हरमंदिर की शान यहाँ
जीवन में है शान्ति यहाँ,
गुरुओं का आशीष मिलेगा
सेवा व बलिदान जहाँ ।
सीमाओं का अंत नहीं
जलियावाला बाग़ यहाँ
नहीं व्यर्थ जाने देंगे
अपने पूर्वजों का ज्ञान यहाँ।
स्वर्ण मन्दिर में अनेकों जगह यह विचार कर माथा टेक रहा था क्या पता उस जगह महात्माओं के चरण पड़े हों।
जब हर मन्दिर साहेब के दरबार यानि स्वर्ण मन्दिर में मुझे सरोपा भेट में मिला तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा।
ओस्लो में स्थित अपना गुरुद्वारा स्मरण हो आया जहाँ अक्सर जाता रहता हूँ जो मेरा केन्द्र है। वेदी जी और गुरु महाराज को धन्यवाद दिया।
ओबामा एक आन्दोलन का नाम है
आज सभी ओबामा की बात करते हैं परन्तु उनकी तरह अपनी सोच को संवर्द्धित नहीं करते। अपना मन खुला और विचारों में व्यापकता और खुलापन rअखन जरूरी है। ओबामा किसी धर्म और रंग का नाम नहीं है। यह बदलाव और नयी सोच का नाम है।
तरक्की करना है तो प्रयास करना होगा। भगवान् का नाम लेकर नासमझी करते रहने से कभी भी तरक्की नहीं कर सकते। यूरोपीय देशों में लोगों ने अपनी आबादी उतनी ही बड़ाई जितनी माता -पिता आसानी से पालन-पोषण कर सकें। इमानदारी, स्वतंत्रता, मानवता आदि से तरक्की की और औरों को करने दे रहे हैं। और हम कितने हैं बुद्धिमान हथियारों से करते हैं शान्ति की कामना। भारत में मैंने देखा की कुछ लोग mehnat से jyada अपने भाई-bahno और sambandhiyon की jaayjaad harapne में jyada समय kharch करते है। कुछ प्रेम में धोखा दे रहे हैं तो बहुत से लोग dahej में अपने को खरीद और बेच रहे है।
aaiye हम अपना इतिहास ख़ुद बनायें ।
हाथ में हाथ रखकर अभी कुछ होना नहीं
katna क्यों chahte हो nai फसल जब तुम्हें bonaनहीं।
ओस्लो, २१.०१.०९
? लिए बहुत सी
४५ वर्षों बाद अमृतसर नगर की यात्रा ने मेरे मन में अनेक प्रश्नों ने जन्म लिया। अमृतसर
को किस नाम से पुकारूँ ? इसमें भी अनेकों दृष्टिकोण उभर के सामने आए। आइये अपनी आपबीती आपतक पहुंचाने का प्रयास करता हूँ।
अमृतसर का स्मरण करते ही सभी के मन में एक बात पहले सामने आएगी वह है ऐतिहासिक परिपेक्ष। दूसरा धार्मिक महत्व। दोनो ही इस स्नेहनगरी को विशेष बना दोते हैं। वैसे तो आपकी दृष्टि भी बहुत है इसको दोखने की, इसमें अपने रंग भरने की या इसके रंग में डूब जाने की। जैसी दृष्टि वैसी सोंच।
दिवाकर जी के साथ रेल में यात्रा का अपना अनुभव रहा। हम दोनों दो विचारधाराओं के दो व्यक्तित्व थे जो अपनी दृष्टि से सब कुछ देख रहे थे। सबका अपना सच है। सबके अपने-अपने आईने हैं। कोई परम्परा के चश्मे देखते हैं? सभी ठीक है अपनी-अपनी परिधि में।
व्यास नगर और नदी गुजर चुकी थी। व्यास नदी ने न जाने कितनी तलवारें धोई होंगी। कितनी ही चुनरिया यहाँ लहराई होंगी। कितनों ने साथ-साथ रहने कि क़समें खाई होंगी।
रेल में एक व्यक्ति मिले। उन्होंने बताया कि बहुत से प्रवासी युवकों ने यहाँ पंजाब में युवतियों से ब्याह रचाया पर अपनी ब्याहता को लेने नहीं आए। रेल में तरह- तरह कि बातों में यात्रा का पता नहीं चला।
रात ग्यारह बजे रेल अमृतसर के रेलवे स्टेशन पर रुकी।
-लो हर महेंद्र का अमृतसर आ गया।
-हाँ, देखिये जरूर वेदी जी आए होंगे। मैं कुछ ही पलों में मानो तीन-चार दशक पीछे लौट गया।
बहुतों ने यहाँ बहुत से लोगों को विदा किया होगा। क्या सभी लौट कर आए। कुछ को बहुत देर हो गयी।
मुझे भी तो चार दशक लग गए। सम्भव है कि कुछ लोग अभी भी प्रतीक्षा कर रहे हों।
अमृतसर के आते ही पता नहीं क्यों अमृता प्रीतम क्यों याद आ गयीं जिनके साथ मैंने ओस्लो नार्वे में तीन दिन बिताये थे एक अन्तराष्ट्रीय कविता महोत्सव में। अमृता प्रीतम के साथ तीन दिनों तक साथ-साथ कविता पढ़ी थी एक ही मंच पर। अहमद फराज भी उस कार्यक्रम में भाग लेने आए थे जो धुम्रपान निषेध होने पर भी स्वरस्वती वंदना के समय सिगरेट पर सिगरेट पिए जा रहे थे जिनका व्यक्तित्व मुझे अजीब और बोकस सा लगा था।
उनकी बातचीत में पंजाब और अमृतसर का वर्णन आया था। मैंने उनसे कुछ सवाल पूछे। कुछ के जवाब मिले और कुछ बिना जवाब ही रह गए। वह गुमसुम सी थी। मानो कह रहीं थी कि अमृतसर को जानना है तो वहा जाओ। पंजाब के नगर और गावं से तुम भी पूछो। पंजाब बताने कि नहीं महसूस करने की जगह है। अमृतसर हो या जालंधर या फ़िर वह भूला -बिसरा व्यास।
मेरे मन से कुछ पंक्तियाँ निकली और कविता का रूप ले बैठीं
" अमृतसर की भोर शेफाली,
उत्सव से उल्लास नगर में
मधुर हवा संगीत सुनाये
कोयल डाली-डाली।
हर गली यहाँ कथा कहती है
होली और दीवाली,
युवा यहाँ खुशी मनाते
राजा बने सवाली।
लोरी और वैसाखी धरती
खेत बने दुल्हन से
मक्के और साग सरसों का
मौसम के रंग बरसें.
ऊँचे मार्ग सेतु नीचे
रातोरात बन रही मस्जिद
शासन आंकें मूंदे।
ये कैसी उन्नति है बाबू !
अमृतसर है, इसे बचाओ
बहुत हो चुके दंगे
जात-पात का भेद भुलाओ
इस धरती को गले लगाओ,
बहुत हो चुके नंगे।
हरमंदिर की शान यहाँ
जीवन में है शान्ति यहाँ,
गुरुओं का आशीष मिलेगा
सेवा व बलिदान जहाँ ।
सीमाओं का अंत नहीं
जलियावाला बाग़ यहाँ
नहीं व्यर्थ जाने देंगे
अपने पूर्वजों का ज्ञान यहाँ।
स्वर्ण मन्दिर में अनेकों जगह यह विचार कर माथा टेक रहा था क्या पता उस जगह महात्माओं के चरण पड़े हों।
जब हर मन्दिर साहेब के दरबार यानि स्वर्ण मन्दिर में मुझे सरोपा भेट में मिला तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा।
ओस्लो में स्थित अपना गुरुद्वारा स्मरण हो आया जहाँ अक्सर जाता रहता हूँ जो मेरा केन्द्र है। वेदी जी और गुरु महाराज को धन्यवाद दिया।
ओबामा एक आन्दोलन का नाम है
आज सभी ओबामा की बात करते हैं परन्तु उनकी तरह अपनी सोच को संवर्द्धित नहीं करते। अपना मन खुला और विचारों में व्यापकता और खुलापन rअखन जरूरी है। ओबामा किसी धर्म और रंग का नाम नहीं है। यह बदलाव और नयी सोच का नाम है।
तरक्की करना है तो प्रयास करना होगा। भगवान् का नाम लेकर नासमझी करते रहने से कभी भी तरक्की नहीं कर सकते। यूरोपीय देशों में लोगों ने अपनी आबादी उतनी ही बड़ाई जितनी माता -पिता आसानी से पालन-पोषण कर सकें। इमानदारी, स्वतंत्रता, मानवता आदि से तरक्की की और औरों को करने दे रहे हैं। और हम कितने हैं बुद्धिमान हथियारों से करते हैं शान्ति की कामना। भारत में मैंने देखा की कुछ लोग mehnat से jyada अपने भाई-bahno और sambandhiyon की jaayjaad harapne में jyada समय kharch करते है। कुछ प्रेम में धोखा दे रहे हैं तो बहुत से लोग dahej में अपने को खरीद और बेच रहे है।
aaiye हम अपना इतिहास ख़ुद बनायें ।
हाथ में हाथ रखकर अभी कुछ होना नहीं
katna क्यों chahte हो nai फसल जब तुम्हें bonaनहीं।
ओस्लो, २१.०१.०९
? लिए बहुत सी
रविवार, 4 जनवरी 2009
नव वर्ष का स्वागत कैसे?
नव वर्ष का स्वागत कैसे? -शरद आलोक
नव वर्ष का स्वागत कैसे करें? ओस्लो में मैं अपने परिवार के साथ था। पहली बार ऐसा हुआ जब मैं अकेले अपने कमरे में विचार करता रहा परन्तु नए वर्ष के स्वागत में और पुराने वर्ष की विदाई देने में असमर्थ रहा।
मैं अकेले नहीं हूँ। देश, समाज और विश्व की समस्याएं अभी भी मुहं बाए खरी हैं। हम कितना सफल हुए हैं?
हमने क्या योगदान दिया है इसके लिए।
एक पाठक ने लिखा कहा की केवल पुस्तकों में हल मिलते हैं? यह कितना सच है इसे तलाशना है और समस्याओं में अपने अंश भर हल करने में योगदान भी देना है।
औपचारिकतावश ही सही पर ह्रदय से आप सभी को नव वर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएं।
आप सामूहिक और वैश्विक समस्याओं के हल में प्रयासरत रहें और अपना धर्म निभाएं खुशी से, दबाव से या भावना में बहकर नहीं।
नव वर्ष का स्वागत कैसे करें? ओस्लो में मैं अपने परिवार के साथ था। पहली बार ऐसा हुआ जब मैं अकेले अपने कमरे में विचार करता रहा परन्तु नए वर्ष के स्वागत में और पुराने वर्ष की विदाई देने में असमर्थ रहा।
मैं अकेले नहीं हूँ। देश, समाज और विश्व की समस्याएं अभी भी मुहं बाए खरी हैं। हम कितना सफल हुए हैं?
हमने क्या योगदान दिया है इसके लिए।
एक पाठक ने लिखा कहा की केवल पुस्तकों में हल मिलते हैं? यह कितना सच है इसे तलाशना है और समस्याओं में अपने अंश भर हल करने में योगदान भी देना है।
औपचारिकतावश ही सही पर ह्रदय से आप सभी को नव वर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएं।
आप सामूहिक और वैश्विक समस्याओं के हल में प्रयासरत रहें और अपना धर्म निभाएं खुशी से, दबाव से या भावना में बहकर नहीं।
रविवार, 28 दिसंबर 2008
हम युद्ध न होने देंगे- शरद आलोक्
हम गांधी के वंशज हैं , हम युद्ध न होने देंगे- शरद आलोक
आज भारत की समस्या केवल भारत की नहीं रही। यह पूरे विश्व की समस्या बन गयी है। इस सम्बन्ध में हम आपको एक बात बताते हैं। यह संस्मरण ओस्लो में आयोजित ग्लोबल सम्मलेन २००८ का है, जहाँ मुझे भी भाग लेने का अवसर मिला। यहाँ मुझे एक चीज की बेहद खुशी हुई जब नार्वे की सुंदर युवतियां भारत में सभी को पीने के लिए पानी उपलब्ध कराने के लिए एक अभियान चला रही थीं। सुंदर युवतियों के जागरण अभियान को देखकर लगा की यदि देवियाँ इस दुनिया में हैं तो उनसे ये दूर नहीं। चाहे पाकिस्तान और बांग्लादेश में गरीबी और धर्मान्धता के कारण युवकों को अपराध के लिए भड़काया जाता हो या भारत में या फ़िर सोमालिया अथवा श्रीलंका तथा चीन में मानवाधिकार के लिए लाखों करोड़ों को बलि का बकरा बनाया जाता है तो ये सारी की सारी समस्याएं मेरी दृष्टि में जितनी भौगोलिक हैं उतनी मेरी निजी अपनी हैं क्योंकि ये मानवता और मानवाधिकार से सम्बन्ध रखती है। कुछ साल पहले नेपाल के साहसिक और लोकप्रिय नेता माधव सिंह नेपाल से बात हुई और जब एक सप्ताह पहले नेपाल के शिक्षा सचिव से मिला तो मेरे सामने काठमांडू से लेकर पोखर तक की याद आ गयी। सुंदर प्यारा सा नेपाल बेहाल क्यों है। काठमांडू के मार्ग टूटे थे। चौराहों पर प्याऊ का नामोनिशान नहीं था पर शराब हर चौराहे पर उपलब्ध था। अब भारत में भी कई बस्तियों का हाल का भी यही हाल है। बच्चों के नंगे पैर धुलने वाले, जूते पहनाने वाले तथा उन्हें भरपेट भोजन देने वाले रक्षक कहाँ चले गए।
मुस्लिम आबादी गरीब है। मुझे इस बात का बहुत दुःख है ठीक इसी तरह कि हमारा पड़ोसी, हमारे भाई -बहन गरीब है। मैं इस समस्या के लिए समाज को और सबसे ज्यादा माता-पिता को दोषी मानता हूँ। समाज को इसलिए कि उसने महिला और पुरूष में भेदभाव करके महिलाओं और युवतियों तथा बालिकाओं को क्यों नहीं पढाया ? अशिक्षा के कारण परिवार बड़े हैं और आर्थिक स्थिथि का माताएं ध्यान नहीं दे पातीं और पुरूष औरत को अपनी ज्याजाद समझते हैं। फलस्वरूप बच्चों कि परवरिश ठीक से नहीं हो पाती। स्वामी दयानंद ने कहा था कि महिलाओं को वेदों को पढ़ा दो और पढ़ने दो स्त्रियाँ अपने आप आत्मनिर्भर हो जायेंगी।
कितने मंदिरों में वेदों को पढाया जाता है और क्या सभी धर्मों के लिए सभी धार्मिक स्थानों के दरवाजे खुले हैं?
क्या धार्मिक स्थानों का प्रयोग बच्चों को बेसिक शिक्षा देने और माता पिता को साक्षर बनाने में प्रयोग नहीं किया जा सकता? राजनैतिक नेता और धार्मिक नेता बेसिक शिक्षक नहीं बन सकते? हम जिस देश में रहते हैं उस देश कि भाषा और कानून को मानते हुए मानवाधिकार की रक्षा नहीं कर सकते? आख़िर क्यों? हम सभी को स्वयं आत्मनिर्भर तो बनना ही है साथ ही पधोसी पड़ोसी को भी आत्मनिर्भर बनाना है। पड़ोसी भूखा है तो क्या आप खुश रह सकते हैं? पड़ोसी की चिंता स्वाभाविक है वह दखल नहीं है। (ओसलो , 2८.1२.०८) फ़िर मिलेंगे। अपने विचार भेजिए परन्तु दूसरे के मानवीय विचारों का आदर करें।
आज भारत की समस्या केवल भारत की नहीं रही। यह पूरे विश्व की समस्या बन गयी है। इस सम्बन्ध में हम आपको एक बात बताते हैं। यह संस्मरण ओस्लो में आयोजित ग्लोबल सम्मलेन २००८ का है, जहाँ मुझे भी भाग लेने का अवसर मिला। यहाँ मुझे एक चीज की बेहद खुशी हुई जब नार्वे की सुंदर युवतियां भारत में सभी को पीने के लिए पानी उपलब्ध कराने के लिए एक अभियान चला रही थीं। सुंदर युवतियों के जागरण अभियान को देखकर लगा की यदि देवियाँ इस दुनिया में हैं तो उनसे ये दूर नहीं। चाहे पाकिस्तान और बांग्लादेश में गरीबी और धर्मान्धता के कारण युवकों को अपराध के लिए भड़काया जाता हो या भारत में या फ़िर सोमालिया अथवा श्रीलंका तथा चीन में मानवाधिकार के लिए लाखों करोड़ों को बलि का बकरा बनाया जाता है तो ये सारी की सारी समस्याएं मेरी दृष्टि में जितनी भौगोलिक हैं उतनी मेरी निजी अपनी हैं क्योंकि ये मानवता और मानवाधिकार से सम्बन्ध रखती है। कुछ साल पहले नेपाल के साहसिक और लोकप्रिय नेता माधव सिंह नेपाल से बात हुई और जब एक सप्ताह पहले नेपाल के शिक्षा सचिव से मिला तो मेरे सामने काठमांडू से लेकर पोखर तक की याद आ गयी। सुंदर प्यारा सा नेपाल बेहाल क्यों है। काठमांडू के मार्ग टूटे थे। चौराहों पर प्याऊ का नामोनिशान नहीं था पर शराब हर चौराहे पर उपलब्ध था। अब भारत में भी कई बस्तियों का हाल का भी यही हाल है। बच्चों के नंगे पैर धुलने वाले, जूते पहनाने वाले तथा उन्हें भरपेट भोजन देने वाले रक्षक कहाँ चले गए।
मुस्लिम आबादी गरीब है। मुझे इस बात का बहुत दुःख है ठीक इसी तरह कि हमारा पड़ोसी, हमारे भाई -बहन गरीब है। मैं इस समस्या के लिए समाज को और सबसे ज्यादा माता-पिता को दोषी मानता हूँ। समाज को इसलिए कि उसने महिला और पुरूष में भेदभाव करके महिलाओं और युवतियों तथा बालिकाओं को क्यों नहीं पढाया ? अशिक्षा के कारण परिवार बड़े हैं और आर्थिक स्थिथि का माताएं ध्यान नहीं दे पातीं और पुरूष औरत को अपनी ज्याजाद समझते हैं। फलस्वरूप बच्चों कि परवरिश ठीक से नहीं हो पाती। स्वामी दयानंद ने कहा था कि महिलाओं को वेदों को पढ़ा दो और पढ़ने दो स्त्रियाँ अपने आप आत्मनिर्भर हो जायेंगी।
कितने मंदिरों में वेदों को पढाया जाता है और क्या सभी धर्मों के लिए सभी धार्मिक स्थानों के दरवाजे खुले हैं?
क्या धार्मिक स्थानों का प्रयोग बच्चों को बेसिक शिक्षा देने और माता पिता को साक्षर बनाने में प्रयोग नहीं किया जा सकता? राजनैतिक नेता और धार्मिक नेता बेसिक शिक्षक नहीं बन सकते? हम जिस देश में रहते हैं उस देश कि भाषा और कानून को मानते हुए मानवाधिकार की रक्षा नहीं कर सकते? आख़िर क्यों? हम सभी को स्वयं आत्मनिर्भर तो बनना ही है साथ ही पधोसी पड़ोसी को भी आत्मनिर्भर बनाना है। पड़ोसी भूखा है तो क्या आप खुश रह सकते हैं? पड़ोसी की चिंता स्वाभाविक है वह दखल नहीं है। (ओसलो , 2८.1२.०८) फ़िर मिलेंगे। अपने विचार भेजिए परन्तु दूसरे के मानवीय विचारों का आदर करें।
विदेश से प्रकाशित स्पाइल-दर्पण भारत में सेमिनार आयोजित करेगी -शरद आलोक
इस लेख में दो बातों पर रौशनी डाल रहा हूँ। १- स्पाइल- दर्पण के २० वर्ष पर ओस्लो में कार्यक्रम। २-भारत में स्पाइल-दर्पण द्वारा विदेशों में हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता पर विभिन्न नगरों में कार्यक्रम आयोजित होंगे।
स्पाइल- दर्पण के २० वर्ष पर ओस्लो में कार्यक्रम:
ओस्लो , नार्वे में भारतीय- नार्वेजीय सूचना और सांस्कृतिक फॉरम और स्पाइल-दर्पण के संयुक्त प्रयास से १२ से १३ दिसम्बर तक दो दिवसीय कार्यक्रम संपन्न हुए। १२ दिसम्बर को लेखक सेमिनार हुआ जिसमें निम्न विषयों पर विद्वानों ने अपने लेख पढे : १) हिन्दी डाटाबेस २) स्पाइल-दर्पण का हिन्दी पत्रकारिता में योगदान। ३) नार्वे में आठवें दशक में नार्विजन भाषा के प्रवासीय साहित्य में सुरेशचंद्र शुक्ल का योगदान। ४) प्रवासी [इतहास में स्पाइल-दर्पण का योगदान। ५) आजादी के बाद का हिन्दी साहित्य। ६) दलित और नारी विमर्श ७) भारत का हिन्दी साहित्य किस तरह विदेशों में प्रसारित किया जाए। ये सभी लेख भारत में नहीं वरन ओस्लो में चार प्रोफेसरों और लेखाखों द्वारा पढ़े गए।
२ भारत में आप यदि किसी विश्वविद्द्यालय से जुड़े हैं या युवा और उदारवादी हैं, हमने विदेश में २५ वर्ष तक नार्वे की नार्वेजीय पत्रकारिता से जुड़े रहकर हिन्दी पत्रकारिता की निशुल्क सेवा की है? आप भी कुछ कीजिये!
स्पाइल- दर्पण के २० वर्ष पर ओस्लो में कार्यक्रम:
ओस्लो , नार्वे में भारतीय- नार्वेजीय सूचना और सांस्कृतिक फॉरम और स्पाइल-दर्पण के संयुक्त प्रयास से १२ से १३ दिसम्बर तक दो दिवसीय कार्यक्रम संपन्न हुए। १२ दिसम्बर को लेखक सेमिनार हुआ जिसमें निम्न विषयों पर विद्वानों ने अपने लेख पढे : १) हिन्दी डाटाबेस २) स्पाइल-दर्पण का हिन्दी पत्रकारिता में योगदान। ३) नार्वे में आठवें दशक में नार्विजन भाषा के प्रवासीय साहित्य में सुरेशचंद्र शुक्ल का योगदान। ४) प्रवासी [इतहास में स्पाइल-दर्पण का योगदान। ५) आजादी के बाद का हिन्दी साहित्य। ६) दलित और नारी विमर्श ७) भारत का हिन्दी साहित्य किस तरह विदेशों में प्रसारित किया जाए। ये सभी लेख भारत में नहीं वरन ओस्लो में चार प्रोफेसरों और लेखाखों द्वारा पढ़े गए।
२ भारत में आप यदि किसी विश्वविद्द्यालय से जुड़े हैं या युवा और उदारवादी हैं, हमने विदेश में २५ वर्ष तक नार्वे की नार्वेजीय पत्रकारिता से जुड़े रहकर हिन्दी पत्रकारिता की निशुल्क सेवा की है? आप भी कुछ कीजिये!
रविवार, 14 दिसंबर 2008
विदेशों में हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्ण दिन "स्पाइल- दर्पण" ने २० वर्ष पूरे किए- शरद आलोक .
नार्वे में स्पाइल - दर्पण पत्रिका ने प्रकाशन के २० वर्ष पूरे किए। - शरद आलोक
नार्वे से प्रकाशित द्वैमासिक पत्रिका "स्पाइल-दर्पण २० पूरे किए। इस अवसर पर चार दिनों तक नार्वे की राजधानी ओस्लो में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए। यह सिलसिला ११ दिसम्बर को आरम्भ हुआ। १० दिसम्बर को तो विश्व के इतिहास में शान्ति के लिए फिनलैण्ड के पूर्व राष्ट्रपति और स्कांदिनेविया और विश्व में भाईचारा बढाने वाले मथाई को ओस्लो में पुरस्कार लेते देखने का अलग आनंद था। इसीके साथ-साथ स्पाइल-दर्पण के २० वर्ष पूरे होने पर हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में , विशेषकर विदेशों में मील का पत्थर साबित होती हुई पत्रिका ने इतिहास रच दिया।
११ दिसम्बर को स्पाइल -दर्पण के संपादक यानी इस लेख के लेखक और
के लेखक भारत से रूहेलखंड विश्वविद्यालय , के डा महेश दिवाकर ने संयुक्त रूप से पत्रिका के जुबली अंक नार्वे की वित्तमंत्री क्रिसतीन हाल्वूर्सेंन को एस ऐ एस होटल में भेट की।
१२ दिसम्बर २००८ को भारत नार्वे लेखक सेमीनार आयोजित हुआ और १३ दिसम्बर को सेमीनार ने विशाल रूप लिया। इन दोनों कार्यक्रमों में भारतीय राजदूत बी ऐ राय , ओस्लो विश्वविद्द्यालय के प्रो क्लाउस जोलर, नार्वे की राईटर यूनियन की आन्ने , राईटर सेंटर की इन्ग्विल्ड, लखनऊ के कालीचरण स्नेही , महेश दिवाकर , सत्येंदर कुमार सेठी, कैलाश सत्यार्थी , फ्रेंच गयाना के शिक्षा मन्त्री, नार्वे के सांसद , समाचारपत्र के संपादक , प्रो क्नुत शेल स्ताद्ली , नार्वे के बहुत से लेखक, प्रवासी लेखक गन सहित बहुत सी हस्तियों ने अपने विचार , अपने लेख प्रस्तुत किए ।
आगामी २० वर्षों के लिए पत्रिका की संभावनाओं पर विचार किया गया।
शेष आगामी दिनों में इस ब्लाग में देखते रहिये।
नार्वे से प्रकाशित द्वैमासिक पत्रिका "स्पाइल-दर्पण २० पूरे किए। इस अवसर पर चार दिनों तक नार्वे की राजधानी ओस्लो में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए। यह सिलसिला ११ दिसम्बर को आरम्भ हुआ। १० दिसम्बर को तो विश्व के इतिहास में शान्ति के लिए फिनलैण्ड के पूर्व राष्ट्रपति और स्कांदिनेविया और विश्व में भाईचारा बढाने वाले मथाई को ओस्लो में पुरस्कार लेते देखने का अलग आनंद था। इसीके साथ-साथ स्पाइल-दर्पण के २० वर्ष पूरे होने पर हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में , विशेषकर विदेशों में मील का पत्थर साबित होती हुई पत्रिका ने इतिहास रच दिया।
११ दिसम्बर को स्पाइल -दर्पण के संपादक यानी इस लेख के लेखक और
के लेखक भारत से रूहेलखंड विश्वविद्यालय , के डा महेश दिवाकर ने संयुक्त रूप से पत्रिका के जुबली अंक नार्वे की वित्तमंत्री क्रिसतीन हाल्वूर्सेंन को एस ऐ एस होटल में भेट की।
१२ दिसम्बर २००८ को भारत नार्वे लेखक सेमीनार आयोजित हुआ और १३ दिसम्बर को सेमीनार ने विशाल रूप लिया। इन दोनों कार्यक्रमों में भारतीय राजदूत बी ऐ राय , ओस्लो विश्वविद्द्यालय के प्रो क्लाउस जोलर, नार्वे की राईटर यूनियन की आन्ने , राईटर सेंटर की इन्ग्विल्ड, लखनऊ के कालीचरण स्नेही , महेश दिवाकर , सत्येंदर कुमार सेठी, कैलाश सत्यार्थी , फ्रेंच गयाना के शिक्षा मन्त्री, नार्वे के सांसद , समाचारपत्र के संपादक , प्रो क्नुत शेल स्ताद्ली , नार्वे के बहुत से लेखक, प्रवासी लेखक गन सहित बहुत सी हस्तियों ने अपने विचार , अपने लेख प्रस्तुत किए ।
आगामी २० वर्षों के लिए पत्रिका की संभावनाओं पर विचार किया गया।
शेष आगामी दिनों में इस ब्लाग में देखते रहिये।
बुधवार, 3 सितंबर 2008
मनचली कोसी कहर ढा रही. - शरद आलोक
मनचली कोसी कहर ढा रही। - शरद आलोक
सोया सारा नगर, गाँव
जीवन की नौका
खे रही नाव
डूब गई नैया, कौन है खिवैया
दूर तक खोजती हैं, अपनों की आहट
चाहत के नयनों में खून लकीर
मिटा गई कोसी उनकी तक़दीर।
खोजते हैं द्वार-द्वार
गूंजती पुकार
आ जा मेरे प्रिय
आसरा तुम्हार।
नेपाल से निकली
मनचली कोसी
धधक् बरपे कहर
पुकारता हूँ बार-बार
लोटो तुम एक बार।
सोया सारा नगर, गाँव
जीवन की नौका
खे रही नाव
डूब गई नैया, कौन है खिवैया
दूर तक खोजती हैं, अपनों की आहट
चाहत के नयनों में खून लकीर
मिटा गई कोसी उनकी तक़दीर।
खोजते हैं द्वार-द्वार
गूंजती पुकार
आ जा मेरे प्रिय
आसरा तुम्हार।
नेपाल से निकली
मनचली कोसी
धधक् बरपे कहर
पुकारता हूँ बार-बार
लोटो तुम एक बार।
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