गुरुवार, 21 अप्रैल 2011
VELKOMMEN TIL FORFATTERKAFÉ
23.04.11 klokka 15:00
VELKOMMEN TIL FORFATTERKAFÉ
VELKOMMEN TIL FORFATTERKAFÉ (Verdens bokdag)
Lørdag den 23. april, kl 15:00Tema: verdens bokdagVeitvet kulturhus/SFO, bak Veitvet skole...Veitvetveien 17, 0596 OSlo
Program for dagen:1 Opplesning av dikt og noveller2 Barna opptrer med dikt, musikk, sang mm3 Antakshari, en sanglek på hindi4 Alle deltar i dans til bollywood musikk
Dette er et gratis familiearrangementDet blir lett servering.Alle barn som opptrer får en liten overraskelse :o)
Ha en fin dag
शनिवार, 16 अप्रैल 2011
ओस्लो में बैसाखी मनाई गयी-सुरेशचन्द्र शुक्ल
ओस्लो में बैसाखी पर्व धूमधाम से मनाया गया
पांच प्यारे के साथ नगर कीर्तन में सम्मिलित आस्थावान लोग ओस्लो में पार्लियामेंट के सामने (कार्ल युहान सड़क पर) लेख और चित्र: सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ओस्लो, नार्वे से' ओस्लो की सड़क पर,/ रंग बिरंगे- केसरिया, / नीले परिधानों मेंबाल युवा वृद्ध, / नारी और पुरुषों का जोश दिला देता है/ अमृतसर की याद।' बोले सोनिहाल.. सत श्री अकाल की/ गूँज भर देती है नव उत्साह। / अपनी संस्कृति के रखवाले कर रहे हैं / मानवता की रक्षा और दे रहे हैं / खालसा पंथ की शिक्षा।/ दिला रहें हैं गुरुनानक का सन्देशऔर/ गुरु गोविन्द सिंह की दीक्षा।/ ओस्लो की सड़क पर / सेन्ट्रल स्टेशन से नेशनल थिएटर तक/ शान्ति और शब्द की शिक्षा।/' ओस्लो, १७ अप्रैल। / आज ओस्लो के सेन्ट्रल स्टेशन से/ बैसाखी के अवसर पर दिन में १२:३० बजे/ विशाल नगर कीर्तन निकलकर / कार्लयुहान सड़क, पार्लियामेंट होता हुआ / यूनिवर्सिटी आउला (नेशनल थिएटर के पास) / में एक विशाल जन सभा में बदल गया। / नगर-कीर्तन के सामने / पुलिस की कार और घोडा चल रहा था। उसके बाद करतब दिखाते युवा सिख कार्यकर्ता और उसके बाद पांच प्यारे / पुरुष और पांच महिलायें/ एक तरह की ध्वजा लिए हुए चल रही थीं। / लोगों में बहुत उत्साह था। / अनेक बैनर सिख धर्म का सन्देश देते हुए / लोगों ने हाथों में पकड़े हुए थे। / यहाँ एक मेले जैसा माहौल था। / एक तरफ कतार में पगड़ी पहनाई जा रही थी। / यह पगड़ी सभी के लिए निशुल्क थीं। / नार्वेजीय युवा लोग बहुत रूचि से पगड़ी पहन रहे थे। / दूसरे पंडाल में भारतीय भोजन / परोसा जा रहा था। / आसमान साफ था। / सूरज चमककर अपनी किरणों से / गर्मजोशी भर रहा था। / विशाल सभा को ओस्लो स्थित / गुरुद्वारा कि प्रधान अमनदीप कौर, / के सबसे बड़े अस्केर, नार्वे में स्थित गुरुद्वारे के मंत्री इंदरजीत सिंह / और भारतीय दूतावास के प्रथम सचिव दिनेश कुमार नंदा तथा नार्वेजीय नेता ऊला एलवेथून ने संबोधित किया और शुभकामनाएं दीं. नंदा जी ने कहा कि जहाँ भी भारतीय जाते हैं वह अपनी पहचान छोड़ देते हैं. वे जहाँ जाते हैं वहाँ के संस्कृति में भी राम जाते हैं और अपनी संस्कृति और भाषा को भी अपनाए रखते हैं. यह मुझे विदेश में अनेक देशों में देखने को मिला. इंदरजीत सिंह ने भी नंदा जी से सहमती जताई और सभी को धन्यवाद दिया. इसा विशाल बैसाखी पर्व में नार्वे में रहने वाले दस हजार भारतीयों में से एक हजार यहाँ उपस्थित थे. नार्वे में दस हजार भारतीय निवास करते हैं जिनमें पांच हजार सिखों की जनसंख्या है.
गुरुवार, 14 अप्रैल 2011
आज बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की जयंती है. बहुब-बहुत बधाई- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
अंबेडकर की दलित चेतना
डॉ तुलसीराम (जवाहर लाल विश्व विद्यालय, दिल्ली में प्रोफ़ेसर हैं )समय बीतने के साथ-साथ बाबासाहेब अंबेडकर के विचारों की प्रासंगिकता बढ़ती ही जा रही है। दलितों तथा गैर दलितों के बीच उनकी तरह-तरह से व्याख्या की जा रही है। अंबेडकर के विचारों के तीन प्रमुख स्रोत थे। पहला उनका अपना अनुभव, दूसरा-महात्मा ज्योतिबा फूले का सामाजिक आंदोलन तथा तीसरा-बुद्धिज्म। इन स्रोतों की जड़ में भारत की अमानवीय जाति व्यवस्था थी। डॉ. अबेडकर को भी छुआछूत तथा जातीय घृणा का शिकार होना पड़ा था, जिससे खिन्न होकर उन्होंने इस खत्म करने का अभियान चलाया। उन्होंने जाति व्यवस्था की ईश्वरीय अवधारणा का तीखा विरोध किया और इसे मानव निर्मित बताया। इस संदर्भ में उनके महात्मा गांधी से वैचारिक मतभेद उभर कर सामने आए। गांधीजी कहते थे कि छुआछूत मानव की देन है इसलिए मानव प्रदत्त छुआछूत से तो लड़ना चाहिए, जबकि ईश्वरीय जाति व्यवस्था के विरुद्ध आवाज नहीं उठानी चाहिए। गांधीजी की इस ईश्वरीय अवधारणा के विरुद्ध अंबेडकर चट्टान की तरह खड़े हो गए। यद्यपि छुआछूत निवारण के अभियान में गांधीजी की भूमिका को अनदेखा नहीं की जा सकती, लेकिन उनकी ईश्वरीय अवधारणा की दलितों ने तीव्र आलोचना की। जाति की ईश्वरीय अवधारणा के चलते डॉ. अंबेडकर ने जाति व्यवस्था को हिंदू धर्म की प्राणवायु बताया और साफ शब्दों में कहा कि ऊंच-नीच के भेदभाव के चलते हिंदू धर्म कभी मिशनरी धर्म नहीं बन पाया, जबकि अन्य धर्म जैसे बौद्ध धर्म अनेक देशों की सीमाएं पार कर गए। जाति व्यवस्था विरोधी, अहिंसक तथा विश्वबुंधत्ववादी होने के कारण डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इन्हीं कारणों से उन्होंने बौद्ध धर्म को दलितों के लिए सबसे उचित धर्म बताया। संक्षेप में डॉ. अंबेडकर का यही सामाजिक चिंतन था। संविधान के माध्यम से उन्होंने भारतीय जनतंत्र को विकासशील बनाया, जिस कारण देश की एकता मजबूत हुई। डॉ. अंबेडकर का राजनीतिक चिंतन भी जाति व्यवस्था से उत्पन्न परिस्थितियों से प्रभावित हुआ था। वह 1920 के दशक से ही दलितों के लिए पृथक मतदान की मांग करने लगे थे। इसके पीछे उनका तर्क था कि ऐसा होने से जाति व्यवस्था के विरोध तथा दलितों के हित में काम करने वाले ही चुनकर विधानसभा तथा लोकसभा में पहुंच सकेंगे अन्यथा दलित स्थापित पार्टियों के दलाल बनकर रह जाएंगे। गांधीजी के प्रबल विरोध और आमरण अनशन के कारण पृथक मतदान की मांग वापस ले ली गई, जिसके बदले मौजूदा आरक्षण व्यवस्था लागू हुई। यह व्यवस्था पूना पैक्ट (1932) के नाम से जानी जाती है। पूना पैक्ट का सबसे अधिक प्रभाव शिक्षा के क्षेत्र में पड़ा। लाखों की संख्या में दलित शिक्षित होकर हर श्रेणी की नौकरियों में शामिल हुए और उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की दिशा बदल दी। लेकिन आरक्षण नीति सही ढंग से लागू न होने के कारण दलित समाज का नुकसान भी हुआ है। डॉ. अंबेडकर की आशंका सही सिद्ध हुई। विधानसभा तथा लोकसभा में चुने हुए प्रतिनिधि दलित मुक्ति के सवाल पर नकारात्मक भूमिका में आ गए। सालों-साल चलती रही इसी भूमिका के कारण काशीराम की बहुजन समाज पार्टी का 1984 में उदय हुआ। काशीराम ने वर्तमान जनतांत्रिक प्रणाली में दलितों की भूमिका को चमचा युग बताया। इसलिए उन्होंने बसपा का जो वैचारिक आधार खड़ा किया वह डॉ. अंबेडकर की आरंभिक राजनीतिक समझ यानी 1920 तथा 30 के दशक के विचारों पर आधारित है। यही कारण है कि उनके क्रियाकलाप में राजनीतिक तीखापान अधिक झलकता है। डॉ. अंबेडकर 1920 तथा 30 के दशक में जाति व्यवस्था के विरुद्ध उग्र रूप धारण किए हुए थे। बाद में उन्होंने सत्ता में भागीदारी के माध्यम से दलित मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने की कोशिश की। काशीराम ने सत्ता में भागीदारी को सत्ता पर कब्जा में बदल दिया। इस उद्देश्य से उन्होंने नारा दिया अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करो। इस नारे के तहत सर्वप्रथम बसपा ने विभिन्न दलित जातियों का सम्मेलन करके उन्हें अपनी तरफ आकर्षित किया। साथ ही उसने पिछड़ी जातियों को अपनी तरफ लाने की कोशिश की जिसका परिणाम था बसपा का 1993 में समाजवादी पार्टी से समझौता। दो साल बाद इस गठबंधन के टूट जाने के बाद बसपा का झुकाव भारतीय जनता पार्टी की तरफ बढ़ा तथा उसके सहयोग से मायावती तीन बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। किंतु 2007 में उत्तर प्रदेश के पिछले आम चुनाव में मायावती के नेतृत्व में बसपा ने दलित-ब्रांाण एकता के नारे के साथ बहुमत हासिल कर लिया। यह बहुमत प्रचंड जातीय धु्रवीकरण के आधार पर मिला था। वैसे भी भारतीय चुनाव प्रणाली में हमेशा जातीय, क्षेत्रीय और सांप्रदायिक धु्रवीकरण आम प्रक्रिया का हिस्सा रहा है। किंतु मंडल कमीशन के लागू होने के बाद जातीय धु्रवीकरण बेहद उग्र रूप में जनता के समक्ष आया है। उत्तर प्रदेश में इस धु्रवीकरण से बसपा को सबसे अधिक फायदा पहुंचा है, जिस कारण वह सत्ताधारी पार्टी बन गई। इस संदर्भ में एक गंभीर सवाल यह उठता है कि जातीय ध्रवीकरण के आधार पर चुनाव जीत कर सत्ताधारी तो बना जा सकता है, किंतु डॉ. अंबेडकर की जाति-उन्मूलन की विचारधारा को मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता। बुद्ध से लेकर अंबेडकर तक ने जाति-विहीन समाज में ही दलित मुक्ति की कल्पना की थी, किंतु आज का भारतीय जनतंत्र पूर्णरूपेण जातीय, क्षेत्रीय एवं सांप्रदायिक जनतंत्र में बदल चुका है। ऐसा जनतंत्र राष्ट्रीय एकता के लिए वास्तविक खतरा है। डॉ. अंबेडकर की उक्ति- जातिविहीन समाज की स्थापना के बिना स्वराज प्राप्ति का कोई महत्व नहीं, आज भी विचारणीय है। (लेखक जेएनयू में प्रोफेसर हैं)
बैसाखी की लाख-लाख बधाई- सुरेशचन्द्र शुक्ल
शनिवार, 9 अप्रैल 2011
८ अप्रैल ओस्लो - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
नार्वेजीय लेखक मित्रों के साथ ओस्लो में आज मौसम अच्छा था। दिन में तेज हवाएं चलती रहीं। ग्रीष्म के आगमन के पूर्व मानों बसंत आया हो। सड़कों पर से बर्फ हट चुकी है। कहीं कहीं सड़कों के किनारे बर्फ के ढेरों का आकर तेजी से कम हो रहा है। कहीं कहीं रास्ते और सड़कों की सफाई का कम हो रहा है। मेरे मित्र राज कुमार भट्टी घर आये। उनके साथ मैट्रो लेकर नेशनल थिएटर स्टेशन पर उतर कर राजा के प्रसाद होते हुए लिटरेचर हाउस जा रहे थे। रास्ते में राजमहल के सामने मेरे एक अन्य मित्र प्रोफ़ेसर असीम दत्तोराय जी मिल गए। थोड़ी देर तक साहित्यिक और सांस्क्रतिक बातचीत होती रही। जहाँ लेखकों की बैठक होनी थी। थोड़ी देर हो गयी थी क्योंकि पत्रिका स्पाइल -दर्पण का कुछ सामग्री तैयार करनी थी। मुझे स्मरण है दिल्ली में रहने वाले लेखक और प्रसिद्ध आलोचक डॉ कमल किशोर गोयनका जी ने मुझसे वर्षों पहले कहा था की मुझे अपनी डायरी लिखनी चाहिए। अतः उनका स्मरण हो आया और डायरी लिखने बैठ गया। आज जहाँ मेरा जीवन खुली किताब की तरह है। फिर उसे आप पाठकों तक अपनी बात और दिनचर्या साझा कर रहा हूँ। लेखकों की बैठक में लगभग सौ नार्वेजीय लेखक उपस्थित थे। उसमें मेरे एक लेखक मित्र २० वर्ष बाद मिले जिन्होंने मेरे नार्वेजीय भाषा के काव्य संग्रह 'Mellom linjene' (पंक्तियों के मध्य ) की समीक्षा ओस्लो के समाचार पत्र VG (वेरदेन्स गंग) में २००५ में लिखी थी। मुझे स्मरण है की दिल्ली के मशहूर कार्टून बनाने वाले लेखक सुशील कालरा का साक्षात्कार दिलाने गया था। वे लोग कुछ विशेष होते हैं। आप चाहे जितना भी सहयोग उन्हें दीजिये वह आपको कम ही पत्र लिखते हैं और धन्यवाद भी नहीं देते है। इनमें अपवाद भी हैं। लेखक बैठक और बाद में मिलना-जुलना पार्टी चलती रही। साहित्यिक और निजी विचारों का आदान -प्रदान हुआ। दो लेखकों ने बताया की उनकी पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद छप चुका है। मुझे जानकार ख़ुशी हुई की हम लीग नार्वे में ठीक दिशा में कार्य कर रहे हैं। यहाँ संगीता शुक्ल सिमोन्सेन का हिंदी स्कूल जिसका उद्घाटन उदघाटन प्रो (डॉ) निर्मला एस मोर्य ने किया था बहुत अच्छा चल रहा है।
चित्र में बीच में लेखक संगठन की अध्यक्ष इन्ग्विल और अन्य लेखक मित्रों के साथ




