नार्वे में प्रेमचंद जी की १२८वीं जयंती मनायी गयी
भारतीय नार्वेजीय सूचना और सांस्कृतिक मंच के तत्वाधान में आज ३१ जुलाइ २००८ को मुंशी प्रेमचंद जी की १२८ वीं जयंती मनायी गई।
इस अवसर पर सुरेशचंद्र शुक्ल "शरद आलोक" ने प्रेमचंद जी को साहित्य पर प्रकाश डाला। मुंशी प्रेमचंद का जन्म ३१ जूलाई1८३६ को वाराणसी जिले के गमही नामक गावं में हुआ था और मृत्यु ८ अक्टूबर १९३६ म३न हुआ था। हिन्दी कहानी को प्रतिष्ठित करने में मुंशी प्रेमचंद का प्रमुख स्थान है। अपनी कहानियो और उपन्यासों के लिए मशहूर प्रेमचंद के उपन्यास गबन और गोदान बहुत पसंद किया जाता है।
इस अवसर पर शाहेदा बेगम और सुरेशचंद्र शुक्ल "शरद आलोक" ने अपनी कहानियाँ सुनाईं । इंगेर मारिये लिल्लेएन्गेन ने अपनी कवितायें सुनाईं। संगीता ने सभी को फूल भेट किए। राजकुमार भट्टी, वासदेव और अलका भारत, माया भारती और करिश्मा ने अपने विचार प्रगट किए।
- माया भारती
गुरुवार, 31 जुलाई 2008
बुधवार, 9 जुलाई 2008
मनमोहन सिंह जी ने इतिहास रचा
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आज जी-८ देशों की बैठक में भाग लेने जापान आए हुए हैं। जी-८ में आर्थिक सम्पन्न देशों की एक समिति है जो विश्व के आर्थिक विकास में अपनी अहम् भूमिका अदा करता है। कल यहाँ एक बात उठाई गयी थी कि भारत और चीन को भी जी-८ देशों में शामिल करके इसे विस्तार दिया जाए और इसका नाम जी-१० हो जाए। देखिये मनमोहन जी को इसमें सफलता मिलती है कि नहीं। पर यह एक ऐतिहासिक कदम है जिसके लिए मनमोहन सिंह को इसका श्रेय कुछ हद तक दिया जा सकता है, परन्तु यह भारत कि पूर्ण राजनीत का हिस्सा है।
भारत को विकास के लिए बिजली की बहुत जरूरत है। विकास के लिए पंडित नेहरू ने कहा था कि तीन बहुत आवश्यक बातें हैं: बिजली , इस्पात और शिक्षा। सस्ती बिजली के लिए परमाणु उर्जा जरूरी है क्योंकि कम लागत में अधिक बिजली देता है जिसके लिए यूरेनियम की जरूरत होती है। मनमोहन सिंह के अमेरिका के साथ परमाणु समझौता के बाद हमको उरेनियम मिलने का रास्ता खुल जायेगा और हमारा देश भी बिजली उत्पादन में महत्वपूर्ण देश बन जायेगा जो प्रगति के लिए बहुत जरूरी है। मनमोहन और सोनिया गाँधी तथा कांग्रेस बधाई की पात्र है और इसको समर्थन देने वाली पार्टियाँ भी बधाई की पात्र हैं।
- शरद आलोक
ओस्लो, नार्वे
भारत को विकास के लिए बिजली की बहुत जरूरत है। विकास के लिए पंडित नेहरू ने कहा था कि तीन बहुत आवश्यक बातें हैं: बिजली , इस्पात और शिक्षा। सस्ती बिजली के लिए परमाणु उर्जा जरूरी है क्योंकि कम लागत में अधिक बिजली देता है जिसके लिए यूरेनियम की जरूरत होती है। मनमोहन सिंह के अमेरिका के साथ परमाणु समझौता के बाद हमको उरेनियम मिलने का रास्ता खुल जायेगा और हमारा देश भी बिजली उत्पादन में महत्वपूर्ण देश बन जायेगा जो प्रगति के लिए बहुत जरूरी है। मनमोहन और सोनिया गाँधी तथा कांग्रेस बधाई की पात्र है और इसको समर्थन देने वाली पार्टियाँ भी बधाई की पात्र हैं।
- शरद आलोक
ओस्लो, नार्वे
बुधवार, 2 जुलाई 2008
लोकप्रिय संपादक, सृजनशील कवि मित्र कन्हैया लाल नंदन को ७५वा जन्मदिन मुबारक
भइया कन्हैया लाल नंदन को बहुत -बहुत शुभकामनाएं - शरद आलोक
जब भी कहीं कविसम्मेलन, पत्रकार सम्मेलन और लेखक सम्मलेन हो और वहां सबके प्रिय कन्हैया लाल नंदन जी उपस्थित हों तो वह अपने संचालन से समां बाँध देतो हैं। जब भी हिन्दी की पत्रकारिता की बात हो और कन्हैया लाल नंदन का जिक्र न हो ऐसा हो ही नहीं सकता।
मेरी सबसे पहली मुलाकात नंदन जी से १९८६ में दिल्ली में उस समय की प्रतिष्ठित पत्रिका दिनमान के कार्यालय में हुई थी। तभी मैंने नार्वे से पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त की थी। वह वर्ष मेरा पत्रिकारिता का स्वर्णिम वर्ष था। तीन महीने मैंने साप्ताहिक हिंदुस्तान और कादम्बिनी में अवैतनिक हिन्दी पत्रिकारिता का अभ्यास किया था। मेरे अनेक लेख और कहानियाँ तथा कवितायें इन दोनों पत्रिकाओं में छपी थी और जिससे हिन्दी जगत से मेरा विस्तृत साक्षात्कार हुआ था। इन्हीं दिनों वामा की संपादक और आजकल हिंदुस्तान व कदाम्बिनी की सम्पादक मृणाल पाण्डेय से हुआ थातब उन्होंने मेरा पत्र भी वामा में छापा था। इसी वर्ष अज्ञेय जी ने मुझे चाय पिलाई थी और इसी वर्ष मेरे मित्र विजयवीर के बड़े भाई और हिन्दी के मशहूर लेखक रघुवीर सहाय से भेंट हुई थी।
इसके पहले हिमांशु जोशी १९८२ में, स्वर्गीय रामलाल, कुरातुल आइन हैदर, अमृता प्रीतम, सत्य भूषण वर्मा, सुरेन्द्र कुमार सेठी और राजेंद्र अवस्थी १९८५ में नार्वे में हमारे मेहमान बने थे। नार्वे आने वालों की लम्बी सूची है।
आगे चलकर नंदन जी से हमारा मिलना तीन बार लन्दन में हुआ । दो बार विशाल कविसम्मेलन में हुआ जिसका आयोजन लन्दन में स्थित हमारे हाईकमीशन ने आयोजित किया था। सिंघवी जी वहां हाई कमिश्नर थे।
महानायक अमिताभ बच्चन भी एक कविसम्मेलन में उपस्थित थे। मेरी मित्रता भी यहाँ पर गोपालदास नीरज और मजरूह सुल्तानपुरी जी से हुई थी। मजरुह जी से उनके जीवित रहने तक मित्रता चलती रही। नीरज जी से अभी दो सप्ताह पूर्व बातचीत हुई।
नंदन जी एक उदार और विवेकी साहित्यकार होने के नाते एक अच्छे शुभचिंतक भी हैं। जब छठे विश्व हिन्दी सम्मलेन का उद्घाटन सत्र था और मेरे द्वारा कुछ प्रश्न पूछे जाने पर नंदन जी ने मुझे नेक सलाह दी थी ताकि अपनी साख बनी रहे और बात भी हो जाए।
अनेक महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाओं के सफल संपादन के साथ-साथ नंदन जी ने अनेक स्मारिकाओं का भी सफल संपादन भी किया है। प्रवासी साहित्यकारों की रचनाओं को खुले ह्रदय से गगनांचल पत्रिका में स्थान देकर एक ऐतिहासिक कार्य किया है नंदन जी ने।
"महक उठे फूलों से कहना
नंदन दूर -दूर देशों में
अपने मित्रों के हृदयों में
नयनों के नीरों में
बहा करता है।
यह नंदन ही भारत का रत्न
मित्रों का मित्र
कविता में दिनकर, पन्त और धूमिल सा
रस बरसाता , मस्त संत सा
अंधकार में दीप जलाता ।"
इन पंक्तियों के साथ मैं कन्हैया लाल नंदन जी को शतआयु होने की कामना करता हूँ और
हार्दिक श्रेष्ठ शुभकामनाएं देता हूँ।
-शरद आलोक
जब भी कहीं कविसम्मेलन, पत्रकार सम्मेलन और लेखक सम्मलेन हो और वहां सबके प्रिय कन्हैया लाल नंदन जी उपस्थित हों तो वह अपने संचालन से समां बाँध देतो हैं। जब भी हिन्दी की पत्रकारिता की बात हो और कन्हैया लाल नंदन का जिक्र न हो ऐसा हो ही नहीं सकता।
मेरी सबसे पहली मुलाकात नंदन जी से १९८६ में दिल्ली में उस समय की प्रतिष्ठित पत्रिका दिनमान के कार्यालय में हुई थी। तभी मैंने नार्वे से पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त की थी। वह वर्ष मेरा पत्रिकारिता का स्वर्णिम वर्ष था। तीन महीने मैंने साप्ताहिक हिंदुस्तान और कादम्बिनी में अवैतनिक हिन्दी पत्रिकारिता का अभ्यास किया था। मेरे अनेक लेख और कहानियाँ तथा कवितायें इन दोनों पत्रिकाओं में छपी थी और जिससे हिन्दी जगत से मेरा विस्तृत साक्षात्कार हुआ था। इन्हीं दिनों वामा की संपादक और आजकल हिंदुस्तान व कदाम्बिनी की सम्पादक मृणाल पाण्डेय से हुआ थातब उन्होंने मेरा पत्र भी वामा में छापा था। इसी वर्ष अज्ञेय जी ने मुझे चाय पिलाई थी और इसी वर्ष मेरे मित्र विजयवीर के बड़े भाई और हिन्दी के मशहूर लेखक रघुवीर सहाय से भेंट हुई थी।
इसके पहले हिमांशु जोशी १९८२ में, स्वर्गीय रामलाल, कुरातुल आइन हैदर, अमृता प्रीतम, सत्य भूषण वर्मा, सुरेन्द्र कुमार सेठी और राजेंद्र अवस्थी १९८५ में नार्वे में हमारे मेहमान बने थे। नार्वे आने वालों की लम्बी सूची है।
आगे चलकर नंदन जी से हमारा मिलना तीन बार लन्दन में हुआ । दो बार विशाल कविसम्मेलन में हुआ जिसका आयोजन लन्दन में स्थित हमारे हाईकमीशन ने आयोजित किया था। सिंघवी जी वहां हाई कमिश्नर थे।
महानायक अमिताभ बच्चन भी एक कविसम्मेलन में उपस्थित थे। मेरी मित्रता भी यहाँ पर गोपालदास नीरज और मजरूह सुल्तानपुरी जी से हुई थी। मजरुह जी से उनके जीवित रहने तक मित्रता चलती रही। नीरज जी से अभी दो सप्ताह पूर्व बातचीत हुई।
नंदन जी एक उदार और विवेकी साहित्यकार होने के नाते एक अच्छे शुभचिंतक भी हैं। जब छठे विश्व हिन्दी सम्मलेन का उद्घाटन सत्र था और मेरे द्वारा कुछ प्रश्न पूछे जाने पर नंदन जी ने मुझे नेक सलाह दी थी ताकि अपनी साख बनी रहे और बात भी हो जाए।
अनेक महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाओं के सफल संपादन के साथ-साथ नंदन जी ने अनेक स्मारिकाओं का भी सफल संपादन भी किया है। प्रवासी साहित्यकारों की रचनाओं को खुले ह्रदय से गगनांचल पत्रिका में स्थान देकर एक ऐतिहासिक कार्य किया है नंदन जी ने।
"महक उठे फूलों से कहना
नंदन दूर -दूर देशों में
अपने मित्रों के हृदयों में
नयनों के नीरों में
बहा करता है।
यह नंदन ही भारत का रत्न
मित्रों का मित्र
कविता में दिनकर, पन्त और धूमिल सा
रस बरसाता , मस्त संत सा
अंधकार में दीप जलाता ।"
इन पंक्तियों के साथ मैं कन्हैया लाल नंदन जी को शतआयु होने की कामना करता हूँ और
हार्दिक श्रेष्ठ शुभकामनाएं देता हूँ।
-शरद आलोक
रविवार, 8 जून 2008
विदेशों (नार्वे) में हिन्दी पत्रिका स्पाइल-दर्पण के बीस वर्ष - शरद आलोक
नार्वे में प्रकाशित हिन्दी पत्रिका "स्पाइल- दर्पण" के बीस बरस - शरद आलोक
वर्ष १९८८ को नार्वे से प्रकाशित होने वाली हिन्दी और नार्वेजीय भाषा की द्विमासिक पत्रिका स्पाइल-दर्पण का शुभारम्भ हुआ था।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन ने एक आत्मकथात्मक, संस्मरणात्मक पुस्तक लिखी थी "क्या भूलूं क्या याद करूँ"। पुस्तक बहुत चर्चित हुई थी। कुछ लेखकों ने कुछ प्रसंगों के सम्बन्ध में लिखा था कि अमुख़ बात सच नहीं । यदि सच थी तो पहले क्यों नहीं लिखा जब घटित हुई थी। फलस्वरूप मेरे मन में विचार जगा क्यों न मैं वह लिखना शुरू करूँ जो मैंने देखा और पाया ताकि भविष्य में मुझे भी लोग यह कह कर नकार न सकें कि मैंने पहले या अभी क्यों नहीं कहा या लिखा।नार्वे में हिन्दी पत्रिका का शुभारम्भ "परिचय" से हुआ था जिसका प्रकाशन १९७८ में शुरू हुआ था।पिछले वर्ष २००७ और २००८ में केवल दो पत्रिकाएं ही छाप रही हैं। ये हैं सपाइल -दर्पण जो २० साल पहले १९८८ में शुरू हुई थी। और दूसरी नयी पत्रिका "वैश्विका " जिसका प्रकाशन २००७ में आरंभ हुआ जिसका लोकार्पण २००७ में न्यूजर्सी, अमरीका में योगऋषि बाबा रामदेव जी के करकमलों द्वारा छठे हिन्दी महोत्सव में सम्पन्न हुआ था जिसकी प्रतियाँ विश्वहिंदी सम्मेलन में विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा, राजदूत रोनेन सेन, संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारे राजदूत निरुपम सेन, निदेशक इन्द्र नाथ चौधरी, पूर्व राजदूत और सांसद लक्ष्मी शंकर सिंघवी और सभी प्रतिनिधियों को भेंट की गयी और सराही गयी थी।हम देश की सेवा, साहित्य की सेवा , अपने और उस समाज की सेवा करते हैं जिसमें हम रहते हैं तो उसे प्रोत्साहित करना चाहिए ?आपके साथ कुछ बातें बाँट रहे हैं। नार्वे में २८ वर्षों में से २५ वर्षों तक हिन्दी पत्रिकाओं "परिचय" और "स्पाइल-दर्पण के माध्यम से निस्वार्थ सेवा करके जो संतोष और जो सुख मिला उसका वर्णन करना मुश्किल है। विदेशों में हमारे भारतीय और अन्य विद्वतजन हिन्दी की सेवा कर रहे हैं ये सुख वही जान सकते हैं।मैं उन सभी लोगों को हार्दिक धन्यवाद देता हूँ जो देश विदेश में हिन्दी, भारत और अपनी संस्कृति का गौरव बढ़ा रहे हैं। मैंने वही किया जो कोई एक संपादक और भारतीय होकर किया जा सकता है। १९८० से १९९० तक का समय विदेशों में हिन्दी पत्रकारिता की स्थापना का समय था। इस समय जब भारत के प्रवासी बाहर परदेश में अपनी जगह बना रहे थे, हिन्दी की पत्रिका शुरू करना कठिन था। मेरे पास का typewriter नही था। फ़िर भी पत्रिका शुरू की और उसे निरंतर जारी रखा। श्री चंद्रमोहन भंडारी जी ने भी "परिचय " में अपने अच्छे विचार व्यक्त किए थे जो एक अच्छे लेखक और नार्वे के भारतीय दूतावास में प्रथम सचिव थे जो आजकल संयुक्त अरब अमीरात में राजदूत हैं।श्री कमल नयन बक्शी जी को कौन नहीं जानता वह स्वीडैन और नार्वे में भारतीय राजदूतावास में लगभग दस वर्ष रहे होंगे। अनेक यादें अभी भी ताजा हैं। सचिव अशोक तोमर जी ने दूतावास से "भारत समाचार " शुरू किया था जिसमें मैं हिन्दी में अनुवाद करके समाचार दिया करता था।राजदूत कृष्ण मोहन आनंद जी ने " सपाइल -दर्पण " पत्रिका और "भारतीय -नार्वेजीय सूचना और सांस्कृतिक फोरम " संस्था का आरंभ कराया था। श्री निरुपम सेन और श्री गोपाल कृष्ण गाँधी जी ने इन पत्रिकाओं और भारतीय संस्थाओं को फलने फूलने का अवसर दिया। सचिव पन्त जी ने भी भरपूर सहयोग दिया है। अभी भी नार्वे में हमारा दूतावास बहुत सहयोग करता है जिसकी प्रशंसा मैंने "सरिता" में की है।"परिचय" में मेरे लेखों और संपादकीय लेखों की भारत के कई प्रतिष्ठित पत्रों ने प्रशंसा और चर्चा की थी। १९८३ -८४ पंजाब समस्या के समय हमारी भूमिका स्वागत योग्य थी। धर्मयुग, कादम्बिनी ओर स्वतंत्र भारत ने इस सम्बन्ध में बहुत प्रशंसा की थी। २००७- २००८ में नार्वे से केवल दो साहित्यिक पत्रिकाएं छप रही हैं। "स्पाईल -दर्पण" और "वैश्विका", जैसा ऊपर लिख चुका हूँ । आज इंटरनेट और वेब का जमाना है। सच्चाई अब हम नहीं छिपा पायेंगे। जब केंद्रीय सरकार इंटरनेट से भारतवासियों की सहायता लेगी और विदेशों में भारतीयों को दिए जाने वाले पुरस्कार और सम्मान का पता चलेगा तब- तब सही कदम उठाने में सहायता मिलेगी। जैसे आजतक TV chainal ने असत्य से परदा हटाया है । आप अपने विचार लिखकर सहयोग करें तथा विदेशों में अपने देश का नाम करें। बहुत से लेखकों ने तो यात्रा वृत्तांत और प्रवासी साहित्य पर पुस्तकें भी लिखी। विदेशों में लिखे साहित्य और क्रियाकलापों का सही मूल्यांकन किया जाना चाहिए। विशेषकर जो भारत की प्रतिष्टा को उजागर करने वाले और सृजनात्मक सत्य को प्रगट करने वाले हों।सही समाचार की कमीविदेश में समाचार पत्र भी हमारे देश भारत की अनेक अवसर पर सही तस्वीर नहीं दिखाते। हम लोगों को चाहिए की हम संपादक के नाम पत्र लिखकर भेजें उसमें अपने देश भारत की तरक्की, उसके गौरवमयी कार्यों और उपलब्धियों को लिखकर बताएं और उसे छपाये ।आप मेरे बारे में जानना चाहते हैं, दिल्ली से प्रकाशित "सरिता" मार्च द्वितीय में मेरे बारें में आपको कुछ सूचना मिल जायेगी। मुझे अनेक पत्र मिले। आपका पत्र के लिए बहुत आभारी हूँ ।यह जरूर सोचिये की आपने हिन्दी के लिए क्या किया है और हिन्दी का अधिक से अधिक प्रयोग करके और पुस्तकें खरीद कर उसे उपहार में दीजिये ताकि हम अपनी भाषा हिन्दी का प्रसार और विस्तार में सहयोग दें। धन्यवाद।
-शरद आलोक
वर्ष १९८८ को नार्वे से प्रकाशित होने वाली हिन्दी और नार्वेजीय भाषा की द्विमासिक पत्रिका स्पाइल-दर्पण का शुभारम्भ हुआ था।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन ने एक आत्मकथात्मक, संस्मरणात्मक पुस्तक लिखी थी "क्या भूलूं क्या याद करूँ"। पुस्तक बहुत चर्चित हुई थी। कुछ लेखकों ने कुछ प्रसंगों के सम्बन्ध में लिखा था कि अमुख़ बात सच नहीं । यदि सच थी तो पहले क्यों नहीं लिखा जब घटित हुई थी। फलस्वरूप मेरे मन में विचार जगा क्यों न मैं वह लिखना शुरू करूँ जो मैंने देखा और पाया ताकि भविष्य में मुझे भी लोग यह कह कर नकार न सकें कि मैंने पहले या अभी क्यों नहीं कहा या लिखा।नार्वे में हिन्दी पत्रिका का शुभारम्भ "परिचय" से हुआ था जिसका प्रकाशन १९७८ में शुरू हुआ था।पिछले वर्ष २००७ और २००८ में केवल दो पत्रिकाएं ही छाप रही हैं। ये हैं सपाइल -दर्पण जो २० साल पहले १९८८ में शुरू हुई थी। और दूसरी नयी पत्रिका "वैश्विका " जिसका प्रकाशन २००७ में आरंभ हुआ जिसका लोकार्पण २००७ में न्यूजर्सी, अमरीका में योगऋषि बाबा रामदेव जी के करकमलों द्वारा छठे हिन्दी महोत्सव में सम्पन्न हुआ था जिसकी प्रतियाँ विश्वहिंदी सम्मेलन में विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा, राजदूत रोनेन सेन, संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारे राजदूत निरुपम सेन, निदेशक इन्द्र नाथ चौधरी, पूर्व राजदूत और सांसद लक्ष्मी शंकर सिंघवी और सभी प्रतिनिधियों को भेंट की गयी और सराही गयी थी।हम देश की सेवा, साहित्य की सेवा , अपने और उस समाज की सेवा करते हैं जिसमें हम रहते हैं तो उसे प्रोत्साहित करना चाहिए ?आपके साथ कुछ बातें बाँट रहे हैं। नार्वे में २८ वर्षों में से २५ वर्षों तक हिन्दी पत्रिकाओं "परिचय" और "स्पाइल-दर्पण के माध्यम से निस्वार्थ सेवा करके जो संतोष और जो सुख मिला उसका वर्णन करना मुश्किल है। विदेशों में हमारे भारतीय और अन्य विद्वतजन हिन्दी की सेवा कर रहे हैं ये सुख वही जान सकते हैं।मैं उन सभी लोगों को हार्दिक धन्यवाद देता हूँ जो देश विदेश में हिन्दी, भारत और अपनी संस्कृति का गौरव बढ़ा रहे हैं। मैंने वही किया जो कोई एक संपादक और भारतीय होकर किया जा सकता है। १९८० से १९९० तक का समय विदेशों में हिन्दी पत्रकारिता की स्थापना का समय था। इस समय जब भारत के प्रवासी बाहर परदेश में अपनी जगह बना रहे थे, हिन्दी की पत्रिका शुरू करना कठिन था। मेरे पास का typewriter नही था। फ़िर भी पत्रिका शुरू की और उसे निरंतर जारी रखा। श्री चंद्रमोहन भंडारी जी ने भी "परिचय " में अपने अच्छे विचार व्यक्त किए थे जो एक अच्छे लेखक और नार्वे के भारतीय दूतावास में प्रथम सचिव थे जो आजकल संयुक्त अरब अमीरात में राजदूत हैं।श्री कमल नयन बक्शी जी को कौन नहीं जानता वह स्वीडैन और नार्वे में भारतीय राजदूतावास में लगभग दस वर्ष रहे होंगे। अनेक यादें अभी भी ताजा हैं। सचिव अशोक तोमर जी ने दूतावास से "भारत समाचार " शुरू किया था जिसमें मैं हिन्दी में अनुवाद करके समाचार दिया करता था।राजदूत कृष्ण मोहन आनंद जी ने " सपाइल -दर्पण " पत्रिका और "भारतीय -नार्वेजीय सूचना और सांस्कृतिक फोरम " संस्था का आरंभ कराया था। श्री निरुपम सेन और श्री गोपाल कृष्ण गाँधी जी ने इन पत्रिकाओं और भारतीय संस्थाओं को फलने फूलने का अवसर दिया। सचिव पन्त जी ने भी भरपूर सहयोग दिया है। अभी भी नार्वे में हमारा दूतावास बहुत सहयोग करता है जिसकी प्रशंसा मैंने "सरिता" में की है।"परिचय" में मेरे लेखों और संपादकीय लेखों की भारत के कई प्रतिष्ठित पत्रों ने प्रशंसा और चर्चा की थी। १९८३ -८४ पंजाब समस्या के समय हमारी भूमिका स्वागत योग्य थी। धर्मयुग, कादम्बिनी ओर स्वतंत्र भारत ने इस सम्बन्ध में बहुत प्रशंसा की थी। २००७- २००८ में नार्वे से केवल दो साहित्यिक पत्रिकाएं छप रही हैं। "स्पाईल -दर्पण" और "वैश्विका", जैसा ऊपर लिख चुका हूँ । आज इंटरनेट और वेब का जमाना है। सच्चाई अब हम नहीं छिपा पायेंगे। जब केंद्रीय सरकार इंटरनेट से भारतवासियों की सहायता लेगी और विदेशों में भारतीयों को दिए जाने वाले पुरस्कार और सम्मान का पता चलेगा तब- तब सही कदम उठाने में सहायता मिलेगी। जैसे आजतक TV chainal ने असत्य से परदा हटाया है । आप अपने विचार लिखकर सहयोग करें तथा विदेशों में अपने देश का नाम करें। बहुत से लेखकों ने तो यात्रा वृत्तांत और प्रवासी साहित्य पर पुस्तकें भी लिखी। विदेशों में लिखे साहित्य और क्रियाकलापों का सही मूल्यांकन किया जाना चाहिए। विशेषकर जो भारत की प्रतिष्टा को उजागर करने वाले और सृजनात्मक सत्य को प्रगट करने वाले हों।सही समाचार की कमीविदेश में समाचार पत्र भी हमारे देश भारत की अनेक अवसर पर सही तस्वीर नहीं दिखाते। हम लोगों को चाहिए की हम संपादक के नाम पत्र लिखकर भेजें उसमें अपने देश भारत की तरक्की, उसके गौरवमयी कार्यों और उपलब्धियों को लिखकर बताएं और उसे छपाये ।आप मेरे बारे में जानना चाहते हैं, दिल्ली से प्रकाशित "सरिता" मार्च द्वितीय में मेरे बारें में आपको कुछ सूचना मिल जायेगी। मुझे अनेक पत्र मिले। आपका पत्र के लिए बहुत आभारी हूँ ।यह जरूर सोचिये की आपने हिन्दी के लिए क्या किया है और हिन्दी का अधिक से अधिक प्रयोग करके और पुस्तकें खरीद कर उसे उपहार में दीजिये ताकि हम अपनी भाषा हिन्दी का प्रसार और विस्तार में सहयोग दें। धन्यवाद।
-शरद आलोक
गुरुवार, 5 जून 2008
विश्व पर्यावरण दिवस पर बच्चों ने किया मार्च
आज ५ जून को पूरे विश्व में में पर्यावरण दिवस मनाया गया
आज पूरी दुनिया में पर्यावरण दिवस मनाया गया। नार्वे की राजधानी ओस्लो में ३००० बच्चों ने जुलूस निकाला और नार्वे के पर्यावरण और विदेश सहायता मंत्री एरिक सूलहाइम को पर्यावरण को लिए सलाह दी। बच्चों ने निर्णय लिया और इन ३००० बच्चों को पर्यावरण एजेंट बनाया गाया। बच्चों ने निर्णय लिया की वे कूढा फेकते समय शीशा, कागज, प्लास्टिक, लोहा और करकट अलग-अलग करके फेकेंगे ताकि पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सके। इस अवसर पर सोशलिस्ट पार्टी की ओस्लो शाखा ने पर्यावरण दिवस पर लोगों से निवेदन किया की लोग अधिक से अधिक रेल, ट्राम, साईकिल, रेल आदि का प्रयोग करें तथा पर्चे बांटे।
- शरद आलोक
आज पूरी दुनिया में पर्यावरण दिवस मनाया गया। नार्वे की राजधानी ओस्लो में ३००० बच्चों ने जुलूस निकाला और नार्वे के पर्यावरण और विदेश सहायता मंत्री एरिक सूलहाइम को पर्यावरण को लिए सलाह दी। बच्चों ने निर्णय लिया और इन ३००० बच्चों को पर्यावरण एजेंट बनाया गाया। बच्चों ने निर्णय लिया की वे कूढा फेकते समय शीशा, कागज, प्लास्टिक, लोहा और करकट अलग-अलग करके फेकेंगे ताकि पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सके। इस अवसर पर सोशलिस्ट पार्टी की ओस्लो शाखा ने पर्यावरण दिवस पर लोगों से निवेदन किया की लोग अधिक से अधिक रेल, ट्राम, साईकिल, रेल आदि का प्रयोग करें तथा पर्चे बांटे।
- शरद आलोक
शनिवार, 31 मई 2008
ओस्लो स्थित गुरुद्वारे में दोबारा चुनाव १५ जून को
परदेश में हम अपनी परम्परा मनाने लगे है:
भारत में जहाँ हम बच्चों के जन्मदिन होटलों- रेस्तरां में मनाने लगे हैं। मैंने देखा, कि लोग विदेशों में अपने तीज त्योहारों और जन्मदिन-समारोह आदि को भारतीय परम्पराओं के अनुसार मनाने में विश्वास करते हैं जो इस बात का सबूत है कि भारत के बाहर भी भारतीय लोग अपने आप को अपनी परम्पराओं के अनुरूप ढालने लगे हैं। इसीलिए कोई अपना जन्मदिन मन्दिर में मनाता है और कोई इस अवसर पर अपनी प्रार्थना-अरदास गुरुद्वारे में कराता है । जो लोग सामाजिक रूप से ज्यादा सक्रिय हैं वे अनेक अवसरों पर अपने घरों पर साहित्यिक कार्यक्रम कराते हैं। अपने अलावा लेखकों और ऋषि मुनियों का जन्मदिन मनाते हैं। अपने शहीदों को याद करते हैं जो इस बात का उदाहरण हैं की हम अपनी संस्कृति को अपने बच्चों के द्वारा भविष्य के लिए सुरक्षित रख रहे हैं। हमको संकीर्ण विचारधारा का नहीं होना चाहिए। जिस भी देश में रहते हैं, उसके विकास के बारे में सोचना तो जरूर चाहिए लेकिन अपने मूल देश की संस्कृति , समाज, समारोह व परम्पराओं को कभी नहीं भूलना चाहिए। मैं इस सन्दर्भ में ऐसे लोगों को बधाई देता हूँ जो अपनी संस्कृति और उदार परम्परा को अपनाते हैं।
ओस्लो स्थित गुरुद्वारे में दोबारा चुनाव १५ जून को:
ओस्लो में स्थित श्री गुरुनानक देव जी गुरुद्वारे में १५ जून को दोबारा चुनाव हो रहे हैं। इसमें कई लोग बहुत सक्रिय थे जिसमें एक महिला प्रबंध समिति में मंत्री चुनी गयीं जिनका नाम रणजीत कौर है, उनकी वाणी ने बहुतों का दिल जीत लिया । वे सभी को आदर से बुलाती थीं कोई भेदभाव नहीं रखती थीं। वह पहली महिला मंत्री बनी थीं जिन्हें हमेशा उनके संचालन के लिए याद किया जायेगा। गुरुद्वारा की प्रबंधक समिति भंग कर दी गयी है पूरी कार्यकारिणी ने अपना स्तीफा दे दिया था, जो अपना पूरा साल भी नहीं पूरा कर पायी। इसने केवल पाँच महीने ही पूरे किए जबकि इसे दो साल के लिए चुना था।
अब नए चुनाव १५ जून २००८ को होंगे।-
- शरद आलोक
भारत में जहाँ हम बच्चों के जन्मदिन होटलों- रेस्तरां में मनाने लगे हैं। मैंने देखा, कि लोग विदेशों में अपने तीज त्योहारों और जन्मदिन-समारोह आदि को भारतीय परम्पराओं के अनुसार मनाने में विश्वास करते हैं जो इस बात का सबूत है कि भारत के बाहर भी भारतीय लोग अपने आप को अपनी परम्पराओं के अनुरूप ढालने लगे हैं। इसीलिए कोई अपना जन्मदिन मन्दिर में मनाता है और कोई इस अवसर पर अपनी प्रार्थना-अरदास गुरुद्वारे में कराता है । जो लोग सामाजिक रूप से ज्यादा सक्रिय हैं वे अनेक अवसरों पर अपने घरों पर साहित्यिक कार्यक्रम कराते हैं। अपने अलावा लेखकों और ऋषि मुनियों का जन्मदिन मनाते हैं। अपने शहीदों को याद करते हैं जो इस बात का उदाहरण हैं की हम अपनी संस्कृति को अपने बच्चों के द्वारा भविष्य के लिए सुरक्षित रख रहे हैं। हमको संकीर्ण विचारधारा का नहीं होना चाहिए। जिस भी देश में रहते हैं, उसके विकास के बारे में सोचना तो जरूर चाहिए लेकिन अपने मूल देश की संस्कृति , समाज, समारोह व परम्पराओं को कभी नहीं भूलना चाहिए। मैं इस सन्दर्भ में ऐसे लोगों को बधाई देता हूँ जो अपनी संस्कृति और उदार परम्परा को अपनाते हैं।
ओस्लो स्थित गुरुद्वारे में दोबारा चुनाव १५ जून को:
ओस्लो में स्थित श्री गुरुनानक देव जी गुरुद्वारे में १५ जून को दोबारा चुनाव हो रहे हैं। इसमें कई लोग बहुत सक्रिय थे जिसमें एक महिला प्रबंध समिति में मंत्री चुनी गयीं जिनका नाम रणजीत कौर है, उनकी वाणी ने बहुतों का दिल जीत लिया । वे सभी को आदर से बुलाती थीं कोई भेदभाव नहीं रखती थीं। वह पहली महिला मंत्री बनी थीं जिन्हें हमेशा उनके संचालन के लिए याद किया जायेगा। गुरुद्वारा की प्रबंधक समिति भंग कर दी गयी है पूरी कार्यकारिणी ने अपना स्तीफा दे दिया था, जो अपना पूरा साल भी नहीं पूरा कर पायी। इसने केवल पाँच महीने ही पूरे किए जबकि इसे दो साल के लिए चुना था।
अब नए चुनाव १५ जून २००८ को होंगे।-
- शरद आलोक
नेहरू चाचा की पुण्य तिथि पर श्रधांजलि
नेहरू चाचा की पुण्य तिथि पर श्रधांजलि
चाचा नेहरू का जन्मदिन १४ नवम्बर १९८९ को इलाहाबाद में हुआ था। पूरे विश्व में उनकी पुण्य तिथि २७ मई २००८ को श्रधांजलि देकर याद किया गया। नार्वे में हमने बच्चों को एक गोष्टी में उनकी जीवनी सुनाई। वह भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। २७ मई १९६४ को जवाहर लाल नेहरू जी की मृत्यु हुई थी। इस पुण्य दिन उनकी याद करते हैं। देश में उनकी समाधि पर सोनिया गाँधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और बहुत से नेताओं और बुद्धिजीवियों ने पुष्प चढाये। शान्ति के पुजारी, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का नाम सभी ने सुना होगा। वे बच्चों को बहुत प्यार करते थे। उनका जन्मदिन बाल दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। जब इनकी मृत्यु २७ मई १९६४ को हुई थी उस समय मैं सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश में अपने अपने दादा के पास गया था जो अवकाश प्राप्त करने के बाद भी आरामशीन लगा कर काम कर रहे थे। नेहरू जी की मृत्यु पर बाजार बंद कर दिए गए थे। नेहरू जी को हम श्रधांजलि अर्पित करते हैं। मेरे दादा मन्ना लाल शुक्ल जी को भी बहुत दुःख पहुँचा था जबकि वे समाजवादी विचारधारा के थे।
- शरद आलोक
चाचा नेहरू का जन्मदिन १४ नवम्बर १९८९ को इलाहाबाद में हुआ था। पूरे विश्व में उनकी पुण्य तिथि २७ मई २००८ को श्रधांजलि देकर याद किया गया। नार्वे में हमने बच्चों को एक गोष्टी में उनकी जीवनी सुनाई। वह भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। २७ मई १९६४ को जवाहर लाल नेहरू जी की मृत्यु हुई थी। इस पुण्य दिन उनकी याद करते हैं। देश में उनकी समाधि पर सोनिया गाँधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और बहुत से नेताओं और बुद्धिजीवियों ने पुष्प चढाये। शान्ति के पुजारी, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का नाम सभी ने सुना होगा। वे बच्चों को बहुत प्यार करते थे। उनका जन्मदिन बाल दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। जब इनकी मृत्यु २७ मई १९६४ को हुई थी उस समय मैं सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश में अपने अपने दादा के पास गया था जो अवकाश प्राप्त करने के बाद भी आरामशीन लगा कर काम कर रहे थे। नेहरू जी की मृत्यु पर बाजार बंद कर दिए गए थे। नेहरू जी को हम श्रधांजलि अर्पित करते हैं। मेरे दादा मन्ना लाल शुक्ल जी को भी बहुत दुःख पहुँचा था जबकि वे समाजवादी विचारधारा के थे।
- शरद आलोक
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