शनिवार, 4 मई 2013

भारत में शिक्षा और चिकित्सा सभी के लिए एक जैसी हो-सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' Suresh Chandra Shukla

भारत में शिक्षा और चिकित्सा सभी के लिए एक जैसी हो और अमीरों से अधिक टैक्स /कर लिया जाये और भ्रष्टाचार की ज़रा सी भी गुंजाइश न हो -

सुरेशचन्द्र  शुक्ल 'शरद आलोक' , ओस्लो, नार्वे  (01.05.13)
 
   Torstein Winger थूरस्ताइन विन्गेर


Prof Per Fugli   प्रो पेर फ्यूग्ली स्पाइल-दर्पण की प्रति संपादक सुरेशचंद्र शुक्ल Suresh Chandra Shukla से प्राप्त करते हुए 


पहली मई को क्रिस्तियानिया होटल, ओस्लो में एक जनसभा हुई, ठीक पहली मई के परम्परात्मक मार्च के बाद।  प्रो.  पेर फूगली मुख्य वक्ता थे।  इस बार 30.000 (तीस हजार ) लोगों ने जुलुस में सम्मिलित होकर श्रमिक दिवस मनाया। लाल झंडों, बैनरों जिसमें श्रमिकों के नारे लिखे थे साथ ही अनेक प्रसिद्ध बैंड, श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधिगण  उपस्थित थे।  मेरे साथ इस बार मेरे साथ क्षेत्र के पूर्व स्थानीय मेयर थूरस्ताइन  विन्गेर थे। मैं भी नार्वेजीय लेबर पार्टी के स्थानीय इकाई में चयन समिति का सदस्य हूँ, नार्वे में पत्रकार और  गत 25 वर्षों से प्रकाशित हिन्दी और नार्वेजीय पत्रिका 'स्पाइल-दर्पण' का संपादक हूँ। 
थूरस्ताइन  विन्गेर के साथ मैंने  सामूहिक भोजन किया।  सभी लोगों ने काफी समय एक पंक्ति में पंक्तिबद्ध होकर  भोजन खरीदा।  एक बहुत बूढ़े नेता ने कहा कि लेनिनग्राद की याद आ गयी वहां बहुत देर लगी थी और सभी एक पंक्ति में लगकर भोजन प्राप्त करते थे।
 पेर फूगली सोशल मेडिसिन  के प्रोफ़ेसर रह चुके हैं उन्होंने जीवन, समाज, मानवीय मूल्य, सुरक्षा, पूंजीवाद और सोशल डेमोक्रेटिक मूल्यों पर चर्चा की। यैसे वक्ताओं के वक्तव्य काश भारत के हमारे नेताओं ने सुनकर उसे गृहण  किया  होता तो भारत में गरीबी कम होती, विकास अधिक होता, मानवीय मूल्यों को पूंजीवाद की जगह स्थान मिलता।  भ्रष्टाचार कम हो सकता था और कोआपरेटिव द्वारा श्रमिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का  ध्यान दिया  जाता और गरीबों  तथा अमीरों के मध्य आर्थिक और वैचारिक अंतर कम होता। तब राजनीति से जुडा कोई भी व्यक्ति स्वयं और अपने परिवार के सदस्य को पूंजीपति बनाने की बात न सोंचता अपितु कोआपरेटिव भाव से श्रमिक संगठनों और कामगरों द्वारा संचालित और सोशल डेमोक्रेटिक राजनैतिक
ढाँचे को मजबूत करने में मदद मिलती। 
इसी के साथ भारत की अभी तक की सभी सरकारें जिन्होंने टैक्स /कर के लिए मजबूत पैमाना तैयार नहीं किया।  लोगों को टैक्स देने के लिए जागरूक नहीं किया।  कर का सीधे गरीब, श्रमिकों के साथ सभी को सुविधाओं और आधारभूत अधिकार नहीं मिले।
एक भारतीय नेता ने ओस्लो नार्वे में अपने भाषण में कहा था कहा था,  
"आये दिन निजी /प्राइवेट संस्थाओं और पूंजीपतियों को अस्पताल, स्कूल और बचत बैंक का अधिकार देकर मनमानी लूट की छूट दे दी है जिससे बहुत से गरीबों को बेइलाज रहना पड़ रहा है।" 
चिकित्सा और शिक्षा में सामान सुविधा और एक जैसी सुविधा सभी को होनी चाहिए।  जैसा की नार्वे में है।  जो जितना कमाए उसे उतना अधिक कर भी देना चाहिए। शासन ऐसा हो भ्रष्टाचार की गुंजाइश ही नहीं हो।
मैंने 01.05.13 मई के इण्डिया टुडे में पढ़ा है जिसमें 50 ताकतवर लोगों में पूंजीपतियों को दिखाया गया है जो लोगों को बहकाने वाली और पूंजीपतियों को आवश्यकता से अधिक इज्जत देने की कोशिश की गयी है।  इससे अच्छा होता की अपनी सांस्कृतिक धरोहर लोकगीत,  लोक नाटक,  हस्तकला, भाषा, संगीत  और वास्तुकला  आदि को सुरक्षित रखने और उसका प्रचार करने में लगे लोगों के बारे में लिखकर कहा जाता कि इन्हें प्रोत्साहित करने और लुप्त होने के लिए बचाने में कार्य करने वाले लोगों की प्रशंसा  की जाती।  कहा जाता है कि भारत और गरीब देशों में  अच्छे टैक्स सिस्टम के अभाव में और जो है उसका दुरूपयोग,  और राजनैतिक भर्ष्टाचार के कारण देश को सही कर नहीं मिल पाता।
काश देश की बड़ी पत्रिकाएं कभी यह भी छापें कि 100 देश के सबसे अमीरों के दादा के पा क्या 50 वर्ष पहले वाजिब जूते थे? इसका पता पत्रिकाएं अपने श्रोत से पता लगाती तो कुछ रहस्य जरूर खुलते?
आइये श्रमिक दिवस पर  हम शपथ लें कि गरीब देशों और भारत में अपना तन -मन -धन लगायेंगे।  जिस देश में भी रह रहे हैं वहां ईमानदार होकर कार्य करेंगे  और टैक्स देंगे तथा राजनीति  में सक्रिय हिस्सा लेंगे ताकि अपनी भाषा और संस्कृति के लिए भी कार्य किया जा सके।  राजनीतिज्ञों की राजनैतिक शिक्षा आज के समय के अनुसार नहीं होने का कारण, और ईच्छाशक्ति की कमी के कारण  देश की योजनाओं को दीर्घजीवी नहीं बनाया जा सक रहा है।  असमान वितरण और अधिक नौकरियों की कमी भी कोआपरेटिव प्रोजेक्टों की कमी/अनदेखी करना भी बड़ा कारन है।
कोआपरेटिव किसी प्राइवेट मालिक द्वारा संचालित करना ठीक नहीं है इसे जब चाहे पूंजीपति किसी को बेच सकता है।  जनता का कोआपरेटिव जिसमें उसे प्रतिनिधित्व से लेकर संचालन करने का अधिकार हो तभी देश विशेषकर गरीब देशों के पक्ष में और उन्हें नौकरी के बहुत अधिक अवसर दिए जा सकते हैं, कामगार कर देकर उसे मजबूत बना सकते है।
अनेक आर्थिक एक्सपर्ट/विशेषज्ञों का कहना है कि गरीब देशों  में प्रति वर्ष 15 हजार रूपये वर्ष  कमाई पर टैक्स होना चाहिये।  इससे पूरे देश में निशुल्क और एक जैसी शिक्षा मिल सकेगी। आज गरीब देशों में सभी को स्कूली शिक्षा नहीं मिल पाती कारण जो भी हो, सरकारी स्कूलों में पढाई पर प्रश्नचिन्ह लगाए जाते हैं। भ्रष्टाचार बहुत आसान है।  निजी भाषा में शिक्षा न मिलने के कारण हम उचित और अधिक संख्या में स्किल्ड वर्कर नहीं पैदा कर पा रहे हैं।  निजी संस्थान इतनी फीस लेते हैं की गरीब के लिए प्रवेश लेना नामुमकिन है।    
काम  देने  वाले को भी टैक्स और मजदूर के पेंशन की कटौती करके देश का धन बढाया जाना चाहिये। लेखक को भारत के टैक्स सिस्टम की जानकारी नहीं है। पर यह पता है कि  अमीर और गरीब में तेजी से अंतर और दूरी बढ़ रही है जो देश की अर्थ व्यवस्था और के लिए अच्छा नहीं है।  

                                              - सुरेशचन्द्र  शुक्ल 'शरद आलोक' , ओस्लो, नार्वे  (01.05.13)
 

बुधवार, 1 मई 2013

स्पाइल-दर्पण पत्रिका 25 वर्ष, हाइकी होलमोस संपादक सुरेशचन्द्र शुक्ल से स्पाइल- दर्पण की प्रति प्राप्त करते हुए


 बायें से माया भारती, बलविंदर कौर हाइकी होलमोस संपादक सुरेशचन्द्र शुक्ल से स्पाइल- दर्पण की प्रति प्राप्त  करते हुए और पीची खडीं हैं वासुकी जयपालन 

परसों 29 अप्रैल को मेरे घर के पीछे स्थित वाइतवेत  सेंटर और यूथ क्लब में नार्वे के  विदेश विकास मंत्री हाइकी होलमोस आये और अपना वक्तव्य दिया तथा लोगों की समस्याओं को सुना। भारतीय-सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम द्वारा लिटरेचर हाउस ओस्लो में आयोजित   भारत-नार्वे लेखक सेमीनार में हाइकी होलमोस भी भाग ले चुके हैं जिसमें भाग लेने भारत से प्रो निर्मला  एस मौर्य, डा रामाश्रय सविता और प्रो योगेन्द्र प्रताप सिंह आये थे।
 इस साल स्पाइल-दर्पण पत्रिका अपने 25  वर्ष पूरे कर रही हैं।  इस अवसर पर मैंने
नार्वे के  विदेश विकास मंत्री हाइकी होलमोस को अपनी पत्रिका स्पाइल-दर्पण पत्रिका की प्रति भेंट की।  मेरे साथ पंजाबी स्कूल की प्रधानाचार्य बलविंदर कौर, माया भारती और वासुकी जयपालन थीं। इसी वाइतवेत  सेंटर में मैंने उनके लिए दो बैठकें आयोजित की थीं।
आज एक मई, अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस है,
आप सभी को अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस पर हार्दिक बधाई।
एक मई, अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस यहाँ ओस्लो, नार्वे  में धूमधाम से मनाया जाता है।

 दुनिया के मजदूर धन्य हैं 

- सुरेशचन्द्र शुक्ल 

 सर पर ढो रहे ईंट - गारा
निर्माण को दे रहे आयाम
भवनों-कर कारखानों का
श्रमजीवी कर रहे निर्माण।   

श्रमिक दिवस मुबारक श्रमवीर,
दूर नहीं दुनिया की शिक्षा,
जब होंगे तुम्हारे हाथों  में
क्रेन, मशीन और ढेर काम।।  




हमें गर्व है भारतीय मजदूरों पर,
जिन्दगी को दे रहे अर्थ
विकास को गति
ढो रहे ईंटों को अपने सर पर।

अपने शरीर को होम करके
बन रहे समाज की प्रगति के वाहक
बढ़ा रहे हौंसला मालिकों का
मशीनी प्रगति को कर गए चित्त

दिखा रहे अपने घर के उद्योगपतियों को रास्ता
जो अपने समाज का धन लगा रहे विदेशों में
मशीनी पुर्जों में
भर रहे धन अपने एकाउंट में
अपने घर में कर नहीं देते
विदेशों में निवेश कर देकर
बना रहे अपने अड्डे
क्या ये मजदूर भी कभी
उन उद्योगपतियों के साथ देश-विदेश घूमकर
करेंगे समाज के धन में और बढ़ोत्तरी!
हाँ जरूर करेंगे,
जब हम नहीं सोयेगें
और इन मजदूरों को पहले साक्षर
फिर स्किल्ड  कारीगर बनायेंगे
और दुनिया में सबसे अधिक मजदूरी करके
श्रमवीर कहलायेंगे
अपने देश में तो प्रगति के साथ-साथ
दूसरे गरीब-अमीर मुल्कों में
सच्चा लोकतंत्र-रामराज्य लायेंगे।
                                                                     (ओस्लो, 01.05.13) 

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

Verdens bokdag 2013 / विश्व पुस्तक दिवस 2013

Verdens bokdag ble feiret på forsudd av Indisk-Norsk Informasjons -og Kulturforum
 på fredag  den 19. april 2013 på Stikk innom på Veitvetsenter i Oslo.




विश्व पुस्तक दिवस 23 अप्रैल को मनाया जाता है, परन्तु भारतीय -नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम द्वारा चार दिन पूर्व ही विश्व पुस्तक दिवस 19  अप्रैल 2013 को  शाम छ: बजे 18:00  वाइतवेत सेन्टर, ओस्लो में मनाया गया।  इस कार्यक्रम में व्याख्यान, कविता और गीत संगीत का कार्यक्रम संपन्न हुआ।

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

लेखक गोष्ठी Forfatterkafe

Forfatterkafe

Den 19. april 2013 - kl 18:00
På Stikk Innom på Veitveitsenter, Oslo
Verdens bokdag blir markert på forskudd av indisk-norsk informasjons- og kulturforum.
Det blir opplesning av dikt og noveller på denne "stikk-innom" på Veitvetsenteret.

For mer informasjon ta kontakt på tlf. 90 07 03 18 eller på epost: speil.nett@gmail.com

लेखक गोष्ठी

आप सादर आमंत्रित हैं।
19 अप्रैल 2013 को शाम छ:बजे 18:00
Stikk Innom, Veitvetsenter में
(विश्व पुस्तक दिवस 23 अप्रैल को होता है पर हम पूर्व ही
शुक्रवार 19 अप्रैल 2013 को  शाम छ:बजे 18:00 मना रहे हैं।) 
भवदीय
भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम
Indisk-Norsk Informasjons -og Kulturforum
Postboks 31, Veitvet, 0518 Oslo

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

Lech Wałęsa लेक वालेसा

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता पोलैंड के लेक वालेसा Lech Wałęsa  और हन्ना क्वामू के साथ सुरेशचन्द्र शुक्ल नोबेल समारोह, ओस्लो में














På bilde fra venstre er Lech Wałęsa, sønnen til Elie Wiesel, Hanna Kvanmo og Suresh Chandra Shukla

 Lech Wałęsa og Suresh Chandra Shukla i Oslo

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

शरद आलोक साहित्य गौरव सम्मान

शरद आलोक  का वक्तव्य साहित्य गौरव सम्मान प्राप्त करने पर 




नार्वे के लेखक सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' को राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान द्वारा साहित्य गौरव सम्मान से पुरस्कृत किया गया था, परन्तु  'शरद आलोक' सम्मान लेने नहीं आ सके थे, अतः ३० मार्च को विधान सभा के साहित्य संस्थान के सभागार में एक गोष्ठी में उनका वक्तव्य हुआ। उन्होंने कहा कि चूँकि वह लखनऊ में  पले और बड़े हुए इसलिए उस नगर और प्रदेश के लोगों ने सम्मानित किया वह ह्रदय छू लेने वाली बात है।  उन्होंने आगे कहा कि हमको अपनी भाषा हिंदी पर गर्व करना चाहिये और इस गलतफहमी से दूर रहना चाहिए कि अंग्रेजी बोलने वालों को नौकरी मिलती है।  उन्होंने कहा कि यदि तकनीकी शिक्षा हिन्दी में दी जाये और उसके शैक्षिक संस्थान और स्कूल अधिक संख्या में खोले जाएँ तो भारत में हम कुशल कारीगर (स्किल्ड और सेमी स्किल्ड) बड़ी तादात में बढ़ा सकते है। तब हम विश्व के सबसे बड़े हार्डवेयर उत्पादकों में सम्मिलित हो सकते हैं। चीन हमसे पांच गुना ज्यादा कंप्यूटर और हार्डवेयर का उत्पादन करता है क्योंकि वहां इसकी शिक्षा चीनी  भाषा  में होती है।  उन्होंने यह भी कहा कि जो युवा अंग्रेजी माध्यम से निजी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं वे नगर और प्रदेश के युवा और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों से कटे हैं क्योंकि उनके स्कूल, कालेज और संस्थान भी नगर और प्रदेश के सांस्कृतिक और राजनैतिक गतिविधियों से कटे हैं जो मेरी दृष्टि में दुर्भाग्य की बात है।  आपस में मिलना जुलना और नगर और प्रदेश की गतिविधियों में सभी के न जुड़ने के कारण कुछ लोग ही वहां के विकास में अपना योगदान दे सकेंगे और दूसरे  अछूते रह जायेंगे।  अफ्रीका में अंग्रेजी जानने वालों की संख्या बहुत है पर उनको नौकरियां मिलने में अंग्रेजी सहायक नहीं होती है। दक्षिण अफ्रीका इसका बहुत बड़ा उदाहरण है। 

लखनऊ में लेखन नाट्य रूपांतर संगोष्ठी

लेखन नाट्य  रूपांतर संगोष्ठी 

नार्वे की हिंदी पत्रिका स्पाइल-दर्पण द्वारा लखनऊ में संगोष्ठी आयोजित

२५ मार्च २०१३, उमानाथ रायबली प्रेक्षागृह (जयशंकर सभागार), कैसरबाग, लखनऊ में होली की पूर्व संध्या पर स्पाइल-दर्पण पत्रिका द्वारा लखनऊ के रंगकर्मियों के साथ संगोष्ठी आयोजित की गयी।
जिसमें फिल्माचार्य आनंद शर्मा, रंगकर्मी ज्ञानी, लखनऊ विश्व विद्यालय के प्रो योगेन्द्र प्रताप सिंह,  डॉ कृष्णा जी श्रीवास्तव  और स्पाइल-दर्पण के सम्पादक सुरेशचन्द्र शुक्ल ने संबोधित किया। यहाँ लखनऊ रंगकर्मियों के संग हुए इस संगोष्ठी में लखनऊ के रंगकर्मियों के विदेश में रंगकर्मियों के साथ जोड़ने और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर चर्चा की गयी। साहित्यिक कृतियों पर नाटक और लघु फिल्मों के निर्माण पर जोर दिया गया और कुछ लघु फ़िल्में भी प्रदर्शित की गयीं जो साहित्यिक कहानियों पर आधारित थीं।  फिल्माचार्य आनंद शर्मा ने लखनऊ के थिएटर के लिए अच्छी कहानियों और नाटकों के लेखन की आवश्यकता पर बल दिया। ज्ञानी जी ने घोषणा की की वह कहानी 'अंतर्मन के रास्ते' पर आधारित एक नाटक का मंचन करेंगे।
उपस्थित लेखकों और रंगकर्मियों ने अपने विचार रखे।