रविवार, 24 नवंबर 2013

स्पाइल-दर्पण (विदेशों में हिंदी पत्रकारिता में मिसाल) की रजत जयन्ती पर -Suresh Chandra Shukla

Speil fyller 25 år. Jeg deler et dikt om denne anledningen på hindi.
स्पाइल-दर्पण (विदेशों में हिंदी पत्रकारिता में मिसाल) की रजत जयन्ती पर
सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

ऐश और आराम के खातिर कितने जीते हैं,
मस्ती भरे क्षणों में मधुरस, कितने पीते हैं
अपनी भाषा बिना यहाँ हम कितने रीते हैं
भाषायी संवाद बढ़े, हम रचनाएं सीते हैं.

विदेश में हिंदी को हम घर-घर पहुंचाते है
विदेशों में मातृभाषा की हम यह शिक्षा देते हैं.
अपने धन से सीच रहे पत्रकारिता की क्यारी,
हिंदी पर मरने वालों पर हम भी मरते हैं.

भाषा और साहित्य को घर-घर पहुंचाना है,
अपनी बातों को समाज में हर पल पहुँचाना है,
कभी घटे न संवाद पीढ़ियों का शरद आलोक!
देश-विदेश में हिंदी का परचम लहराना है.

स्पाइल-दर्पण की आज रजत जयन्ती है,
कविता और कहानी से खूब अपनी छनती है,
खुद भी पढ़े और बच्चों को हिंदी रोज पढ़ायें.
दुतकारो या प्यार करो मेरी सबसे बनती है.

रजत जयन्ती वर्ष कह रहा हिंदी फ़ैल रही
मिशन भाव हिंदी शिक्षा से भाषा बेल बड़ी.
स्पाइल-दर्पण से कितने रसाले 25 वर्ष हुए?
कविता-कहानी के विकास का युग ले आये.
जिसने भी सहयोग दिया उसको नमन करूं।

शनिवार, 23 नवंबर 2013

नार्वे से हिंदी पत्रिका स्पाइल -दर्पण - Suresh Chandra Shukla

नार्वे में हिंदी पत्रिका स्पाइल ने  रजत जयन्ती मनाई




ओस्लो, 23 नवम्बर। स्पाइल-दर्पण के पच्चीस वर्ष पूरे होने पर ओस्लो में रजत जयन्ती मनाई गयी.

शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

 अपने में मस्त  अभिमन्यु अनथ को बहुत बधायी - शुभकामनायें

 

 अपने में मस्त रहने वाले लेखक हैं अभिमन्यु अनथ. चाहे वह १९ ९३ में मारीशस की अपनी धरती पर  या वह लन्दन, यू के में सम्पन्न संपन्न विश्व हिन्दी सम्मलेन हो. 

विश्व हिंदी पत्रिका- दीप्ति गुप्ता के ई-पत्र से  समाचार प्राप्त  कर अति प्रसन्नता हुई कि मारीशस के मशहूर साहित्यकार साथी अभिमन्यु अनत को भारत में साहित्य अकादमी द्वारा मानद महत्तर सदस्यता का सर्वोच्च सम्मान दिया गया है जो इसके लिए सम्माननीय पात्र हैं.

महान मारीशस की भूमि सदा ही हिन्दी के लिए उर्वरा रही है और महात्मा गांधी संस्थान, मोका और वसंत इसके अनेक उदाहरणों में से एक है. आगे चलकर कुछ वर्षों से विश्व हिन्दी सचिवालय ने भी हिन्दी के लिए अनेक उपक्रम कर रही हैं.  जो लोग मारीशस गए हैं या जो मारीशस के हिन्दी प्रेमियों से मिले हैं वे जानते हैं कि मारीशस के संस्कृतिकर्मियों और राजनीतिज्ञों में हिन्दी और भारत के प्रति सम्मान है हम भारतीय लोग भी मारीशस को बहुत सम्मान से देखते हैं.  श्री राजनारायण गति जी, मुकेश्वर चुन्नी जी, भी अभिमन्यु जी की तरह अनेको कार्यक्रमों में मिले हैं और पूरी सहानभूति और स्नेह दिया है. सरिता बुधू को भी भूलना आसान नहीं है. जगदीश  गोबर्धन भी भाषा को लेकर गतिशील रहते हैं. 

भारत से बाहर रहकर विदेशी जमीन पर बैठकर हिन्दी में साहित्य सृजन हिन्दी और  में करना सराहनीय और नयी चुनौतियों से भरा है. पर नार्वे में हमको वह स्थिति और वातावरण नहीं मिला फिर भी हिन्दी साहित्य के सृजन के साथ-साथ हिन्दी की शिक्षा देकर नयी पीढी को हिन्दी से अवगत कराना तथा पत्रिकाएं निकाल कर उसमें सभी हिन्दी और नार्वेजीय भाषियों को जोड़ना उन्हें अभिव्यक्ति देना कुछ हमारी निजी गतिविधियों में से है. नार्वे में हमारी पत्रिका स्पाइल-दर्पण इस वर्ष अपने २५ वर्ष पूरे कर रही है तब और भी सुखद लगता है कि भारत के बाहर हिन्दी की सेवा में लगे रहना कितना सुखकर मिशन है. 
सन १९९० में जब मैंने एक अंतर्राष्ट्रीय समारोह में भाग लिया था तब राजेन्द्र अवस्थी के पुत्र और वर्तमान में आथर्स गिल्ड आफ इंडिया के महामंत्री शिव शंकर अवस्थी के साथ उनके मारीशस में स्थित निवास पर  गया था.  राजेन्द्र  अवस्थी जी वहां पहले से उपस्थित थे.  साथ-साथ भोजन भी किया और विचार-विमर्श भी हुआ था. उनके आँगन में बागीचे में कुछ चित्र भी खींचे गये. एक चित्र उर्दू की पत्रिका 'बाजगश्त'  में सन १९९० में छपा था उसी पत्रिका में जैनेद्र कुमार के साथ लिया गया चित्र भी सन १९८५ में छपा था जिसमें मैं और ऐनक लगाए जैनेन्द्र जी कोकाकोला साथ पी रहे थे. अभिमन्यु अनत से अनेक साहित्यिक समारोहों में मिला जिसमें लन्दन में हुए सन १९९९ में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन और एक वर्ष पूर्व फोन पर मुम्बई में फोन पर कपिल कविराय के निवास पर फोन से बात हुई थी.
अपने मित्र अभिमन्यु अनत और साहित्य अकादमी को बहुत बधायी-शुभकामनायें और धन्यवाद देता हूँ उनके सहयोग और योगदान के लिए.  शेष आगामी ब्लाक में पढ़िये। 
सुरेशचन्द्र शुक्ल ´शरद आलोक´
सम्पादक, स्पाइल-दर्पण
POSTBOX 31, VEITVET
0518- OSLO
NORWAY

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

डायरी 06-10-13, Oslo

मुझे अपनी डायरी लिखनी चाहिये। 

मुझे आलोचक और प्रेमचंद पर विशद साहित्य लिखने वाले कमल किशोर गोयनका जी ने कहा था की मुझे अपनी डायरी लिखनी चाहिये।  अतः जो कुछ स्मरण है और चाह रहा हूँ लिख रहा हूँ. 
कल शनिवार था, ५ अक्टूबर २०१३, ओस्लो में मौसम बहुत खूबसूरत था. दिन सामान्य था कवितामय था तो एक विवाहोत्सव में जाना था.
मेरे घर के पीछे मित्रो स्टेशन वाइतवेत है जो इस क्षेत्र का भी नाम है.. मैट्रो   से सेंटर गया. मैंने अकेले एक परिक्रमा की ओस्लो सेंटर की. नगर के मध्य में अनेक कार्यक्रम आयोजित थे. फोल्केतहूस 'ओस्लो कांफ्रेंस सेंटर' में विभिन्न परिधान पहने सैकड़ों सुन्दर और विचित्र भेष-भूषा में आकर्षक युगल, ग्रुप आदि जा रहे थे एक विशाल कार्यक्रम में.  
काव्य संध्या  
शाम छ: बजे स्तोवनेर, ओस्लो में स्थित फोस्सुमगोर में एक काव्यसंध्या थी. कार्यक्रम १८:४० पर शुरू हुआ चालीस मिनट देरी से.  लगभग तीस लोग उपस्थित थे. वहां मैंने अपनी तीन नार्वेजीय कवितायें सुनायी साथ ही लोगों को एक हिन्दी कविता भी सुनायी जिससे लोगों को हिन्दी-उर्दू का भी आनन्द मिले।  


डैनियल और प्रीती के विवाह के रिसेप्शन/प्रीत भोज में  
बड़ा अच्छा लगता है जब किसी उस व्यक्ति की शादी में शामिल होना जिसे आपने जन्म से लेकर विवाह तक देखा हो तो बात और होती है. कल वहां पर मैंने उस युवती के विवाह पर अपनी एक कविता लिखी और आशीर्वाद रूप सुनायी। यह युवती और कोई नहीं चरणजीत और अंजू की बेटी है जो कभी विवाह के पूर्व चरणजीत (चन्नी) वाइतवेत, ओस्लो में  जहाँ मैं रहता हूँ उसी के पास रहते थे.
डैनियल और प्रीती की जोड़ी को दिया अपनी बेटी संगीता और माया भारती के साथ जाकर दिया आशीर्वाद!
चित्र विहीन बचपन 
यदि मैं अपने बचपन पर निगाह डालता हूँ तो मेरा बचपन एक तरह चित्र विहीन रहा है.  कक्षा तीन में पढता था तब सहपाठियों के साथ एक सामूहिक चित्र खींचा गया था. वह भी पैसे के अभाव में नहीं ले सका था. परन्तु जब हाईस्कूल में आया तब से चित्र का शौक ही ऐसा हुआ की चित्र की धीरे-धीरे कमी दूर हो गयी.क्योकि पढाई के साथ-साथ मैं रेलवे के मालडिब्बे और सवारी डिब्बे कारखाने में काम करने लगा था.  
बल्कि अभी कुछ वर्षों से ऐसा हुआ है कि वहुत से समृद्ध (पैसे से समृद्ध) लोगों के पास अपने मृत्यु प्राप्त करने वाले व्यक्ति के चित्र नहीं थे अतः उन्होंने मेरा सहयोग लिया और मुझसे अपने दिवंगत लोगों के चित्र प्राप्त किये जो मैंने अनेक अवसरों पर लिए थे. आदमी मना नहीं कर पाता।
बड़ी विडंबना है. एक कविता साझा कर रहा हूँ: 
एक कविता
"मृत्यु प्रमाण पत्र,
इन्हीं से मिलने हैं बीमा का धन, सुपुत्र!
धन की खबर कभी उनको दी ही नहीं
जिनके थे वे हकदार कुपुत्र!
लड़की का बराबर हक़ है अपने माता-पिता की छोड़ी जायजाद में?
बेटों को भी नहीं बक्शते, हट्टे खट्टे, मुश्टंडे,
स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के ठेकेदार अमीर विचित्र! "
 
दलित- स्त्री विमर्श
मैंने दो अध्यापन  करने वाले दलित विद्वानों के घर पर बालकों को कार्य करते देखा तो हैरान हो गया. क्या बाल मजदूरी  कराना अच्छा है? क्या अच्छा है,  मेरे पूछने पर भी उन्हें साथ बैठने और चाय पीने की पेशकश ठुकरा देना।  उन्हें हमारे साहित्य में दलित, स्त्री विमर्श कम दीखता है शायद उन्होंने स्वयम जातिवादी चश्में पहन रखें हैं जो आज तर्कसंगत नहीं है.
दुनिया कहाँ से  कहाँ तरक्की कर  आगे बढ़ रही है और हम अभी भी दकियानूसी ख्यालों में जकड़े हैं? और कब तक?
ऐसा ही जब मैंने मेरठ में डा महेश दिवाकर जी के साथ श्री सिसौदिया जी के निवास पर सफाई कर्मचारी को कुर्सी देने का आग्रह किया तो वहां उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई, उन्हें बैठाया और चाय पिलाई, और बताया कि ये तो इनका घर है चाहे जब चाय पी सकती हैं और चाय पीती भी रहती हैं. 
गंज बासौदा में श्री संजीव कुमार जैन के महाविद्यालय द्वारा  विश्वविद्यालय आयोग के सहयोग से आयोजित तीन दिवसीय सम्मलेन में जिसका विषय था कि 'हिन्दी उपन्यासों में भूमंडलीकरण' वहां मैं भी एक सत्र में मुख्या वक्ता था. इसका जिक्र इस लिए कर रहा हूँ की दो बातें  कहनी हैं. एक सेमीनार में स्त्री विमर्श को लेकर मेरा नार्वे के सन्दर्भ में वक्तव्य और कमलेश्वर के उपन्यासों 'समुद्र में खोया आदमी' और 'कितने पाकिस्तान' पर मेरा  आलोचनात्मक वक्तव्य.
सेमीनार के बाद दूसरी बात तब की है जब मैं अपने मित्र राजेन्द्र रघुवंशी जी के साथ उनके सम्बन्धियों के घर गंज बासौदा में ही उनके निवास पर गया तो लगा कि किसी पुराने जमीदार के घर पर आ गया हूँ. आवाभगत के बाद बाहर देखा कि तीन महिला सफाईकर्मी झाड़ू लगा रही थीं. उस समय जो परिचर्चा हुई उसी से जन्मी मेरी कविता 'पर्यावरण की देवी' जो कविता संग्रह 'गंगा से ग्लोमा' में संग्रहित है.
परिचर्चा जारी रहेगी। . . . . . . आगामी पोस्ट में देखिये!



 

रविवार, 22 सितंबर 2013

लेखक गोष्ठी में शेष नारायण सिंह सम्मानित
भारतीय  -नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम की और से आयोजित  लेखक गोष्ठी में 

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

Forfatterkafé på  Veitvetfredag 6. september  kl. 18:00 på Stikk Innom på Veitvetsenter, Oslo    
Tema: ’Demokrati  og stemmerett’


Æresgjest: Shesh Narain Singh, Journalist ( Politisk redaktør i den kjente daglig avis, Deshbandhu)   og forfatter fra India.
Gratis inngang.  Elkel servering.
Det blir diktlesning og musikk i slutten av arrangement.
For mer informasjon, ta kontakt med Suresh Chandra Shukla.
på telefon 90 07 03 18 eller på e-post: speil.nett@gmail.com





बायीं  ओर शेष जी ओस्लो में अपनी पत्नी के साथ
लेखक गोष्ठी में आपका हार्दिक स्वागत है 
गोष्ठी में मुख्य अतिथि का सम्मान, काव्य गोष्ठी और परिचर्चा 'प्रजातंत्र और मताधिकार' पर परिचर्चा होगी 
आज शुक्रवार ६ सितम्बर को शाम छ: बजे (18:00)
स्तिक इन्नोम (Stikk Innom), वाइतवेत सेंटर (Veitvet senter), ओस्लो में
(T-bane til Sinsen og buss nr. 5A og 5C fra Sinsen.
मैट्रो से Sinsen सिनसेन स्टेशन और वहां से बस नम्बर 5A  और 5 C)
जाने-माने पत्रकार शेष नारायण सिंह मुख्य अतिथि होंगे जो भारत के सुप्रसिद्ध अखबार देशबंधु के राजनैतिक संपादक हैं.
प्रवेश निशुल्क है. अंत में काव्य गोष्ठी होगी और संगीत का कार्यक्रम है. 
अधिक सूचना के लिए संपर्क कीजिये सुरेशचन्द्र शुक्ल   टेलीफोन 90 07 03 18 या speil.nett@gmail.com
आयोजक: भारतीय नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम 
Araangør: Indisk Norsk Informasjons -og Kulturforum
  

रविवार, 1 सितंबर 2013

1 सितम्बर को अर्जुन का जन्मदिन

 आज मेरे बेटे अर्जुन का जन्मदिन है, उसको  हार्दिक बधाई।  
चित्र में दायें अर्जुन जिसका जन्मदिन है साथ में बायें अपने  भाई अनुपम के साथ

मेरा छोटा बेटे  अर्जुन जिसका आज 20वां जन्मदिन है. प्यार से उसे लोग बोबी और आंद्रे कहकर भी पुकारते हैं. वह मेरा सबसे छोटा पुत्र है. संगीता के बाद वह परवार में सबसे ज्यादा क्रांतिकारी है. यदि उसके बाबा जीवित होते तो जरूर गर्व करते। मेरे पिता कहते थे कि मेरे क्रान्तिकारी होने से उन्हें अपने अनुसार मुझे ढालने में परेशानी होने लगी।   वह नहीं चाहते थे कि मैं नौकरी, पढ़ाई के अतिरिक्त समाजसेवा और जन प्रतिनिधित्व न करूँ क्योंकि इससे धन और समय का नुक्सान होता है तथा आदमी परिवार को प्राथमिकता (प्रायोरिटी) नहीं देता है. मैं प्रातःकाल घर से निकल कर रात ग्यारह बजे घर आता था. विवाहित होने के कारण  व्यक्ति को अपना समय परिवार के साथ भी बिताना चाहिये.
मैं कैसे बताऊँ कि रेलवे में आठ घंटे प्रति दिन की नौकरी करते हुए रेगुलर कालेज में शिक्षा भी प्राप्त करता था  और अपने दादा (बाबा) श्री मन्ना लाल शुक्ल से प्रभावित होकर एक सार्वजनिक व्यक्ति के नाते अपनी पहचान भी बनाना चाहता था. इसी क्रम में मेरा पहला काव्यसंग्रह 'वेदना' 1976  में छप गया था.

हाँ तो मैं अर्जुन की बात कह रहा था. बहुत से लोग यह नहीं जानते हैं कि अर्जुन फ्रीग फ़ुटबाल टीम का कैप्टन रह चुका है और अनेक टूर्नामेंट में वाइतवेत का भी प्रतिनिधित्व किया। नार्वे के साथ साथ अर्जुन (बॉबी) दो बार मार्शल आर्ट में यूरोप का जूनियर चैम्पियन रह चुका  है.    अर्जुन  व्यवहारशील  और अन्याय पर अपनी बात बेखटक कह देने वाला दूसरों के सम्मान का भी ध्यान रखता है.
वह अपने जीवन में सफल हो यही उसके परिवार और मित्रों की कामना है.