शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

 अपने में मस्त  अभिमन्यु अनथ को बहुत बधायी - शुभकामनायें

 

 अपने में मस्त रहने वाले लेखक हैं अभिमन्यु अनथ. चाहे वह १९ ९३ में मारीशस की अपनी धरती पर  या वह लन्दन, यू के में सम्पन्न संपन्न विश्व हिन्दी सम्मलेन हो. 

विश्व हिंदी पत्रिका- दीप्ति गुप्ता के ई-पत्र से  समाचार प्राप्त  कर अति प्रसन्नता हुई कि मारीशस के मशहूर साहित्यकार साथी अभिमन्यु अनत को भारत में साहित्य अकादमी द्वारा मानद महत्तर सदस्यता का सर्वोच्च सम्मान दिया गया है जो इसके लिए सम्माननीय पात्र हैं.

महान मारीशस की भूमि सदा ही हिन्दी के लिए उर्वरा रही है और महात्मा गांधी संस्थान, मोका और वसंत इसके अनेक उदाहरणों में से एक है. आगे चलकर कुछ वर्षों से विश्व हिन्दी सचिवालय ने भी हिन्दी के लिए अनेक उपक्रम कर रही हैं.  जो लोग मारीशस गए हैं या जो मारीशस के हिन्दी प्रेमियों से मिले हैं वे जानते हैं कि मारीशस के संस्कृतिकर्मियों और राजनीतिज्ञों में हिन्दी और भारत के प्रति सम्मान है हम भारतीय लोग भी मारीशस को बहुत सम्मान से देखते हैं.  श्री राजनारायण गति जी, मुकेश्वर चुन्नी जी, भी अभिमन्यु जी की तरह अनेको कार्यक्रमों में मिले हैं और पूरी सहानभूति और स्नेह दिया है. सरिता बुधू को भी भूलना आसान नहीं है. जगदीश  गोबर्धन भी भाषा को लेकर गतिशील रहते हैं. 

भारत से बाहर रहकर विदेशी जमीन पर बैठकर हिन्दी में साहित्य सृजन हिन्दी और  में करना सराहनीय और नयी चुनौतियों से भरा है. पर नार्वे में हमको वह स्थिति और वातावरण नहीं मिला फिर भी हिन्दी साहित्य के सृजन के साथ-साथ हिन्दी की शिक्षा देकर नयी पीढी को हिन्दी से अवगत कराना तथा पत्रिकाएं निकाल कर उसमें सभी हिन्दी और नार्वेजीय भाषियों को जोड़ना उन्हें अभिव्यक्ति देना कुछ हमारी निजी गतिविधियों में से है. नार्वे में हमारी पत्रिका स्पाइल-दर्पण इस वर्ष अपने २५ वर्ष पूरे कर रही है तब और भी सुखद लगता है कि भारत के बाहर हिन्दी की सेवा में लगे रहना कितना सुखकर मिशन है. 
सन १९९० में जब मैंने एक अंतर्राष्ट्रीय समारोह में भाग लिया था तब राजेन्द्र अवस्थी के पुत्र और वर्तमान में आथर्स गिल्ड आफ इंडिया के महामंत्री शिव शंकर अवस्थी के साथ उनके मारीशस में स्थित निवास पर  गया था.  राजेन्द्र  अवस्थी जी वहां पहले से उपस्थित थे.  साथ-साथ भोजन भी किया और विचार-विमर्श भी हुआ था. उनके आँगन में बागीचे में कुछ चित्र भी खींचे गये. एक चित्र उर्दू की पत्रिका 'बाजगश्त'  में सन १९९० में छपा था उसी पत्रिका में जैनेद्र कुमार के साथ लिया गया चित्र भी सन १९८५ में छपा था जिसमें मैं और ऐनक लगाए जैनेन्द्र जी कोकाकोला साथ पी रहे थे. अभिमन्यु अनत से अनेक साहित्यिक समारोहों में मिला जिसमें लन्दन में हुए सन १९९९ में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन और एक वर्ष पूर्व फोन पर मुम्बई में फोन पर कपिल कविराय के निवास पर फोन से बात हुई थी.
अपने मित्र अभिमन्यु अनत और साहित्य अकादमी को बहुत बधायी-शुभकामनायें और धन्यवाद देता हूँ उनके सहयोग और योगदान के लिए.  शेष आगामी ब्लाक में पढ़िये। 
सुरेशचन्द्र शुक्ल ´शरद आलोक´
सम्पादक, स्पाइल-दर्पण
POSTBOX 31, VEITVET
0518- OSLO
NORWAY

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

डायरी 06-10-13, Oslo

मुझे अपनी डायरी लिखनी चाहिये। 

मुझे आलोचक और प्रेमचंद पर विशद साहित्य लिखने वाले कमल किशोर गोयनका जी ने कहा था की मुझे अपनी डायरी लिखनी चाहिये।  अतः जो कुछ स्मरण है और चाह रहा हूँ लिख रहा हूँ. 
कल शनिवार था, ५ अक्टूबर २०१३, ओस्लो में मौसम बहुत खूबसूरत था. दिन सामान्य था कवितामय था तो एक विवाहोत्सव में जाना था.
मेरे घर के पीछे मित्रो स्टेशन वाइतवेत है जो इस क्षेत्र का भी नाम है.. मैट्रो   से सेंटर गया. मैंने अकेले एक परिक्रमा की ओस्लो सेंटर की. नगर के मध्य में अनेक कार्यक्रम आयोजित थे. फोल्केतहूस 'ओस्लो कांफ्रेंस सेंटर' में विभिन्न परिधान पहने सैकड़ों सुन्दर और विचित्र भेष-भूषा में आकर्षक युगल, ग्रुप आदि जा रहे थे एक विशाल कार्यक्रम में.  
काव्य संध्या  
शाम छ: बजे स्तोवनेर, ओस्लो में स्थित फोस्सुमगोर में एक काव्यसंध्या थी. कार्यक्रम १८:४० पर शुरू हुआ चालीस मिनट देरी से.  लगभग तीस लोग उपस्थित थे. वहां मैंने अपनी तीन नार्वेजीय कवितायें सुनायी साथ ही लोगों को एक हिन्दी कविता भी सुनायी जिससे लोगों को हिन्दी-उर्दू का भी आनन्द मिले।  


डैनियल और प्रीती के विवाह के रिसेप्शन/प्रीत भोज में  
बड़ा अच्छा लगता है जब किसी उस व्यक्ति की शादी में शामिल होना जिसे आपने जन्म से लेकर विवाह तक देखा हो तो बात और होती है. कल वहां पर मैंने उस युवती के विवाह पर अपनी एक कविता लिखी और आशीर्वाद रूप सुनायी। यह युवती और कोई नहीं चरणजीत और अंजू की बेटी है जो कभी विवाह के पूर्व चरणजीत (चन्नी) वाइतवेत, ओस्लो में  जहाँ मैं रहता हूँ उसी के पास रहते थे.
डैनियल और प्रीती की जोड़ी को दिया अपनी बेटी संगीता और माया भारती के साथ जाकर दिया आशीर्वाद!
चित्र विहीन बचपन 
यदि मैं अपने बचपन पर निगाह डालता हूँ तो मेरा बचपन एक तरह चित्र विहीन रहा है.  कक्षा तीन में पढता था तब सहपाठियों के साथ एक सामूहिक चित्र खींचा गया था. वह भी पैसे के अभाव में नहीं ले सका था. परन्तु जब हाईस्कूल में आया तब से चित्र का शौक ही ऐसा हुआ की चित्र की धीरे-धीरे कमी दूर हो गयी.क्योकि पढाई के साथ-साथ मैं रेलवे के मालडिब्बे और सवारी डिब्बे कारखाने में काम करने लगा था.  
बल्कि अभी कुछ वर्षों से ऐसा हुआ है कि वहुत से समृद्ध (पैसे से समृद्ध) लोगों के पास अपने मृत्यु प्राप्त करने वाले व्यक्ति के चित्र नहीं थे अतः उन्होंने मेरा सहयोग लिया और मुझसे अपने दिवंगत लोगों के चित्र प्राप्त किये जो मैंने अनेक अवसरों पर लिए थे. आदमी मना नहीं कर पाता।
बड़ी विडंबना है. एक कविता साझा कर रहा हूँ: 
एक कविता
"मृत्यु प्रमाण पत्र,
इन्हीं से मिलने हैं बीमा का धन, सुपुत्र!
धन की खबर कभी उनको दी ही नहीं
जिनके थे वे हकदार कुपुत्र!
लड़की का बराबर हक़ है अपने माता-पिता की छोड़ी जायजाद में?
बेटों को भी नहीं बक्शते, हट्टे खट्टे, मुश्टंडे,
स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के ठेकेदार अमीर विचित्र! "
 
दलित- स्त्री विमर्श
मैंने दो अध्यापन  करने वाले दलित विद्वानों के घर पर बालकों को कार्य करते देखा तो हैरान हो गया. क्या बाल मजदूरी  कराना अच्छा है? क्या अच्छा है,  मेरे पूछने पर भी उन्हें साथ बैठने और चाय पीने की पेशकश ठुकरा देना।  उन्हें हमारे साहित्य में दलित, स्त्री विमर्श कम दीखता है शायद उन्होंने स्वयम जातिवादी चश्में पहन रखें हैं जो आज तर्कसंगत नहीं है.
दुनिया कहाँ से  कहाँ तरक्की कर  आगे बढ़ रही है और हम अभी भी दकियानूसी ख्यालों में जकड़े हैं? और कब तक?
ऐसा ही जब मैंने मेरठ में डा महेश दिवाकर जी के साथ श्री सिसौदिया जी के निवास पर सफाई कर्मचारी को कुर्सी देने का आग्रह किया तो वहां उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई, उन्हें बैठाया और चाय पिलाई, और बताया कि ये तो इनका घर है चाहे जब चाय पी सकती हैं और चाय पीती भी रहती हैं. 
गंज बासौदा में श्री संजीव कुमार जैन के महाविद्यालय द्वारा  विश्वविद्यालय आयोग के सहयोग से आयोजित तीन दिवसीय सम्मलेन में जिसका विषय था कि 'हिन्दी उपन्यासों में भूमंडलीकरण' वहां मैं भी एक सत्र में मुख्या वक्ता था. इसका जिक्र इस लिए कर रहा हूँ की दो बातें  कहनी हैं. एक सेमीनार में स्त्री विमर्श को लेकर मेरा नार्वे के सन्दर्भ में वक्तव्य और कमलेश्वर के उपन्यासों 'समुद्र में खोया आदमी' और 'कितने पाकिस्तान' पर मेरा  आलोचनात्मक वक्तव्य.
सेमीनार के बाद दूसरी बात तब की है जब मैं अपने मित्र राजेन्द्र रघुवंशी जी के साथ उनके सम्बन्धियों के घर गंज बासौदा में ही उनके निवास पर गया तो लगा कि किसी पुराने जमीदार के घर पर आ गया हूँ. आवाभगत के बाद बाहर देखा कि तीन महिला सफाईकर्मी झाड़ू लगा रही थीं. उस समय जो परिचर्चा हुई उसी से जन्मी मेरी कविता 'पर्यावरण की देवी' जो कविता संग्रह 'गंगा से ग्लोमा' में संग्रहित है.
परिचर्चा जारी रहेगी। . . . . . . आगामी पोस्ट में देखिये!



 

रविवार, 22 सितंबर 2013

लेखक गोष्ठी में शेष नारायण सिंह सम्मानित
भारतीय  -नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम की और से आयोजित  लेखक गोष्ठी में 

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

Forfatterkafé på  Veitvetfredag 6. september  kl. 18:00 på Stikk Innom på Veitvetsenter, Oslo    
Tema: ’Demokrati  og stemmerett’


Æresgjest: Shesh Narain Singh, Journalist ( Politisk redaktør i den kjente daglig avis, Deshbandhu)   og forfatter fra India.
Gratis inngang.  Elkel servering.
Det blir diktlesning og musikk i slutten av arrangement.
For mer informasjon, ta kontakt med Suresh Chandra Shukla.
på telefon 90 07 03 18 eller på e-post: speil.nett@gmail.com





बायीं  ओर शेष जी ओस्लो में अपनी पत्नी के साथ
लेखक गोष्ठी में आपका हार्दिक स्वागत है 
गोष्ठी में मुख्य अतिथि का सम्मान, काव्य गोष्ठी और परिचर्चा 'प्रजातंत्र और मताधिकार' पर परिचर्चा होगी 
आज शुक्रवार ६ सितम्बर को शाम छ: बजे (18:00)
स्तिक इन्नोम (Stikk Innom), वाइतवेत सेंटर (Veitvet senter), ओस्लो में
(T-bane til Sinsen og buss nr. 5A og 5C fra Sinsen.
मैट्रो से Sinsen सिनसेन स्टेशन और वहां से बस नम्बर 5A  और 5 C)
जाने-माने पत्रकार शेष नारायण सिंह मुख्य अतिथि होंगे जो भारत के सुप्रसिद्ध अखबार देशबंधु के राजनैतिक संपादक हैं.
प्रवेश निशुल्क है. अंत में काव्य गोष्ठी होगी और संगीत का कार्यक्रम है. 
अधिक सूचना के लिए संपर्क कीजिये सुरेशचन्द्र शुक्ल   टेलीफोन 90 07 03 18 या speil.nett@gmail.com
आयोजक: भारतीय नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम 
Araangør: Indisk Norsk Informasjons -og Kulturforum
  

रविवार, 1 सितंबर 2013

1 सितम्बर को अर्जुन का जन्मदिन

 आज मेरे बेटे अर्जुन का जन्मदिन है, उसको  हार्दिक बधाई।  
चित्र में दायें अर्जुन जिसका जन्मदिन है साथ में बायें अपने  भाई अनुपम के साथ

मेरा छोटा बेटे  अर्जुन जिसका आज 20वां जन्मदिन है. प्यार से उसे लोग बोबी और आंद्रे कहकर भी पुकारते हैं. वह मेरा सबसे छोटा पुत्र है. संगीता के बाद वह परवार में सबसे ज्यादा क्रांतिकारी है. यदि उसके बाबा जीवित होते तो जरूर गर्व करते। मेरे पिता कहते थे कि मेरे क्रान्तिकारी होने से उन्हें अपने अनुसार मुझे ढालने में परेशानी होने लगी।   वह नहीं चाहते थे कि मैं नौकरी, पढ़ाई के अतिरिक्त समाजसेवा और जन प्रतिनिधित्व न करूँ क्योंकि इससे धन और समय का नुक्सान होता है तथा आदमी परिवार को प्राथमिकता (प्रायोरिटी) नहीं देता है. मैं प्रातःकाल घर से निकल कर रात ग्यारह बजे घर आता था. विवाहित होने के कारण  व्यक्ति को अपना समय परिवार के साथ भी बिताना चाहिये.
मैं कैसे बताऊँ कि रेलवे में आठ घंटे प्रति दिन की नौकरी करते हुए रेगुलर कालेज में शिक्षा भी प्राप्त करता था  और अपने दादा (बाबा) श्री मन्ना लाल शुक्ल से प्रभावित होकर एक सार्वजनिक व्यक्ति के नाते अपनी पहचान भी बनाना चाहता था. इसी क्रम में मेरा पहला काव्यसंग्रह 'वेदना' 1976  में छप गया था.

हाँ तो मैं अर्जुन की बात कह रहा था. बहुत से लोग यह नहीं जानते हैं कि अर्जुन फ्रीग फ़ुटबाल टीम का कैप्टन रह चुका है और अनेक टूर्नामेंट में वाइतवेत का भी प्रतिनिधित्व किया। नार्वे के साथ साथ अर्जुन (बॉबी) दो बार मार्शल आर्ट में यूरोप का जूनियर चैम्पियन रह चुका  है.    अर्जुन  व्यवहारशील  और अन्याय पर अपनी बात बेखटक कह देने वाला दूसरों के सम्मान का भी ध्यान रखता है.
वह अपने जीवन में सफल हो यही उसके परिवार और मित्रों की कामना है.  

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

आज बहुत ख़ुशी का दिन है, जन्माष्टमी भी है  और इस पावन दिन पर मेरे बेटे अनुराग का विवाह ओस्लो में  हुआ 
आज बहुत ख़ुशी का दिन है. सूरज देवता भी प्रसन्न हैं और अपनी किरणें चहुओर फैला रहे हैं. ओस्लो में अगस्त का महीना, बुधवार तारीख २८ अगस्त २०१३। नार्वे में कुछ देरी से ही सही पर गर्मी ऋतु के सभी कद्रदान हैं। किसी का जन्मदिन तो किसी की शादी की सालगिरह होगी और किसी का नामकरण, विवाह और उपनयन संस्कार आदि होगा।
सभी खुश रहें, प्रसन्न रहें और शतायु हों यही दुआयें हैं हमारी।
हर लम्हे से खुशियाँ मांगें,
और दुआयें मांगे!
फूल में छिपी आस्था सबकी,
गुलदस्तों ने बांचे!
तुम्हें मुबारक, दिन तेरा हो,
मेरी हों बस रातें।
जहाँ रहें अपने-बेगाने,
हों खुशियों की बरसातें!!


एक और ख़ुशी में इजाफा, मेरे बड़े बेटे का विवाह संपन्न हुआ. 


चित्र में बायें  से  मेरेते  की माँ , मेरेते  नव विवाहित  बहू , नवविवाहित  बड़ा  पुत्र अनुराग  और  उसकी माँ  माया भारती  (माया शुक्ला)



 अनुराग की अनोखी  बातें 
मुझे स्मरण है पांच वर्ष तक मुंडन न होने की वजह से अनुपम के केश बढ़ गये  थे. बड़े बालों के कारण अनुराग में एक अलग आकर्षण था. 
वह कभी भारत में अपनी दादी श्रीमती किशोरी देवी और दादा (बाबा) श्री बृजमोहन लाल शुक्ल के साथ के साथ रहा और इसी कारण उसका सम्बन्ध सदा अपनी दादी से भी रहा और दादी की मृत्यु पर सम्मिलित हुआ और औरों की तरह अंतिम संस्कार में केश भी कटवाए थे जैसा कि परिवार की परंपरा है कि शोक में और मरने वाले को सम्मान देने के लिए केश कटाये जाते हैं. 
अब लोग आधुनिक हो गये हैं, सभी लोग केश नहीं कटवाते।  परंपरा और रीति रिवाज स्वयं अपनाने के लिए हम स्वतन्त्र हैं.  वहां अनुराग का महत्त्व पारिवारिक दायरे में बढ़ जाता है. अपनी दादी की तेहरवीं में संगीता और अनुराग उपस्थित भी हुए और दिल खोलकर खर्चकर संतुष्टि प्राप्त की।
विदेशों में नयी पीढ़ी को अपनी और पूर्वजों की संस्कृति के बारे में बताने के लिये  माता -पिता ही उपयुक्त और सही शिक्षक हैं. बेटे के श्रवण कुमार बनने की सम्भावना तब अधिक होती है जब पिता, माता स्वयं उदहारण बनें। 
एक और घटना उस समय की है जब अनुराग को पढ़ाने उसके अध्यापक आते थे या जब वह मोहल्ले में १२/४ में रहने वाली शुक्ला अध्यापिका के घर पढ़ने अनुराग जाता था, सुना है वह बहाने बनाने में बहुत निपुण था.
भोला और सभी के स्नेह का भाजन अनुराग अपनी दादी और बाबा का प्रिय था. बाबा की सबसे प्रिय उसकी बड़ी बहन संगीता और नीलू (मेरी बड़ी  भांजी) रहे हैं. जय प्रकाश मेरा बड़ा भतीजा है जो सदा अपने परिवार के साथ रहता था जहाँ अनुराग और संगीता भी रहे हैं.


 ओस्लो शतरंज चैम्पियनशिप में भी स्वर्ण पदक
जब अनुराग की चर्चा कर रहा हूँ तो यह भी बताता चलूं  अन्य बच्चों की तरह अनुराग भी माइकेल जैक्सन के संगीत पर बहुत अच्छा नृत्य कर लेता था और उसने मार्शल आर्ट भी सीखी तथा ओस्लो शतरंज चैम्पियनशिप में भी स्वर्ण पदक अपनी टीम के साथ लाया।  नार्वे में हर फ़ुटबाल खेलता और बरफ के खेल स्की कर लेता है. अनुराग को भी सकी करना और फ़ुटबाल बहुत पसंद है आजकल भी वह अपने पुराने मित्रों के साथ कभी-कभी फ़ुटबाल खेलता है. अनुराग सदा से टेक्नीकल रूचि का रहा है और वह कंप्यूटर हार्डवेयर में ही कार्य करता है.
 मैं चाहता था कि अनुराग सिनेमा से जुड़े
मैं पिता होने के नाते चाहता था कि अनुराग सिनेमा से जुड़े और फोटोग्राफर और एडिटर बने. इसी वजह से मैंने अनुराग को अपनी पहली नार्वेजीय फिल्म 'Reisen til Canada' कनाडा की सैर में फोटोग्राफर के रूप में उतारा और उसने फिल्म का संपादन का भार भी उठाया जिसे उसने भली भांति पालन भी किया। नार्वेजीय समाचारपत्रों ने फिल्म के साथ अनुराग की फोटोग्रागी की भी चर्चा की. अनुराग सिनेमा से तो नहीं जुड़ा पर कंप्यूटर से जुड़ गया जो आज की आवश्यकता है. यहाँ और भारत में उसने अपने भाइयों की कंप्यूटर से मदद की और आज मेरी भी अक्सर कोई समस्या होने पर मदद करता है.

 
बायें अनुराग का बनवाया चश्मा पहने दादी सन  1998 में 
नार्वे में दादी का चश्मा 
मैं और  अन्य अनेक प्रवासी लोग आँखों का चश्मा सस्ता और बेहतर होने के कारण भारत से बनवाते हैं.  नार्वे में बहुत धन लगता है नजर की ऐनक बनवाने में इसलिए अपने-अपने देश में (यानि भारत में ) बनवाते हैं पर अनुराग ने दादी का चश्मा नार्वे से बनवाया। उसका कहना था कि दादी के चश्में के लिए धन क्या बचाना। इससे मुझे प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' की याद आ गयी जिसमें हामिद अपनी दादी के लिए अपने खिलौने की जगह  चिमटा खरीदकर लाता है.
२८ अगस्त को जन्माष्टमी के दिन शादी 
हर माता-पिता, भाई-बहन चाहते हैं कि क्रमशः उसकी संतान उसका भाई विवाहित हो. तो यह सपना भी पूरा हुआ अनुराग के विवाह के बाद. कल जन्माष्टमी के शुभ दिन अनुराग और मेरेते वैवाहिक बंधन में बन्ध गए जो १२ वर्षों से साथ-साथ रह रहे थे.




थिंगहूस (कोर्ट) ओस्लो के बाहर   एक ग्रुप फोटो 









 थिंगहूस (कोर्ट) ओस्लो के अन्दर जज के साथ   एक ग्रुप फोटो





विवाह के बाद हम सभी उपस्थित लोगों ने साथ-साथ भोजन किया। मुझे अपने उन मित्रों की याद आयी जो संगीत के माहिर हैं और अनेक साजों के साथ गीत  और गजलें गाते हैं. 
मेरा मन भी चाहा कि कुछ गुनगुनाऊं, पर ऐसा नहीं कर सका. भावुक हो गया था. मेरा छोटे बेटे 
अर्जुन ने इस अवसर पर कुछ शुभकामनाओं के शब्द कहे जो हमेशा याद रहेंगे।     
शरद आलोक, ओस्लो, नार्वे     

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

३१ अगस्त को अमृता प्रीतम जी का जन्मदिन है


 अमृता जी की एक कविता है
 ए़क दर्द था
जो सिगरेट की तरह
मैने चुपचाप पिया
सिर्फ कुछ नज्में हैं
जो सिगरेट से मैने
राख की तरह झाड़ी हैं !!

- अमृता प्रीतम

अमृता जी, का जीवन कुछ हद तक खुली किताब की तरह रहा है. मैंने साथ -साथ सिगरेट पी है. साथ-साथ पीये भी हैं और खाया भी है. २८ साल पहले।  ( यह बात और है कि  अब सिगरेट आदि नहीं पीता।) ओस्लो की तीन महफ़िलों और दो मंचों पर  महान  साहित्यकारों के साथ रहे इनमें अमृता जी, आक्तावियो पाश (नोबेल पुरस्कार विजेता) और अहमद फराज थे.  मौका था  'प्रथम ओस्लो इंटरनेशन पोएट्री फेस्टिवल' का.  अक्सेल जेनसेन एक जिन्दा दिल इंसान और एक अच्छे लेखक थे. वे भारत से प्यार करते थे और उन्होंने भारतीय सुयोग्य महिला प्रतिभा जी से विवाह किया था.  पहले वे अपनी एक नाव में रहते थे. जिस नाव में रहते थे वह सागर किनारे आकेरब्रीगे, ओस्लो में थी. वह थे तो आर्किटेक्ट पर लेखक भी कम अच्छे नहीं थे 'एप' (Epp) पुस्तक से वे ख्याति प्राप्त कर चुके थे. हमारे राजदूत कमल नयन बक्शी जी और एक्सेल येनसेन  के साथ महफ़िलों में रहना कभी भुलाए भी नहीं भूलेगा।

मेरा जीवन कुछ ज्यादा ही खुली किताब की तरह रहता है. माया जी कहती हैं कि लोकलाज और समाज के लिए कुछ छिपाया भी करो.  आजकल जाने-माने पत्रकार शेष नारायण सिंह नार्वे आये हुए हैं. उनसे रोज मुलाकात हो जाती है. वे रोज इंटरनेट पर कलम चलाते  हैं हिन्दी में. मैंने  विचार किया  रोज कुछ न कुछ हिन्दी में मैं भी ब्लाग में लिखा करूँ। (ब्लाग लेखन तो काफी समय से करता हूँ पर  रोज नहीं लिखता).  ओस्लो के चालीस प्रतिशत भाग में जहाँ आकेर्स आवीस ग्रूरुददालेन का प्रसार है लोग मुझे जानने लगे हैं पर मैं हरगिज मशहूर आदमी नहीं हूँ. यह तो वही बतायेगा जो समाचारपत्र पढता है  या यहाँ आयोजित हमारी-तुम्हारी गोष्ठियों में  कभी आया हो.  ओस्लो के एक  समाचार पत्र के अनुसार लोग मेरी दो चीजों से परिचित हैं कविता या मेरी टोपी (हैट) से.   मैं एक सांस्कृतिक लेखक-मजदूर-पत्रकार हूँ. 
कुछ पंक्तियाँ मैंने भी अमृता की याद में लिखी हैं, उन्हें आपके साथ साझा कर रहा हूँ.

अमृता जी! तुम्हारे साथ पी हैं  सिगरेटें
ओस्लो की महफ़िलों में,
चुपचाप चश्में के मध्य देखती पैनी आँखें 
साथ थे अपने सिफारत खाने के बक्शी जी,
जिन्हें भुलाने से भी भूल न सकता कभी!
ओक्तावियो पाश (मेक्सिको के) ने मिलाया हाथ में ले जाम.
एक ही मंच से कविता पढ़ीं थीं तीन शामें!
अहमद फराज मंच पर भी पीते रहे। … ,
एक शाम थी बस तुमारे नाम!

२८ बरस बाद भी लग रहा है कल.
गुनगुनाने लगा अनबूझ गीत
आज दोहराने लगा हूँ 
वे पल!! 
 फिर गुनगुनाने लगा हूँ
कुछ शब्द आतुर हैं पाने को स्थान ,
आगे भी दिखने लगे जब अतीत 
समझ लेना रुक   रही है जिन्दगी,
बढ़ रही है एक पथ अनजान !
             शरद आलोक  ओस्लो, २७ -०८ -१३