शुक्रवार, 11 जून 2021

जितिन प्रसाद ने विचारधारा क्यों छोड़ी? - शशि थरूर

 

पार्टी में कोई कमी थी भी तो जितिन प्रसाद ने विचारधारा क्यों छोड़ी?

        शशि थरूर
 (क्विंट ने शशी थरूर का यह लेख मूल अंग्रेजी और फिर उसका हिंदी तर्जुमा छापा है)
जितिन प्रसाद और ज्योतिरादित्य सिंधिया आज उसी रंग में जा रंगे हैं जिसकी कभी वह सबसे ज्यादा निंदा किया करते थे
शशि थरूर
अपने 'बड़े भाई' ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी ज्वाइन करने के 1 साल बाद जितिन प्रसाद का उसी राह पर जाने का निर्णय बहुत निराशाजनक है. मैं यह बात बिना किसी व्यक्तिगत कड़वाहट के बोल रहा हूं. दोनों मेरे दोस्त थे, दोनों मेरे घर आ चुके हैं और मैं उनके. मैं जितिन की शादी पर भी मौजूद था. इसलिए यह किसी व्यक्ति विशेष या उसके व्यक्तिगत पसंद और नापसंद की बात नहीं है. उन्होंने जो किया है,उसमें मेरी निराशा की वजह इससे काफी बड़ी है.
सिंधिया और प्रसाद दोनों बीजेपी और भारत के लिए उसके सांप्रदायिक कट्टरता के खतरों के खिलाफ सबसे मुखर आवाजों में से एक थे. आज वह उसी रंग में मिलने जा रहे हैं जिसकी कभी वह सबसे ज्यादा निंदा किया करते थे.
इससे प्रश्न उठता है कि वास्तव में उनकी विचारधारा क्या है? कौन से विश्वास और मूल्य उनकी राजनीति का आधार हैं? या वह सिर्फ अपने हितों और सत्ता प्राप्ति के लिए राजनीति में है? क्या राजनीति का करियर बिना सिद्धांतों के हो सकता है?
राजनीति में प्रवेश आप अपनी विचारधारा के साथ करते हैं
मेरे लिए राजनीति विचारों के बारे में होनी चाहिए वरना वह खोखली है. अगर आप दृढ़ विश्वास और सिद्धांत के बिना करियर चाहते हैं तो आप एक बैंकर या वकील या अकाउंटेंट भी हो सकते हैं और पैसा कमा सकते हैं. या आप एक CEO के रूप में पावर प्राप्त कर सकते हैं. डिटर्जेंट बनाने वाली कंपनी के मैनेजर की विचारधारा से किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ता, जब तक कि उसके प्रोडक्ट की क्वालिटी अच्छी हो.
लेकिन राजनीति इससे अलग है. राजनैतिक दल आदर्श समाज के विचार की कल्पना करते हैं और उसे पाने के लिए खुद को वचनबद्ध करते हैं. उनकी आस्था उन विश्वासों में दृढ़ होती है जिससे उनके अनुसार समाज का निर्माण और संचालन होना चाहिए. वही उनकी विचारधारा होती है.जब आप राजनीति में प्रवेश करते हैं तो आप किसी पार्टी को ऐसे नहीं चुनते जैसे कॉलेज से निकला ग्रेजुएट नौकरी की तलाश में कोई सी भी ऐसी कंपनी चुनता है जो उसे सबसे अच्छा प्लेसमेंट ऑफर करती है. राजनीति में प्रवेश आप अपनी विचारधारा के पार्टी के साथ करते हैं.
आपकी पार्टी न केवल आपकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का संस्थागत रूप है बल्कि वह उन सिद्धांतों, विश्वासों और विचारधारा के समूह को भी दर्शाती है जिसे आप अपने राजनैतिक जीवन के दौरान बढ़ावा देने और बचाव करने के लिए वचनबद्ध है.
राजनीति IPL की तरह नहीं है जहां आप 1 साल किसी एक टीम के लिये खेलते हैं तो दूसरे साल किसी और के लिए. IPL टीम में लेबल, यूनिफार्म और उस टीम के खिलाड़ियों के अलावा चुनने को कुछ और नहीं होता. लेकिन दूसरी तरफ राजनैतिक दलों के बीच सिद्धांत और दृढ़ विश्वास के प्रमुख मुद्दे हैं.
आप या तो पब्लिक सेक्टर में सरकारी दखल के हिमायती होते हैं या मुक्त व्यापार के. आपका विश्वास या तो मिलकर साथ रहने वाले समाज में होता है या संप्रदाय के स्तर पर बंटे हुए समाज में. आपकी आस्था या तो हाशिए पर पड़े लोगों के लिए कल्याणकारी राज्य बनाने की होती है या आप उनको अपने हाल पर छोड़ देने में विश्वास करते हैं. आप की विचारधारा आपको इन दो विकल्पों में से एक के साथ रखती है और दूसरे से दूर.
IPL के विपरीत राजनीति में सिर्फ 'अच्छा अवसर' देखकर पाला नहीं बदलते
IPL में अगर आपको लगता है कि आपकी टीम टूर्नामेंट में पर्याप्त रूप से अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही या आपको मैनेजमेंट आपकी पसंदीदा बैटिंग पोजिशन पर नहीं भेज रहा, तब अगर आप टीम बदल भी लें तो कोई आपको जज नहीं करेगा. यह स्वीकार किया जाता है कि आपको वहां जाने का अधिकार है जहां आपके पास बेहतर अवसर हैं, जहां IPL ट्रॉफी जीतना ज्यादा मुमकिन है और आप उसके साथ आने वाले अन्य बोनस लाभों का लुत्फ भी उठा सकते है.
राजनीति में लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए. यहां आप अपनी टीम में है क्योंकि उसकी विचारधारा में आपकी आस्था है. चाहे आपकी टीम कितना भी खराब प्रदर्शन कर रही हो ,वह तब भी आपकी टीम है. वह आप के सिद्धांतों और मूल्यों का मूर्त रूप है.यहां आपका कप्तान आपके साथ चाहे कितना भी बुरा व्यवहार करें, कोई भी वजह आपको उस विपक्षी कप्तान के प्रति निष्ठा की शपथ नहीं दिला सकती, जिसकी विचारधारा आपकी विचारधारा के विपरीत है.
बेशक पार्टी आप के सिद्धांतों के लिए सिर्फ एक पवित्र संस्था नहीं है, बल्कि यह लोगों से मिलकर बनी है. यहां पदों पर बैठे लोगों के अपने पूर्वाग्रह, कमियां और कमजोरियां भी हैं. हो सकता है कि आपकी पार्टी की विचारधारा आप से मिलती हो लेकिन वह उन्हें मतदाताओं के बीच अच्छी तरह से ना रख पाती हो या इतने अप्रभावी ढंग से रखती हो कि आपको लगने लगे कि अच्छे विचार कभी भी चुनाव में अच्छे परिणाम नहीं ला सकते.
इन कारणों से शायद आपका मन अपनी पार्टी छोड़ने का कर भी जाये. लेकिन अगर आप खुद का और उस विचारधारा का सम्मान करते हैं, जिसके साथ आप अतीत में खड़े रहे हैं तब आप अपने आपको ऐसी पार्टी में ले जाएंगे जो आपके विचार एवं मूल्यों के करीब हो- चाहे वह समान विचारों वाली क्षेत्रीय दल ही क्यों ना हों. आप अपने प्रमुख वैचारिक विरोधियों की पार्टी में कभी नहीं जायेंगे.
अतीत में राजनीति में प्रवेश करने वालों में से अधिकांश की यही सोच थी. उन्होंने अपनी पार्टियों को छोड़ दिया, पार्टी तोड़ दी, विलय कर लिया या नई पार्टी बना ली. लेकिन उन्होंने अपने विश्वासों एवं मूल्यों को कभी नहीं छोड़ा.
राजनीति को करियर मानने वाले नेताओं का आगमन
लेकिन अब कुछ वर्षों में हमने "करियरवादी" राजनेताओं का आगमन देखा है ,जिनका प्रवेश राजनीति में किसी सिद्धांत के कारण नहीं बल्कि पेशे के रूप में हुआ है. उनके लिए सिद्धांतों और जुनून के मायने व्यक्तिगत उन्नति की संभावनाओं के मुकाबले कम है.
जिस पार्टी में वह शामिल हुआ अगर वह अच्छा प्रदर्शन ना कर रही हो तो वह उसकी सफलता के लिए लंबे,कठिन संघर्ष के लिए तैयार नहीं होता. उसकी मुख्य चिंता यह नहीं है कि "मेरी विचारधारा क्या है?" बल्कि ध्यान इस पर है कि "इसमें मेरे लिए क्या है?"
उसमें राजनीति की प्रक्रियाओं, हार और रिवाइवल को लेकर भी धैर्य नहीं है. वह बड़े उद्देश्य या मूल्यों-सिद्धांतों को बढ़ावा देने और उसके बचाव के लिए नहीं बल्कि राजनीति के करियर में वह अपने प्रमोशन के तलाश में है. उसे वह तुरंत चाहिए. उसे लंबा इंतजार नहीं करना है. हमारे देश में नेता अगले चुनाव से ज्यादा सोचने में असमर्थ हैं. अगर उनको अपना भविष्य सफल नहीं दिख रहा है तब उन्हें पाला बदल लेने का कोई मलाल नहीं होगा जब तक कि यह दलबदल सत्ताधारी पार्टी में हो.
राजनीति के मायने क्या है?
कभी-कभी हमारा इन राजनेताओं से यह सवाल करने का मन होता है- जब आप अपने आपको पुराने वीडियो या प्रेस रिपोर्ट में वह सब कहते देखते हो जो आप के आज के बयानों से उलट है,तो आपको शर्मिंदगी महसूस होती है? या आप अपना पीठ केवल इस बात पर थपथपाते हो कि आपका अंदाज तब भी आज की ही तरह प्रभावशाली था? क्या आपको अपनी विचारधारा को खारिज करने का कोई पछतावा नहीं है?
मीडिया में जितिन प्रसाद के बीजेपी से जुड़ने की वजह को लेकर अटकलें होती रहेंगी. मेरा सवाल अलग है- राजनीति के मायने क्या है? मुझे डर है कि उनका जवाब सही नहीं है.

सोमवार, 7 जून 2021

कारवां निकल गया, अपनों की तलाश में - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

 

 कारवां निकल गया

अपनों की तलाश में

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

कारवां निकल गया, अपनों की तलाश में,

खोजकर थक गया, यादों की मिठास में. 

नीरज की कामना, शरद आलोक बांचना।

शिशु हाथ में झुनझुना, बजा रही संवेदना।

 

कैसी है संकल्पना, आकाश में तैरना।

पर्वतों में घूमना, घाटियों में विचाना। 

पृकृति भूल से भरी, सौंदर्य की रसभरी।

लगा जैसे  छुइमुई, तितली सी रंगभरी।। 

गुलकन्द सी पान में, जबान बेजुबान में. 


बड़ा वही फला पका, महान था झुका रहा. 

देवघर में फूल सा,  मस्तक पर सजा रहा.

माँ  बस टोकती रही,  आँधियों से रोकती। 

रोकी कामना सभी, तोड़ी दब भावना सभी. 

 

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

 


मंगलवार, 25 मई 2021

25 मई 2021, श्रृंगवेरपुर घाट पर-

 

खोदकर कब्रों को
शवों को हटा रहे हैं.

आक्सीजन की कमी से
जब लोग मर रहे थे.
तब हमारे आका,
मानो तब शतरंज खेल रहे थे.
जब जिन्दा थे ये इंसान
मुर्दे होने से पहले,
सहायता के बदले उन्हें 
आइना दिखा रहे थे।

प्रयागराज नाम बदला,
पर बदल न सका आचरण?
अब खोदकर कब्रों से शवों की,
अब वे निशानी मिटा रहे हैं।

श्रृंगवेरपुर घाट पर जब  60-100
शव रोज दफनाए जा रहे थे।
कोरोना का पीक था
इलाज का तब गाँव में 
नामोंनिशान नहीं था। 
सहायता नहीं मिली थी,
प्रशासन डरा-छिपा हुआ था.
ग्रामवासियों को  जीवन
व्यर्थ सा लगा था।

25 मई 2021 जब इंसानियत मिट गयी थी
प्रयागराज में  शमशान पर गजब हो गया था.
एक दिन पहले तक एक किलोमीटर तक
अपने परिजनों को को दफनाया जहाँ-जहाँ था.
बांस-बल्ली निशानी गाड़कर जो गए थे.
आज (25.05.21) दो बुलडोजर ले प्रशासन ने
नामोंनिशां मिटा दिए थे.
जब परिजनों ने आज आकर देखा
उनके होश उड़ गए थे.

जब रोकना था, तब कहाँ था प्रशासन।
अंतिम संस्कार से वंचित जहाँ मृतक हों.
उस देश के हम वासी, शासन छल रहा है.
अव्यवस्था के कारण, हर तरफ उठा धुँआँ है.

फेसबुक पर हमने
जब गाथा सुनी किसी से
न रो सका तब मैं
हंस ही सका हूँ.
विदेश में रहकर देश की
छवि धूमिल होने से कैसे मैं सँवारूँ.

मरने के बाद भी,
जहाँ शान्ति न मिले शवों को,
वह कभी प्रयागराज का शमशान,
कभी काशी का शमशान-कब्रगाह है.

प्रशासन को खुली छूट
सत्ताधीश से मिलकर
जिन्दा को जेल में और
शवों को हटा रहे हैं
जैसे धरती के ये हैं मालिक
अनजाने में अपनी हस्ती जला रहे हैं.
 
 - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

सोमवार, 24 मई 2021

भारत से: अपनी-अपनी जगह - सुरेशचन्द्र शुक्ल शरद आलोक

अपनी-अपनी जगह 

     सुरेशचन्द्र शुक्ल शरद आलोक speil.nett@gmail.com 

भारत से  निवेदन आंदोलनकारियों को बिना शर्त रिहा किया जाये ताकि संक्रमण न  हो ।  तीनों किसान बिल/कानून संसद तुरंत रद्द  करें।  किसान आन्दोलन  में मरे व्यक्तियों को शहीद का दर्जा दिया जाये?  पिछले सात सालों से चुनावी चन्दे को और खर्च को सार्वजनिक किया जाये।  जनता  में और राजनैतिक पार्टियों में बिना चर्चा कराये कोई बिल  नहीं लाया जाये।  बिल का मसौदा काफी समय पहले संसद को दिया जाए, उस पर बहस हो, संसद में बिना सभी दलों को चर्चा  का अवसर मिले। बाद में प्रस्ताव कलाकार पास कराया जाये।

राजनैतिक पार्टियों को चन्दा की पारदर्शिता कहाँ है? यह देशवासियों के सामने सार्वजनिक किया जाये की चन्दा कहा से आया है?   आवाज उठाने वालों को सजा दी जा रही है क्या यही भारतीय लोकतंत्र  है? संसद में बिल,  प्रस्ताव के  पूर्व जनता में  सार्वजनिक  किया जाना चाहिये. प्रस्ताव पर जनता, पार्टियों के अंदर और संसद में बहस क्यों नहीं कराई जाती?  

जन आन्दोलन में भाग लेने वालों को जो अब बीमार हैं, युवाओं और महिलाओं को जेल में डाल दिया गया है.  यदि उन्हें  संक्रमण हुआ तो वे  दोहरी  सजा  काटेंगे  और संक्रमण से वे मर भी सकते हैं ?

क्या संक्रमण के सवा  के सवा साल में (जनवरी 2020 से 24 मई 2021 तक)  संसद ने संक्रमण को लेकर कितनी बैठकें की हैं. कितनी बहस और चर्चा  हुई है. क्या हर माह सर्वदलीय बैठक और संक्रमण को लेकर कार्य कर रही सरकारी गैर सरकारी के साथ हर हफ्ते बैठक  हुई है. उसे सार्वजानिक  किया गया है?  

मेरा आप सभी पाठकों से देश के नागरिकों से पूछना है कि क्या आप दूसरों के लिए श्रमदान करते हैं? पार्किंग, अपने पार्क, तालाब, नदी, बाजार आदि कैसा हो, इस बारे में रोज आपने श्रमदान के रूप में कितने घंटे खर्च किये हैं? क्या सब कुछ ठीक चल रहा हैं? 

संसद में विपक्ष को बोलने नहीं दिया जाता। सभी कानून और प्रस्ताव जो पास होते हैं उसकी जनता और राजनैतिक पार्टियों में चर्चा नहीं कराई जाती। जो कानून और प्रस्ताव संसद  और राज्य सभा में पास हुए उनको जनता और राजनैतिक पार्टियों को बहुत पहले क्यों नहीं बताया जाता ताकि उसपर सही और पारदर्शिता से चर्चा हो सके. सभी पक्ष को अपनी बात कहने का अवसर मिले और यदि किसी की बात तार्किक देश हिट और उस तबके की है उसे भी सम्मिलित किया जाए जी नहीं हुआ है इसलिए इस लेख की आवश्यकता पड़ी है।

संसद में जनता के आंदोलनों पर कितनी चर्चा हुई. यह चर्चा स्कूलों  और कॉलेजों में कराई गयी.संसद में मैंने चर्चा में कई बार अलोकतांत्रिक तरीके से बहस होते देखा है. एक उदाहरण है जिसे आप देख सकते हैं एक बहुत योग्य युवा सांसद हैं महुआ मोइत्रा, उनके पहले भाषण से लेकर आज तक जितने भाषण हुए हैं उन्हें लोग खड़े होकर विरोध करते हैं. संसद में सञ्चालन बहुत  कमजोर दिखता है. असल में लोकसभा अध्यक्ष उसे चुना जाना चाहिए जिसका बहुत ज्यादा अनुभव हो संसद का. 

सरकार ने संक्रमण के समय संक्रमण सम्बन्धी कितने जनता के लिए फैसले लिए हैं? किसान के तीन क़ानून पर पहले जनता,  किसान,राजनैतिक पार्टियों से न विचार-विमर्श किया गया और न ही संसद में बहस का मौक़ा दिया गया क्यों? क्या कोई साजिश तो  या कोई गुप्त एजेंडा तो नहीं है. पारदर्शिता  का अभाव, संसद में लोकतंत्र के अभाव में भारत की जनता को असहाय छोड़ दिया  है. करोरेटरों  के लिए अनेक निर्णय क्यों लिए गए. संक्रमण की दवा और वैक्सीन को सरकारी कंपनियों को सही समय पर कार्य दिया गया होता और वैक्सीन की रिसर्च और खरीद का एक  इंतजाम किया गया होता तो भारत में दस लाख लोग मरने से बच सकते थे. 

 संक्रमण से मरने वालों का आंकड़ा या दस लाख संख्या विदेश में वैज्ञानिकों और संक्रमण के लिए कार्य कर रहे लोगों की है जो  है.  आप टीवी की रिपोर्ट, जनता द्वारा दिया गया मीडिया और के  डाटा के आधार पर बहुत काम किया जा रहा है. चूँकि भारत में वयवस्था मरने वालों को छिपाने में लगी  है. 

 जिससे भारत का संक्रमण का शोध पिछड़ जाएगा और विदेशी शोध भारत के सम्बन्ध में क्या जा रहा है.

हर चीज की अपनी-अपनी जगह है. जैसे स्कूल और महाविद्यालयों में शिक्षा, बाजार में व्यापार और संसद और विधानसभा और ग्राम पंचायत में समस्याओं के लिए राजनीतिक डिबेट और सभी की भागीदारी।

भारत की सबसेबढ़ा राजनैतिक बहस, विचार-विमर्श का मंच है संसद। क्या आपने इसमें रूचि क्यों नहीं ली है?  जिस विषय पर संसद और विधानसभा में चर्चा होनी है उसकी सूचना और उसपर बहस विचार-विमर्श का अवसर जनता को, जनता के प्रेतनिधि जिनपर बात होनी है उनसे बात की गयी है? वह सहमत नहीं है तो फिर जबरदस्ती संसद में भी बिना बहस और विचार विमर्श के किसी कानून अध्वा प्रस्ताव पास करना चाहे संख्या के हिसाब से सही हो पर लोकतांत्रिक तो नहीं है. इसका जिम्मेदार कौन है.

यह प्रश्न मैंने उपर उठाये हैं, इसका उत्तर क्या होना चाहिए।  भेदभाव की राजनीति, मनमानी और पारदर्शिता को ख़तम करके हम देश का उसकी जनता का नुक्सान नहीं कर रहे हैं? इसे कैसे ठीक किया जाये।

क्या आपको यह उसी तरह दिख रहा है. क्या सभी अपने-अपने स्थान पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं. यदि नहीं तो क्यों? आपको ही इसे तय करना है कि लोग अपने-अपने स्थान पर रहकर कार्य करें और हम उसका सहयोग दें।

हर घर को दो भागों में बाँट दिया गया है पक्ष और विपक्ष।  क्या यह बटवारा सही है और इसका निर्णय कहाँ करना चाहिए और ऐसा क्यों हो रहा है?  क्या बच्चों को राजनीति की शिक्षा और उसका स्तेमाल स्कूल और कॉलेजों में नहीं सीखना चाहिए। 

आप जिस मोहल्ले में रहते हैं, जिस कालोनी या सोसाइटी में रहते हैं वहां रहने वालों की समिति है जिसके आप सभी बराबर के सदस्य हैं. सफाई, बिजली, पानी, सामाजिक और राजनैतिक जागरूक हैं?

राजनीति ऐसा मंच यह विषय है उसके ज्ञान और उसकी प्रेक्टिस की शिक्षा हमको बचपन से सही तरीके से दी जा रही है?  उत्तर है नहीं। स्कूलों में छात्रसंघ के या छात्र संसद के चुनाव होते हैं इसका उत्तर भी है नहीं क्योंकि शाट प्रतिशत स्कूलों में चुनाव नहीं हो रहे हैं.  बालवाड़ी और स्कूलों में माता-पिता और अविभावक का चुनाव उनकी ट्रेनिंग और सूचना और आपसी बैठकों का अभाव क्यों है? स्कूल और महाविद्यालय बिना माता-पिता और अविभावकों के प्रतिनिधियों से तालमेल और विचार-विमर्श करके कार्य कर रहे हैं, इसका उत्तर भी मुझे नहीं में मिला है, जबकि कुछ स्थानों में इसका अपवाद हो सकता है.

स्कूल-कालेज में छात्र-छात्रा, शिक्षक, अविभावक और प्रबंधक चार मुख्य लोग हैं जो स्कूल कालेज के व्यवस्था और शिक्षा से जुड़े हैं. क्या इनमें तालमेल है? आपका ज्यादातर उत्तर होगा नहीं। 

आप स्वस्थ रहें.

सुमित्रा नंदन पन्त - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

सुमित्रा नंदन पन्त

जहाँ नहीं स्वप्नों का है अन्त,
महाकवि सुमित्रा नंदन पन्त।
प्रगतिशील में नहीं स्वीकार,
कोटि नमन हे कवि सुकुमार।।
 
छायावाद के तुम बन आधार,
अध्यात्मवाद से अंतिम द्वन्द्व।
आकाश और झीलों में तैर,
रचे हैं अलंकार और छंद।।
 
- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
   Oslo, 24.05.21

समय पर आये न ऋतुराज? - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

 

समय पर आये न ऋतुराज?
पलाश के फूलों में मकरंद,
आँगन में दाने चुनती चिरई।
द्वार के मुंडेर पर बैठे काक
चिढ़ाती पेड़ पर गिलहरी।
पक्षी चहचहाते करें मजाक।।
समय पर आये न ऋतुराज?
छिप-छिप वृक्ष के पीछे,
बहेलिये सा नयनों का जाल,
बिछाकर अंतस में कितने फूल.
लुटाने को थे बेताब।
बरसती रही गगन से धार.
समय पर आये न ऋतुराज?
भ्रमर न रहने देते शांत बौर
कब बन जाते फूल
पता क्या कोयल को है पता?
पथिक जब रस्ता जाते भूल.
प्रतीक्षा टिटहरी सी है कठिन,
आसमान उठाने को आतुर,
बाट जोहते है पपीहे युगल,
बन रहा रही का परिहास।
अंधियारे में जुगनू की आस.
समय पर आये न ऋतुराज?
 
- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
 
Oslo, 21.05.2021

बुधवार, 19 मई 2021

गंगा माँ ने बुलाया है -

 

गंगा माँ ने बुलाया है

“गंगा माँ जहाँ मुंडन होते हैं
मरने पर अंतिम संस्कार।
ज़िन्दा गंगा माँ अपने हज़ारों मृत बच्चों को 
बेमन प्रश्रय दे रही है।

काश गंगा माँ अस्पताल बना सकती 
तो उसकी संताने ना मरतीं
और माँ असमय मरी संतानों का मुख 
वर्षों देख सकती थी।
किसी को मोक्ष देती है 
तो किसी को कफ़न एकत्र करने 
के लिए बुलाती है।

माँ सब जानती है इसलिए 
जल की तरह एक सा नहीं रहती 
और बदलती रहती है रूप को।

माचिस बन्दर को 
राज्य धृतराष्ट्र को नहीं देना था।

पुलिस वाले कब तक मंत्रियों की रक्षा करते
शमशान पर लाशों के प्रवेश पर रोक 
लगाते हुए कोविड से संक्रमित होते रहेंगे?

जब जनता नहीं होगी तो 
मेरी कविता पढ़ने 
क्या भूत प्रेत आयेंगे?”
  
 -  सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’
              18.05.21