रविवार, 6 दिसंबर 2015

स्पाइल-दर्पण का अंक 4 -2015 Speil-4 2004 Et flerkulturelt magasin på norsk og hindi.



नया अंक आपके हाथों में है. आशा है कि आपको यह अंक पसंद आयेगा।
नार्वे से गत 27 वर्षों से लगातार विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अग्रसर है. 
आप को यह अंक कैसा लगा अपने विचार व्यक्त करें!

https://drive.google.com/file/d/0B-Yr4tfxYfDnbGJTUVlydDJZTzRxNlNqWXU2a0V3N0hpYTdR/view?usp=sharing




मेरी पहली किताब My first collection of poetry 'Vedna' 'वेदना' (Pain) - 40 years by Suresh Chandra Shukla

मेरी पहली किताब 

'वेदना' के प्रकाशन के चालीस वर्ष 

चालीस वर्ष पहले मेरा पहला काव्य संग्रह १९७५ में छपने के लिए तैयार हुआ और कमल प्रिंटर्स मॉडल हाउस लखनऊ से छपा! 
श्री अशोक घोष जी प्रेस के समीप ही रहते थे. उस समय इंटरमीडिएट डी ए वी इंटर कालेज से  किया था. रेलवे में श्रमिक पद पर कार्य करते हुए यह संग्रह पुर्चिओं कागज़ के टुकड़ों पर और सिगरेट के कवर में लिखकर सवांरा और तब संग्रह तैयार हुआ. सवारी माल डिब्बे में काम करते हुए विचार आते थे तो जो भी कागज़ मिल जाता उसपर लिख लिया करता था और खाना खाने की छुट्टी में एक घंटा रेलवे के पुस्तकालय में साहित्यिक पत्रिकायें पढता था. 
बारहवीं कक्षा में मेरे अध्यापकों श्री त्रिवेदी जी, श्री रमेश अवस्थी जी और श्री दिनेश मिश्रा जी मुझे स्नेह देते थे. पुस्तक छापने के बाद श्री उमादत्त द्वेदी  जी मुझे अपने घर ले गए और वह उस समय एक पत्रिका प्रकाशित करते थे. उनकी पत्नी भी एक अच्छी सांस्कृतिक अध्यापिका थीं और बाद में प्रधानाचार्य बनीं हनुमान प्रसाद रस्तोगी गर्ल्स इंटर कालेज में. वहां हनुमान प्रसाद रस्तोगी गर्ल्स इंटर कालेज में मेरे व्याख्यान अधपकों और छात्राओं के लिए हुए जिन्हे भुला पाना मेरे लिए संभव नहीं है. और इसी विद्यालय में कुछ वर्ष पूर्व एक कविसम्मेलन में मुझे मुख्य अतिथि बनाया गया था जहाँ कवियित्री श्रीमती सुमन दुबे और डॉ  अलखनंदा रस्तोगी अध्यापक हैं. इस कवि सम्मेलन में पद्मश्री सुनील जोगी मौजूद थे और सर्वेश अस्थाना जी सञ्चालन कर रहे थे. 

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

Speil nr. 4 - 2015 स्पाइल-दर्पण का अंक 4 -2015



हम स्पाइल-दर्पण का लिंक जोड़ने में कामयाब नहीं हुये,
जल्द ही जोड़ेंगे। धन्यवाद।
स्पाइल-दर्पण का अंक 4 -2015

नया अंक आपके हाथों में है. आशा है कि आपको यह अंक पसंद आयेगा।
नार्वे से गत 27 वर्षों से लगातार विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अग्रसर है. 
आप को यह अंक कैसा लगा अपने विचार व्यक्त करें!
सुरेशचन्द्र शुक्ल, सम्पादक
ओस्लो, नार्वे 

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता: Tolerance versus intolerance at social media-Suresh Chandra Shukla


Hei, når vi skriver på sosial media vær snill og skrive som gir andre glede. Takk. 
सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता: 
यह चित्र ओस्लो के पत्रकारों के लिए सोशल मीडिया पर था. दोनों पत्रकार वक्ता मेरे दोनों और खड़ी-खड़ी विनम्र बीच में खड़े मेरा अभिवादन लिटरेचर हाउस, ओस्लो में कर रही हैं. धन्यवाद।Et bilde er fra et kurs om sosiale media. Begge sider på bilde er journalister er høflige mot meg som står i midten på Litteraturhuset.
मित्रों! जब हम सामजिक मीडिया में अपने विचार व्यक्त करते हैं तो वह सार्वजनिक हो जाता है. आपके गलत विरोध और पक्षधर होने से आपकी छवि उससे जोड़कर देखी जाती है. इतना ही नहीं आपको और आपके बच्चों को नौकरी और यश में उसका फर्क पड़ेगा। सार्वजनिक की हुई टिप्पणी से आपकी छवि को वह असर पड़ता है जो आपने सपने में भी नहीं सोचा होगा। कृपया आप किसी भी के विचारों पर लिखे तो भावुक होकर नहीं वरन समझदारी से लिखे ताकि जिसके लिए या विरोध में लिखा जा रहा है उससे दुबारा आँख मिलाकर बात की जा सके औए आपको उस वक्तव्य के लिए दूसरों और अपनों के सामने शर्मिन्दा न होना पड़े. आपको बात बुरी लगे तो क्षमा करें और फायदा हुआ है तो मन ही मन खुश हों और दूसरों से भी खुशहाली भरी बातें करें। सभी को कहने और सुनने का हक़ है. कोई ट्वीटर पर एक पंक्ति लिखता है हम उसपर पूरा निबंध लिखने को तैयार रहते हैं पर निबंध रोचक हो तो बात ही क्या है. धन्यवाद आपसे कुछ स्वरचित पंक्तिया साझी कर रहा हूँ जो कभी बच्चों के लिए लिखी थी.
कभी भी बोलो प्यारे बोल
दूजों के मन में रस घोल.
अपने-पराये सभी हमारे
भाईचारे का हो माहौल।।
क्या लाये क्या ले लाओगे,
आदर्श बने इतिहास भूगोल।
कड़वे में भी मीठा घोल
तभी बनोगे तुम अनमोल।।
- शरद आलोक, ओस्लो, नार्वे
यह चित्र ओस्लो के पत्रकारों के लिए सोशल मीडिया पर था. दोनों पत्रकार वक्ता मेरे दोनों और खड़ी-खड़ी विनम्र बीच में खड़े मेरा अभिवादन लिटरेचर हाउस, ओस्लो में कर रही हैं. धन्यवाद।
Et bilde er fra et kurs om sosiale media. Begge sider på bilde er journalister er høflige mot meg som står i midten på Litteraturhuset.

Speil 2015 - 4 utgitt fra Oslo. अंक 4 -2015 स्पाइल-दर्पण

अंक 4 -2015 स्पाइल-दर्पण
ओस्लो, नार्वे से गत 27 वर्षों से प्रकाशित

https://drive.google.com/open?id=0B-Yr4tfxYfDnbGJTUVlydDJZTzRxNlNqWXU2a0V3N0hpYTdR


https://drive.google.com/drive/my-drive

सोमवार, 23 नवंबर 2015

memories fron First Oslo International poetry festival-Suresh Chandra Shukla

पुरानी  यादें: अमृता प्रीतम, अहमद फराज और आक्ताविओ पाश के साथ

Hei, venner. Et bilde er fra Den første Oslo poesifestivalen i 1985. प्रिय मित्रों! आक्तावियो पाश,  अहमद फराज और अमृता प्रीतम के साथ कुछ पुरानी यादें  ताजा कर रहा हूँ. सन 1985 की बात है. नार्वे में ओस्लो अंतर्राष्ट्रीय कविता महोत्सव ( ओस्लो इंटरनेशनल पोएट्री फेस्टिवल) में पंजाबी भाषा की यशस्वी लेखक अमृता प्रीतम और उर्दू के मशहूर शायर अहमद फराज, साहित्य में नोबेल पुरस्कार प्राप्त आक्तावियो पाश के साथ मैंने भी अपनी कवितायें पढ़ीं थी. तीन दिन के इस कार्यक्रम में हम लोग काफी समय साथ-साथ रहे. अमृता जी, अहमद फराज और मैं सिगरेट पीते साथ-साथ शाम पार्टियों में खाते - पीते और कवितायें गुनगुनाते।  पहले सिगरेट पीता था पर बाद में छोड़ दिया था. ब्रिटेन में शरणार्थी की तरह रह रहे अहमद फराज ने उस समय मुझे एक अपनी कविता की पुस्तक दी थी जो उर्दू और अंगरेजी में थी.
हमारे राजदूत कमल नयन बक्शी जी को भुला पाना आसान नहीं है. वह अक्सर निजी पार्टियों में मुझे अपने निवास पर बुलाते और यदि मेरे उचित कपड़े न पहने होने पर मुझे सलाह देकर अपने कपड़े पार्टी के समय पहनने देते थे. देखिये ऐसे भी राजदूत होते हैं कमल नयन बक्शी जी और निरुपम सेन जी की तरह.
चित्र में बाएं से स्वयं मैं, आक्तावियो पाश,  अहमद फराज और अमृता प्रीतम गले मिल रहे हैं.

På bilde fra venstre er Suresh Chandra Shukla, Oktavia Paz, Ahmad Faraz og Amrita Pritam i Den første poesifestivalen i 1985 i Oslo.