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शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

शिवमंगल सिंह सुमन 5 अगस्त सन् 1915 में जन्मे- सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' Suresh Chandra Shukla


शिवमंगल सिंह सुमन एक अच्छे मित्र और रचनाकार - सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'
बायें से शिवमंगल सिंह सुमन, सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' और बेकल उत्साही।

लखनऊ में मुलाकात 
शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी से मेरी मुलाक़ात लखनऊ में अनेक बार हुई उत्तर प्रदेश हिंदी संसथान और लिटरेरी हाउस में शिव शंकर मिश्र जी के साथ. शिवशंकर मिश्र राजेंद्र नगर, लखनऊ में रहते थे. मैंने उनके साथ लन्दन और मैनचेस्टर में कविसम्मेलनों में साथ-साथ कविता पाठ किया था. वह मुझे बहुत मानते थे और मेरी हिंदी सेवा से बहुत प्रसन्न थे. 
5 अगस्त  को उन्नाव ज़िले के झगरपुर ग्राम में जन्मे शिवमंगल सिंहसुमनहिन्दी गीत के सशक्त हस्ताक्षर हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर तथा डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वालेसुमनजी ने अनेक अध्ययन संस्थाओं, विश्वविद्यालयों तथा हिन्दी संस्थान के उच्चतम पदों पर कार्य किया।
साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित 
सन् 1974 में आपकी कृतिमिट्टी की बारातपर आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसी वर्ष में आपको भारत सरकार का पद्म श्री अलंकरण भी प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त भी अनेक पुरस्कारों सम्मानों से सम्मानितसुमनजी ने अनेक देशों में हिन्दी कविता का परचम लहराया।
हिल्लोल’, ‘जीवन के गान’, ‘युग का मोल’, ‘प्रलय सृजन’, ‘विश्व बदलता ही गया’, ‘विंध्य हिमालय ‘, ‘मिट्टी की बारात’, ‘वाणी की व्यथाऔरकटे अंगूठों की वंदनवारेंआपके काव्य संग्रह हैं। इसके अतिरिक्तमहादेवी की काव्य साधनानाम से आपने आलोचना साहित्य भी लिखा है।उद्यम और विकासशीर्षक से आपका गीति काव्य भी प्रकाशित हुआ औरप्रकृति पुरुष कालिदासनामक नाटक भी आपने लिखा।
हिन्दी कविता की वाचिक परंपरा आपकी लोकप्रियता की साक्षी है। देश भर के काव्य-प्रेमियों को अपने गीतों की रवानी से अचंभित कर देने वाले सुमन जी 27 नवंबर सन् 2002 को मौन हो गए।
बायें से बेकल उत्साही, सुरेन्द्र अरोड़ा (हिंदी अधिकारी , भारतीय है कमीशन लन्दन) और  शिवमंगल सिंह सुमन, लन्दन, यू  के में. 

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

सोलह वर्ष की आयु - समय ने दीवाना बन दिया - सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' Suresh Chandra Shukla


सोलह वर्ष की आयु में जब समय ने दीवाना बना दिया
(बचपन के संस्मरण आज लिख रहा हूँ क्योकि मुझे मालुम है की भविष्य में इन्हें लिखने का कभी समय नहीं मिलेगा क्योंकि साहित्यिक लेखन का दबाव होगा।)



अर्थशास्त्र  में  नोबेल  पुरस्कार विजेता और भारत रत्न पुरस्कार  विजेता अमर्त्य सेन के साथ 

हम इस आयु में राजकुमार और राजकुमारी से कम नहीं होते
यह आयु बहुत संयत होती है. मन से  अंकुर फूटने लगते हैं. हवा के झोंके किसी भी नरम टहनी को लचका देते हैं. समय के रथ पर सवार हम सभी इस आयु में राजकुमार और राजकुमारी से कम नहीं होते हैं. आकर्षण और नयनप्रियता एक बार में जो मन में समां गयी वह बहुत समय तक रहती है. 
उत्साह और उमंग की होती है यह आयु. जैसे छोटा शिशु हाथ से छूकर और मुख  में हर वस्तु  डालकर स्वयं  उसे पहचानना चाहता है ठीक उसी तरह मन स्वतन्त्र -स्वच्छन्द अपनी कल्पनाओं के वशीभूत होकर आनन्दित होता है और अपने मित्रों को अपने व्यवहार से संतुष्ट करता है और साथ.साथ सैर करना दूर-दूर तक घूमना फिरना। हंसना और हंसाना।  इस आयु में समय ने मुझे दीवाना बना दिया था. सीमाओं ने आभास कराया, उत्सुकता ने उसे जगाया, फिर ऐसा भी हुआ जब मैं  सारी -सारी रात सो नहीं पाया।
विचारों से विचार उपजते उससे नयी कविता और गीत लिखकर गीत भेंट कर दिया करता था।  मुझे नहीं मालुम कि वे गीत कितने अच्छे थे या नहीं थे पर उस समय मनभावन लगते थे. आप किसी से खुश होते हो, किसी को उपहार देना चाहते हो. या तो भौतिक  उपहार और दूसरा अहसासों का उपहार। मेरे पास देने के नाम पर केवल कविता और अहसास होता। जिसपर कविता लिखता उसे भेंट कर देता।  मेरे पास वे कवितायें नहीं हैं पर भविष्य में यदि लोगों ने बचा रखी होंगी तो शायद प्रगट हो जायें।  मेरे मित्र अक्सर कहते कि मैं अनेकों पर कविता क्यों लिखता हूँ. मुझे एक विषय एक व्यक्ति पर ही कविता लिखनी चाहिए यह बात तब की है जब मैं अनाड़ी था आयु सम्भवता पंद्रह-सोलह वर्ष की रही होगी।  मेरा उस समय कहना था. मैं सभी को अपना मन खोल कर नहीं दिखा सकता था  मेरे पास मेरी कवितायें -भावनायें थीं. कवितायें और मेरी स्नेहिल भावनायें उसकी छाया/ कॉपी  भर है.  
माँ ने परिश्रम करना और सादगी से रहना सिखाया 
चूँकि मेरी माँ (श्रीमती किशोरी देवी) ने गाय पाली थी उसका नाम श्यामा था. मेरी माँ अक्सर मुझे सुबह चार-पांच बजे उठा देती और  गाय के चारा-पानी और सफाई आदि में मदद लेतीं थीं. मैं घर में छोटा था. बड़े भाई की पढ़ाई पर ध्यान दिया जाता था. हमेशा बड़ी संतान की तरक्की पर माता-पिता की ज्यादा नजर होती है. छोटे को दुलार तो मिलता है पर कार्य सभी के करने पड़ते हैं. मेरे जीवन के लिए यह बहुत अच्छा रहा. परिश्रमी होना, जो साधारण कहना मिले उसे प्रेम से खा लेना और जमीन तथा तखत पर भी खुशी-खुशी सो जाना ये सब मेरी माँ की सिखाई हुई बातें हैं जो मुझे आज भी सम्बल देती हैं.
मेरा अनुभव है आप जिससे बहुत प्रेम करते हैं यदि वह आपसे बहुत प्रेम करता है तो ऐसा भी होता है कि वह प्रेम में आपके खिलाफ बहुत बड़ा निर्णय भावना में बहकर ले लेता है.  उसे मालुम होता है कि आप उससे  हर हाल में प्रेम करते रहेंगे।  यह बात प्रेमी की हो या रिश्तेदारों की या सगे सम्बन्धी की.  मेरे मामले में यह सोलह आने सच साबित हुई है. इससे एक बात तो होती है  कि आपके विरोध में कार्य करने और निर्णय लेने वाले पर आप जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हो या इसका एक पक्ष और है. 
मैं आपसे प्रेम करता हूँ , और आप मुझसे सभी कुछ छीन लेते हो । तो आप मांगने के हकदार नहीं होते भले मैं देने को तैयार रहूं।  सबका अपना सच होता है. सबकी अपनी-अपनी करनी और अपने-अपने अनुभव होते हैं.
सभी धर्मों के मित्र  अपने मित्रों के साथ अवकाश के समय घर के बाहर पार्क में बैठे रातभर गप्पे मारना अभी भी याद है. लखनऊ नगर में आयोजित कुछ बड़े कविसम्मेलनों, फिल्म प्रदर्शनों, नौटंकियों को अपने साथियों के साथ देखने जाता था और वहां  आयोजक सदस्य से अपने वयवहार से घनिष्टता बनाने की कोशिश करता था. इससे नए-नए परिचित मिले कुछ जुड़े, कुछ छूटे। 
तब मेरे मित्र हिन्दू, मुस्लिम सिख, ईसाई सभी थे और जन्माष्टमी और रामलीला देखने सभी साथ-साथ जाते थे. यहाँ तक कि मोहल्ले में चन्दा मांगने के लिए जब जाता तो वे सभी साथ देते थे. 
बहुत से विद्वानों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से मिला 
यहाँ मैं  साहित्यकारों से जिनसे उस आयु में मिला जिन मशहूर स्वत्रता सेनानी और नेताओं, शिक्षाविदों और समाज सेवियों से मिला उनका जिक्र नहीं कर रहा हूँ. उसके लिए अलग से लेख लिखूंगा।  उस समय के बहुत से लोग हैं जैसे स्वतंत्रता सेनानियों में शचींद्र नाथ बक्शी, रामकृष्ण खत्री, दुर्गा भाभी, गंगाधर गुप्ता जी शिक्षाविदों में सत्य नारायण त्रिपाठी, डा दुर्गाशंकर मिश्र, भारती गांधी और जगदीश गांधी, समाजसेवियों में  पुरानी  लेबर कालोनी ऐशबाग के भगत जी जिन्हें हम पापाजी कहते थे, सम्पादकों में  शिव सिंह सरोज, अशोक जी वीरेंद्र सिंह जी और वचनेश त्रिपाठी जी आदि-आदि.  
आईये मेरी पुरानी स्वरचित कविता  का कुछ आनंद लीजिये।
पास रहना, अजनबी कहना, रोज की बात थी.
साथ चलना, फिर खिलखिलाना, रोज की बात थी
पहेलियां बुझा न सके, बस यही चर्चा में रहा,
चित  में बसा था जिन्हे, रोज उनकी बात थी

बस मन में  जो पर्दा रहा, उसी का अफसोस है,
लखनऊ से अमरीका तक, रोज उसकी बात की. 
हाँ और ना में कभी फर्क, समझा नहीं मदहोश था.
प्रेम में झांकना, दीप में तापना,  रोज की बात थी.

गीतों में मेरे नाचना, नयनों से छिप-छिप देखना।
मंच पर घुंघरू की तरह, बेबाक होकर थिरकना।
आज सब कुछ याद है, पर कुछ नहीं मैं कर सका.
वह उसके मन के पृष्ठ थे, ये मेरे मन का फलसफा।
हाई स्कूल के मित्रगण 
कक्षा नौ से दस तक मेरी कक्षा में अनेक मित्र आये और गये. सोलह वर्ष की आयु थी, तब तक कुछ कवितायेँ लिखी थीं. स्कूल में खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कुछ इनाम चटकाये थे. हिन्दी और साहित्य में रूचि के बाद भी सभी विषयों की तरफ ध्यान नहीं गया बस इसके अलावा किसी बात का अफ़सोस नहीं रहा क्योंकि परीक्षा में पास होने के लिए सभी विषयों में पास होना जरूरी होता है.
इस अवस्था में मन में स्वप्नों की हिलोरें, अल्हड़ता का रंग, मित्रों के साथ समय बिताने की मस्ती हर कोई स्मरण जरूर करेगा। अनेक जीती जागती कहानियां कभी स्पर्श करके निकल जातीं या कभी दर्शन देकर कुछ समय के लिए लुप्त हो जातीं। कक्षा नौ से दस तक मेरी कक्षा में अनेक मित्र आये और गये. अवस्था में कुछ मेच्योरिटी /परिपकवता आने लगी थी.  तब समय ने मुझे दीवाना बना दिया था.
हाई स्कूल के मित्रगणों में बहुत से मित्र रहे पर कुछ का ही जिक्र यहाँ करूँगा अनेक मित्रों से मित्रता के अलग-अलग केंद्र बिंदु थे.
जिनके साथ पार्कों या स्नस्थानों में फ़िल्में देखने जाता उसमें अहमद अली, विजय सिंह दिनेश जायसवाल, ओम प्रकाश, आत्मा राम मुख्य थे.
सिनेमाहाल में जिनके साथ जाता था उनमें मनोज सिंह, आनंद प्रकाश गुप्त, विजय सिंह आदि मुख्य थे.


सोमवार, 11 जुलाई 2016

शिशुकाल से बालकाल तक -सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' Suresh Chandra Shukla

शिशुकाल से बालकाल तक 



अपने बचपन को  स्मरण करते हुए  आपको अपनी एक पुरानी  कविता से  सराबोर करने का प्रयास कर रहा हूँ।  आशा है  कि  आपको भी अपना बचपन याद हो आयेगा।  स्मृति के फूल झड़ेंगे  और आप शायद  आनन्दित हों पढ़कर।  
ओ मेरे बचपन फिर आना 
मधुर-मधुर बचपन फिर आये,
फिर से मुझको गीत  सुना ये   ।
जिसमें खोकर भूलूँ दुखड़े,
बचपन - मित्रों से पुनः मिलाये।  

झूलों में वह पैंग मारना ,
पैंग  मार कर नभ को छूना। 
कभी अकेले कभी  साथ में ,
घूम-घूमकर चक्कर  खाना। . 

लुका  छिपी का खेल सुहाना ,
कभी रुलाना कभी हँसाना ,
रूठे हुये  को पुनः  मनाना ,
चूम-चूमकर  गले लगाना।  

स्वाधीनता दिवस  जब आये   ,
प्रभात फेरी , ध्वज लहराना। 
गली -गली  में द्वार-द्वार तक,
देशभक्ति के नारे  गाना। 

ओ मेरे बचपन फिर आना 
नये  पुराने राग  सुनाना। 
बिछड़े मीतों को  मिलवाना,
यादों  की  बांसुरी बजाना। 

दौड़-दौड़  तितली के पीछे ,
उसे पकड़ना , उसका मरना। 
फिर  पुस्तक में  उसे संजोना ,
सुख-दुःख साँझा रिश्ता रखना। 

झूठ -मूठ  थी लगी  भली  थीं,  
माँ -दादी  की  कही कहानी। 
सुनकर  रोमांचित हो जाते ,
सुधियों  की बस रही  निशानी।।  


संस्मरण 
(मेरे पास बचपन की कोई तस्वीर नहीं है. स्कूल में एक सामूहिक चित्र खींचा गया था पर मेरे पास नहीं है यदि किसी के पास मेरी बचपन की तस्वीर हो तो कृपया उसे ई-मेल से भेंट की कृपा करें या इसमें किसी प्रकार का सहयोग भी सराहनीय होगा। कभी -कभी  विचार करता हूँ कि यदि चित्रकार होता तो स्कैच/रेखाओं से चित्र बनाकर लोगों को अपने बचपन के बारे में बताता।
बचपन की दो बातें याद हैं. एक चीन ने जब १९६२ में  भारत पर आक्रमण किया था तब हमने अपनी बस्ती में बड़ों के साथ भारत की एकता और चीन के खिलाफ फेरी में सम्मिलित हुये थे. दूसरी बात याद है कि विवेकानंद जी की जन्मशती पर हमने सहयोग के लिए कार्ड खरीदे थे उनकी कन्याकुमारी उनकी याद में स्मारक बन्ने में सहयोग के लिए.
बचपन में हम मस्त रहते हैं. कोई चिंता नहीं। कोई परवाह नहीं। नये-नये  सपने बनते और मिटते। आपस में प्रेम से खेलते-लड़ते और फिर एक हो जाते जैसे कुछ हुआ ही नहीं। इसी लिए कहा गया है बचपन सबसे अच्छा होता है।  स्कूल में छुट्टी होने के बाद हम तरह-तरह से चलते, मटकते हुए, कूदते फांदते हुए.  बचपन में कितना आनन्द मिलता था यह विचार कर मन पुलकित हो जाता है.  
पूनम शिक्षा निकेतन में 
नर्सरी से कक्षा तीन तक 
पूनम शिक्षा निकेतन बड़ी कालोनी ऐशबाग में स्थित है. इसे इप्रूवमेंट ट्रस्ट कालोनी भी कहते हैं. यह पुरानी  श्रमिक बस्ती ऐशबाग और स्वरूप कोल्ड स्टोरेज-राष्ट्रीय स्वरूप समाचार-पत्र प्रेस  के मध्य में स्थित है.

विद्यालय की मालकिन और बड़ी आंटी के नाम से ख्याति प्राप्त कौशल्या जी इस स्कूल की प्रधानाचार्य हैं.
अभी भी वह रोज रिक्शे से प्रातः स्कूल आती हैं, यह मुझे उनके  निजी रिक्शाचालक से बातचीत से मालुम हुआ जब मार्च २०१६ को एक दिन सुबह लखनऊ प्रवास में स्कूल के सामने टहलते हुए जा रहा था.
उनके पति जिन्हें हम अंकल जी कहते थे वह रेलवे में कार्यरत थे जिनकी बहुत पहले मृत्यु हो चुकी है.

पूनम शिक्षा निकेतन स्कूल में मैंने नर्सरी से लेकर कक्षा तीन तक शिक्षा प्राप्त की है.
स्कूल के आँगन में हमारी पंक्ति बनाकर प्रार्थना होती थी.
उस समय मेरी एक अध्यापिका थीं वह पुरानी श्रमिक बस्ती में १९ /७ में रहती थीं. एक शुक्ला आंटी के नाम से मशहूर थीं जो इसी कालोनी में १३/४ में रहती थीं. इसी में सं १९८६-१९८७ में नीरू पढ़ाती थी.
कागज की नाव बरसात का पानी 
बरसात में यहाँ आँगन में पानी भर जाता था हम लोग कागज़ की नाव बनाकर तैराते थे. कागज को मोम से रगड़ते थे ताकि कागज़ की नाव पानी को सहन कर सके. दो तरह की नाव बनाना ( एक सादी नाव और दूसरी जिसमें ऊपर आधी में ऊपर से ढकी हो ताकि नाव में सवार पानी बरसने पर न भीगें।) . कागज के जहाज  बनाकर अध्यापिका के न होने पर उसे कक्षा में ऊपर उड़ाना बहुत अच्छा लगता था. हम एक दूसरे के ऊपर भी उड़ाते थे बड़ा अच्छा लगता था.
जब कक्षा तीन में था तब बरसात में कभी-कभी कक्षा की छत से पानी टपकता था.
कागज के फूल 
इसी विद्यालय में हमने कागज़ के फूल, हार बनाना सीखा था. पलास्टिक के  तार जिससे कुर्सी आदि बुनते हैं उसी तार से हमको बेल्ट बनाना सिखाया गया. कागज के फूल बनाते और घर में माँ और पिताजी को भेंट करते थे.
तार से  बनी बेल्ट/पेटी हम अपनी पैन्ट में बांधते थे.
मीठे -मीठे शहतूत 
स्कूल एक पीछे गली और उसके बाद एक बगिया थी जहाँ शहतूत के अनेक पेड़ थे. हम शहतूत तोड़ने अवकाश के समय जाया करते थे. अपने बाल मित्रों के साथ वहां जाना बहुत अच्छा लगता था. स्कूल एक पीछे गली ऐशबाग ईदगाह के पीछे की दीवारों को आगे जाकर मिलती थी और यह गली पुरानी श्रमिक बस्ती के ब्लाक नम्बर ६० के सामने समाप्त होती थे जहाँ एक और स्कूल है.
लंगड़ी-टांग का खेल 
हम जब स्कूल में पहले आ जाते तो हम एक खेल प्रायः खेलते थे जिसे हम लंगड़ी-टांग  कहते थे. इस खेल में एक व्यक्ति एक टांग से दौड़-दौड़कर दूसरों को छूने की कोशिश करता था. हम उसकी पीठ  को बार-बार छूकर उसे छेड़ते थे. जिसे वह छू लेता था तब उसकी बारी आती थी. फिर वह सहपाठी एक टांग से फुदकता हुआ दूसरों को छूने का प्रयास करता।
हाई स्कूल के मित्रगण 
कक्षा नौ से दस तक मेरी कक्षा में अनेक मित्र आये और गये. सोलह वर्ष की आयु थी, तब तक कुछ कवितायेँ लिखी थीं. स्कूल में खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कुछ इनाम चटकाये थे. हिन्दी और साहित्य में रूचि के बाद भी सभी विषयों की तरफ ध्यान नहीं गया बस इसके अलावा किसी बात का अफ़सोस नहीं रहा क्योंकि परीक्षा में पास होने के लिए सभी विषयों में पास होना जरूरी होता है.
इस अवस्था में मन में स्वप्नों की हिलोरें, अल्हड़ता का रंग, मित्रों के साथ समय बिताने की मस्ती हर कोई स्मरण जरूर करेगा। अनेक जीती जागती कहानियां कभी स्पर्श करके निकल जातीं या कभी दर्शन देकर कुछ समय के लिए लुप्त हो जातीं। कक्षा नौ से दस तक मेरी कक्षा में अनेक मित्र आये और गये. अवस्था में कुछ मेच्योरिटी /परिपकवता आने लगी थी.

शनिवार, 9 जुलाई 2016

बचपन के दिन भूल न पाऊँ --सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

बचपन के दिन मैं भूल न पाऊँ।

कुछ यादें रस्तोगी विद्यालय की 
जब मैं गोपीनाथ लक्ष्मण दास रस्तोगी इंटर कालेज ऐशबाग, लखनऊ में पढ़ता था तब के कुछ संस्मरण सुना रहा हूँ. सन् १९६५ में नगरपालिका स्कूल में पांचवी कक्षा पास करने के बाद मेरी रस्तोगी इंटर कालेज ऐशबाग में प्रवेश परीक्षा हुई जिसमें गणित, इमला (हिन्दी), के ज्ञान की परीक्षा हुई.
मैं इस विद्यालय में सन् १९६५ से लेकर १९७३ तक पढ़ा हूँ.
विद्यालय में कक्षा छः से लेकर कक्षा आठ तक की कक्षा दिन में बारह बजे और कक्षा नौ से कक्षा बारह तक की पढ़ाई  सुबह की शिफ्ट/पारी में होती थी.
विद्यालय में कक्षा छः से लेकर कक्षा आठ तक की कक्षायें  दिन में बारह बजे और कक्षा नौ से कक्षा बारह तक की पढ़ाई  सुबह की शिफ्ट/पारी में होती थी.
टूटी चप्पल पहनकर स्कूल जाता था. 
प्रार्थना कराने के लिए चप्पल बदल लेता था. मंच/स्टेज पर घिस्लाते हुए चप्पल ले जाना बहुत अजीब लगता था. विद्यालय शुरू  होने के पहले प्रार्थना होती थी जिसमें राष्ट्र गान और प्रतिज्ञा कराई जाती थी. अक्सर मैं स्टेज पर जाकर प्रतिज्ञा कराता था. अतः अपनी टूटी हुई चप्पल को किसी सहपाठी से बदलकर स्टेज पर जाता था.
रबर की बनी हवाई चप्पल जिन्होंने इस्तेमाल की होगी तो उन्हें पता होगा कि वह वाई आकर की होती है और उसके तीन सिरों पर शोल में फंसने के लिए बटननुमा बनावट होती है जब आगे का बतननुमा हिस्सा अधिक चलने से घिस जाता था तो वह टूट जाता था. जब उसकी मरम्मत कराते थे तो उसे कारीगर चमड़े या रेक्सीन के टाँके लगा देता था, जो फिर टूट जाती थी.
नंगे पाँव रहने की आदत 
उस समय वहां लगे पांव रहने की आदत हो गयी थी. इसी कारण अक्सर दाहिने पैर के अंगूठे के बगल वाली अंगुली में ठोकर लगती थी और अक्सर घायल हो जाया करती थी उसकी खाल चील जाते थी उससे तीस उठती थी कभी उसे पत्ते से दबाकर रखता तो कभी बीड़ी का कागज़ लगा लेता था ताकि थोड़ा आराम मिले और खाल दुबारा उसी में चिपक जाये।
पेड़ पर चढ़कर दातून तोड़ना 
जब खाली समय होता तो नीम के पेड़ पर चढ़कर उसकी कोमल टहनियाँ तोड़ता जिसे हम दातून बनाकर ब्रश की तरह स्तेमाल करते थे. नीम की कड़वाहट और उसे चबाकर ब्रशनुमा बनाने से पूरे मुख्य में लसलसा मंजन जैसा हो जाता और उसका कड़वापन मुख्य में ताजगी का अहसास देता था.
पढ़ाई को गम्भीरता से नहीं लिया
कक्षा सात और आठ में अंग्रेजी के अध्यापक पी के शुक्ल थे जो बहुत लम्बे थे. जिन्हें पीठ पीछे विद्यार्थीगण उन्हें शुतुरमुर्ग कहते थे.  उनकी कक्षा को कट करने का खामियाजा हमको नौवीं और दसवीं कक्षा में उठाना पड़ा.
कक्षा नौ को मैंने गम्भीरता से नहीं लिया था. नौवीं कक्षा में मेरे कक्षा अध्यापक राघव जी थे. जो अंगरेजी पढ़ाते थे. उनकी कक्षा में जाना अच्छा लगता था क्योंकि प्रश्नों के जवाब नहीं मालुम होने पर भी वह केवल व्यंग्य करते थे पर अनुशासन में वह बहुत सख्त थे. परीक्षा में अंग्रेजी में अनुत्रीण होने के बावजूद मुझे कॉम्प्लीमेंट्री पास कर दिया गया. मेरा एक मित्र जिसका नाम सुरेन्द्र था पर घर का नाम कोडू था जो सरल सहृदय था और पुरानी  श्रमिक बस्ती में रहता था.

मैं  मित्रों के साथ बहुत घूमा।  फिल्म देखने का शौक उस समय एक नशे की तरह था. उस समय पार्कों में भी निशुल्क फ़िल्में दिखाई जाती थीं जिसकी सूचना समाचार पत्र में 'लखनऊ में आज' और 'नगर में आज' नामक शीर्षक के अंतर्गत छपती थी.  सिनेमा का टिकट भी सस्ता था.
पुरानी श्रमिक बस्ती में श्रम हितकारी केंद्र था. वहां खेल (फ़ुटबाल, बालीवाल और शतरंज खेलने के लिए मिलता था. समचरपत्रक का भी एक कमरा था और लाइब्रेरी भी थी. यहाँ से हमको भारत स्काउट और गाइड की ट्रेनिंग भी दी जाती थी जिसके अध्यापक पुरानी लेबर कालोनी में ही रहने वाले श्री खरे जी और दिनेश श्रीवास्तव जी थे.
स्काउट के कैडेट बनकर हम दो बार लखनऊ के स्टेडियम में गए जहाँ बाल युवा समारोह था जिसके आयोजक भारती और जगदीश गांधी जी थे जो लखनऊ में मशहूर सिटी मोंटेसरी स्कूल के संस्थापकद्वय हैं.
हाईस्कूल में फेल हो गया
मेरी  गोदावरी बुआ हमको बहुत प्रेम करते थीं. उन्हीं दिनों वह बहुत गम्भीर रूप से बीमार हुईं और मेडिकल कालेज में भरती हो गयीं उन्हें खाना  देने अस्पताल जाया करता था. श्री नंदकिशोर बाजपेयी फूफा जी भी अक्सर हमारे घर आया करते थे. हम भी कभी-कभी उनके पास गर्मी की छुट्टियों में लालगंज रायबरेली जाया करते थे.
उधर सन् १९७० में हाईस्कूल में फेल हो गया  और उसके बाद विद्यालय में  साहित्य परिषद, विज्ञान परिषद  और सांस्कृतिक परिषद के चुनाव जीत गया. इन परिषदों में अध्यक्ष का चुनाव नहीं होता था. इनमें अध्यापक ही अध्यक्ष होते थे अतः साहित्य परिषद के अध्यक्ष श्री गंगाराम त्रिपाठी और सांस्कृतिक परिषद के अध्यक्ष लेखक श्री सुदर्शन सिंह जी थे. विज्ञान परिषद में लाइब्रेरियन, साहित्य परिषद में उपाध्यक्ष और सांस्कृतिक परिषद में मंत्री चुना गया था. विज्ञान परिषद में लाइब्रेरियन होने से जो विद्यार्थी पुस्तक देर से जमा करते थे उन्हें जुर्माना देना पड़ता था जिसका कुछ हिस्सा विज्ञानअध्यापक-कोष में बाकी स्वयं खर्च करने की इजाजत थी क्योंकि यह काम  खाली और अवकाश के समय मुझे करना होता था.
विद्यालय के कार्यक्रमों ने मेरी साहित्य की तरफ रूचि बढ़ायी।
रेलवे में नौकरी 
मेरे बाबा, पिताजी, बड़े फूफा जी सभी आलमबाग लखनऊ स्थित सवारी और मालडिब्बा कारखाना में काम करते थे. मेरे फेल होने पर मेरी रेलवे में श्रमिक की नौकरी की तैयारी शुरू हो गयी. मेरा साक्षात्कार लिया गया साक्षात्कार में खेल सम्बन्धी प्रश्न पूछे गए और एक बड़ा पत्थर का टुकड़ा और एक भरी बोरी को कंधे में रखकर दिखाना था.
सन् १९७२ में मैंने हाईस्कूल पास/ उत्रीण कर लिया था.  और मेरी नौकरी रेलवे में श्रमिक के तौर पर लग चुकी थी.  रेगुलर स्कूल में पढ़ना मुश्किल हो रहा था.
जब कारखाने में दिन की शिफ्ट में काम करता था तब प्रातः सुबह सात बजे से चार बजे तक काम करना होता था और विद्यालय भी प्रातः साढ़े सात बजे से शुरू होकर बारह -साढ़े बारह बजे समाप्त होता था.  शाम और रात की शिफ्ट में ही काम करके ही विद्यालय में जाना संभव हो पाता था.
खाली समय में कविता से प्रेम 
काम-करते-करते खाली समय में कविता की कुछ पंक्तियाँ जो भी कागज़ का टुकड़ा मिलता उसपर लिख लिया करता था. एक नोटबुक भी बनायी थी उसपर भी कवितायें लिखता रहता था. कभी-कभी एक घंटे के लन्च के अवकाश में और कभी काम समाप्त होने पर शाम छुट्टी के बाद विधानसभा  मार्ग पर दैनिक समाचारपत्र स्वतन्त्र भारत में प्रकाशन के लिए देने जाया करता था.  पास में ही आकाशवाणी  (रेडियोस्टेशन) था.
मेरे पिता जी भी कभी-कभी एक दो कवितायें गुनगुनाया करते थे जब मैं ४१/३ पुरानी लेबर कालोनी में रहता था.
उनके कोई भी बोल मुझे याद नहीं हैं.

बचपन के कुछ मित्र -सहपाठियों के नाम 

कक्षा एक से तीन तक के मित्रों में अमर प्रकाश गुप्ता, अमिता, झमन, अमोद वासदेव, इन्द्रा, मंजू और अन्य।
शम्भू पांजा, विनोद भल्ला, अशोक शर्मा(मुन्ना), सिराज अहमद ये पड़ोस में रहते थे और कक्षा चार-पांच के समय के सहपाठी  थे.
कंचन चटर्जी पड़ोस में रहता था अतः उसके साथ विजय सिंह के द्वार पर क्रिकेट खेलते थे.
कक्षा छः से कक्षा आठ तक के समय में अमर, रमन श्रीवास्तव, सुरेन्द्र (कोडू), कुंडू, महेन्द्र तिवारी, नरेश धमीजा, सूर्य प्रकाश, एक मित्र मास्टर कन्हैया लाल रोड  पर रहते थे  नाम याद नहीं आ रहा है.





शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

ओस्लो, ०१.०७. १६ डायरी कलाकार फारुख शेख एक बहुत अच्छे इंसान थे - सुरेशचन्द्र शुक्ल Suresh Chandra Shukla

ओस्लो, ०१.०७. १६ डायरी 
कलाकार फारुख शेख एक बहुत अच्छे इंसान थे - सुरेशचन्द्र शुक्ल 
Suresh Chandra Shukla
क्लब ६० फिल्म फारुख शेख और सारिका की फिल्म है जिसमें रघुबीर यादव का अभिनव जानदार है.


यह एक अच्छी फिल्म है जो फिल्म में कुछ बुजुर्ग परिवारों के हालत का अच्छा वर्णन करती है.
यह फिल्म ६ दिसंबर २०१३ को परदे पर आयी -रिलीज हुई. फिल्म रिलीज होने के २१ दिन बाद २७ दिसंबर को  फारुख शेख जी का निधन सऊदी अरब में हो गया था. मुझे फारुख शेख के निधन से बहुत दुःख हुआ.
वह एक अच्छे इंसान थे. मेरी उनसे दो मुलाकातें  हुई थीं. जिन्हें मैं नहीं भूल सकता हूँ.
फारुख शेख स्वयं तो एक बहुत अच्छे कलाकार थे.   वह जानी-मानी अभिनेत्री शबाना आजमी के साथ ओस्लो आये थे. तब उन्होंने ओस्लो में अमृता प्रीतम द्वारा रचित  'मेरी अमृता' पर शबाना आजमी जी के साथ मोनो प्ले किया था. दोनों ने अपने अभिनय का लोहा मनवाया था और शबाना जी ने सभी को अपने अभिनय से रुला दिया था.
मेरी  फारुख शेख जी से ३५ मिनट की मुलाक़ात हुई थी.
उसके बाद मेरी मुलाक़ात लखनऊ के ताज होटल में हुई थी तब वह होटल में प्रवेश कर रहे थे और मैं होटल से बाहर निकल रहा था . फिर मैंने आवेदन किया कुछ बातचीत करने के लिए और  वह राजी हो गए थे. विचार-विमर्श किया था. उन्होंने आवश्यकता पड़ने पर सहयोग का आश्वासन भी दिया था. असल में फिल्म के सम्बन्ध में कुछ जानना और सहयोग चाहता था इस पर कभी और चर्चा करेंगे।
जावेद अख्तर और शबाना आजमी के दुनिया में बहुत प्रशंसक हैं. मैं तो उनके परिवार में सभी संस्कृतिकर्मियों का प्रशंसक हूँ.
सबसे पहले कैफी आज़मी जी का जिनसे मेरी मुलाक़ात डायकमामान्सके पुस्तकालय के बाहर हुई थी. वह यहाँ एक मुशायरा में भाग लेने आये थे.
इसके बहुत पहले जब मैं लखनऊ में पढता था. उनके दर्शन २ अक्टूबर १९७२ में को लखनऊ में यूनियन कार्बाइड के तालकटोरा स्थित बड़े मैदान में मंच पर हुये थे जहाँ मैंने भी अपनी कविता महात्मा गांधी जी पर पढ़ी थी 'हे बापू तुम धन्य हो'. कैफी आजमी जी उसमें ख़ास मेहमान थे.
मुंबई में श्रीमती पुष्पा भारती जी द्वारा आयोजित धर्मवीर भारती जी पर केंद्रित  कार्यक्रम में जावेद अख्तर और बॉलीवुड के मशहूर खलनायक अमरीश प्यूरी से बात हुई थी जिन्होंने मंच पर धर्मवीर भारती जी की पुस्तक का पाठ करते हुए अभिनय किया था और मुझे डा गिरिजाशंकर त्रिवेदी जी की कृपा से साथ-साथ पुस्तक का विमोचन करने का अवसर मिला था. तब शबाना जी राजयसभा सदस्य थीं पर फिर भी जमीन में बैठी थीं.
यह परिवार संस्कृति और साहित्य में एक बहुत बड़ा स्थान रखता है जो सभी के लिए एक उदाहरण है.
जावेद अख्तर दोनों ही एक मिलनसार व्यक्ति हैं और फारुख शेख कभी न भूलने वाले व्यक्तित्व थे.  

बुधवार, 22 जून 2016

बृजमोहन ने सभी को मोह लिया (संस्मरण) - सुरेशचन्द्र शुक्ल suresh chandra shukla

बृजमोहन ने सभी को मोह लिया (संस्मरण) - सुरेशचन्द्र शुक्ल suresh chandra shukla
(मेरे पिताजी बृजमोहनलाल शुक्ल)

(मुझे संस्मरण लिखने के लिए दो लोगों ने बहुत जोर दिया दोनों ही साहित्य और आलोचना में जाने माने नाम हैं. ये नाम हैं डॉ कमल किशोर गोयनका और डॉ गिरिराज शरण अग्रवाल। इसी के साथ यह भी शायद महत्वपूर्ण हो कि ओस्लो में मेरे  बियरके के टाउन मेयर ने मुझपर  नार्वेजीय भाषा में  पुस्तक लिखी है जो उन्होंने मेरे साक्षात्कार लेकर लिखी है. पिछले  वर्ष मुझे  नार्वे से  अनेक पुरस्कार मिले थे  इसी कारण  नार्वे के लोग मेरी बायोग्राफी  पढ़ना चाहते हैं।  पर  बहुत कुछ कहना होता है और  बहुत कुछ छिपाना पड़ता है।   अब मैं  फिर से कुछ संस्मरण लिख रहा हूँ बिना पॉलिश और  बिना सजधज  और काटछांट के। जो संस्मरण मैंने यहाँ ब्लॉग पर लिखने शुरू किये हैं वह शुरुआत है और दूसरों की राय से और स्वयं भी संवर्धन करने में आसानी होगी। उसके बाद ही  निकट भविष्य में पुस्तक के रूप में प्रतिष्ठित  प्रकाशकों को छपने दूंगा।   निम्न लिखे संस्मरणों में संपादन और संयोजन की  अभी जरूरत लगती है  फिर भी ऐसी सूचनायें  अन्यत्र उपलब्ध नहीं हैं इस लि ए फिलहाल यह अपने आप में  एक ही है. धन्यवाद।   )


जब मैं कक्षा नौ में रस्तोगी कालेज ऐशबाग़, लखनऊ में पढ़ता था  सन् १९६९ में मेरी कविता अखबार में  प्रकाशित हुई तो पिता जी ने उस अखबार को अपने मित्र मिश्रा जी को पढ़ाया और खुश हुए. 

अपने मोहल्ले में आयोजित होली के एक कार्यक्रम में उन्होंने जब मुझे कैरिकेचर करते और कविता पाठ करते सुना तो उन्होंने मेरी माताजी को खुशी व्यक्त करते बताया और शंका व्यक्त की कि कहीं सुरेश कलाकार न बन जाये फिर क्या होगा?  इसके साथ ही वह मेरे घूमने और सिनेमा देखने की रूचि से थोड़ा परेशान रहते थे जिसे मैं बहुत बाद में जान सका था. 

सन्  १९७१ से सन् १९७७ तक पुरानी श्रमिक बस्ती ऐशबाग में 'युवक सेवा संगठन' की स्थापना की और मोहल्ले में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने लगा था. 
सन्  १९७१ से सन् १९७७ तक आयोजित इन कार्यक्रमों में  स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों: शचींद्र नाथ बक्शी, राम कृष्ण खत्री, गंगाधर गुप्ता जी और समाज सेवियों में भारती और जगदीश गांधी, योगेन्द्र नारायण,  मंगला प्रसाद मिश्र, स्थानीय लेखकों में : शिवशंकर मिश्र, सत्य नारायण त्रिपाठी, शारदा प्रसाद भुसुंडि, वकील इलाहबादी, डॉ दुर्गाशंकर मिश्र, एल बी वार्ष्णेय और अन्य अतिथि बने थे. पिताजी सभी कार्यक्रमों में उपस्थित रहते थे.  
आइये मेरे पिताश्री जो इस दुनिया को बहुत पहले ही सन् १९९२ में छोड़कर चले गए थे, आइये इस संस्मरण में उनके बारे में कुछ और जानें।  

मेरे पिता बृजमोहनलाल शुक्ल को जैसा मैंने देखा 

हाजिर जवाब मेरे पिता से जब मेरे बी ए में मेरे मित्र रमेश कुमार ने पूछा,
"चाचा जी आप नशा करते हैं आप भांग खाते हैं." पिताजी ने जवाब दिया, " जब भतीजे पूरी पूरी बोतल (शराब) उड़ा जाते हैं तो चाचाजी तो मामूली नशा करते हैं."

मैंने डी  ए वी  कालेज से इंटरमीडिएट कालेज लखनऊ से इंटर पास किया और  बी एस एन वी डिग्री कालेज से बी ए किया था. दोनों ही विद्यालय में छात्रसंघ के चुनाव भी लड़े थे. मेरे सहपाठी जो चुनाव में मेरे प्रतिद्वंदी थे उन्होंने मेरे घर कुछ अपने दबंग मित्रों को मुझे चुनाव में न लड़ने की हिदायत देने के लिए भेजा था. वे तीन लोग थे. उनमें से एक ने कहा कि आप अपने बेटे को चुनाव लड़ने से मना  कर दीजिये नहीं तो वह घर वापस नहीं आयेगा। मेरे पिताजी ने उनसे बातचीत की और उन्हें शांत कर चाय पिलाकर भेजा।

अपने समाज में किसी आम आदमी का नेता बनना किसी नेता और राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं को नहीं सुहाता है. वे लोग रुकावट खड़ी करते रहते थे. यह मैंने अपने युवावस्था में ही जान लिया था. मेरे पिताजी मेरे छात्रनेता बनने के खिलाफ नहीं थे पर मुझे नौकरी और पढ़ाई में रुकावट आये बिना यह सब करना होता था। कक्षा दस में जब था तो मेरी रेलवे में नौकरी मेरे पिता और उनके मित्र श्री सत्य नारायण त्रिपाठी जी की कृपा से लग गयी थी.

मुझे यह जानकार बहुत अजीब लगा था अपनी माँ से यह जानकर कि जब मैं तीन वर्ष का था अपने ननिहाल में था और बहुत गम्भीर रूप से बीमार पड़ा था. बड़ी चेचक भी निकली थी. तब मेरे पिता कभी भी मुझे और मेरी माँ को देखने नहीं आये थे. पूरे जीवन में वह एक बार ही मेरे स्कूल गए थे जब मेरा प्रवेष कक्षा नौ में होना था.

जब मैं तीसरी कक्षा में पूनम शिक्षा निकेतन बड़ी कालोनी ऐशबाग़, लखनऊ में पढ़ता था  तब परीक्षायें  होने वाली थी तब तीन महीने की गर्मियों की छुट्टी की एडवांस फीस जमा होनी थी. पर पिताजी मेरी फीस न जमा कर सके थे अतः मेरा नाम कट गया था. उसके बाद मेरे पिता ने नगरपालिका के स्कूल में दाखिला दिलाया था जहाँ से मैंने कक्षा  पांच पास की थी. वहां एक अध्यापक थे जिनका नाम नन्हा महाराज जो छन्द लखने और सुनाने में सिद्धहस्त थे. पिताजी का नन्हा महाराज से परिचय था. नन्हा महाराज बताते थे कि मेरे पिता को भी कवितायें  लिखने का शौक था. मैंने अपने पिता को गुनगुनाते तो देखा था पर कभी उन्हें उनकी अपनी कवितायें सुनाते नहीं सुना और नहीं देखा था.
वह हमको इस श्लोक से सीखने को कहते थे. जो बहुत चर्चित श्लोक है विद्यार्थियों को लेकर था
''काक चेष्टा, वको न ध्यानम्, स्व निद्रा तथयि  वचः,
अल्पहारी गृहस्त त्यागी, पंचकर्म विद्यार्थी।"

उन्नाव में जन्म और लखनऊ में पूरा जीवन बिताया 
मेरे  पिताजी का पूरा नाम डॉ बृजमोहनलाल शुक्ल है जो अंग्रेजी में अपना नाम बी एम लाल लिखते थे. 
उनका जन्म १९---- को मवैयामाफी गाँव, थाना अचलगंज और पोस्ट आफिस बेथर, उन्नाव जिले में हुआ था और मृत्यु लखनऊ में          १९९२ को हुयी थी. लखनऊ में पहले चित्ताखेड़ा और फिर ३०/८ एवं ४१/३ पुरानी  लेबर कालोनी, ऐशबाग में और अंत में अपनी मृत्यु तक ८-मोतीझील ऐशबाग रोड, लखनऊ में रहते थे.  
लम्बा कद, बड़ी आँखें, आकर्षक चेहरा, सांवला रंग, बातूनी (बातचीत करना पसंद करने वाले) धैर्य और खाने और पहनने में शौक़ीन  मेरे पिता को आर्थिक  स्थितियों ने सादगी में रहने के लिए मजबूर किया था. बचपन में मैंने देखा कि उन्हें हैट और ओवर कोट पहनने का शौख था परन्तु पिता को आर्थिक समस्याओं ने मजबूर किया आम कपडे पहनने को.  बाद में कुर्ता धोती और सदरी पहनते रहे और केवल एक कोट को बरसों पहनकर गुजारा किया।

भाई-बहनों में सबसे बड़े 
वह अपने भाई बहनों में सबसे बड़े थे.  उनसे छोटे क्रम से: कृष्ण गोपाल (साधुओं की संगत के कारण वह घर पर नहीं रहते थे और कृष्ण गोपाल चाचा पता नहीं जीवित हैं कि नहीं), रामरती (बुआ), स्व गोदावरी (बुआ), राम गोपाल (चाचा जो सुल्तानपुर नगर में सिविल लाइन्स में रहते हैं.) सावित्री (बुआ मुम्बई में रहती हैं) और कृष्णा (बुआ रायबरेली में ) रहती हैं.


चित्र में बृजमोहन लाल  जी अपनी पोती संगीता  शुक्ल के साथ सन १९८० में 

मेरे संबंधियों की नजर मेंं पिताजी 
वह हर काम में निपुण थे : मेरी बड़ी बुआ रामरती जी ने बताया, "बड़े भैया मुझसे और लल्ला भैया (कृष्ण गोपाल शुक्ल) से बड़े थे. हम सभी साथ-साथ खेलते थे. वह शांत स्वभाव के थे. अपने भाई बहनों से प्रेमभाव रखते थे. वह मिलनसार थे और हर काम में निपुण थे." बड़ी बुआ कुछ विचार करती हुई कहती हैं, "बड़े भैया चाहते थे कि हम सभी लोग पास-पास रहें। इसीलिए उन्होंने आवास-विकास में चार-पांच प्लाट देखे थे. वह चाहते थे कि हम, राम गोपाल (मेरे चाचा) और अन्य परिवारजनों के अपने घर हो और वह भी पास-पास हों. मृत्यु के लगभग छः-सात महीने पहले उन्होंने कहा था कि तुम्हारे लिए प्लाट देखा है. हम प्लाट देखने नहीं गये. रामगोपाल को सावित्री की शादी में लखनऊ आकर प्लाट देखने को कहा था पर वह नहीं आ सके थे. काश उनका यह सपना पूरा होता और परिवारजन पास-पास रहते". 
मेरी बड़ी बहन आशा तिवारी कहती हैं," सुरेश! पिताजी बहुत सीधे थे कोई चालाकी उनमें नहीं थी. जो भी कार्य करते थे किसी से छिपाते नहीं थे. वह खाने-पीने के बहुत शौक़ीन थे. एक बार की बात है पिताजी को बोनस मिला तो माताजी से कहने लगे कि उनके लिए जेवर बनवा देंगे। पिताजी के मित्र श्री मिश्रा जी दारु गोदाम नाम के मोहल्ले ऐशबाग में रहते थे और श्री हनुमान जी के मंदिर के बगल में कोयला और राख का व्यापार करते थे,  मिश्रा जी ने राय दी कि आपके पास जगह है और आप क्यों न पांच छ: ट्रक कोयला गिरवा  दें और कोयला और राख को अलग  करवाकर लाभ उठायें। मेरी माँ ने मिश्र जी का समर्थन किया।  पिताजी ने ८ -मोतीझील ऐशबाग, लखनऊ मेंं पाँच ट्रक राख-कोयले के गिरवा दिये।  मेरी माँ कोयला-बीनकर कोयला-राख बेचकर हमारा सभी का खर्च चलाने मेन पिताजी की मदद करने लगीं और उसी से घर बनवाया।  पिताजीने घर चलाने के लिए कर्ज ले रखा था।  घर का खर्च चलाने मेंं काफी मुश्किलें अाती थी. 
मुझसे बड़े भाई श्री रमेश चन्द्र शुक्ल अपने पिता के बारे मेंं कहते हैं, "मेरे पिताजी सभी का भला करते थे. उन्होंने गांधी मेडिकल हाल भी निशुल्क सेवा के लिए ही खोला था. उनमें बहुत सेवा भाव था. वह रुपये पैसे से और अपना समय देकर भी अपने संबंधों का इस्तेमाल करके  किसी बीमार को अस्पत्ताल मेंं  भर्ती करवाते, उसे  दवा दिलवाना अादि  से भी सहायता करते थे. अाखिरी समय में बहुत अस्वस्थ  होने से हम सभी बहुत परेशान थे. मैं  उनके अंतिम वर्षों मेंं उनके साथ  रहा था. ऐशबाग, लखनऊ  मेंं स्तर के अच्छे  डॉक्टर और क्लीनिक का न होना जहां  इमरजेंसी और घर पर उन्हें अारम्भिक स्वास्थ सहायता प्राप्त कर सकते थे. अाज भी स्थिति नहीं बदली है. अाज क्लीनिक तो हैं पर उनमें अनुभव वाले डॉक्टर नहीं है और स्तर की उचित मूल्य पर सेवा नहीं उपलब्ध है. जब पिताजी को अक्समात समस्या होने पर मेडिकल कालेज पहुंचे तो घंटों वह डॉक्टर की प्रतीक्षा करते रहे न अाया की सेवा मिली न नर्स की सेवा मिली कोई सहायता उन्हें नहीं मिली अंत मेंं उन्होंने बहुत से घंटों के बाद अपने प्राण त्याग दिये।"

मेरे बड़े भाई श्री राजेन्द्र प्रसाद कलकत्ता से १५ अगस्त १९७० को घर छोड़कर साइकिल यात्रा पर निकल पड़े थे.  जहां उनके मित्र गोपाल पांजा ( जो उस समय  ४०/४ पुरानी लेबर कालोनी, ऐशबाग  पड़ोस मेंं रहते थे) और कलकत्ता मेंं अपनी बड़ी बहन तथा  पूर्व मेयर मिहिर सेन से सहायता दिलाई थी.  बड़े भाई भारत से नार्वे साइकिल से विश्व यात्रा करने निकले और नार्वे अच्छा लगा फिर यहीं रह गये.  कलकत्ते से मुम्बई तक साइकिल से मुम्बई से बसरा(ईराक) तक पानी के जहाज से पहुँचे थे. बसरा से टर्की, सीरिया, यूगोस्लाविया, ग्रीस, जर्मनी होते हुए नार्वे अाये थे. बचपन मेंं वह भी कविता कहानी लिखते थे. परन्तु अब उन्हें साहित्य अथवा सामाजिक कार्यों मेंं रूचि नहीं है.
बड़े भाई विदेश (नार्वे) मेंं रहते हैं, जैसा मैने पहले लिखा है. उन्होंने लखनऊ मेंं भी अलग अपना घर बना लिया है. वह जब भारत अाते तो अपने निजी घर मेंं रहते थे तो पिताजी उनसे कुछ नहीं कहते थे बेशक मेरी मां बहुत परेशान रहती थीं क्योंकि उन्होंने उनके साइकिल टूर करते समय सप्ताह दो-दो दिनों तक ईश्वर पर विश्वास करके वृत रखतीं थीं कि मेरे बड़े भाई को कोई नुकसान नहीं पहुंचे और वह सलामत रहें।

मिठाई और पान खाने के शौक़ीन
मेरी बड़ी बुआ रामरती जी ने बताया, "भाई साहेब मिठाई खाने के बहुत शौक़ीन थे. मेरे बाबा उनके लिए हमेशा मिठाई लेकर आते थे. तभी से वह शौक़ीन हो गए थे. वह विनम्र स्वभाव के मृदुभाषी थे. वह हमको बहुत मानते थे. वह सभी भाई -बहनों को आदर देते थे. पिताजी पान और  तम्बाकू खाने के बहुत शौकीन थे. वह पान खुद लाते थे और  खुद उसे  लगाकर खाते थे."
वैसे भी लखनऊ मेंं पान खाने के बहुत से शौकीन लाग मिल जायेंगे इसीलिए जगह-जगह पान की दुकानें हैं.  
रेलवे कारखाने में इन्सपेक्टर 
मेरे पिता  डॉ बृजमोहनलाल शुक्ल रेलवे कारखाने में इन्स्पेक्टर थे. वह अारा शाप मेंं थे जहां वह लकड़ियों की जांच करते थे और अन्य इंस्पेक्शन करते थे. 
मैंने भी इसी रेलवे कारखाने (सवारी और मालडिब्बा कारखाना आलमबाग, लखनऊ) में साढ़े सात साल काम किया है सन १९७२ से २० जनवरी १९८० तक. मैं  शाप बी मेंं काम करता था जिसमें मालडिब्बे की मरम्मत होती थी, डिब्बे मेंं खराब हिस्से को काटकर निकाल दिया जाता था और  उसमें छोटे-बड़े मोटी लोहे की चद्दर के पैच रिवीटर के जरिए लगाये जाते थे. हम लोग बड़ी चादरें  बड़े कटर से कटवाते थे उसको दोनो ओर सूराख करते थे जिसे रिविट (लोहे के बोल्ट को बहुत गरम लाल  करके) जड़ते थे. ऐसी अावाज अाती थी जैसे बड़ी मशीनगनें चल रही हों. इस प्रक्रिया मेंं  जलते हुये लोहे के कण हाथ, गर्दन, सर  अादि पर  पड़ते थे और  जला देते थे.  
अक्सर लोहे से कटने के कारण जगह जगह निशान बान जाते थे जिससे अक्सर टिटनेस का इंजेक्शन लगता था ताकि इंफेक्शन न हो जाये। 
मुझे स्मरण है कि हम जब रेलवे में काम करते थे तो पिताजी और मेरा खाना साथ लाते थे. मध्यावकाश के समय एक घंटे का अवकाश होता था. पिताजी मुझे पराठे अंगीठी में सेंक कर देते थे. बहुत सुखद लगता था.  मैं उनके पास दस मिनट पहले आ जाता था और दोपहर का लंच  करके  इस एक घंटे के अवकाश में वहां मजदूरों के पुस्तकालय में अखबार-पत्र-पत्रिकायें पढ़ने जाया करता था उससे मुझे बहुत सुकून मिलता था.

चिकित्सक के रूप में सेवा 
डॉ बृजमोहन लाल शुक्ल समाजसेवी के तौर पर चिकित्सक थे. रजिस्टर्ड मेडिकल प्रेक्टिशनर थे अतः वह डाक्टर के तौर पर सीमित काम कर सकते थे. वह मिल रोड मवैया, लखनऊ में गांधी मेडिकल हाल में शाम को रेलवे की नौकरी से लौटने के बाद प्रेक्टिस करते थे. उनके साथ कुछ वर्षों तक स्व श्री रामाश्रय त्रिवेदी जी भी बैठते थे. मेरे डिग्री कालेज के सहपाठी मित्र  नरेंद्र दुबे मवैया में अाज भी  रहते हैं जिनके घर के सामने मंदिर के प्रांगण में गांधी मेडिकल हाल हुआ करता था. 
 त्रिवेदी जी की बहू और पोती अपने ननिहाल अलीगंज में रहती हैं जिनसे मिलने मैं होली २०१६ में संजय मिश्र के साथ गया था. 
पिताजी के पास अक्सर पास पड़ोस के लोग अपनी बीमारी पर दिखाने  और दवा लेने  तथा  रिसिप्ट और मेडिकल लिखाने आते रहते थे. वह लोगों की  निशुल्क और कम पैसे में ही सहायता कर दिया करते थे. 
मेरे पिता मुझे चिकित्सक और मेरे बड़े भाई को इंजीनियर बनाना चाहते थे पर ईश्वर को और ही मंजूर था मैं पत्रकार और लेखक बन गया और बड़े भाई चिकित्सक बने तथा बीच वाले भाई श्री रमेशचन्द्र शुक्ल पुलिस (पी ए सी) मेंं कार्यरत रहे. 

कोई काम बड़ा या छोटा नहीं होता  
कोई काम छोटा और बड़ा नहीं होता यह मेरे पिता से सीखना चाहिये।  आर्थिक रूप से परेशान पिताजी ने किसी प्रकार के काम करने में कोई शर्म नहीं की और मेरी माँ ने उनका भरपूर साथ दिया। 
पहले मेरे पिता मिल रोड मवैया, लखनऊ में गांधी मेडिकल हाल में चिकित्सा की प्रेक्टिस करते थे जिससे उन्हें कुछ आय भी हो जाती थी पर अपने मित्र  श्री रामाश्रय त्रिवेदी जी के अनुरोध पर मेरे पिता ने न चाहकर भी त्रिवेदी जी की सहायता के लिए  गाँधी मेडिकल हाल और प्रेक्टिस छोड़कर उन्हें सौंप दी थी. उसके बाद उन्होंने क्या-क्या नहीं किया।
अपनी नौकरी के बाद पार्टटाइम राखी-कोयले के काम मेंं मॉ की मदद करते और  रेलवे मेंं अपने मित्रों को लाटरी के टिकट बेचकर अपना जेबखर्च चलाते थे।  कभी-कभी पिताजी मुझे भी लखनऊ के ओडियन सिनेमा के पास 'अग्रवाल लाटरी' से लाटरी के टिकट खरीदने के लिए भेजते थे. वह भांग का सेवन भी करते थे और उन्हें विश्वास था कि मैं भांग का सेवन नहीं करता और न करूंगा अतः वह मुझे बचपन में नाकाहिंडोला, लखनऊ में भांग लेने भेजते थे.

समाजसेवी 
मेरे पिताजी के चिरपरिचितों ने बताया कि पुरानी श्रमिक बस्ती ऐशबाग, लखनऊ में पुराने लोग सभी याद करते हैं. वह निस्वार्थ भाव से  सेवा करते थे और किसी की भी पीड़ा को सुनकर दुखी होते थे और उसके साथ चल देते थे जबकि वह स्वयं गरीब थे. 
पिताजी के बारे में मैंने प्रतिष्ठित व्यक्ति और मेरे पिताजी के समकालीन श्री चावला जी से बात की जो ४८/५ पुरानी  श्रमिक बस्ती में रहते हैं और रेलवे से अवकाश प्राप्त कर चुके हैं.  श्री चावला जी ने बताया कि आपके पिताजी बहुत शालीन व्यक्ति थे. जब डॉ बृजमोहन जी यहाँ  कोआपरेटिव सोसाइटी, पुरानी लेबर कालोनी में मंत्री चुने गये थे तब उनसे अक्सर मिलना होता था. चुनाव के पहले भी मेरे पास आये थे. वह श्री शोभनाथ सिंह जी के मित्र थे और उनका भी बहुत सम्मान करते थे जो कभी इसी सोसाइटी में अध्यक्ष चुने गये थे और यहाँ के सम्मानित व्यक्ति थे.  मैंने श्री चावला जी से एक अन्य समाजसेवी श्री भगत जी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह उन्हीं के ब्लाक में नीचे वाले घर में रहते हैं. मैं भगत जी से मिलने गया और प्रणाम किया और उन्हें बचपन में ईमानदारी और दया की शिक्षा देने के लिए धन्यवाद दिया और आभार व्यक्त किया।  पता चला है कि अब भगत जी नहीं रहे उन्हें सभी बच्चे और युवा पापा जी कहकर पुकारते थे. भगत जी ने पूरी कालोनी में वृक्षारोपण, सत्य बोलना और जीवों पर दया करना सिखाया था और उनके द्वारा लगाये हुए कुछ पेड़ आज भी उनकी याद दिलाते हैं. 

पिताजी छुआछूत नहीं मानते थे 
मैंने बचपन में देखा था कि वह छुआछूत नहीं मानते थे. यदि मैं हिन्दू धर्म के अलावा किसी धर्म के कार्यक्रमों में कभी जाता तो उसका कभी भी बुरा नहीं मानते थे जबकि मेरी दादी गधा छू जाने के बाद और शमशान से वापस आने के बाद बिना नहाये घर में घुसने नहीं देती थीं चाहे कितना जाड़ा क्यों न हो. उस समय गरम पानी से नहाने का चलन नहीं था अतः ठन्डे पानी से नहाने में बहुत जाड़ा लगता था.

हर धर्म के मित्र 
पिताजी के हर धर्म के मित्र थे. हिन्दू, मुस्लिम और सिख सभी धर्मों से उनके मित्र थे. ईदगाह के पास घर होने की वजह से उनके मित्र ईद और बकरीद के दिन जब नमाज पढ़ने के लिए ईदगाह अाते थे तो पहले वे अपनी साइकिलें और स्कूटर खड़ी करने आते थे. 
जब उन्होंने ८-मोतीझील पर दुकानें बनवाईं तब उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दोनों को ही दुकाने किराये पर दीं थी. तथा जिन्हें लोग छोटी जाति  का समझते थे पिताजी मेरी तरह उनके साथ-उठने बैठने में कोई परहेज नहीं करते थे. बचपन में पिताजी हर साल २४ घंटे के लिए अखण्ड रामायण का पाठ अपने घर पर रखते थे और दूसरों के घर भी पढ़ने स्वयं भी जाते थे और हम लोगों को भी भेजते थे. 
बाद में उनका कहना था कि रामायण पाठ से ज्यादा जरूरी किसी की मदद करना और सेवा करना है. 

पुनर्विवाह के पक्ष में 
यदि किसी लड़की की परिवार में शादी के बाद विधवा हो या तलाग हो या अन्य कारण हो तो पिताजी लड़कियों के भी पुनर्विवाह के पक्ष में थे. मेरी बड़े चाचा की बेटी सरोज के पुनर्विवाह का पिताजी ने समर्थन ही नहीं किया बल्कि उसे संपन्न भी कराया।  आज सरोज के दो बेटे और दो होनहार बेटियां हैं और उनकी दोनों बेटियों की शादी हो चुकी है. 

अवकाशप्राप्त करने वाला दिन पिताजी के लिए यादगार दिन  
पिताजी अपने रेलवे के कार्य से बहुत जल्दी सेवा निवृत्त हो गए थे. उस समय अवकाशप्राप्त करने की आयु  ५८ होती थी।  उनके अवकाशप्राप्त की खुशी में  हमने एक कवि सम्मलेन का कार्यक्रम आयोजित किया था जिसमें स्थानीय कवी मौजूद थे. इस कार्यक्रम में मेरे छोटे चाचा श्री राम गोपाल, शिव नारायण मिश्र, पिता के मित्रगण: श्री सत्य नारायण त्रिपाठी, शिवशंकर मिश्र, रामाश्रय त्रिवेदी और बहुत से मित्र आये  थे जिसमें कुछ परिवारजन भी आये थे. वह उनके लिए एक बहुत बड़ा दिन था. हालाकिं एक दुर्घटना हो जाने के कारण उन्हें बहुत दुःख भी हुआ था
जिससे कार्यक्रम में थोड़ा व्यवधान आ गया था. 
सेवा निवृत्त होने के पांच वर्ष बाद हम सभी को छोड़कर दुनिया से चल बसे थे.  उनकी बहुत सी यादें हैं जिन्हें सही तारीख और स्थान की पुष्टि के अभाव में नहीं दे पा रहे हैं. 

मंगलवार, 24 मई 2016

मेरी स्मृतियां में अमेरिका -सन् २००३-सुरेशचन्द्र शुक्ल Old memories ( U.S.A.-2003)- Suresh Chandra Shukla

अमेरिका की पुरानी मेरी स्मृतियां में अमेरिका -सन् २००३ की.
सुरेशचन्द्र शुक्ल 





यू एस ए (अमेरिका) सन 2003 की चित्रमय स्मृतियां। कथा गोष्ठी। मेहता जी के साथ वेदों से सम्मानित किया गया था । वैदिक स्कूल में. शेर बहादुर सिंह जी की शादी की सालगिरह में. अपने प्रिय मित्र लेखक स्व ललित अहलूवालिया और सेठी जी के साथ. विश्व डॉ विजय कुमार  डॉ राज गुप्ता जी के साथ पारिवारिक सैर आदि आज भी याद है.
डॉ सुषम बेदी के साथ उनके  कोलम्बिया विश्व विद्यालय, न्यूयॉर्क में. 

गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

मेरी बर्मिंघम ब्रिटेन की यात्रा -Suresh Chandra Shukla

मेरी बर्मिंघम ब्रिटेन की यात्रा 
30 मार्च से 4 अप्रैल तक हमने माया भारती के संग मैनचेस्टर और बर्मिंघम की यात्रा की. यहाँ हमने मंदिर, निरंकारी समाज के प्रतिष्ठित विद्वान और प्रचारक श्री उपासक जी के घर भी गये.
भारतीय दूतावास बर्मिंघम में कवि  सम्मलेन और सम्मान समारोह संपन्न हुआ. पियाली रे जी को उनके बर्मिंघम में संस्कृति को योगदान के लिए सम्मानित किया गया.
कवि सम्मलेन में पंछी जी पंजाब भारत से आये थे और मैं  (सुरेशचंद्र शुक्ल) और माया भारती  नार्वे से आये थे. डॉ निखिल कौशिक, सोहन रही, शिखा वार्ष्णेय और शैल अग्रवाल ब्रिटेन से ही थीं. इनके अतिरिक्त श्री नय्यर, डॉ कृष्ण कन्हैया, दलजीत कौर, सीमा कौर, स्वर्ण तलवार, वंदना मुकेश और संयोजक डॉ कृष्ण कुमार सभी ब्रिटेन से थे.



भारतीय दूतावास के श्री जे के शर्मा मुख्य अतिथि थे जिन्होंने सभी का स्वागत किया और भाषा और साहित्य के योगदान के लिए बधाई दी.


हम एक हिन्दू मंदिर गये. वहां सत्य नारायण जी की कथा और भोज था. एक बिटिया का जन्मदिन के अवसर पर कार्यक्रम था. मंदिर भव्य और आयोजन शानदार था.
हम बर्मिंघम के सिटी काउन्सिल गए वहां मेयर कार्यालय में मेयर नहीं मिले परन्तु उनके कार्यालय सहयोगियों ने बहुत ध्यान दिया, बर्मिंघम में राजनैतिक इतिहास बताया तथा वहां प्रदर्शित चित्रों और वस्तुओं के दर्शन करते हुए उनके बारे में रोचक और विस्तार से बताया।
मेयर का ऐतिहासिक हार जो मेयर अपने कयरलय में पहनता है उस हार में तीन हीरे जेड थे तथा उसमें पूर्व के सभी मेयरों के नाम और वर्ष दिए गए थे. यह हार बहुत ऐतिहासिक था जिसे धारण करने का अवसर हम लोगों को दिया गया.




सोमवार, 4 अप्रैल 2016

मैनचेस्टर और बर्मिंघम की यात्रा 

३० मार्च को ओस्लो में रीग्गे एयरपोर्ट से मैनचेस्टर, यू के के लिए  फ्लाइट लेकर माया जी के साथ यात्रा पर आया. मैनचेस्टर एयरपोर्ट पर उतरकर रेलवे स्टेशन का पता पूछताछ कर रेलवे  स्टेशन गया. दस बारह मिनट पैदल चलने के बाद स्टेशन पहुंचे वहां रेल का टिकट लेकर बर्मिंगम के लिए प्लेटफार्म नंबर 4 A पर आ गए जहाँ से रेल ने प्रस्थान करना था.
माया जी का साथ बहुत समय बाद हम दोनों एक साथ विदेश की यात्रा पर आया हूँ.
एक अनोखी खुशी और एक अनोखा संतोष का अनुभव।
अज्ञात स्थान की यात्रा जैसा आनंद जबकि बर्मिंगम पहले भी आ चुका हूँ पर हवाई जहाज से.
२ अप्रैल को बर्मिंघम में साहित्यिक कार्यक्रम था गीतांजलि बहुभाषी समुदाय द्वारा आयोजित कवी सम्मलेन और सम्मान समारोह में भाग लेने आया था. आमंत्रण दिया था डॉ कृष्ण कुमार जी ने बर्मिंघम से जिनके निमंत्रण को हम इंकार नहीं कर सके थे. यहाँ रहते हुए फोन से डॉ. महेंद्र कुमार वर्मा, उषा वर्मा और श्रीमती पांडेय जी (डॉ श्याम मनोहर पांडेय) जी से बाअत हुई थी.
बर्मिंगम का मंदिर का अंदर से अवलोकन किया और पूजा में सम्मिलित हुए. एक परिवार अपने पौत्र का जन्मदिन मन रहा था.
बहार से भव्य गुरुद्वारा देखकर बहुत खुशी हुई.
बर्मिंघम की जेल से लेकर एक नया बड़ा अस्पताल जहाँ मलाला का इलाज हुआ  था सभी को दूर से या पास से देखा था.
बर्मिंघम के नगर काउन्सिल और मेयर कार्यालय का भ्रमण रोचक और पररनपद रहा जिसे भुलाया नहीं जा सकता।
कल 4 अप्रैल को ओस्लो वापसी है. कल 2 अप्रैल को यहाँ हुए गीतांजलि कार्यक्रम भी एक सफल और रोचक कार्यक्रम था जिसमें कवितापाठ किया और अपने अनुभव साझे किये।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

पुरानी यादें, मुद्दा छात्र जीवन में संघर्ष  


हाई स्कूल गोपीनाथ लक्ष्मण दास रस्तोगी इंटर कालेज ऐशबाग लखनऊ से 
गोपीनाथ लक्ष्मण दास रस्तोगी इंटर कालेज ऐशबाग लखनऊ में स्थित है जो मेरे ह्रदय में बसा रहा है. यहाँ से मेरी बहुत सी स्मृतियाँ जुडी हैं. यहाँ मैं  सांस्कृतिक परिषद का मंत्री और  साहित्य परिषद का उपाध्यक्ष  था इसी के साथ विज्ञान परिषद में पुस्तकालयाध्यक्ष था. सभी परिषदों के अध्यक्ष अध्यापक होते थे. यहाँ मुझे साहित्यिक संस्कार मिले और बहुत से कवि और विद्वानों को सुना। प्रधानाचार्य डा दुर्गा शंकर मिश्र, सुदर्शन सिंह एवं गंगाराम त्रिपाठी जी साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में बहुत रूचि लेते थे और सांस्कृतिक कार्यक्रम विद्यालय में करवाते थे. श्री विनय रस्तोगी जी विज्ञान सम्बन्धी कार्यक्रम और प्रदर्शनी करवाते थे. 
इन्टरमीडिएट डी ए वी इन्टर कालेज, लखनऊ से 
जब मैं डी ए वी इन्टर कालेज, लखनऊ का छात्र बना तो यहाँ उमाशंकर त्रिवेदी, रमेशचन्द्र अवस्थी और दिनेश मिश्रा जी के संपर्क में आया था जिनसे बहुत कुछ सीखा. यहाँ छात्रसंघ का चुनाव बहुत विकट हो गया अक्सर दो दलों में झड़प और मारपीट होती थी. मैं बिना किसी बड़े ग्रुप से जुड़ा चुनाव लड़ रहा था. यहाँ लोगों को कहते सुना था कि जो जितनी बार जेल जाता है वह उतना ही परिपक्व नेता होता है. 
लखनऊ में जब मैं छात्र नेता था तब अक्सर पुलिस गिरफ्त में आना पड़ता था. किसी गिरफ्तारी के बाबत नहीं केवल पूछताछ के लिए. 
पहले यह जानना जरूरी है कि मैं विद्यालय में किसी भी तरह हड़ताल के पक्ष में कभी नहीं रहा. वाकआउट के भी विरुद्ध था. बहुत से तरीके हैं अपनी मांगे रखने के लिए और समस्यायें सुलझाने के लिए. मैं शिक्षकों के विरोध के पक्ष में कभी नहीं रहा. 
मैं समस्याओं की शुरुआत में ही उसे हल करने के लिए पहले आपस में तय करके कि असल क्या मुद्दा है और कैसे उसकी पैरवी करनी है.
छात्रों का एकमत होना सबसे अच्छा है. फिर बातचीत के दौरान सभी के विचारों का स्वागत किया जाना चाहिये।  
मेरा मानना है कि क्षात्रनेता को अपने सहपाठियों से, कार्यालय से, शिक्षकों से अच्छे  सम्बन्ध और निरंतर संवाद रखना जरूरी है. छात्रनेता को चाहिये कि वह एक की बात दूसरे को न बताये बस उसी बात पर ध्यान दे और कहे जिससे सौहाद्र बनता हो और समस्या के सुलझाने के लिए जरूरी हो.
स्नातक किया मैंने बी एस एन वी डिग्री कालेज, लखनऊ से 
मैंने बी एस एन वी डिग्री कालेज, लखनऊ में शिक्षा प्राप्त करते समय जुलूस आदि को कालेज बंद होने के बाद ही समर्थन किया पर यदि अन्य कोई अपनी जिम्मेदारी पर ऐसा कर रहा है तो मैं उसमें रोड़ा नहीं बना और सामान्य रहने की कोशिश की. विद्यालय के प्रांगण में मैं आम सभा के पक्ष में नहीं रहा क्योंकि पढ़ाई और शान्ति में व्यवधान पड़ता था. इस बात को मेरे अध्यापक श्री त्रिवेदी जी ने जब मेरी चौथी पुस्तक काव्य संग्रह 'दीप जो बुझते नहीं' का विमोचन लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में हो रहा था तब जिक्र किया था, "सुरेशचन्द्र शुक्ल' क्रांतिकारी विचारों के होते हुए भी विद्यालय में वाक् आउट और हड़ताल के खिलाफ रहे. शिक्षकों के मध्य भी वह प्रिय थे.उनकी कहानियाँ विद्यालय की पत्रिका में प्रकाशित होती थीं. वह रेलवे में श्रमिक भी थे यह बात उन्होंने शुरू में छिपा रखी थी. इनकी कविता जब किसी अखबार में छपती तो वह दिखाते थे. अंतिम वर्ष में  जब हम लोगों (शिक्षकों) को  सुरेश के आर्थिक संघर्ष के बारे में पता चला तो हम लोगों में इनके प्रति और स्नेह उत्पन्न हो गया. इनके उज्जवल भविष्य की कामना एक अध्यापक के नाते भी करता हूँ. "
('दीप जो बुझते नहीं' का  लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में विमोचन हुआ था. उपस्थित लोगों में मुख्य थे विभागाध्यक्ष प्रो सूर्य प्रसाद दीक्षित, प्रो शम्भुनाथ चतुर्वेदी, डॉ दुर्गाशंकर मिश्र,  प्रसिद्द कवि और  उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष  लक्ष्मी कान्त वर्मा, पूर्व प्रोफ़ेसर और जाने माने कवि आदरणीय कुंवर चन्द्र प्रकाश सिंह, के के वी में मेरे हिन्दी अध्यापक त्रिवेदी जी मौजूद थे.)

यह उस समय की बात है जब मैंने सन 1976 में बी एस एन वी डिग्री कालेज, लखनऊ में दाखिला लिया था. उसके पहले डी ए वी कालेज में इंटर पास करने के बाद यहाँ पर ही डिग्री कालेज में दाखिला लिया था जहाँ शाम की  कक्षायें लगती थीं. शाम छह बजे कक्षाएं होने के कारण मैं कक्षाओं में अनुपस्थित रहता था. अतः एक वर्ष बर्बाद हो गया जिसका मुझे बाद में बहुत अफ़सोस हुआ. डी ए वी डिग्री कालेज की पत्रिका में मेरी पहली कहानी 'अपूर्व स्वप्न' कहानी प्रकाशित हुयी थी.  बी एस एन वी डिग्री कालेज, लखनऊ की पत्रिका में जय प्रकाश नारायण जैसा मैंने पाया और कहानी 'आंसू रुक न सके'  विद्यालय की पत्रिका में छपी थी. 

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

मेरी माँ किशोरी देवी (१४ फरवरी २०१६ को मात्र दिवस पर) 
को कोटि-कोटि नमन 


Gratulerer med morsdag og Valentinedag. Jeg er med mor på bilde. पश्चिम में आज मात्र दिवस और वेलेंटाइन दिवस है. भारत में हर दिन मात्र दिवस होता है यदि हम माँ के चरण स्पर्श करते हैं, उन्हें स्मरण करते हैं और सभी बंधुओं, बहनों, भाइयों से शिष्टाचार से स्नेह देते और लेते हैं. अतः हम प्रेम से रहें और दूसरों की गलतियों को क्षमा करें। आपका दिन मंगलमय हो! अपनी कविता की , कबीरदास जी और रहीम दास की पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं: बुझा नहीं सकता वह दीपक प्रेम से जिसे जलाया है। 
प्रेम में कभी नहीं यह सोचें क्या खोया क्या पाया है॥
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥
'पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भआ न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय।
सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक', ओस्लो
अपनी स्वर्गीय माँ किशोरीदेवी जी के साथ मैं, लखनऊ में.

आदरणीय स्व. भाभी श्रीमती किरण शुक्ल जी के जल्दी निधन के बाद मेरी माँ ने उनकी (जय प्रकाश, चन्द्र प्रकाश, ओम प्रकाश और आयुष्मती शैल की) माँ का रोल अदा किया और बीमार होने के बाद भी उनके नाम बहुत कुछ छोड़ गयीं। 
ऐसी माँ को कोटि-कोटि प्रणाम!  मेरी माँ सभी बच्चों  की सुनती थीं और उसे एक दूसरे से  कभी नहीं कहती थीं, यदि आवश्यक न हो और उस कहने से अच्छा असर पड़े, पर आज आप किसी एक सूचित कर दीजिये तो वह सन्देश बहुधा घर में सभी को  पहुँच जाता है. 


रविवार, 7 फ़रवरी 2016

आपबीती दो - Suresh Chandra Shukla

आर्थिक अभावों और धनी उत्साह भरा रोमांचक बचपन 



फ़िल्मकार मुजफ्फर अली के साथ  होटल ताज आगरा में 5 जनवरी 2016 को  यू  पी  प्रवासी दिवस में। 

संस्मरण  जन्मदिन  १० फरवरी  पर 
'लखनऊ की सड़क से ओस्लो के नगर पार्लियामेन्ट तक.'
सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ओस्लो, नार्वे से 
बहुत से सफल लेखक और कलाकार आमतौर पर अपने आरंभिक जीवन के बारे में कहने से  संकोच करते हैं. हम उनके संघर्षमय जीवन से अनभिज्ञ रहते हैं.  उनके खट्टे-मीठे अनुभवों को कभी इमली, बेर, कैथा और  संतरा आदि फलों की तरह स्वाद नहीं ले पाते। 
मुझे अनेक मित्रों ने प्रेरित किया कि मैं अपनी आप बीती लिखूँ।  जिनमें प्रकाशक के अलावा मैं दो लोगों का नाम लेना चाहूँगा। राजेंद्र अवस्थी जी जब कादम्बिनी के संपादक थे उन्होंने कादम्बिनी में मेरे दो साक्षात्कार प्रकाशित किये थे. जब भी मैं भारत जाता तो कादम्बिनी कार्यालय जरूर जाता था वहाँ सदा  राजेंद्र अवस्थी जी सभी का स्वागत करते दिखते थे ।   कादम्बिनी  के कार्यालय में  लेखकों और विद्वानों के आने-जाने का ताँता लगा रहता था. वहां पर बहुत से लेखकों से सम्पर्क हुआ उसमें प्रेमचंद साहित्य पर शोधपरक ग्रन्थ लिखने वाले आलोचक डॉ कमलकिशोर गोयनका जी थे जिन्होंने मुझे अपनी आपबीती यानि संस्मरण लिखने को कहा जो साहित्यिक और जीवन के उन पहलुओं का वर्णन करता हो जो मैंने स्वयं जिया हो. 
अभी पिछले सप्ताह मुझे ब्रिटेन के नगर बर्मिंगम से डॉ कृष्ण कुमार जी ने फोन पर पुनः कहा, 
"सुरेश जी आपने अपना जीवन किस तरह रेल की पटरियों के किनारे काम करते हुए शुरू किया और आज लेखक के रूप में प्रतिष्ठित है. आपकी कथाओं पर अनेकों लघु टेलीफिल्में बनी हैं." 
उन्होंने हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का भी जिक्र किया और कहा, 
" मोदी जी कहाँ कभी चाय बेचते थे और आज प्रधानमंत्री हैं. और आपने भी कम संघर्ष नहीं किया और आज भी कर रहे हैं. जरूर आपके जीवन से भी लोग सीख सकेंगे और आपके संघर्षों को जान सकेंगे।"  
यह बात सही है कि अपने देश से दूर जाकर नार्वे जैसे देश की राजधानी ओस्लो नगर पार्लियामेंट में सन 2004 से 2007  तक सदस्य चुना गया था.  इसी के साथ यह भी बात ध्यान देने वाली है कि रेलवे में लगभग आठ वर्ष (सन 1972 से 21  जनवरी 1980 तक नौकरी करते हुए स्नातक की शिक्षा और श्रमिक शिक्षक की शिक्षा पायी थी.  लखनऊ में कभी-कभी समाचार पत्रों में मेरे समाचार और कवितायें छपती थीं.  उस समय सभी अखबार साहित्य को अधिक स्थान देते थे.

विदेशों में हिन्दी साहित्य और भाषा का प्रचार-प्रसार
जब भी विदेशों में भारतीय संस्कृति और भाषाओँ (हिन्दी, पंजाबी, उर्दू और तमिल) के प्रचार प्रसार और विदेशों में रचे  जा रहे हिन्दी  साहित्य और पत्रकारिता की बात की जायेगी मेरे 36  वर्षों तक हिन्दी पत्रिका के संपादन और इसके लिए योगदान को भुलाया नहीं जा सकेगा।  सन 1980  से सन 1985 तक नार्वे की प्रथम हिन्दी पत्रिका परिचय का सम्पादन किया और सन 1988 से स्पाइल-दर्पण का सम्पादन कर रहा हूँ.


जब पिछले वर्ष 9 फरवरी 2015 को मेरे काव्य संग्रह 'गंगा से ग्लोमा तक' को मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी का भवानी प्रास मिश्र काव्य पुरस्कार मिला और 14 सितम्बर 2015 को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का 'हिन्दी विदेश प्रसार सम्मान' मिला तो अच्छा लगा और अधिक सेवा करने की प्रेरणा मिली।

हिन्दी वैश्विक भाषा है और मेरी अस्मिता की पहचान 
हिन्दी विश्व की एक बड़ी भाषा है. यह आम जनों की भाषा है. हिन्दी लेखक होने के नाते मुझे बहुत से देशों में सम्मान और पुरस्कार मिल चुके हैं जिसके लिए मैं हिन्दी वालों का और विदेशों में हिन्दी की सेवा में लगे लोगों का आभारी हूँ. मेरा मानना है कि जो लोग विदेश में रहते हैं उनसे निवेदन है कि वह अपने रोजमर्रा के कार्य करते हुए अपनी संस्कृति और भाषा को बचाये रखने के लिए वहां राजनीति में भी सक्रिय हों ताकि वह अपने कर्तव्य निभायें और अपनी भाषा और संस्कृति को अपना हक़ दिलायें।

पूर्वज-लेखक हमारे लिए प्रेरणा
यह मेरे मित्रों का बड़प्पन है कि वह मेरे बारे में अच्छा सोचते हैं और अपने विचारों से मेरा हौंसला बढ़ाते हैं.
एक तरफ से नजर उठाइये तो हमारे पूर्वज-लेखकों ने कम संघर्ष नहीं किया।  गोस्वामी तुलसीदास जी का बचपन  और कबीरदासजी, रैदास जी के कर्म  हमारे लिए प्रेरणा और बहुत बड़े उदहारण हैं संघर्ष के.
आजकल आधुनिक लेखकों का जीवन भी कम संघर्षपूर्ण नहीं रहा है. सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' और  नागार्जुन  जी की तरह आदम गोंडवी जी जैसे लेखक अपना समुचित इलाज भी नहीं करा सके थे. कभी-कभी जब मैं भारतीय समाचारपत्रों में पढता हूँ कि किसी मेरी बेटी या बहन को नंगा घुमाया गया उसके साथ बदसलूकी हुई, प्रताड़ित किया गया, तब पढ़कर स्वयं बहुत दुखी होता हूँ.  सोचता  हूँ कि मुझे अपने देश भारत लौट आना चाहिए और दलितों, प्रताड़ित लोगों और दुनिया की जेल में बंद बच्चों और महिलाओं को छुड़वाने और उन्हें जेल के बाहर जिंदगी जीने के लिए सामूहिक घर दिलाने में मदद करनी चाहिये। पर क्या करूँ कभी-कभी लगता कि यह संभव है जब महान लोगों से मिलने की बात सोचता हूँ. इनमें कुछ लोगों का जिक्र करना चाहूँगा जिनसे मैं मिला हूँ. ये हस्तियां हैं: नेलसन मण्डेला, दलाई लामा, रेगुबेर्टा मेंचू , ओस्कर आरियास कैलाश सत्यार्थी और अन्य।  ये सभी नोबेल पुरस्कार विजेता हैं. जब ये लोग अपने संघर्ष में काफी हद तक सफल रहे तब मैं क्यों नहीं कर सकता।  कभी-कभी लगता कि यह कार्य लोहे के चने चबाने जैसा है. जैसा भी हो एक बार अपने माननीय  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से मिलने का मौक़ा जब भी मिलेगा तो एक बार बातचीत करके प्रयास जरूर करूंगा।
आइये अब अपने जीवन के कुछ अंतरंग किस्से सुनाता हूँ.  अपनी आपबीती एक कविता 'बचपन की स्मृति' से शुरू करता हूँ.
मुझे स्मृति बहुत आती है,
मन  मोहक बचपन की.
रीता भरा लगा करता था
स्वप्न गगन गागर की.
आर्थिक अभाव था
स्वप्न बहुत थे
रंगबिरंगे मेरे।
तितली का पीछा
गुब्बारों सा जीवन
सुख-दुःख दोनों संग मेरे।
एक साथ छोड़ देता था
तब, दूजा संग आता था.
आँख मिचौली लगा खेल
छिपता फिर मिल जाता।
 तब प्रयास भी न जाने क्यों
मौसमी फूल लगे थे.
मन्दिर-ईदगाह के  जब तब
खट्टे - मीठे बेर लगे थे.

छोटे हमउम्र बच्चे जब
गली कूड़ा बीन रहे थे.
हम अपनी अम्मा से
श्रम रामायण सीख रहे थे.
ये अभाव है, भेदभाव है
दस्तक दे जाता है
सुनकर जब चुपचाप रहेंगे
बार-बार आता है.

अभाव -भेदभाव से
जमकर तुम लड़ना।
लगन-श्रम-शिक्षा से
उसे न जमने देना।
दिन भर जब श्रम से थकना,
रात में तारों और जुगनू सा
अंधियारे से लड़ना।
अन्तर्मन का दिया जलाना
कभी न बुझने देना।
बचपन के दिन जब से होश संभाला तब बड़ा ही उत्साह से भरा जीवन और उसके क्षण बहुत चुनौतीपूर्ण लगते थे. मैं अपने मामा के घर (ननिहाल) में था और जब मैं जब दो-तीन बरस का था तो मुझे बड़ी चेचक निकली  थी. मेरी  माँ  ने बतलाया था कि मेरे पूरे शरीर पर खुजलाने के कारण घाव हो जाते थे. आँखे भी चेचक से ढक गयी थीं.  मेरे पिताजी भी उस समय मुझे देखने नहीं आते थे. मेरी माँ को छोड़कर अनेक लोगों ने यह आशा नहीं की थी कि मैं बचूंगा।  अपने तीन  भाइयों और एक बहन में मैं सबसे छोटा था.  उस समय मुझे बड़ी चेचक निकली थी उस समय बड़ी चेचक दुनिया में विद्यमान थी. चेचक के निशान मेरे चेहरे पर अभी भी साफ़-साफ़ देखे जा सकते हैं.

'मैं अपने मामा (ननिहाल) के घर पर कानपुर जिले के एक आर्थिक रूप से पिछड़े बकौली ग्राम पोस्ट कठारा में था. मुझे बहुत नहीं याद है पर यह याद है कि वहां मेरी लगने वाली भाभियाँ भी अच्छे-बुरे मजाक करती थीं. सारे मजाक मैं नहीं समझ पाता था और शर्मा जाता था.  वहां घर एक दूसरे घरों से मिले हुए प्रतीत होते थे और  जिनकी छते करीब-करीब मिलती थीं. छत से करीब चार-पांच घरों के आँगन दिखायी देते थे. अतः उन घरों में रोजमर्रा के कार्य होते हुए दिखायी देते थे. कोई महिला अनाज सूप से पछोर रही होती थी, कोई ओखली में कुछ कूट रही होती तो कोई बड़ी मथानी से बड़े घड़ों में मक्खन निकालने के लिए मथ रही होती थी और कहीं सुबह-सुबह दूध बहुत बड़े भगौने में उबाल रही होती थी. सभी अपने अपने काम में लगे होते थे.
आपस में स्नेह भाव था. अधिकाँश महिलायें पढ़ना नहीं जानती थीं पर सफाई और बोलचाल तथा व्यवहार बहुत अच्छा था. पक्के घर कम थे.  पड़ोस के एक घर में तोता पला था.  तोता बहुत नकलची था. उस समय बैलगाड़ी और अच्छे बैलों से किसानों का स्तर यानी कौन समृद्ध है नापने का पैमाना होता था. मेरे पांच मामा थे जिनमें केवल दो ही बहुत समृद्ध थे पर सभी परिश्रमी थे.
एक मामा के घर पर तीन भैसें, दो बड़े बैल थे जिन्हें गाँव वाले हीरा और मोती  कहकर पुकारते थे तब पता चला कि कथाकार मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'दो  बैलों की कथा' से बैलों के नामकरण किये गए थे .  यह कथा वहां एक ने पढ़कर सुनायी थी. बिजली नहीं थी. रात  को अँधेरा हो जाता था तो लोग अलाव जलाकर शाम को एकत्र होते और भूत प्रेत की कहानियाँ, अगिया बैताल आदि की कहानियां सुनाते थे जिनपर बचपन में वहां के अधिकाँश लोगों की तरह विश्वास  करने लगा था.   वहां भूत प्रेत की कहानियाँ सुनकर हम सभी रोमांचित होते और जिन कहानियों को सुनकर कभी खुशी और कभी डर लगता था।
वहां मामा के साथ जहाँ अनाज काटकर खलियानों में जमा होता था.  वहां पर मामा अनाज की रक्षा करने और मढ़ाई आदि के कारण सोने जाते थे और मैं भी उनके साथ रात खलियान में  सोता था.  रात को ठंडी-ठंडी हवा बहुत  सुहावनी और सुखद लगती थी. घास-फूस पेड़ों और अनाज के गट्ठरों से टकराती हुई जब बयार चलती थी कर्णप्रिय लगती जैसे संगीत बज रहा हो. मोरों के रह-रह कर बोलने की आवाज तथा रात को झींगरों के झिनझिनाने की आवाज फिल्म के रात के दृश्यों की तरह लगती थी.
दिनों में मैदानों में उगी घास चरने के लिए खच्चर में जुतने वाले घोड़े, गाय, बकरियां, भैंस आदि मैदानों में चरते थे.  पशु-पक्षियों की मिली जुली आवाजें और बंदरों का आसपास से गुजरना बहुत रोमांचक लगता था.  वहां रहकर मैंने पेड़ पर चढ़ना सीखा। स्वयं और अन्य बच्चों  के साथ चरने आये खच्चर में जुतने वाले घोड़े को टीले के पास हाँक कर ले जाता और उनके मुख में जल्दी से रस्सी से बांधकर उसकी पीठ पर बैठ जाता। यह सब बहुत फुर्ती से करना होता था। घुड़सवारी की  प्रक्रिया में कई बार घोड़े की पीठ से गिरा और घोड़ी की दुलत्ती भी खाई. घुड़सवारी में आनंद और चोट से तकलीफ भी होती जिसे जल्दी ही भूल जाता था. घुड़सवारी करना सीख गया था. घोड़े से गिरने  के कारण  मुझे कई बार चोट लगी थी. और ज्यादा घुड़सवारी करने से बैठने की रगड़ लगने का कारण  कभी-कभी घाव भी हो जाता था.
वहां कुछ दूरी पर बहने वाली नहर में भी नहाने  जाता था. बाद में भी स्कूल से गर्मियों की छुट्टी में हम मामा के पास जाते रहे और पृकृति के खुले वातावरण में खुले आसमान के नीचे मौज मनाते रहे.
कभी महुआ, गुल्लू  बीनना, गिरे हुए आम बीनना और प्रातः से लेकर शाम तक घूमना -फिरना याद करके कभी-कभी ऐसा लगता है कि काश वह बचपन दोबारा वापस आ जाये।

यहाँ गाय और भैंस लगभग अनेक घरों में थीं क्योकि यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय यहाँ गाँव से दूध ले जाकर कानपुर नगर में बेचना होता था. यहाँ से किसान दूध लेकर कठारा रोड रेलवे स्टेशन पर ले जाते थे जो बाँदा रेलवे लाइन के अंतर्गत आता है. चित्रकूट से आने वाली रेल भी यहाँ से होकर गुजरती थी.  कठारा रोड कानपुर के कुछ ही स्टेशन पहले पड़ता था.

रेल में दूध के लिए अलग डिब्बे 
रेल में दूध के अलग डिब्बे होते थे जिसमें अंदर तो लोग दूध के कैन रखते ही थे और उसे रेल के डिब्बे के बाहर  खिड़कियों में बांधकर लटकाते थे. दूध के कैन गीले टाट से लिपटे होते थे ताकि दूध ख़राब न हो.
उसी डिब्बे में कोई रामायण पढ़ रहा होता तो कोई आपस में बर्तालाप कर रहा होता।

ददिहाल में 
मैं अपने बाबा यानि ददिहाल में भी कुछ  छुट्टियां बितायी थीं. ददिहाल ग्राम मवैया, अचलगंज के पास , उन्नाव जिले में था मेरे गाँव से स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चन्द्र शेखर आजाद का स्मारक थोड़ी दूर पर स्थित है.
यहाँ गुड़िया का तालाब, आम के पेड़ पर चढ़ना और तालाब में नहाना आदि अभी भी याद करके मन पुलकित हो जाता है. यहाँ के लोगों की दबंगई के कारण  लगभग अधिकाँश घरों और परिवारों में फौजदारी के मुक़दमे चलते-रहते थे. इस क्षेत्र में पुलिस भी संभल कर ऐक्शन लेती थी.

मेरी कर्म भूमि पुरानी श्रमिक बस्ती, लखनऊ  
लखनऊ में पुरानी श्रमिक बस्ती ऐशबाग में जहाँ हमारा घर था यहाँ मैंने इक्कीस वर्ष बिताये और लगातार इस कालोनी के संपर्क में आज 2016 तक संपर्क में हूँ. यहाँ मैं जन्म से मकान नम्बर 30/7 तथा 30/8 में सन 1962 तक और उसके बाद सन 1975 तक मकान नम्बर  41/3 में रहता था.
वहां अभी भी बहुत से पुराने लोग रहते हैं और स्नेह देते हैं.
जब भी लखनऊ जाता हूँ इस लेबर कालोनी में एक बार जरूर होकर गुजरता हूँ. यह कालोनी भी बहुत अच्छी जगह बसी है. कालोनी के एक ओर पानीघर, एक ओर ऐशबाग ईदगाह और एक ओर मोतीझील का एक बड़ा हिस्सा जो अब कूड़े से पटे जाने के कारण उसकी सुन्दरता जाती रही पर यह लखनऊ के मध्य में बसा है. पुरानी  लेबर कालोनी खुली-खुली बसी है. यहाँ ही रहकर समाजसेवा से जुड़ा और मेरे भीतर साहित्य के अंकुर फूटे।
इस कालोनी में तीन मुख्य पार्क हैं जिन्हें हम बचपन में सेंटर वाली पार्क, नीम वाली पार्क और नेताजी वाली पार्क कहकर पुकारते थे.
संघर्ष ही जीवन है 
इस कालोनी में बहुत से स्वतंत्रता संग्रामसेनानियों, नेताओं, शिक्षाविद और कलाकारों को लाने का श्रेय मुझे है. सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिये यहाँ युवकों को रचनात्मक कार्यों से जोड़ा और खुद जुड़ा 'युवक सेवा संगठन' बनाकर उसके माध्यम से और स्वतन्त्र रूप से भी जुड़ा।  इस कालोनी ने मेरे अंदर फिल्मकार बनने के सपने,  कविता रचना  और और समाजसेवा करना  सिखाया जो आज भी मेरा पीछा नहीं छोड़ रहे हैं. 
मैं शहीद दिवस समारोह आयोजित करना चाहता था. अतः  मेरे एक मित्र जीत सिंह जो रेलवे में काम करते थे उन्होंने प्रताप सिंह रौतेला से मिलवाया  और उन्होंने राम कृष्ण खत्री से मिलवाया जो काकोरी कांड के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. शचीन्द्र नाथ बक्शी जी ने भी आना था पर न आ सके थे. यह कार्यक्रम मैंने नेताजी वाली पार्क में कराया था. यहाँ कार्यक्रम स्थल पर स्वयं स्वतंत्रतासंग्राम सेनानी गंगाधर गुप्ता जी आये  और आगे चलकर उन्होंने लखनऊ और गाजियाबाद में अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से मिलवाया। आयु में बड़े होने के बाद भी वह आजीवन मुझे मित्रवत ही मानते रहे.
यहाँ पुरानी लेबर कालोनी ऐशबाग लखनऊ में एक कार्यक्रम में राज्यपाल सत्यनारायण रेडडी जी आये थे उस कार्यक्रम में हमको उनके समीप नहीं जाने दिया गया था और वही सत्यनारायण रेडडी जी बाद में मेरे ओस्लो निवास पर मिलने  आये  और मुझे अपने साथ भारतीय राजदूत के निवास पर पंद्रह अगस्त को ले गये और मेरे घर तीन दिन तक आये और एक दिन तो मैं खरीदारी करने अपने साथ ले गया था तब उन्होंने मेरे सामान के पैसे दिए थे और वापस देने पर नहीं लिये थे. कभी-कभी ऐसा भी होता है.  चाहे सिटी मोन्टेसरी स्कूल के जगदीश गांधी या भारती गांधी हों या और अनेक  नेता और कलाकार
वह हमारे कार्यक्रम में आते थे. कालोनी में ही रहने वाले के के पाण्डेय जी को नहीं भुला सकता वह एक अच्छे इंसान और कलाकार थे उन्होंने न केवल हमारे कार्यक्रमों में  हिस्सा लिया था बल्कि उत्तर प्रदेश की कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया था.

यहाँ रहकर ही मैंने जाना और समझा कि संघर्ष ही जीवन है और बिना परिश्रम और त्याग के कुछ नहीं मिलता। संघर्ष और कठिन परिश्रम से आप अपने अलावा दूसरों  की भी सेवा कर सकते हैं.
मैं गोपीनाथ लक्ष्मणदास रस्तोगी इंटर कालेज, ऐशबाग, लखनऊ में पढता था और यहाँ से ही मैंने हाईस्कूल उत्रीण किया था. यहाँ मैं साहित्य परिषद का उपाध्यक्ष और सांस्कृतिक परिषद का मंत्री और विज्ञान परिषद का लाइब्रेरियन चुना गया था.  साहित्य परिषद और सांस्कृतिक परिषद के अध्यक्ष अध्यापक होते थे. अतः लेखक सुदर्शन सिंह और गंगाराम त्रिपाठी जी इन संस्थाओं के अध्यक्ष थे और लेखक दुर्गाशंकर मिश्र विद्यालय के प्रधानाचार्य थे. यहाँ मैंने अनेको स्वरचित कवितायें विद्यालयों के आयोजन में सुनायीं थीं.
जब मैं है स्कूल में 1970 में अनुत्रीण  हुआ तो मेरे पिताजी  मेरी नौकरी के बारे में सोचने लगे. सन 1972 में मेरे गोपीनाथ लक्षमण दास रस्तोगी इंटर कालेज से हाईस्कूल पास करते ही  आलमबाग लखनऊ स्थित मालगाड़ी और सवारी डिब्बे कारखाने लखनऊ  में एक सबसे मामूली कर्मचारी खलासी के रूप में नौकरी लगवाई।  इस कारखाने में मेरे दादा जिन्हें मैं बाबा कहता था ने भी कार्य किया था और मेरे पिता जी भी कार्यरत थे.
इसके पहले मैंने अपने एक मित्र  रतन गुलाटी के साथ एक रामनगर ऐशबाग में साबुन की फैक्ट्री में ढाई रूपये प्रतिदिन के हिसाब से दो सप्ताह काम किया था और एक मित्र अहमद अली के साथ गर्मी की छुट्टियों में आम रखने वाली पेटियाँ बनायी थी.
मुझे लगा, आ गया ऊँठ पहाड़ के नीचे।  आगे पढ़ने के बड़े-बड़े अरमान धूमिल होते दिखने लगे. पिताजी की ख़राब आर्थिक स्थिति होने के कारण  मुझे अपने पिता का निर्णय बाद में सही लगा.
          "हाथ पर हाथ रखकर कभी कुछ होना नहीं।
          काटना क्यों चाहते हो नई फसल जब तुम्हें बोना नहीं।"
जब मैं निराश और परेशान कविता लिखता और कवितायें गुनगुनाता था.  मंच से भी कवितापाठ करने लगा था वह भी मोहल्ले और विद्यालय के मंच से.
आवारागर्दी ने मुझे बहुत अपनापन दिया
आवारागर्दी ने मुझे बहुत अपनापन दिया और  ईमानदारी , उदारता , स्वच्छंदता , सहृदयता, अल्हड़पन, घुमक्कड़ी और खेलकूद से जोड़ा मुझे अपने दोस्तों के साथ आवारागर्दी में. यह आवारागर्दी अपराध से जोड़ने वाली नहीं थी  पर उमंगों को नया रंग  बंधन से मुक्त प्रेम की तरह थी, जिसमें मेरे अपने सपनों की उड़ान थी जिसका कोई ठौर नहीं रहा. मेरे इन अधिक आवारागर्दी भरे तीन वर्षों ने ( सन 1969 से 1972 तक) मुझे आटा दाल का भाव बता दिया था.  स्वतंत्रता और  बंधनमुक्त परिश्रम और संघर्ष मेरी रोजमर्रा की जिंदगी का अधिकाँश जीवन हिस्सा रहा जिसने अनुशासन से कभी प्रेम न करते हुए भी उसे अपनाया पर कभी गले नहीं लगा सका.
          "सपने सत्य नहीं होते तो,  मैं सपनों से प्रेम करूँ क्यों?"
प्रेम ने मुझसे नाता तोड़ दिया और सदा अनचाहे दूसरों को आजीवन प्रेम करता रहा, मेरे शुभचिंतक इस प्रेम को आवारगी कहते हैं, हालाँकि मेरा सहमत होना और न होना मायने नहीं रखता।  मुझे लगता है प्रेम बाँटने  से प्रेम बढ़ता है. संकीर्णता प्रेम का अंग नहीं हो सकती।
          "बुझा नहीं सकता वह दीपक, ह्रदय ने जिसे जलाया है।
          "प्रेम में कभी नहीं यह सोचें, क्या खोया क्या पाया है।।"
डी ए वी कालेज में लेखक (कवि) बना 
दी ए वी कालेज में मेरे अध्यापक उमादत्त त्रिवेदी और रमेशचन्द्र अवस्थी जी थे जिनसे मुझे सदा प्रोत्साहन मिलता था. त्रिवेदी जी एक साहित्यिक संस्था और एक पत्रिका छापते थे जबकि रमेश अवस्थी जी विद्यालय की पत्रिका के संपादक थे. दिनेश मिश्रा जी यहाँ छात्र यूनियन के अधिकारी भी थे जो विद्यालय में होने वाले कार्यक्रमों के संयोजक भी रहते थे.  इस विद्यालय में मैंने छात्रसंघ का चुनाव अध्यक्ष पद के लिए लड़ा.

पहला काव्य संग्रह वेदना प्रकाशित हुई

इस विद्यालय में मैंने खेल में तीन पुरस्कार जीते और इंटर पास करते ही सन 1975  में  मेरी पहली काव्य पुस्तक 'वेदना' प्रकाशित हो गयी थी. ध्यान रहे मैं विद्यालय रोज नहीं जा पाता था. जब शाम की या रात की शिफ्ट में काम होता तभी कालेज जा पाता था.  रेलवे में कर्मचारी रहते  हुए कालेज से रेगुलर इंटर पास करके मुझे खुशी हुई थी.  इसी वर्ष मैंने अपना पासपोर्ट बनवा लिया था. उस समय पासपोर्ट बनवाना मुश्किल कार्य था.