शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

भारत में प्रेस स्वतंत्रता- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

भारत में प्रेस स्वतंत्रता- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' (लेख नीचे दिया है)
सोहन लाल सुखाड़िया विश्व विद्यालय में हिंदी दिवस (१४ सितम्बर) पर आयोजित गोष्ठी

मंच पर बाएँ से डॉ आशीष सिसोदिया, प्रो नवीन नंदवाना शरद आलोक और माइक पर प्रो नीतू परमार
अधिक चित्र देखने के लिए कृपया नीचे दिए लिंक पर दबाएँ:
http://picasaweb।google.no/speil.nett/2010KanpurAurUdaypurUniversity#
क्षत्रपति साहूजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर में
भावी पत्रकारों (शिक्षार्थियों) और मीडियाकर्मियों के साथ
कानपुर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में २१ सितम्बर २०१० को व्याख्यान के बाद प्रो अरविन्द सिंह के कक्ष में चित्र
भारत में प्रेस स्वतंत्रता- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
भारत एक प्रजातंत्र है। संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबन्ध के लिए तो अनेक उपाय बताये गए हैं जबकि प्रेस स्वतंत्रता का अलग कोई अध्याय नहीं है। संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में दिए गए १९ ग के अंतर्गत बोलने की आजादी की तरह प्रेस स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। भारतीय संविधान में भी प्रेस की स्वतंत्रता का एक अलग अध्याय होता तो क्या कहने थे। जो भी हो भारत में अच्छी खासी प्रेस स्वतंत्रता है।
प्रेस आजादी में भारत १२२ वें स्थान पर
मुझे कानपुर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग में प्रोअरविन्द सिंह और डॉ योगेन्द्र प्रताप सिंह के सानिध्य में २१ सितम्बर २०१० को और १४ सितम्बर को हिंदी दिवस पर मोहन लाला सुखाड़िया विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रो नवीन नन्दवाना के सानिध्य में हिंदी पत्रकारिता और उसमें निरंतर बढ़ रहे पाठकों की संख्या पर विचार रखने का अवसर मिला। शिक्षार्थियों के अतिरिक्त अध्यापकों का भी उत्साह देखते नहीं बनता था जो हिंदी को रोजगार की भविष्य की भाषा बनाने में सहयोग देगी।
हिंदी का प्रचार-प्रसार देश विदेश में बहुत तेजी से बढ़ रहा है जो उसके लिए उज्जवल भविष्य का संकेत है।
पत्रकार संगठन रिपोर्टर विदाउट बोर्डर्स ने कुछ यूरोपीय देशों में प्रेस पर बढ़ते नियंत्रण की आलोचना की है, लेकिन छह देशों की प्रेस स्वतंत्रता के लिए सराहना की है। प्रेस की आजादी पर न्यूयार्क से रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर्स ने कहा है कि फिनलैंड, आइसलैंड, नीडरलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और स्विट्जरलैंड 2002 में सूची की शुरू होने के बाद से ही चोटी पर है। पत्रकार संगठन का कहना है कि इसके साथ वे पत्रकारों के सम्मान और मीडिया की सुरक्षा में अनुकरणीय उदाहरण हैं।पत्रकार संगठन का कहना है कि इसके विपरीत यूरोपीय संघ मीडिया की आजादी के सवाल पर नेतृत्व खोने के खतरे में है। हालाँकि यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों में से 13 रिपोर्टर विदाउट बोर्डर्स की सूची में पहले 20 में शामिल हैं, लेकिन बाकी 14 सूची में बहुत नीचे हैं।यूरोपीय संघ के महत्वपूर्ण सदस्यों में शामिल फ्रांस 44वें, इटली 49वें, रुमानिया 52वें और ग्रीस तथा बुल्गारिया बेनिनकेन्या और कोमोरोन के साथ 70वें स्थान पर हैं। जर्मनी की स्थिति पिछले साल के मुकाबले सुधरी है और वह 17वें स्थान पर पहुँच गया है जबकि अमेरिका 20वें स्थान पर है। भारत 17 स्थान गिरकर 122वें स्थान पर पहुँच गया है।रिपोर्टर विदाउट बोर्डर्स के महासचिव जाँ फ्रांसोआ यूलियार्ड का कहना है कि प्रेस की आजादी की रक्षा एक संघर्ष बना हुआ है। पुराने यूरोप के लोकतांत्रिक देशों में चौकन्ना रहने का संघर्ष और विश्व भर के निरंकुश शासनों में दमन और अन्याय के खिलाफ संघर्ष।उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और ब्लॉगरों की स्थिति संस्था के लिए स्थायी चिंता की वजह है। जूलियार्ड ने चीन से नोबेल पुरस्कार विजेता लिऊ शियाओबो को रिहा करने की माँग की। 178 देशों की सूची में चीन 171वें स्थान पर है।

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

Oslo 12 October ओस्लो में आम सभा - शरद आलोक

ओस्लो में आमसभा
हाइकी होल्मोस Heikki Holmås, शरद आलोक, औदुन लीसबाकेन Audun Lysbakken एक प्रतिनिधि

नार्वे के विदेश मंत्री से हाथ मिलाते हुए सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
आज ओस्लो में आम सभा में नार्वे के विदेशमंत्री यूनास गाह्र स्त्योरे, बाल विकास और समन्वय मंत्री औदुन लीसबाकेन, ओस्लो नगर सरकार के स्तियान बर्गेर और बहुत से लोगों ने हिस्सा लिया। नार्वे के विकास, बहुसंस्कृति, समय और समाधान पर बातें की गयीं। पूरा हाल भरा था। संवाद बहुत महत्त्वपूर्ण और आवश्यक था। भारत में भी ऐसी बैठकें होनी चाहिए जहाँ आपस में ईमानदारी से संवाद हो और समस्याओं पर विचार किया जाए और उन्हें हाल करने का रास्ता मिलकर निकाला जाए। विदेश मंत्री, बाल एवं समन्वय मंत्री तथा सांसद और डिप्टी मिनिस्टर हैकि से बातचीत हुई जो बहुत सार्थक रही।
हाइकी हमारे लेखक सेमिनार में आये थे।



सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

चीन के जेल में बन्द लू शिआबो को शान्ति का नोबेल पुरस्कार मिलेगा-शरद आलोक

चीन के जेल में बन्द लू शिआबो को शान्ति का नोबेल पुरस्कार मिलेगा-शरद आलोक

लू शिआबो को शान्ति का नोबेल पुरस्कार मिलेगा, यह सूचना नार्वे में नोबेल शान्ति समिति के अध्यक्ष और यूरोपीय समूह के महामंत्री थूरब्योर्न याग्लंद ने १० अक्टूबर को ग्यारह बजे एक प्रेस कांफ्रेंस में दी।
इसका जोरदार विरोध चीन ने किया है जो सरासर गलत है। एक तरफ चीन सुपर ताकत बनना चाहता है पर सुपर पावर जैसी हरकत नहीं कर रहा। मानवाधिकार का सम्मान और दूसरे स्वतन्त्र संस्थाओं में दखलंदाजी अशोभनीय है जो चीन को भारत से सीखना चाहिए।

पत्नी भी नज़रबंद
इस बीच लू श्याबाओ की पत्नी को भी नज़रबंद कर दिया गया है जबकि श्याबाओ ख़ुद चीन की जेल में बंद हैं, उन्होंने नोबेल पुरस्कार थ्येन आन मन चौक की गोलीबारी मारे गए 'शहीदों के नाम' कर दिया है.
श्याबाओ की पत्नी लू च्याई के वकील ने कहा है कि उनसे संपर्क करना संभव नहीं हो पा रहा है क्योंकि उनके घर का फ़ोन काट दिया गया है और उनके घर के बाहर मौजूद पत्रकारों को उनसे बात करने की अनुमति नहीं है.
चीन ने श्याबाओ को नोबेल पुरस्कार दिए जाने की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि "यह नोबेल सम्मान के मूल सिद्धांतों के विपरीत निर्णय है".
नामांकन की ख़बर आने के बाद ही चीन ने नॉर्वे के राजदूत को बुलाकर चेतावनी दी थी कि अगर श्याबाओ को नोबेल पुरस्कार दिया गया तो इससे दोनों देशों के संबंध ख़राब हो सकते हैं.
श्याबाओ को 2009 में ग्यारह वर्ष के कारावास की सज़ा सुनाई गई थी, उन पर देश में विद्रोह भड़काने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया है।
चीन का विरोध गलत - दलाई लामा
चीन की सरकार ने कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की आवाजाही पर रोक लगाई है और देश में नोबेल पुरस्कार के बारे में किसी तरह के इंटरनेट चैट पर पाबंदी लगा दी गई है.
तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा को नोबेल पुरस्कार दिए जाने पर भी चीन ने कड़ा एतराज़ जताया था।
नोबेल पुरस्कार समिति का दफ़्तर नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में है लेकिन नोबेल समिति नॉर्वे की सरकार के नियंत्रण से बाहर है, नोबेल पुरस्कार समिति कह चुकी है कि वह अपने निर्णय किसी के दबाव में नहीं करेगी.
तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा ने मानवाधिकार कार्यकर्ता लू श्याबाओ को नोबेल पुरस्कार दिए जाने पर चीन के विरोध को ग़लत ठहराया है.
निर्वासन में भारत में रहने वाले दलाई लामा ने कहा, "चीन अलग तरह के विचारों का सम्मान नहीं करता है."
एक जापानी समाचार पत्र को दिए गए इंटरव्यू में दलाई लामा ने कहा कि "अगर चीन एक खुले समाज का निर्माण करता है तभी सबका भला हो सकता है।"
नार्वे के साथ चीन की बैठक रद्द
नार्वे की मंत्री चीन जाने वाली थीं और उनकी बैठक चीन के उच्च स्तर के राजनयिकों से होनी थी। पर विश्ववस्थ सूत्रों से ज्ञात हुआ है की अब यह बैठक फिलहाल रुक गयी है।

पेरू के मारियो वर्गास लिओसा को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिलेगा-शरद आलोक

स्टाकहोम, ८ अक्टूबर २०१० स्वीडीय अकादमी (साहित्य) ने घोषणा की है की मारियो लिओसा को साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार दिया जाएगा। - शरद आलोक
यह एक अच्छा निर्णय है। इससे लेटीन अमरीकी (दक्षिण अमेरिकाई देशों) देशों में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी है। मेरी अग्रिम बधाई।
पेरू के लेखक मारियो वर्गास लिओसा को इस साल साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है। 74 वर्षीय लिओसा उपन्यासकार, समालोचक और पत्रकार हैं।वो लातिन अमेरिका के सबसे लोकप्रिय साहित्यकारों में से एक हैं। नोबेल समिति ने उनके साहित्यिक योगदान की जमकर तारीफ की है और उन्हें जन्मजात प्रतिभाशाली कहानी लेखक बताया है।उसका कहना है कि उनका लेखन पाठकों के दिल को छू जाता है। मारियो वर्गास लिओसा ने कहा कि उन्हें पुरस्कार का समाचार पाकर थोड़ा अचंभा हुआ क्योंकि इसके पहले भी उन्हें कई बार इसके लिए नामांकित किया गया था।उनका कहना था कि उन्होंने सोचा कि शायद ये एक मजाक हो। लिओसा टाइम ऑफ द हीरो और कंवेर्शेसन इन कैथ्रेडल जैसे रचनाओं से 1960 में दुनिया की नजर में आए।उन्होंने 30 से अधिक उपन्यास और लेख लिखे हैं। इसके अलावा एक स्तंभकार के रूप में भी उन्होंने वंचित तबके को स्वर देने की कोशिश की है।एक दौरे में वो पेरू में राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल थे, लेकिन 1993 में उन्होंने स्पेन की नागरिकता ग्रहण कर ली।

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

दूसरा दौर बरेली में /ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता अखलाख शहरयार और ओ एन वी कुरूप को बहुत-बहुत बधाई- शरद आलोक

दूसरा दौर बरेली में -सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'


गोयल जी के दूसरे अभिनन्दन ग्रन्थ का लोकार्पण बरेली में
मैं बरेली, (उत्तर प्रदेश) में एक दिन रेलवे स्टेशन पर रेल से उतरा देखा कि फिल्म उमराव जान में गीत लिखने वाले शायर की जन्मभूमि के नगर बरेली में पानी बरस रहा है। उस दिन बरेली के एक दूसरे शायर राम प्रकाश गोयल के दूसरे अभिनन्दन ग्रन्थ का विमोचन और उनके युवा पुत्र विवेक गोयल कि स्मृति में पुरस्कार दिया जाना है। मुझे विशिष्ट अतिथि और गुरुनानक देव विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी प्रोफ़ेसर हर्मेन्द्र सिंह बेदी मुख्य अतिथि थे। मुरादाबाद के जाने माने साहित्यकार महेश दिवाकर भी इस कार्यक्रम में भाग लेने आये थे। यह मेरा बरेली आने का दूसरा मौका था। मेरे मन से अचानक कविता की पंक्तियाँ फूटने लगीं।
'बरेली की भीगी सारी गली,
तिपहिये में बैठे ढूँढें
मझधार में भीगे
बादल गरजे, बिजली चमकी,
सुबह के खाए
शाम के भूखे
मेहमानों की खातिरदारी खली
अपनों से ज्यादा पड़ोसी को फिकर
आँचल में छिपाए महुआ भली
दिवाकर जी के आँगन में बारिश
आदर में सूखी डली।

अपने कोसमझ महा प्राण 'निराला'
भूख गयी सिमटी।
(कार्यक्रम हुआ रेडियो में विदेशों में हिंदी पर साक्षात्कार लिया गया । कार्यक्रम अच्छा था भले ही कार्यक्रम के बाद हवापानी का नाश्ता करके आगे बढ़ना हमारी मजबूरी थी बेदी जी से और दिवाकर जी से बातचीत करने का जो मोह पाल रखा था।)
मोरलिया जी के लोकगीतों की गोरी
ज्यों सावन (साजन) को तरसी
आठ घंटे काली रात में
मार्ग अटपटे, उबड़ -खाबड़
मोटर गिरी मिलीं
बाढ़ नहीं वह काली रात थी
मेहमानों पर गुजरी
उल्लास साथ थे फिर भी
रो हंस रातभर खूब छीटाकशी।

गोयल जी को चैन नींद की
बजी मेरी वंशी
अच्छा होता
पैदल चलते फुटपात छानते
कम से कम वह साथ बिठाते
बचपन के दिन लौट आते तब
उन अमीरन और तुलसी के
फिर चरण धुलाकर
उन्हें पोछते
ऊंचों से ना कभी मिली है
आशा, पानी की गगरी
क्या जाने वह गैरों का मन
जिसने फुत्पात पर ना रात गुजारी.
इसी लिए थी मति गयी मारी
मोटर के आगे रिक्शे छोड़ कर
जब आठ घंटों में सफ़र तय किया
हाय बरेली
अलविदा मुरादाबाद दो पल साथ सही।
जब कभी मिलेंगे
मिलते ही कहेंगे अलविदा।
क्योंकि संगम
मिलन -विरह का मापदंड है
प्रेम की मिली सजा।
हाय बाय का संगम जीवन
सारी दुनिया तारी।
दूसरा दौर बरेली में, रेल में रात गुजारी।
शहरयार बरेली अपना
पर ना करना इससे यारी ।

यह तो बात थी उस रात की जब हमने मुरादाबाद तक जाने में ८ घंटे लगाये और मौत से बार-बार बचे।
आइये कुछ अच्छी खुशहाली की बात करते हैं अपने दोस्त शायर अखलाख मुहम्मद खान शहरयार को और कुरूप जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए नामित किये जाने के लिए बहुत-बहुत बधाई।
उर्दू के नामचीन शायर अखलाक मुहम्मद खान शहरयार को 44वां ज्ञानपीठ पुरस्कार



देने की शुक्रवार को घोषणा की गई। उन्हें यह पुरस्कार वर्ष 2008 के लिए दिया जाएगा। साथ ही मलयालम के प्रसिद्ध कवि व साहित्यकार ओ.एन.वी. कुरुप को वर्ष 2007 के लिए 43वां ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाएगा।
जाने-माने लेखक और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता डॉ. सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता में ज्ञानपीठ चयन समिति की बैठक में दोनों साहित्यकारों को पुरस्कृत करने का निर्णय लिया गया। चयन समिति में प्रो. मैनेजर पांडे, डॉ. के. सच्चिदानंदन, प्रो. गोपीचंद नारंग, गुरदयाल सिंह, केशुभाई देसाई, दिनेश मिश्रा और रवींद्र कालिया शामिल थे। उर्दू के जाने-माने शायर शहरयार का जन्म 1936 में आंवला [बरेली, उत्तरप्रदेश] में हुआ। इस 74 वर्षीय शायर का पूरा नाम कुंवर अखलाक मुहम्मद खान है, लेकिन इन्हें इनके उपनाम शहरयार से ही ज्यादा पहचाना जाना जाता है।
वर्ष 1961 में उर्दू में स्नातकोत्तर डिग्री लेने के बाद उन्होंने 1966 में अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू के लेक्चरर के तौर पर काम शुरू किया। वह यहीं से उर्दू विभाग के अध्यक्ष के तौर पर सेवानिवृत्त भी हुए। बॉलीवुड की कई हिट हिंदी फिल्मों के लिए गीत लिखने वाले शहरयार को सबसे ज्यादा लोकप्रियता 1981 में आई उमराव जान से मिली। इस वक्त की उर्दू शायरी को गढने में अहम भूमिका निभाने वाले शहरयार को उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, दिल्ली उर्दू पुरस्कार और फिराक सम्मान सहित कई पुरस्कारों से नवाजा गया।
वर्ष 2007 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले कुरुप का जन्म 1931 में कोल्लम जिले में हुआ। वह समकालीन मलयालम कविता की आवाज बने। उन्होंने प्रगतिशील लेखक के तौर पर अपने साहित्य सफर की शुरुआत की और वक्त के साथ मानवतावादी विचारधारा को सुदृढ किया। साथ ही सामाजिक सोच और सरोकारों का दामन भी थामे रखा। बाल्मीकि, कालीदास और टैगोर से प्रभावित कुरुप की उज्जयिनी और स्वयंवरम जैसी कविताओं ने मलयालम कविता को समृद्ध किया। उनकी कविता में संगीतमयता के साथ मनोवैज्ञानिक गहराई भी है। कुरुप के अब तक 20 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और उन्होंने गद्य लेखन भी किया है। उनको केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, वयलार पुरस्कार और पद्मश्री से नवाजा गया है।
[शुक्रवार, 24 सितंबर 2010]

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

रोमन स्कूल, ओस्लो में आमसभा १२ अक्टूबर को नार्वेजीय विदेश मंत्री एवं बाल और समन्वय मंत्री के साथ

रोमन स्कूल, ओस्लो में आमसभा १२ अक्टूबर को शाम 18:00 बजे

नार्वे के विदेश मंत्री यूनास गाह्र स्त्योरे के साथ सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
नार्वेजीय विदेश मंत्री Jonas Gahr Støre एवं बाल और समन्वय मंत्री Audun Lysbakken तथा byrådsleder Stian Berger Røsland के साथ
Folkemøte i Groruddalen
रोमन स्कूल, ओस्लो में आमसभा १२ अक्टूबर को 18:00 नार्वेजीय विदेश मंत्री एवं बाल और समन्वय मंत्री के साथ
Tidspunkt: 12। oktober 2010 kl 18:00 - 20:00Barne-, likestillings- og inkluderingsminister Audun Lysbakken inviterer til folkemøte i Groruddalen। Statsråden ønsker seg meninger, innspill og ideer fra folk som bor i Groruddalen। - Hvordan er det å bo i dalen, hva opptar dere og lever dere godt sammen, spør Lysbakken. Lysbakken ønsker alle interesserte velkomne til debatt for å diskutere hvilken integreringspolitikk vi bør ha. Han ønsker at ulike stemmer og synspunkter kommer fram.- Jeg er opptatt av at alle barn deltar i barnehagen og klarer seg bra på skolen. Jeg ønsker debatt rundt hvordan vi kan bryte ned klasseskillene i Oslo, men også diskusjon rundt mer kontroversielle temaer som bussing og skolegrenser, sier statsråden. Utenriksminister og leder av Aps integreringsutvalg Jonas Gahr Støre og byrådsleder Stian Berger Røsland (H) har så langt takket ja til å sitte i et panel sammen med Audun Lysbakken på folkemøtet. Asta Busingye Lydersen er debattleder.- På folkemøtet er det åpen mikrofon. Jeg vil høre nettopp dine erfaringer og konkrete innspill på utfordringer som dere møter i hverdagen, oppfordrer ministeren.Folkemøtet er på Rommen skole og kultursenter tirsdag 12. oktober kl. 18-20. Det er kapasitet til 300 deltakere.
Røde Kors Ressurssenter tilbyr barnetilsyn under møtet.