रविवार, 4 मार्च 2012

अमरीका में हमारे सांस्कृतिक दूत शेर बहादुर सिंह -शरद आलोक

अमरीका में हमारे सांस्कृतिक दूत शेर बहादुर सिंह -शरद आलोक

सबसे पहले मैं भाई डॉ मनोज जी को बधाई देता हूँ कि जिन्होंने शेर बहदुर सिंह जी के अभिनन्दन ग्रन्थ का सम्पादन आरम्भ किया है.  ऐसे कर्मठ हिन्दी सेवी शेर बहादुर सिंह के जीवन पर इस ग्रन्थ द्वारा विस्तृत सामग्री पाठकों के सामने आयेगी और लोग उससे लाभान्वित होंगे.

वृक्ष कबहु नहीं अल भखे, नदी न संचै नीर 
परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर..

कबीर दास जी की इन पंक्तियों को  सही रूप में अमेरिका में बसे श्री शेर बहादुर सिंह जी के जीवन को चरित्रार्थ कर रही हैं .  शेर बहादुर सिंह अमेरिका सन  १९७८ को भारत से अमेरिका आ गये थे. वहीं अपने परिवार के साथ बस गये हैं.  आपको अमरीकी प्रदेश न्यूयार्क या  न्यूजर्सी में ही नहीं अपितु पूरे अमेरिका में भारतीय लोग जानते हैं.  एक बड़ी संख्या है उन भारतीय लोगों की जो नये -नये अमरीका  में आये थे और स्थापित होने का प्रयास कर रहे थे तथा सहयोग की कामना कर रहे थे उन्हें न केवल स्वयं शेर बहादुर सिंह ने यथा संभव अपने तन-मन-धन  से सहायता की बल्कि उन्हें नौकरी दिलाने के लिए रास्ते भी बताये.
आम तौर पर लोग जीवन यापन के लिए विदेश आते-जाते रहते हैं. धन कमाने और शिक्षा यापन के लिए. पर शेर बहादुर सिंह केवल अमेरिका में बसकर भी अपनी सभ्यता और संस्कृति की सेवा कर रहे हैं जो बहुत प्रशासनीय है.   

युवाओं जैसे  जोश से भरा व्यक्तित्व
आपसे किसी भी आयु का व्यक्ति बातचीत में सहजता महसूस होता है. आप मिलने वाले उसकी आयु और स्थिति का ध्यान  तो करते ही हैं साथ ही उसका समय बर्बाद नहीं करते.  किसी प्रकार की समस्या या अड़चन हो उससे निपटने और उसे निपटाने  के लिए युवाओं की तरह तत्पर रहते है.
मुझे शेर बहदुर सिंह जी की शादी की जुबली में सम्मिलित होने  का अवसर मिला था. इनके बेटे ने इस  उत्सव का आयोजन सागर तट पर बने एक  बड़े सुन्दर रेस्टोरेंट में किया था जिसमें पूरे अमरीका से साहित्यिक प्रेमी, परिवार और मित्रजन आये थे.  लेखिका पूर्णिमा गुप्ता १२ घंटे कार चलाकर वहां आयी थीं. देवेन्द्र सिंघ्न्यु जर्सी से आये थे. जिसमें नृत्य के लिए युवा माडलों ने भी उत्सा की सरगर्मी में चार चाँद लगाये थे.  यह एक न भूलने वाला पारिवारिक कार्यक्रम था
सबके प्रिय शेर बहादुर सिंह जी
शेर बहादुर सिंह अमरीका और भारत मरण सभी के प्रिय हैं. जो एक बार आपसे मिलता है आपसे जरूर प्रभावित होता है.
अपने समाज से लेकर समस्त भारतीयों के सांस्कृतिक, धार्मिक और साहित्यिक समाज के लोग केवल शेरबहादुर सिंह जी को जानते ही नहीं हैं अपितु आपके कार्य के प्रशासक हैं.  लोग इनका उदहारण देते हैं कि 'मनुष्य हो तो शेरबहादुर सिंह जैसा.' कर्मठ समाजसेवी हो तो इनके जैसा.  जहाँ भारत देश की बात आती है तो उसके सम्मान के खिलाफ कोई समझौता नहीं करते भले ही वह कोई हो वह स्पष्ट कह देते हैं कि यह उन्हें सहनीय नहीं है.  यही कारन है कि अनेक अन्स्कृतिक, धार्मिक और साहित्यिक संस्थाओं ने आपको अपना नेता चुना. आपने अपने को कभी नेता न समझते हुए, सभी को समान समझते हुए सभी को आदर देते हैं और उसका सम्मान करते हैं.
इसीलिये आप अमरीका में रहने वाले भारतीयों बड़े उदार, कर्मठ और पुरुषार्थी के रूप में भी प्रतिष्ठा पाते हैं. 
आपके पास अनेक संस्थाओं के अनेक महत्वपुर्ण पद रहे पर आपने कभी घमंड नहीं किया. और किसी के भी आग्रह पर आप उसके पास जाकर उसकी परेशानी सुनते थे और उसे हल कारने का प्रयास करते थे.
साहित्यकारों का बहुत सम्मान
आप साहित्यकारों का बहुत सम्मान करते हैं इसीलिए अमरीका में आपके घर पर बहुत से साहित्यकार आकर रुकते हैं और उनका घर साहित्य गोष्ठियों से भर जाता है. में बस गये हैं.  वह अपने परिवार के साथ रहते हुए अपना संस्कृति और हिन्दी सेवा में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं.
मुझे अनेकों बार अमरीका में आने का अवसर प्राप्त हुआ और हर बार शेर बहादुर सिंह जी से मिला. इनके घर पर भी अनेकों बार रुका.  इनका पूरा परिवार भारतीय संस्कृति को समर्पित है. सातवे विश्व हिन्दीसम्मेलन न्यूयार्क के बाद मैं आपके घर पर डॉ. दो दिन उज्जैन के विद्वान हरिमोहन बुधौलिया के साथ रुका था.  साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्मरणों और कवता कहानी का ऐसा दौर चलता कि रात के दो और तीन बज जाते थे.
साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन
अमरीका में हर वर्ष आपकी संस्था अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति  अमेरिका के विभिन्न प्रदेशों में कविसमेलन आयोजित करती है जिसका और भारत से अनेक साहित्यकारों को आमंत्रित करती है. इस तरह वर्षों से कविता के माध्यम से अमेरिका में हिन्दी का प्रचार प्रसार हो रहा है.  आप इस संस्था के पदाधिकारी हैं और अपने घर पर कवियों को रकते हैं और सम्मान करते हैं.  अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति  अमेरिका की स्थापना स्व. कुंवर चन्द्र प्रकाश सिंह ने की थी और आजकल कुंवर चन्द्र प्रकाश सिंह के सुपुत्र डॉ रवी प्रकाश सिंह भी इससे जुड़े हुए हैं.
आपने स्वयं संस्था के माध्यम से दर्जनों कवी सम्मलेन भारतीय दूतावास और  सार्वजानिक स्थानों पर आयोजित किये हैं.
विश्व हिन्दी सम्मलेन में महत्वपूर्ण भूमिका
आप विश्व हिन्दी सम्मलेन में आयोजन समिति के सदस्य थे तथा स्थानीय यात्रा संबंधी सुविधा को सम्मलेन में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों को दिलाना आपकी जिम्मेदारी थे जिसे आपने बहुत ख़ूबसूरती से निभाया था आपको इसके लिए भारतीय विद्या भवन और दूतावास ने सम्मानित भी किया था.
अध्यापन में महत्वपूर्ण योगदान
आपने ११ वर्षों तक न्यू यार्क शिक्षा बोर्ड में कार्य किया और  महत्वपूर्ण सेवा की.  भारत में आप पहले २३ वर्षों तक माधवराव सिंधिया व्यास कालेज में भी कार्यरत रहे. आप पहली पारी के एक दशक से अधिक प्रधानाचार्य भी रहे. एन सी सी प्रशिक्षण और छात्रावास प्रबंधन में भी बहुत महत्वपूर्ण  भूमिका निभायी और सभी की प्रशसा के पात्र बने.

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

हिन्दी ब्लागलेखन की विस्तृत भूमिका - - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' , ओस्लो, नार्वे

हिन्दी ब्लागलेखन की विस्तृत भूमिका
- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' , ओस्लो, नार्वे

(लेखक सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' गत ३२ वर्षों से नार्वे में हिन्दी का प्रचार-प्रसार कर रहे  है और गत 25 वर्षों से नार्वे प्रकाशित द्वैमासिक, द्वैभाषिक (हिन्दी-नार्वेजीय) पत्रिका स्पाइल-दर्पण के सम्पादक और 'वैश्विका' साप्ताहिक के संस्थापक हैं और स्वयं ब्लाग लेखन भी करते हैं. विदेशों में हिन्दी साहित्य और मीडिया में महत्वपूर्ण योगदान देने वालों में सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' का नाम महत्वपूर्ण है. आपके दो कहानी संग्रहों और आठ काव्य संग्रहों के अलावा नाटक संग्रह तथा अनुवाद साहित्य में नार्वे, स्वीडेन और डेनमार्क के साहित्य से हिन्दी में अनुवाद भी किया है: अनुवाद में  हेनरिक  इब्सेन  के नाटकों  'गुड़िया का घर' और 'मुर्गाबी'  कथाओं में  'नार्वे की लोककथायें' तथा डेनमार्क के एच  सी अन्दर्सन  कथायें  तथा  नार्वे,  स्वीडेन और   डेनमार्क  के प्रसिद्द कवियों की कविताओं का अनुवाद भी किया है.  )

आज सन् 2012 में हिन्दी ब्लॉग लेखन की बड़ी भूमिका है. एक दशक से हिंदी ब्लागिंग ने जन संचार में एक धूम मचाई है जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है.
भारत में मैंने हिन्दी को वैश्विक परिदृश्य में एक चमकते सितारे की तरह देखा है.
शोध पत्रिकाओं की अहम् भूमिका
पहले हिन्दी में शोध पत्रिकाओं का अभाव था पर जिस तरह अनेक नयी-नयी शोध पत्रिकायें प्रकाशित हो रही हैं वह हिन्दी के उज्जवल भविष्य की ओर संकेत कर रही हैं. विश्वविद्यालयों में शोधकर्ता और शोध गुरुओं द्वारा हिन्दी के वैश्विक धरातल पर स्तरीय वैश्विक शोध द्वारा हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया जा रहा है. जैसा कि अनेक दशकों पूर्व अंग्रेजी और यूरोप में अभी भी अनेक भाषाओँ के शोध मात्र सरकारी धन से ही संपन्न हो रहे हैं वहाँ हिन्दी का प्रचार-प्रसार निस्वार्थ भाव से देश विदेश के हिन्दी प्रचारक, लेखक और समाजसेवी कर रहे है. हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं को चाहिए कि वे अन्य भारतीय भाषाओँ की अच्छी -अच्छी रचनाओं और शोध कार्य को हिन्दी पाठकों के सामने रोचक और स्तरीय तरीके से प्रस्तुत करें. इससे किसी को भी हिन्दी द्वारा सभी भारतीय भाषाओँ के साहित्य के दर्शन होंगे. अनेक प्रवासी लेखकों और अनुवादकों ने विदेशी साहित्य को हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओँ में अनुवाद किया है और आगे भी कर रहे हैं जो हमारी भाषा और साहित्य के असीमित विस्तार की तरफ संकेत करता है. शोध पत्रिकाओं ने अपने नेट पृष्ठ भी बनाये हैं और ब्लागलेखन में भी सम्मिलित किया है.

फोन पर हिन्दी (देवनागरी) में सूचना और सन्देश

फोन पर हिन्दी (देवनागरी) में सूचना और सन्देश भेजना शुरू हो गया है. इंटरनेट पर तो हिन्दी में पत्राचार बहुत पहले शुरू हो गया था. दो दशक पूर्व वेबदुनिया ने पाठकों को अपने पृष्ट हिन्दी में बनाने और ई-पत्र की हिन्दी में सुविधा दे रखी थी. इसमें मुझे भी जुड़ने का अवसर दो दशक पूर्व मिला था. हालाँकि वह उतना विकसित नहीं था पर शुरुआत को बहुत प्रशंसनीय कहा जाएगा.

भारत सरकार के आई टी मंत्रालय ने तो हिन्दी के प्रोग्राम को निशुल्क देकर हिन्दी का बढ़-चढ़कर प्रचार-प्रसार किया था. इस सम्बन्ध में मैं एक बार रेलवे में राजभाषा के तत्कालीन निदेशक डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा के कहने पर ओम विकास जी से मिलने गया था. ओम विकास जी और विजय कुमार मल्होत्रा की भी इंटरनेट में हिन्दी के विकास और प्रसार में महवपूर्ण भूमिका है जिसे भुलाया नहीं जा सकता है.

विदेशों में बसे हिन्दी के रचनाकारों के हिन्दी ब्लॉग लेखन ने नये आयाम दिए हैं. चाहे वेब पत्रिकाओं के स्तम्भ हों, या स्थापित और छोटे-बड़े समाचार पत्र के स्तम्भ समाचार वे ब्लॉग से जुड़े दिखाई देते हैं. नार्वे से सुरेशचन्द्र शुक्ल का ब्लाग, यू के कथा, अभिव्यक्ति नेट पत्रिका के साहित्यिक समाचार और सैकड़ों इसके अच्छे उदाहरण हैं. इस लेख में विस्तार से लिख पाना संभव नहीं हो रहा है पर जैसे ही लेखक को और जानकारी प्राप्त होगी निकट भविष्य में उसे प्रस्तुत किया जायेगा.

भारत में तो ब्लागलेखन के अनेक समूह वेब पर उभर के आये हैं. ब्लॉग लेखन पर पुस्तकें भी छप रही हैं भले ही वह अपनी छमता के कारण ब्लाग लेखन के विस्तार को अपनी पुस्तक में समाहित नहीं कर पाये हैं.

विश्व हिन्दी सम्मलेन न्यूयार्क में ब्लॉग लेखन पर गोष्ठी
ब्लॉग लेखन करने वाले प्रवासी लेखकों की एक बैठक सन् २००७ में विश्व हिन्दी सम्मलेन न्यूयार्क में होटल के प्रेस कक्ष में हुई थी. इसमें अनेक मीडिया के सदस्य भी उपस्थित थे. एक कवि गोष्ठी भी संपन्न हुई थी जिसका सीधा फोन के जरिये अमरीकी रेडियो में प्रसारण भी हुआ था इस कवि गोष्ठी में अभिनव शुक्ल आदि की प्रमुख भूमिका थी. दोनों गोष्ठियों में लेखक (सुरेशचन्द्र शुक्ल) स्वयं भी उपस्थित थे. इसमें विदेश विभाग के प्रतिनिधि के अलावा एक भारतीय दूतावास के हिन्दी अधिकारी भी उपस्थित थे.

विश्वहिंदी सम्मलेन समाचार बुलेटिन में स्थान की कमी और पहुँच के कारण ये समाचार प्रकाश में नहीं आ पाये. दूसरा कारण ये विषय विश्व हिन्दी सम्मलेन के किसी सत्र में समाहित नहीं किये गये थे. विदेशों में किये जा रहे हिन्दी ब्लागलेखन के योगदान को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि इनके लेखन में विविधता के साथ-साथ विस्तार भी है. हिन्दी की सरकारी और गैर सरकारी पत्रिकायें ब्लॉग लेखन और विदेशों में जा रहे हिन्दी लेखन की सूचना प्राप्त करने के लिए प्रयास कम करती हैं. ये पत्रिकायें प्राय भेजी गयी और अपनी परिधि में प्राप होने वाली सूचनायें और सामग्री प्रकाशित कर अपनी लेख संबंधी जरूरतें पूरा करती हैं.
आशा है कि आगे चलकर इस पर शोध किया जाएगा और नयी सूचनाओं और प्रगति की सूचनाओं के साथ देश विदेश की हिन्दी पत्रिकायें हिन्दी ब्लागलेखन पर विस्तृत और विश्वसनीय सूचनायें प्रकाशित करेंगी.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए जरूरी विचारों का प्रकाशन
प्रतिष्ठित समाचार पत्रों द्वारा अपने पत्रों के ब्लॉग समूह स्थापित किये गये हैं और पाठकों, लेखकों और अपने पत्रकारों को उसमें सम्मिलित भी किया है. ऑनलाइन प्रतिक्रिया को भी प्रकाशित करके हिन्दी में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को वह आयाम दिया है जो पहले अनेक कारणों से संभव नहीं था. आवाज दबाने से कभी भी हल नहीं निकलता और अभिव्यक्ति होने से उसके जवाब में भी प्रतिक्रिया होती है जो एक जनतंत्र और खुले समाज के लिए जरूरी है. किसके मन में क्या है उसका भी पता चल जाता है.

माँ बाप को बच्चा दिलाने के लिए भारतीय अधिकारी नॉर्वे में

माँ बाप को बच्चा दिलाने के  लिए भारतीय  अधिकारी नॉर्वे में
(साभार 'समाचार पत्र' २७.०२.१२) ओस्लो. भारत और नार्वे के मध्य अच्छे सम्बन्ध हैं.  भारतीय सरकार ने बच्चों को भारत ले जाने के लिए सार्थक प्रयत्न किये हैं जिसमें भारतीय राजदूत और नार्वेजीय राजदूत  एक सकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं.
भारतीय विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी को नॉर्वे भेजा गया है ताकि वो एक भारतीय दंपति को उनके बच्चों को सौंपने के सिलसिले में बातचीत कर सकें.

विशेष दूत मधूसुदन गणपति नॉर्वे के विदेश मंत्री और दूसरे उच्च अधिकारियों से बातचीत करेंगे.
इससे जुड़ी ख़बरें‘देखभाल’ के लिए बच्चे और मां-बाप जुदा नॉर्वे में बच्चों से मिले भारतीय दंपति 'ऐसा भी नहीं कि बच्चे अनाथ हैं और उनका कोई वतन नहीं'.  भारत भारतीय विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता सईद अकबरुद्दीन ने ट्वीट पर कहा कहा कि विशेष दूत गणपति सभी जरूरी अधिकारियों से मिलेंगे.
नॉर्वे के बाल कल्याण अधिकारियों ने पिछले साल मई में अनुरूप भट्टाचार्य और उनकी पत्नी सागरिका को उनके दो छोटे बच्चों को ये कहते हुए उनसे छीन लिया कि वे बच्चों की ठीक से देखभाल नहीं कर पा रहे.
इस घटना को लेकर ख़ासा हंगामा हुआ और भारत सरकार को भी इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा है जिसने नॉर्वे के विदेश मंत्रालय से संपर्क किया है.
कुछ दिनों पहले नॉर्वे के तीसरे बड़े शहर स्तावान्गेर में काम कर रहे अनुरूप भट्टाचार्य और उनकी पत्नी सागरिका भट्टाचार्य को तीन महीने बाद अपने बच्चों से मिलने दिया गया था.
तीन वर्षीय अभिज्ञान और एक वर्षीया ऐश्वर्या - से उनकी कुछ घंटे की मुलाक़ात बाल कल्याण विभाग के एक दफ़्तर में हुई.
फ़िलहाल नॉर्वे के अधिकारी इन बच्चों को उनके चाचा को सौंपे जाने के बारे में विचार कर रहे हैं.
नॉर्वे के अधिकारियों ने उम्मीद जताई है कि अगले दो हफ़्ते में इस बारे में कुछ तय कर लिया जाएगा.
मगर बच्चों के माता-पिता का कहना है कि अभी कुछ भी तय नहीं हुआ है और उन्हें बताया गया है कि बच्चों को सौंपे जाने को लेकर देर हो सकती है.
इस बीच बंगाल में रहने वालों उन बच्चों के नाना-नानी दिल्ली में नॉर्वे की दूतावास के बाहर सोमवार से चार दिनों तक धरना कर रहे हैं.
ध्यान रहे बच्चों की सही देखभाल न करने और लापरवाही के कारण बच्चों की  सही देखरेख के अभाव में बच्चों की देखभाल माता-पिता से ले ली गयी थी.
नार्वे में बच्चों की देखभाल विश्व के उच्च स्तर  पर किया जाता है. यहाँ सामाजिक और उच्च स्तर पर बच्चों की परवरिश किये जाने में विश्व में बड़ा नाम है. यदि भारत सरकार सहयोग न करे तो बच्चे १८ वर्ष से पहले माता पिता को मिलना संभव नहीं है.  इस सम्बन्ध में भारत से दूत भेजे गए हैं जो नार्वे में सरकार के प्रतिनिधियों से इस बारे में मिलकर समझौता करने का प्रयास करेंगे.

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

अन्ना मारा गया (कहानी) -सुरेशचंद्र शुक्ल ,शरद आलोक'

अन्ना  मारा गया  (कहानी) पहला  भाग -सुरेशचन्द्र शुक्ल ,शरद आलोक'
 'अन्ना मारा गया, मशहूर समाजसेवक अन्ना मारा गया. आज की ताजा खबर.', 'आइये लीजिये मुफ्त अख़बार-नए-नए ताजे समाचार.  लखनऊ नगर का मशहूर चारबाग़ रेलवे स्टेशन पर एक अखबार बेचने वाला आवा ज लगा रहा है. लोग उसकी तरफ देखते हैं जो जल्दी में नहीं हैं वह अख़बार लेते जा रहे हैं. हाकर की फुर्ती उसकी सक्रियता का बयां कर रही थी. वह बिना थके गोहार  लगा रहा है, आइये नवाब साहेब, बहनजी ताजा समाचार है, चाय के साथ नाश्ता करना भूल जायेंगी, नवाब साहेब आइये और मिर्च और मुरब्बे सी ख़बरों का लुफ्त उठाइये'. यात्रियों की भीड़ स्टेशन की ओर उमड़कर जा रही है. अखबार वाला सड़क के मध्य बने डिवाइडर पर अखबार रखे हैं. उसके बगल में बैठी एक महिला नीम की दातून बेच रही है. आज भी कुल्ला करने का पुराना तरीका. एक सज्जन मुख में दातून दबाए दातून  को अपनी अँगुलियों से  घुमाते हुए दूसरे हाथ  से अखबार पकड़ते हैं और अखबार वाले से पूछते हैं, 'किसने दी है परमिशन अखबार बेचने के लिए.'
'इसमें अनुमति की क्या जरूरत है भाई साहेब',  कहते हुए अखबार  वाला लोगों को अखबार पकड़ा रहा था. निडर. बेख़ौफ़. दातुन वाले ने पूछा,
'क्या नाम है तुमारा?'
'अन्ना.'
'तुम  तो  कह  रहे हो  अन्ना मारा गया.'  उसने दातून की कूची मुख से निकली और वहीं बगल में थूकते हुए पूछा था.
'हाँ बाबूजी, पर हम क्या करें? क्या अन्ना मेरा नाम नहीं हो सकता.' अखबार वाले ने जवाब दिया और  शुरू हो गया अपने अखबार का प्रचार करने'
'बेरोजगारी का नया व्यापार, नरेगा का  पैसा लूटकर नेता मालदार.' 
'अखबार बेच रहे हो या कविता कर रहे हो.'
'हाँ, जनाब कविता भी कर लेता हूँ.'  उसने आगे कहा, 'आप लखनऊ के नहीं लगते हो तभी आपको नहीं मालुम कि लखनऊ का हर दूसरा शहरी शायराना अंदाज में बात करता है.' तभी उस अखबार वाले के मोबाइल फोन की घंटी बजी. 'उसने मोबाइल फोन उठाया. और कहा बीच सड़क पर छोटी लाइन के सामने' वह दातून से कुल्ला करने वाला आदमी अखबार वाले के नजदीक आ गया और पूछने लगा, 
' किससे टर-टर कर रहा है ?'
अखबार वाले ने वहां से हटकर अपने मोबाइल फोन पर कुछ कहा और खुला मोबाईल अखबार के पास रखकर अखबार के गठ्ठर के पास आ गया.
दातून वाला आदमी उसके पीछे -पीछे आ गया. तभी एक मोटर साइकिल से सवार दो युवक उतरे और अपना कमरा एक युवक के पीछे छुपकर रिकार्ड करने लगे. 
अखबार वाले ने पूछा,' क्या कहते हो भैया? मुझे अखबार क्यों नहीं बेचने देते?''
'यहाँ मेरा ठेका चलता है. मुझे भी उगाही करके देना पड़ता है.' अखबार वाला उसकी बात सुनकर अपना मोबाईल हाथ में लेकर दोबारा पूछने लगा क्या कहा भैया, शोर में सुनायी नहीं पड़ा? जरा जोर से बोलो?
' मैंने कहा मेरा यहाँ ठेका चलता है. मुझे भी आगे पासे देने होते हैं. तुम्हें भी कुछ न कुछ देना पड़ेगा.' दातून कर रहे आदमी ने अपनी दातून बीच सड़क पर फेकते हुए बोला.
'हमने तो सुना था यहाँ सरकार राज है, पर यहाँ तो आपका राज लगता है.', अखबार वाले ने व्यंग्यात्मक लहजे में  और कहने लगा,  दातून वाला सुनकर आग बबूला हो गया.
,  'तुम यहाँ बिना कुछ लिए दिए अखबार नहीं बेच सकते?'
'देखो भैया घूस लेना और देना जुर्म है' दातून वाले ने कंधे पर लटके झोले से एक स्वेटर निकाल  और उसे पहन लिया स्वेटर के मुड्ढे पर पुलिस का बिल्ला लगा था. 
'अख़बार वाले के मुख में कोई शिकन नहीं थी. वह बेधड़क अखबार बेचने की गोहार लगाता  जा रहा था,
'आज की ताजा  खबर, खुलेआम पुलिस सिपाही घूस मांग रहा, जनता बेखबर.'
उसके यह कहते ही वहां भीड़ एकत्रित होने लगी. सिपाही पहले हड़बड़ाया फिर  संभलकर आरोप लगाता हुआ  बोला, 
'बीच सड़क में खड़े होकर रास्ता जाम करते हो. तुम्हें थाने  में बन्द करवा दूंगा.' 
अखबार वाले ने जवाब दिया, ''जब आप मुझपर दबाव डाल  रहे हो घूस के लिए, तो चलो देता हूँ. मेरे पास जरा छुट्टे रूपये नहीं हैं सौ का नोट है. जरा इसे तोड़ा लूं.' कहकर  वह मोटरसाइकिल वाले एक युवक से पास आ गया. नोट देने का इशारा करता है, सिपाही पीछे-पीछे आता है.
'बढ़ाओ हाथ और पकड़ो अपनी उगाही.''  सिपाही से ऊपर हाथ उठाकर पैसे लेने को कहता है. सिपाही पचास का नोट जेब में डालने का इशारा करता है. पर अखबार वाला कहता है ,
'एक तो आप जबरदस्ती पैसे मांग रहे हो, ऊपर से लेने से डरते भी हो.'
सिपाही को मानो ताव आ गया और उसने कहा, 'कौन डरता है, लाओ उसने हवा में हाथ उठाया और पचास का नोट पकड़ लिया. और कहा 'या तुम्हरे फुटपात  का किराया है.'   
'तो फिर रसीद भी दोगे?' अखबार वाले ने कहा. 
'काहे की रसीद.' कहकर वह सिपाही की वर्दी में सिपाही जाने लगा, पर अखबार वाले ने जिद की तो उस आदमी ने अखबार वाले को अपना परिचयपत्र दिखाया और बताया कि वह पास के थाने  में सिपाही है.
(शेष कहानी आगे पढ़िए .....इसी ब्लॉग पर धन्यवाद. )
 
 
  वह  दूसरी और  motar
   


 खबरदार.' दूर करें' नरेगा का उपहार'   
     

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

विदेशों (नार्वे) में हिन्दी शिक्षा - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

दिल्ली के साहित्यिक परिवेश और विदेशों (नार्वे) में हिन्दी शिक्षा - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

चित्र  में:  हिन्दी  स्कूल  नार्वे में रंगों के पर्व होली पर रंबिरंगे चेहरे   


दिल्ली के साहित्यिक परिवेश को लेकर मेरे अन्दर कुछ धारणाएं हैं. दो बार समाचार पत्रों में साक्षात्कार के बाद भी उन धारणाओं को किसी ने सार्वजनिक रूप से जवाब नहीं दिया. दिल्ली में साहित्यिक लेखकों का बटाव और अलगाव केवल विचारधारा को लेकर ही नहीं है. साधारणतया राजनैतिक विचारधारा से भी नहीं बंधे हैं लेखक और उनके खेमे. अपने तर्क को उचित ठहराने और तार्किकता से दूर रहने के कारण बहुत से लेखकों ने वर्षों से विदेशों में रची जा रही साहित्यिक सेवाओं (भारतीय भाषाओँ के लिए जिनमें मुख्यता हिंदी, पंजाबी, उर्दू, तमिल, मराठी, तेलगू और अन्य भारतीय भाषाओँ) का ठीक से जिक्र न ही अपने संस्मरण में किया है न ही अपनी अन्य रचनाओं में. इसीलिए हमने यह बीड़ा उठाया है कि विदेशों में हिंदी, पंजाबी, उर्दू का प्रचार-प्रसार करते हुए विदेशों में रचे जा रहे सामयिक उपलब्धियों को ऐतिहासिक, साहित्यिक और राजनैतिक कृतियों में स्वयं भी लिखेंगे और अन्य अपने जैसे सैकड़ों रचनाकारों और अन्य प्रतिभाशाली लोगों के बारे में भी लिखेंगे ताकि, सही तस्वीर उपस्थित दर्ज हो सके.


भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों का साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप से देश-विदेश में की जा रही सेवाओं और कृतियों को प्रकाश में लाने और उन्हें प्रकाशित तथा प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है.

विदेशों में भारतीय भाषाओं के और अपने प्रवास-निवास के देश की भाषा के साहित्यकारों ने ऐतिहासिक भूमिका निभायी है इन संकलनों में यहाँ केवल उन्हें ही सम्मिलित कर रहा हूँ जिन्होंने खुली दृष्टि से बिना भेदभाव के सही तस्वीर अपने साहित्य में अपने साक्षात्कारों में और अपने व्याख्यानों में प्रस्तुत किया है. यहाँ धार्मिक लेखन का जिक्र नहीं है.

लेखक गोष्ठियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भारतीय भाषाओं हिन्दी, पंजाबी और अन्य भाषाओँ का प्रचार और प्रसार
नार्वे, स्वीडेन, फिनलैंड और डेनमार्क में साहित्यिक और भारतीय भाषाओँ को, वहां की भाषाओँ और वहां बच्चों और युवाओं की सामाजिक और सामयिक आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा द्वारा और साहित्यिक, लेखक गोष्ठियों द्वारा प्रचारित करने का जो आन्दोलन शुरू किया है. हिन्दी स्कूलों और अन्य संस्थाओं के माध्यम से सहकारिता भाव से हिन्दी शिक्षा को दिया जाना और सीखने वाले देश विदेश के क्षत्रों अपने कार्यक्रमों में सम्मानित किया जाना चाहिए.
बच्चों को द्विभाषीय सांस्कृतिक राजदूत बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय  भाषा हिन्दी की शिक्षा जरूरी
हिन्दी की शिक्षा देवनागरी लिपि में जरूरी है. क्योंकि देवनागरी लिपि वैज्ञानिक, सहज और प्रायोगिक है. किसी भी संस्कृति को अपनी मात्रभाषा और मूल भाषा सीखे बिना संभव नहीं है. अपनी भाषा-संस्कृति, उसकी जड़ों से जुड़े बिना हमारी पहचान अधूरी है. यह अविभावकों और सामजिक कार्यकर्ताओं का फर्ज है कि मात्रभाषा और मुख्य भारतीय भाषा हिन्दी के जरिये हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ की शिक्षा देना और उसमें भारत सरकार की रचनात्मक और उसकी उपलब्धियों की जानकारी देते हुए, भारतीय राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पर्वों की जानकारी देते हुए अन्य धर्मों से सद्भाव रखने की की शिक्षा देते हुए जिस देश में रह रहे हैं उसके साहित्य और संस्कृति और सामयिक विषयों की जनकारी पत्य्क्रम में होना जरूरी है. तभी हम हिंदी सीखने वाले छात्र-छात्राओं को भाषा का सांस्कृतिक दूत बनाने में सफल हो सकेंगे जो अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद आने वाली पीढी को अपने देशों में हीनी कि शिक्षा के द्वारा प्रचार प्रसार न योगदान देते रहेंगे.
हिन्दी की शिक्षा सभी धर्म के मानने वालों या धर्म को न मानने वालों के लिए भी बहुत जरूरी है. हिंदी शिक्षा किसी का भेदभाव नहीं करेगी. हिन्दी शिक्षा को किसी के विचारों और और स्वतंत्रता का हनन नहीं करेगी और कट्टरवादिता से बचेगी.

नार्वे में हिन्दी की शिक्षा का प्रचार अनेक नगरों में
नार्वे में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओँ की शिक्षा का प्रचार अनेक नगरों में हो रहा है. नार्वे में हिन्दी-स्कूल में अविभावकों द्वारा दी जा रहे शिक्षा के माडेल को स्वीडेन, डेनमार्क और फिनलैंड में भी प्रचारित किया जाना चाहिए जिसमें भारतीय राष्ट्रीय त्योहारों, राजनैतिक सिस्टम, पर्वों, धर्मिक और सामाजिक नाटकों और यहाँ जिस देश में हिन्दी की शिक्षा दी जा रही है यहाँ के पर्वों, परम्पराओं की भी शिक्षा को सम्मिलित किया जाना बेहद जरूरी है. बच्चों को आत्म निर्भर बनाने और नेतृत्व करने की क्षमता का विकास करने के लिए ओस्लो में दी जा रही हिन्दीस्कूल के तर्ज पर हिंदी की शिक्षा बहुत जरूरी है.

भारतीय राजदूत आर के त्यागी जी का आश्वासन
नार्वे में भारतीय राजदूत आर के त्यागी जी ने भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम और नार्वे से गत २४ वर्षों से प्रकाशित स्पाइल-दर्पण पत्रिका तथा हिन्दी स्कूल और अन्य संस्थाओं को आश्वासन दिया है कि यदि भारतीय दूतावास के सहयोग की जरोरत हो तो वह पूरा करेंगे और इस कार्य को प्रोत्साहित करेंगे जो स्वागत योग्य कदम है.
सभी को समान हिन्दी शिक्षा
हिन्दी को नार्वे के विभिन्न नगरों में प्रचारित करते हुए इसे विभिन्न उत्तरीय(स्कैंडिनेवियाई देशों: नार्वे, स्वीडेन, फिनलैंड, ग्रीनलैंड और आइसलैंड) में अपने भाई-बहनों, देशवासियों और अन्य राजनैतिक सहयोगी मित्रों के सहयोग से हिन्दी शिक्षा के माध्यम से और बढाया जाएगा.
हमारे बच्चे चाहे वह भारतीय मूल के हों या मूल स्कैंडिनेवियाई हों, लगन, परिश्रम और सहकारिता भाव से सभी को समान और अच्छी शिक्षा दे जायेगी.

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

सपनों का महत्व जानने की कोशिश-1 -शरद आलोक

सपनों का महत्व जानने  की कोशिश -शरद  आलोक
चित्र  में कविता महोत्सव का दृश्य  

परसों स्वप्न देखा की मेरे दो अग्रज लेखक मित्र स्वप्न में दिखे और उनसे बात चीत हुई.
स्वप्न टूटने के बाद उन्हें संजोना या उन्हें उसी तरह याद रख पाना स्मृति शक्ति की सीमा से परे होता है. भले ही कुछ स्वप्न याद रह जाते हैं. ये दोनों लेखक मित्र थे कन्हैया लाल नंदन और राजेंद्र अवस्थी.  कन्हैया लाल नंदन ने एक शांति स्वरूप गंभीर व्यक्तित्व के धनी  कवि और सम्पादक के रूप  में प्रतिष्ठा पा चुके थे जबकि राजेंद्र अवस्थी जी कहीं गंभीर तो कहीं एक चंचल मनचले व्यक्तित्व, कहानीकार और साहित्यिक संपादक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे.  उनके मझिले बेटे शिवशंकर अवस्थी (मुन्नू) आजकल अवस्थी जी के बाद आथर्स गिल्ड आफ इंडिया के महामंत्री हैं.  इन दोनों लेखकों में आपस में मित्रता नहीं थी. क्योंकि एक हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप के साथ था तो एक टाइम्स आफ इंडिया समूह के साथ.
दिल्ली के साहित्यिक परिवेश को लेकर मेरे अन्दर कुछ धारणाएं हैं. दो बार समाचार पत्रों में साक्षात्कार के बाद भी उन धारणाओं को किसी ने सार्वजनिक रूप से जवाब नहीं दिया. दिल्ली में साहित्यिक लेखकों का बटाव और अलगाव केवल विचारधारा को लेकर ही नहीं है. साधारणतया  राजनैतिक विचारधारा से भी नहीं बंधे हैं लेखक और उनके खेमे. अपने तर्क को उचित ठहराने और तार्किकता  से दूर रहने के कारण बहुत से लेखकों ने वर्षों से विदेशों में  रची जा रही साहित्यिक सेवाओं (भारतीय भाषाओँ के लिए जिनमें मुख्यता  हिंदी, पंजाबी, उर्दू, तमिल, मराठी, तेलगू और अन्य  भारतीय भाषाओँ)  का ठीक से जिक्र न ही अपने संस्मरण में किया है न ही अपनी अन्य  रचनाओं में. इसीलिए हमने यह बीड़ा उठाया है कि विदेशों में हिंदी, पंजाबी, उर्दू का प्रचार-प्रसार  करते हुए विदेशों में रचे जा रहे सामयिक उपलब्धियों को ऐतिहासिक, साहित्यिक और राजनैतिक कृतियों में स्वयं भी लिखेंगे और अन्य अपने जैसे सैकड़ों रचनाकारों और अन्य प्रतिभाशाली लोगों के बारे में भी लिखेंगे ताकि, सही तस्वीर उपस्थित दर्ज हो सके.

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' का जन्मदिन मनाया गया लेखक गोष्ठी में (हिंदी में पढ़ने केलिए नीचे पढ़ें.) Flere norske dikt ble presentert på Forfatterkafe på Veitvet


Forfatterkafe markerte Shukla 58. fødselsdag den 10. februar på Veitvet i Oslo

Dikt av flere farfattere ble presentert på Forfatterkafe på Veitvet i går den 10. februar på Bjerke familiesenter, Veitvetsenter i Oslo.
Hovedgjeten var tidligerer BU-leder Torstein Winger som leste dikt av Sgbjørn Østfelder og kastet  lys over bursdagsbarn Suresh Chandra Shuklas kjærlighet for Groruddalen og deres kultur og samfunn. 
Inger Marie Lilleengen leste sine dikt og tekster fra sin bok mens Sirid marie Refsum sang sine sanger med gitar. Anurag Sam Shaw har sunget raga med indisk trekkspill harmonium.
Suresh Chandra Shukla leste dikt av Paal Brekke,  Gunvor Hofmo, Øvind  og egne dikt.
I denne anledning fikk han hilsen fra D K Nanda fra den Indiske ambasaaden,  Akhtar Chaudhry visepresident i stortinget og flere som var ikke tilstede.
Barna sang sanger og leste dikt. 

१० फरवरी को लेखक गोष्ठी में कविताओं के बीच मनाया गया सुरेशचंद्र शुक्ल का जन्म दिन.
बियरके फैमिली  सेंटर ओस्लो में लेखक गोष्ठी में कविता, गीत-संगीत और संस्मरणों और शुभकामनाओं के साथ मनाया गया सुरेशचंद्र शुक्ल का जन्मदिन.