मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

Oslo Parliyament 2015-2019 -Suresh Chandra Shukla

Bystyre i Oslo skal kontituere 22. oktober. २२ अक्टूबर २०१५ को ओस्लो नगर पार्लियामेंट चुनाव के बाद गठन. 
FOTO: NTB Scanpix
चित्र में बायें  से  ब्योर्नेर मोक्स्नेस, राइमोन्द  युहानसेन, लान मारिए निगयुएन बर्ग और मारिआने बोरगेन प्रेस कांफ्रेंस  में  
Bjørnar Moxnes (Rødt), Raymond Johansen (Ap),Lan Marie Nguyen Berg og Marianne Borgen på pressekonferansen. 

Den første vara-ordfører med innvandrerbakgrunn, Khamshajiny Gunaratnam (Ap).

27 वर्षीय खामशाजिनी गुनारत्नम  ओस्लो नगर पार्लियामेंट की डिप्टी मेयर बनीं 








शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015


पुरस्कार लौटने से अच्छा अन्याय के लिए आवाज उठाना 

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक', ओस्लो, नार्वे 

(लेखक नार्वे में गत 35 वर्षों से ओस्लो, नार्वे से प्रकाशित हिन्दी-नार्वेजीय द्वैमासिक पत्रिका स्पाइल-दर्पण के सम्पादक, देशबन्धु के यूरोप सम्पादक और प्रतिष्ठित लेखक हैं.) 
साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने से ज्यादा जरूरी है ये लेखक अन्याय के खिलाफ निरवरत आवाज उठायें।
हमको अपने अकादमी और अन्य पुरस्कार पाये और बिना पुरस्कार वाले लेखकों पर गर्व है.
लेखक का काम है अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना। यह काम घर से शुरू हुआ यह अच्छा है पर पुरस्कार वापसी से नहीं अन्याय के खिलाफ घर वापसी से होना चाहिये। 
"क्या यह पुरस्कारों की घर वापसी है?  यह कटु सत्य है कि आप आदमी के जो अधिकार हैं वे आजादी के बाद से गिरवी पड़े हैं. सरकारें आती हैं और जाती हैं. जनता मूक या चिल्ला चीख कर चुप हो जाती है. फिर वही रोजमर्रा की जिंदगी और भेदभाव के वातावरण में जनता घुटन और संत्रास की जिंदगी में भी अपने विवेक और धैर्य से जय श्रीराम और अल्लाह ओ अख़बार कहकर चुप हो जाती है. 
पहली बात राजनीति और लेखनी अलग नहीं हो सकती और लेखकों को भारत में ही नहीं वरन पड़ोसी देशों में 
हो रहे अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय के खिलाफ भी आवाज उठानी चाहिये।
स्वयं बहुत से लेखक बेइलाज मर जाते हैं, बहुत से लेखक बुजुर्ग हैं और कोई देखभाल करने वाला नहीं है.
मानवाधिकार के लिए यदि भारतीय लेखक एक साथ जुट जाएँ और अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक अगुवाई करें 
तो कितना ही सुखद होगा देश के  युवाओं के लिए, नयी पीढ़ी के लिए.

मैंने स्वयं अकादमी प्राप्त कुछ लेखकों और अन्य प्रतिष्ठित लेखकों के घर में बच्चों को काम करते देखा है क्या यह सही है. बच्चों से काम कराना उनकर बचपन की आजादी और स्कूल जाने के समय का क़त्ल करना है. हालांकि अधिकाँश लेखक मानवाधिकार के लिए बहुत जागरूक हैं.

पुरस्कार लौटने की जगह ये लेखक और अन्य लेखकों के साथ जुड़कर अभी से अन्याय के खिलाफ आवाज उठायें। बहुत से मुद्दे हैं.
मातृभाषा की शिक्षा भारत के हर स्कूल में अनिवार्य हो चाहे प्राइवेट स्कूल हों. कोई रोजगार के हुनर जैसे बढ़ई, काष्ठकला,  सिलाई, बुनाई आदि स्कूलों में अनिवार्य हो ताकि सभी बच्चे स्वावलम्बी बनें और वी आई पी संस्कृति से दूर हों. देश में समानता हो और भेदभाव समाप्त हो.
सभी को विदित है यदि निराला जी के पास कोई लेखकीय आर्थिक सहायता मिलती तो वह अपना और अपनी बेटी का इलाज करा सकते थे. अदम गोंडवी का इलाज पहले शुरू हो जाता तो आज हमारे बीच जीवित होते। ये कुछ मुद्दे हैं.
अनेक मुद्दों पर संघर्ष, बातचीत और सम्मेलन किये जा सकते हैं और यह निरवरत चलना चहिये।
ऐसा नहीं है कि कोई मुद्दे और समस्यायें रातोरात या कुछ महीनों से हैं ये असमानता, आस्मान वितरण, भेदभाव और हिंसा की घटनाओं ने सदा ही हम सभी को प्रभावित-परेशान किया है यह सिलसिला दशकों से चल रहा है पर शायद अब जागरण का समय आ गया है.
काश यह सही हो कि हम लेखक जाग गए हैं और हम मिलकर अन्याय की लड़ाई को आगे बढ़ायेंगे।
चाहे  प्रदर्शन, बातचीत, सम्मेलन अथवा चुनाव के जरिये। निशुल्क कार्यशालाएं, नुक्कड़ नाटकों में ये लेखक भाग लें और समाज-देश के बच्चों और नौजवानों को प्रशिक्षित और शिक्षित करें तो हम उन पर और अधिक गर्व कर सकेंगे।
मैंने लिखा था शायद ये पंक्तियाँ सार्थक हों:
"कुँए खेत सूख  रहे गाँव में
गाँव के स्कूल जुएँ दाँव में।
काटना जो चाहते हो बेड़ियाँ,
खड़े होना अगले चुनाव में.।"
"हाथ पर हाथ रखकर कभी कुछ होना नहीं।
काटना क्यों चाहते हो नई फसल जब तुम्हें बोना नहीं।"  

रविवार, 11 अक्टूबर 2015

जय प्रकाश नारायण ११ अक्टूबर जिनका जन्मदिन है -Suresh Chandra Shukla

जय प्रकाश नारायण ११ अक्टूबर जिनका जन्मदिन है 



लोकनायक जय प्रकाश नारायण जी का जन्म ११ अक्टूबर १९०२ में बिहार के सारन  जिले में हुआ था और मृत्यु ८ अक्टूबर १९७९ में हुई थी.  उन्होंने भारतीय राजनीति में  महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उनकी एक पुस्तक थी 'वाई सोशलिज्म' समाजवाद क्यों?
वह समाजवादी चिंतक थे. इंदिरा जी के शासनकाल में आपातकाल में उनकी महत्वपूण भूमिका थी.
उनसे मेरा मिलना उनके जन्मदिन पर सन  १९७७ में पटना में उनके निवास पर हुआ था.

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

१० अक्टूबर को फ्रितयोफ नानसेन और स्वर्गीय श्री नरेंद्र मोहन का जन्मदिन था- Suresh Chandra Shukla


फ्रितयोफ नानसेन  Fridtjof Nansen (जन्म १० अक्टूबर १८६१ और मृत्यु  १३ मई १९३०) 
१० अक्टूबर को नार्वे के नोबल पुरस्कार विजेता फ्रीडोफ नानसेन और दैनिक जागरण अखबार के पूर्व प्रधान संपादक और पूर्व  राज्य सभा के सदस्य स्वर्गीय श्री नरेंद्र मोहन का जन्मदिन था.

नरेंद्र मोहन 
जन्म १० अक्टूबर १९३४ और मृत्यु २० सितम्बर २००२
नरेंद्र मोहन से मेरी चर्चायें विश्व हिन्दी सम्मेलन मॉरीशस १९९३ और लन्दन में १९९९ में हुई थी. उनसे पत्र व्यवहार भी हुआ था. यदि वह जीवित होते तो ८१ वर्ष के होते। 

ट्यूनीशिया के संवाद चार को शांति का नोबेल पुरस्कार -२०१५ - विजेताओं को बहुत-बहुत बधाई!

शान्ति नोबेल पुरस्कार -२०१५ - विजेताओं को बहुत-बहुत बधाई! ट्यूनीशिया के संवाद चार को शांति का नोबेल 



Gratulerer med Nobels fredspris-2015. Fire organisasjoner fra arbeidslivet og rettsvesenet sammen med islamistiske og sekulære partier ville - og klarte - å videreutvikle "den arabiske våren" demokratisk og fredelig. 
Nesten alle land og Tunisias egen befolkning hyller fredsprisvinnerne - fordi de har vist at ikke-vold, demokratisk mangfold og samarbeid er veien videre.
शान्ति नोबेल पुरस्कार -२०१५ - विजेताओं को बहुत-बहुत बधाई! ट्यूनेशिया की चार संस्थाओं: श्रमिक संगठन, नियोक्ता संगठन (काम देने वाली संस्था), इस्लामिक और सेकुलर संस्था ने मिलकर ऐसा विकास किया कि ये साथ-साथ कार्य करते हुए देश में प्रजातंत्र लाने का सफल प्रयास कर रहे हैं. ट्यूनेशिया के अलावा अधिकतर देश इसकी प्रशंसा कर रहे हैं.

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

ओस्लो के पूर्व एयरपोर्ट एयरपोर्ट फोरनेबू 7-10-1998 के दिन 1998 को आख़िरी बार यहाँ से जहाज उड़ा था.

Siste fly fra Fornebu var den 7. oktober 1998.
Hei. Hvor mange husker Oslos tidligere flyplass Fornebu. 7. oktober (i dag) i 1998 tok siste fly fra Fornebu. बंधुवर नमस्कार। नार्वे में रहने वाले और नार्वे आने वालों को याद है ओस्लो के पूर्व एयरपोर्ट एयरपोर्ट फोरनेबू के बारे में. कितने लोगों को याद है ओस्लो का पुराना एयरपोर्ट फोर्नेबू। आज के दिन 1998 को आख़िरी बार यहाँ से जहाज उड़ा था. 26 जनवरी 1980 को मैं भी पहली बार यहाँ जहाज से आया था. 



चित्र 1998: ओस्लो में मेरी माताजी परिवार के साथ ओस्लो में पूजा कर रही हैं.


शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

दो अक्टूबर को गांधी जयन्ती में प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री जी को (उनके जन्मदिन पर) याद किया गया. 


ओस्लो में गांधी जयंती धूमधाम से संपन्न 
पिछली सदी के महामानव विश्व शान्तिदूत महात्मा गांधी जी का जन्मदिन कल धूमधाम से ओस्लो में मनाया गया.
इस कार्यक्रम में भारतीय दूतावास के सचिव श्री एन पुनप्पन जी ने गांधी जी के जीवन से मार्टिन लूथर किंग, नेलसन मंडेला, लेक वालेसा, दलाई लामा, विशप देशमंद टूटू  और अन्य के रोचक संस्मरणों को सुनाया जिसमें उन्होने गांधी जी के सिद्धांतों अहिंसा, सत्याग्रह और सत्य से सीखने और उन्हें अपना आदर्श मानने की बात की.  
सुरेशचन्द्र शुक्ल ने बताया कि भारतीय -नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम की स्थापना का पहला कार्यक्रम २ अक्टूबर १९८८ को संत हॉवर्ड चर्च, ओस्लो में आयोजित किया गया था जिसमें ओस्लो के तत्कालीन महापौर अलबर्ट नोर्डिंगन, नार्वे की उप विदेशमंत्री, भारत के राजदूत महामहिम रंगराजन, प्रथम सचिव आर वी पण्डित और लेखकों ने हिस्सा लिया था और गांधी जी पर दिखाई गया वृत्तचित्र एक यादगार चित्र था.
सुरेशचन्द्र शुक्ल ने महान गांधीवादियों से मिलने की बात कही जो उनके जीवन के न भूलने वाले क्षणों में हैं. सुरेशचन्द्र शुक्ल बताते हैं कि नेलसन मंडेला से उनकी भेंट ओस्लो के दोमचर्च में सं १९९३ में हुई थी. उसके पहले दलाई लामा से १९८९ में एक साक्षात्कार भी लिया था जो ओस्लो के स्थानीय पात्र ओस्लो ओयस्त Oslo-øst में प्रकाशित हुआ था. लेक वालेसा, राष्ट्रपति ओबामा, मिखाइल गर्वाचोव, कैलाश सत्यार्थी आदि को नोबेल वक्तव्य देते हुए सुना था जो जिनके आदर्श महात्मा गांधी रहे हैं. शुक्ल जी ने गांधी जी के साथ लाल बहादुर शास्त्री जी को एक ईमानदार प्रधानमंत्री बताया जो सादा जीवन उच्च विचार के मानने वाले थे.
लाइफ हेराल्ड ने गांधी जी के जन्मदिन मयाये जाने को एक बहुत जरूरी कार्यक्रम बताया।  तथा भारतीय- नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम के कार्य को एक आवश्यक सेतु का कार्य बताया। 
कार्यक्रम में वक्तव्य, कवितापाठ, संगीत और गीतों के साथ संपन्न हुआ. कार्यक्रम का आयोजन भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम ने किया था. 
नवनिर्वाचित ओस्लो पार्लियामेंट के सदस्य मोशब्बिर बनारस ने कार्यक्रम और सुरेशचन्द्र शुक्ल को विभिन्न संस्कृतियों के मध्य जोड़ने वाला बताया और कार्यक्रम की बधाई दी. 
संगीत 
कार्यक्रम में आशी ने एक कविता गाई तथा डॉ राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल ने बांसुरी बजायी और जावेद भट्टी ने टेबल पर सांगत दी. राजकुमार ने गीत गाय और जावेद ने साथ दिया। 
कविगोष्ठी 
कार्यक्रम में अनेक कवियों ने अपनी कविता सुनाईं जिसमें नूरी न्योसेग, लीव एवेनसेन, राय भट्टी, सिग्रिड मारिये रेफ्सुम, गुरु शर्मा, इंगेर मारिये लिल्लेएंगेन, गुरू शर्मा, एलिन स्वेर्दरूप थीगेसन और सुरेशचन्द्र शुक्ल ने कवितायेँ पढ़ीं।