सोमवार, 5 नवंबर 2018

भारत में (4 नवम्बर 2018) विदेशी निवेशकों ने 2018 में 1 लाख करोड़ से ज्यादा रुपये निकाले आर्थिक संकट की घड़ी में सभी राजनैतिक दलों को चाहिये कि चुनाव में रैलियां न करें ताकि खर्च घटाया जा सके.चुनाव खर्च घटायें, सभी दल मिलकर खोजें हल, सरकार करे पहल. -शरद आलोक 05.11.18-


भारत में  आर्थिक संकट की घड़ी में सभी राजनैतिक दलों  को चाहिये कि चुनाव में रैलियां न करें ताकि खर्च घटाया जा सके.चुनाव खर्च घटायें, सभी दल मिलकर खोजें हल, सरकार करे पहल. -शरद आलोक 05.11.18
विदेशी निवेशकों की बाजार से निकासी दो साल के उच्च स्तर पर, 2018 में 1 लाख करोड़ से ज्यादा निकाले 
 कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, रुपये में गिरावट और चालू खाते के घाटे की वजह से विदेशी पोर्टफोलियो वाले निवेशकों में भी डर का माहौल है। इस वजह से उन्होंने अक्टूबर महीने में पूंजी बाजार से 38,900 करोड़ की निकासी की। यह 2 साल की सबसे बड़ी निकासी है कच्चे तेल की है
·         विदेशी पोर्टफोलियो वाले निवेशकों ने अक्टूबर महीने में पूंजी बाजार से 38,900 करोड़ की निकासी की। यह दो साल की सबसे बड़ी निकासी है।
·         कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, रुपये में गिरावट और चालू खाते का घाटा वजह।
·         2018 में अब तक विदेशी निवेशकों ने प्रतिभूति बाजार (शेयर एवं ऋण) से कुल एक लाख करोड़ रुपये से अधिक निकाले हैं।
नई दिल्ली 
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, रुपये में गिरावट और चालू खाते के घाटे की वजह से विदेशी पोर्टफोलियो वाले निवेशकों में भी डर का माहौल है। इस वजह से उन्होंने अक्टूबर महीने में पूंजी बाजार से 38,900 करोड़ रुपये की निकासी की है। यह दो साल की सबसे बड़ी निकासी है। इसी के साथ 2018 में अब तक विदेशी निवेशकों ने प्रतिभूति बाजार (शेयर एवं ऋण) से कुल एक लाख करोड़ रुपये से अधिक निकाले हैं। इस दौरान, शेयर बाजार से 42,500 करोड़ रुपये और ऋण बाजार से 58,800 करोड़ रुपये की निकासी हुई। 

डिपॉजिटरी के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने अक्टूबर के दौरान 28,921 करोड़ रुपये के शेयर बेचे और ऋण बाजार से 9,979 करोड़ रुपये की निकासी की। इस तरह एफपीआई ने कुल 38,900 करोड़ रुपये (5.2 अरब डॉलर) निकाले हैं। यह नवंबर 2016 के बाद से अब तक की सबसे बड़ी निकासी है। नवंबर 2016 में निवेशकों प्रतिभूति बाजार से 39,396 करोड़ रुपये निकाले। 

विदेशी निवेशक इस साल कुछ महीने (जनवरी, मार्च, जुलाई और अगस्त) को छोड़कर बाकी समय शुद्ध बिकवाल रहे। इन चार महीनों में विदेशी निवेशकों ने कुल 32,000 करोड़ रुपये का निवेश किया। मार्निंगस्टार के वरिष्ठ विश्लेषक प्रबंधक (शोध) हिंमाशु श्रीवास्तव ने कहा, 'फेडरल रिजर्व के ब्याज दर बढ़ाने की आशंका, कच्चे तेल के बढ़ते दाम, रुपये में गिरावट, चालू खाते के घाटे की खराब होती स्थिति, राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को सीमित दायरे में रखने में सरकार की क्षमता आदि कारकों का प्रभाव देश के वृहत-आर्थिक स्थिति पर पड़ने के आसार है। निवेशकों के लिये यह चिंता विषय है।' 

इसे निवेशकों के लिए चिंता का विषय बताते हुए श्रीवास्तव ने कहा, 'देश में होने वाले आगामी चुनाव और अमेरिका तथा चीन के बीच व्यापार मोर्चे पर बढ़ता तनाव भी भारत जैसे उभरते बाजारों के शेयर बाजारों को प्रभावित कर सकता है।' ( नवभारत टाइम्स से साभार)
भारत में (4 नवम्बर 2018)
यदि इस आर्थिक संकट की घड़ी में सभी राजनैतिक दलों  को चाहिये कि चुनाव में रैलियां न करें ताकि खर्च घटाया जा सके.

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

भारतीय दूतावास ओस्लो में पटेल जयन्ती - सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'

 ओस्लो में पटेल जयन्ती

कल भारतीय दूतावास ओस्लो में पटेल जयन्ती पर पटेल-प्रश्नावली प्रतियोगिता में सही उत्तर देने वाले सभी प्रतिभागियों को राजदूत महामहिम कृष्ण कुमार द्वारा पुस्तक कृष्ण गीता भेंट की गयी. राजदूत महामहिम कृष्ण कुमार और श्री ओमवीर उपाध्याय ने अपने विचार रखे और प्रिया ओबेराय ने संचालन किया। कार्यक्रम का आमंत्रण श्री अमर जीत जी ने भेजा था.
 I går ble markert Patels fødselsdag på den indiske ambassaden i Oslo.

बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

इंदिरा गाँधी की पुण्य तिथि वर्सेस बनाम सरदार पटेल जयन्ती छुपा कोई एजेंडा है? -sharad aalok

क्या लौह भारतीय नेताओं प्रियदर्शनी इंदिरा गाँधी की पुण्य तिथि वर्सेस सरदार पटेल जयन्ती के पीछे छुपा कोई एजेंडा है? 
- सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'
 चित्र में लेखक लौह मिहिला प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी जी के साथ ओस्लो, नार्वे में 1983 में 
मुझे लगता है वर्तमान में पूर्व गृह मंत्री सरदार पटेल जी की जयन्ती को बढ़ाचढ़ा कर मनाने का कारण उनकी महानता को दिखाना कम और भारतीय महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी की पुण्यतिथि को दबाना है.
यदि सरदार पटेल जी की प्रतिमा बनानी थी तो भारत में क्यों नहीं बनायी गयी. भारतीय कलाकारों/ मूर्तिकारों को क्यों नहीं सम्मिलित किया गया भारतीय धातु के चयन और बनाने में. एक तरफ भारतीयों को बहुत जगह से दूर रखा जा रहा है, चाहे उनका क्यों न बहुत बड़ा योगदान हो. 
यदि आप इतिहास और पुराने अखबार देखिये तो पता चलेगा कि इंदिरा जी को लोकप्रिय प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने देवी दुर्गा कहकर सम्बोधित किया था. आज सरकारी तौर पर उनकी पुण्य तिथि को नकारा  जा रहा है ऐसा लगता है? 

आज की वर्तमान सरकार इंदिरा जी की पुण्यतिथि पर क्या कर रही है? यह किसी राजनैतिक पार्टी का सवाल नहीं वरन आदर्श, साफ़ सुथरी राजनीनीति का सवाल है.

एक बात और भारत दो महीने के अंदर फ्रीडम आफ प्रेस में 136  स्थान से गिरकर 138 स्थान पर आ गया है.



मंगलवार, 25 सितंबर 2018

विश्व की महत्वपूर्ण हिंदी पत्रिका पत्रिका स्पाइल-दर्पण का मारीशस में लोकार्पण संपन्न -

विश्व हिंदी सम्मेलन में स्पाइल-दर्पण का लोकार्पण 

मारीशस में संपन्न हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में ओस्लो, नार्वे से गत 30 वर्षों से प्रकाशित पत्रिका स्पाइल-दर्पण का लोकार्पण सम्पन्न हुआ. 
पत्रिका के सम्पादक सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' ने लेखकों और पाठकों और लोकार्पण में धन्यवाद और बधाई देने वालों को धन्यवाद देते हुए कहा कि स्पाइल-दर्पण विदेशों में लिखे जा रहे हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिका है जिसमें विदेशों में रह रहे बहुत से साहित्यकारों की प्रथम रचना प्रकाशित की है. जबकि इतिहासकारों और आलोचकों और शोधकर्ताओं की दृष्टि स्पाइल-दर्पण पर कम पड़ी है. 

सांस्कृतिक पत्रिका स्पाइल-दर्पण एक गैर राजनैतिक और गैर धार्मिक पत्रिका है जिस पर लखनऊ विश्वविद्यालय में गरिमा तिवारी नामक छात्रा ने प्रोफ़ेसर योगेंद्र प्रताप सिंह के निर्देशन में शोध संपन्न किया था. 

इस अवसर पर अनेक उपस्थित लोगों ने शुभकामनायें दी और आशा प्रगट की कि विदेशों से छपनी वाले अग्रणी पत्रिकाओं में स्पाइल-दर्पण का स्थान पहले से ही है और भविष्य में अधिक प्रतिष्ठित होगा तथा हमेशा की तरह पत्रिका आने वाले समय में भी विदेशों में लिखे जा रहे हिंदी और नार्वेजीय साहित्य को प्रोत्साहित करती रहेगी।

शुभकामनाएं देने वालों में प्रमुख थे मारीशस भारत में राजदूत जगदीश गोबर्धन, उपसाला विश्व विद्यालय, स्वीडेन के प्रोफ़ेसर वेसलेर, मारीशस के प्रसिद्द साहित्यकार प्रह्लाद राम शरण, विश्व हिंदी सचिवालय (मारीशस) के सचिव विनोद कुमार मिश्र, महात्मा गाँधी संस्थान मोका, मारीशस की अलका धनपत, चीन में प्रोफ़ेसर नवीन लोहानी, फिनलैंड में प्रोफ़ेसर रहे और फ़िनलैंड पृष्ठभूमि पर उपन्यास लिखने वाले गोपीनाथन, डेनमार्क की उपन्यासकार अर्चना पैन्यूली और अन्य।
भारतीय लेखकों जिनकी शुभकामनायें स्पाइल के लोकार्पण में प्राप्त हुई उनमें उस्मानिया विश्व विद्यालय हैदराबाद से डॉ शीला मिश्रा, उज्जैन से प्रोफ़ेसर शैलेन्द्र कुमार शर्मा,  प्रोफ सुशील कुमार शर्मा, सरदार मुजावर, इलाहाबाद से प्रोफ़ेसर योगेंद्र प्रताप सिंह, गुजरात से डॉ कल्पना गवली, ग्वालियर से श्रीधर पराड़कर जी, जबलपुर से त्रिभुवन नाथ शुक्ल, लखनऊ से डॉ रमेशचन्द्र त्रिपाठी, प्रोफ़ेसर श्रुति, प्रोफ राधा और डॉ कृष्णा जी श्रीवास्तव  थे.
इनके अतिरिक्त श्रीनगर से प्रोफ़ेसर जोहरा अफजल, पुणे से डॉ वर्षा डिसूजा, मुंबई विद्यापीठ से प्रोफ़ेसर सरवदे, डॉ प्रदीप कुमार सिंह, दिल्ली से पद्मश्री डॉ श्याम सिंह शशि जी, गिरीश पंकज, आशीष खांडवे, डॉ विद्याविन्दु सिंह, प्रोफ़ेसर योगेंद्र प्रताप सिंह, प्रोफ़ेसर के डी सिंह, डॉ प्रणव शास्त्री, डॉ मनोरमा अवस्थी और अन्य थे. 
पत्रिकाओं की कुछ प्रतियां डॉ जवाहर कर्णावट जी को भी भेंट की गयी जिन्होंने सम्मेलन  में विदेशों में प्रकशित पत्रिकाओं की प्रदर्शनी लगायी थी. 

गुरुवार, 9 अगस्त 2018

दलाई लामा शरणार्थी है, नेहरू जी पर गलतबयानी से बयानी से आएं

आज अखबारों दलाई लामा का एक बयान छपा है . फरमाते हैं कि अगर नेहरू ने जिन्ना को प्रधानमंत्री बनने दिया होता तो देश का बँटवारा नहीं होता. दलाई लामा इस देश में एक शरणार्थी हैं  .जिस देश ने उनको शरण दी है उसके आतंरिक मामलों के बारे में उनको गैर ज़िम्मेदार बयान नहीं देना चाहिए . समझ में नहीं आ रहा है कि उनका जिन्ना प्रेम क्यों जागा है .
मुहम्मद अली जिन्ना को प्रधानमंत्री क्या ,देश उनको कोई भी ज़िम्मेदारी देने को तैयार  नहीं था. जिन्ना के डाइरेक्ट  एक्शन के आवाहन के बाद ही बंगाल और पंजाब में खून खराबा शुरू हुआ  था . इस तरह से जिन्ना के सर पर १९४७ में मारे गए दस लाख लोगों के खून का ज़िम्मा है. दुनिया के हर  समझदार आदमी को मालूम था कि जिन्ना ने अगर डाइरेक्ट एक्शन की  कॉल न दी होती तो इतने बड़े पैमाने पर दंगे न होते.  जवाहरलाल ही नहीं पूरी कांग्रेस और पूरा देश जिन्ना को कोई ज़िम्मेदारी देने को तैयार नहीं  था. जब सरदार पटेल के प्रस्ताव पर जवाहरलाल नेहरू को अंतरिम सरकार का प्रमुख नियुक्त किया गया तो  जिन्ना पगलाय गए . उन्होंने उल जलूल हरकतें करना शुरू कर दिया . डाइरेक्ट  एक्शन  का आवाहन उसी तरह का कृत्य है.  अंतरिम सरकार में उनके ख़ास चेला , लियाक़त अली को  वित्त सदस्य बनाया गया था, आर्थिक मंजूरी के सारे पावर उनके पास थे . उन्होंने अंतरिम सरकार के हर काम में अडंगा लगया . उनको वायसराय का समर्थन था इसलिए यह सारी हरकतें कर रहे थे . पंजाब बाउंड्री   फ़ोर्स के गठन तक में उन्होंने मुसीबतें पेश की. नतीजा यह हुआ  कि शरणार्थियों की सुरक्षा में भारी बाधा आई . जिन्ना हर हाल में मुसीबत  खड़ी करना चाहते थे . इसलिए सरदार पटेल समेत भारत का कोई भी जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने को  तैयार नहीं था. ठीक ही हुआ क्योंकि बंटवारे के बाद जिस देश का  ज़िम्मा  जिन्ना और लियाक़त अली ने संभाला  ,उसका हाल आज दुनिया देख रही है . पकिस्तान एक " फेल्ड स्टेट" है . अगर जिन्ना-लियाक़त की टोली को ज़िम्मा दिया गया होता , तो हमारा भी हाल बहुत  अच्छा न होता. दलाई लामा कहते हैं कि गांधी जी जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाना  चाहते थे. यह  अर्धसत्य है . महात्मा जी ने केवल इतना कहा था कि इस आदमी के खूंखार मंसूबों को रोकने के लिए इसको कुछ काम से लगा देना चाहिए लेकिन  सरदार को वह भी मंज़ूर नहीं था. दलाई लामा से गुजारिश है कि वे  अर्धसत्य का सहारा  लेकर इस देश के महापुरुषों के  सम्मान को नीचा  दिखाने की कोशिश  करने से बाज आयें .
एक बात और ,जवाहरलाल नेहरू ने जीवन में जो थोड़ी  बहुत  गलतियाँ की हैं  ,उनमे दलाई लामा को भारत में  शरण देना शामिल हैं .अगर इन श्रीमान जी को  नेहरू ने शरण न दी होती तो चीन से सामान्य सम्बन्ध बनाने की  जो कोशिश आज की जा रही  है , उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती  क्योंकि जवाहरलाल ने तो १९५४-५५ में हिंदी-चीनी  भाई भाई का कार्यक्रम चला दिया था . चीन हमारा दोस्त था . वह सम्बन्ध  दलाई लामा को शरण देने के कारण ही  बिगड़ा .उसी बिगाड़ के कारण भारत-चीन युद्ध हुआ और हमारी उस वक़्त की कमज़ोर अर्थव्यवस्था  का भारी नुक्सान हुआ. आज भी चीन से हमारे रिश्ते इनके कारण  ही खराब  हैं . चीन ने  पाकिस्तान से हाथ मिला लिया   है  और हमारी सरहदों पर सुरक्षा बलों को ज्यादा चौकस रहना  पड़ता है . इस सब के बाद जब आज यह दलाई लामा जी ,चबा चबा कर ज्ञान बघारते  हैं तो  कष्ट होता है .

-  शेष नारायण सिंह जी के लेख से साभार 

शनिवार, 4 अगस्त 2018

नार्वे में मंडेला और नीरज जी याद किये गये सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' Suresh Chandra Shukla

नार्वे में मंडेला और नीरज जी याद किये गये 
 - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक', ओस्लो, नार्वे से 

ओस्लो, नार्वे में  नेलसन मंडेला की जन्मशती पर  और गोपालदास नीरज जी की मृत्यु पर याद किये गये और श्रद्धांजलि दी गयी. . दायकमान्स्के पुस्तकालय तोइयेन और वाइतवेत सेन्टर में लेखकों ने नीरज और मंडेला को याद किया और उनके संस्मरण साझा किये। 
नेलसन मंडेला विश्व शान्ति दूत थे और 27 वर्षों तक जेल में रहकर दक्षिण अफ्रीका में पृथकवासन (अपार्डहाइड) के खिलाफ संघर्ष करते रहे. वह अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस के नेता थे. उन्हें 1993 में नोबेल पुराकसकार से सम्मानित किया गया था. यदि मंडेला जीवित होते तो 19  जुलाई 2018 को वह सौ वर्ष के होते। 
भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम द्वारा आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' ने दोनों महान आत्माओं पर अपने संस्मरण सुनाये जिनसे वह स्वयं मिल चुके हैं. उन्होंने कहा कि नीरज की गीतों की पुस्तकों को नार्वे के पुस्तकालय में होना चाहिए। 
इंगेर मारिये लिल्लेएंगेन, माया भारती, सत्यरूपा, राज कुमार,  फैसल नवाज चौधरी ने अपने विचार रखे. इस अवसर पर भारत से आये डा पी द्विवेदी जी ने नीरज को सर्वश्रेष्ठ गीतकार बताया और फ़िल्मी गीतों का जिक्र किया।
वह मानवतावादी रचनाकार थे. 
 जाने-माने गीतकार गोपालदास नीरज भले ही आज इस दुनिया को अलविदा कह गए हैं, लेकिन उनकी कविताएं और गीत उन्हें जिंदगीभर अमर रखेंगी।  गोपालदास नीरज ने हिन्दी फिल्मों में कई गाने लिखे, बहुत लोकप्रिय हुए। नीरज के द्वारा लिखे गए गीत आज भी लोगों की जुबान पर मिल जाएंगे।  उनका नयी उमर की नयी फसल का शुरुआती गीत 'कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे' बहुत लोकप्रिय हुआ. फिर तो अनेक गीत लोकप्रिय हुए. उन्होंने मंचों पर हिंदी कविता को बहुत ऊँचाई दी. 'लिखे जो खत तुझे.', 'आज मदहोश हुआ जाए रे', 'ए भाई जरा देखके चलो.', 'दिल आज शायर है.', 'शोखियों में घोला जाए, फूलों का शबाब.'  जैसे तमाम गाने लिखे, जो आज भी लोकप्रिय हैं