सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

काटों के सेज पर मना वसन्त - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' A Spring-poem by Suresh Chandra Shukla from Oslo

काटों के सेज पर मना वसन्त - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' 

जहाँ शराब से मरे सैकड़ों,
शासन तो उत्सव मना रहा.
अस्पतालों में दवा नहीं है,
कुम्भ में अरबों खपा रहा.

अपने अपराधों को माफी,
जेलों में निरपराध किये बंद.
जनता मरती न कोई अंत.
हाँ जोगी-भोगी का वसंत।

शरद आलोक जन्मदिन मना,
ओस्लो में उत्सव मना रहे.
तभी यू पी में कितने परिवार, 
जहरीली शराब का कहर सहें।

सैनिक का सीमा पर वसन्त,
फुटपातों पर ठिठुरा अनन्त,
एशिया -अफ्रीका की (बहु)जनता,
का अभावों में बीता वसन्त।

ओस्लो, 10 फरवरी अपने जन्मदिन पर 

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

सिखा उत्सवो की अर्चना - सुरेशचन्द्र शुक्ल, 'शरद आलोक' Oslo


सिखा
उत्सवो की अर्चना

सुरेशचन्द्र शुक्ल, 'शरद आलोक'

क्यों न दूँ दुआयें मैं, द्वीप का धुंआँ सही.
दूज के तिलक का मैं, स्नेह का कुआँ सही.
रोक सकता कोई नहीं, हवा का रुख कहीं.
महल -झोपड़ी से उठा हुआ धुंवाँ सही.

ठग लिया बहुत मुझे साहूकार से राज्य ने,
विधि लिखा मिट गया, जब भाग्य लिखा आपने
जब नेतृत्व ढोलपोल है, तब बदलता भूगोल है.
आँख जब न मिला सके, तो बात गोलमोल है.

शेर की खाल में, जब दहाड़ता प्रधान है.
जन के मुख कौर छीन, तीसमारखाँ महान है?

डरूं नहीं कहूँगा सच, तुम सागर या पहाड़ हो.
गिर पड़े हैं राज-काज, जनता की दहाड़ से.
इसीलिये कोई राह में, कभी दिखा मशाल में.
प्रात हो या साँझ हो, जीवन में उबाल हो.
न हौंसले थकें कभी, बढे कदम रुके नहीं।
बदलना नियति को है, ये हौंसला चुके नहीं।

आज 10 फरवरी को मेरा जन्मदिन है. -सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'


आओ मिलकर साथ मनायें, आज मेरा जन्मदिन है. -सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'


स्थान:
ओस्लो में आयोजित लेखक गोष्ठी में दिन 15:00 वाइतवेत सेंटर ओस्लो में.

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

अमीरों के बकरे न बनो? जनता के जवाबदेह हो! - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'













 1993 में ओस्लो में बिशप एरोफ्लोट और नेलसन मंडेला के साथ लेखक सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

नेता और बकरे नहीं बनें  ?
सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
नेता बकरे बने हुए,
तमाशा दिखा रहे यहाँ,
विदेश में मूर्ति बना,
स्वांग एकता के भरे।
विपक्ष-पक्ष के निंदकों के,
काटते गले रहे,
प्रेस और संसद में
विपक्ष को गालियाँ दे रहे?

प्रजातंत्र नहीं वहाँ,
जहाँ संवादहीनता रहे,
जहाँ पक्ष-विपक्ष साथ-साथ
विचार विमर्श नहीं करे।
गरीग और गरीब हुए,
सड़क पर अपराध बढ़ रहे
सुप्रीम कोट की गुहार को सरकार,
खुले आम अनसुनी करे।
बिना रायशुमारी के,
नाम शहर के बदल रहे?

देश की प्रतिष्ठा दाँव पर,
प्रधान बिन बुलाये विदेश जा रहे,
न संसद से सलाह से?
न जनता को बता रहे?
कौन साथ विदेश में,
साथ कौन किस भेष में?
क्यों हम और आप से प्रधान जी छिपा रहे?

सत्ता में जब प्रधान नहीं रहेंगे,
कहेंगे; हमें परेशान न करो?
जनता, नहीं सहेगी तानाशाही,
अब बस करो- अब बस करो?

गर जनता की न सुनी,
जनता नहीं बचायेगी।
सौहाद्र बिगाड़ रही ताकतें,
प्रतिबंधित जब हो जायेंगी।
कितने भी गाल फुलाओगे,
कभी न कुछ कर पाओगे।
जनता को जहाँ सताओगे,
फिर शान्ति कहाँ से पाओगे?

स्वदेश के कारीगर मरे
महा-अमीर लूटते रहे
गाँव में स्कूल नहीं,
अस्पताल में दवा नहीं।
हजारों बच्चों के अपहरण हो रहे
सरकार को पता नहीं?

यह गाँधी का देश है,
अपराधी खुलेआम धूमते,
चहुओर असमानता बढ़ रही
कुछ तो तुम जवाब दो।

शपथ लोकतंत्र की खाकर,
यदि पूरा नहीं  कर सको।
संभाल नहीं सकते देश को,
दफा हो, इस्तीफा दो?
जनता पुकारती
जवाब दो -जवाब दो ।

अमीरों के बकरे न बनो?
जनता के जवाबदेह हो!
जिसने तुम्हें चुना यहाँ,
उसके खैरखाह हो।

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

प्रवासी का अंतर्द्वंद्व - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'


प्रवासी का अंतर्द्वंद्व - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

बन्धुवर, मेरे नये संग्रह 'प्रवासी के अन्तर्द्वन्द' का लोकार्पण बड़ौदा और दिल्ली में हुआ.


एक "कविता साझा कर रहा हूँ.

जितने ऊँचे उड़ेे गगन में,
धरती पर विश्राम किया है.
हम तो पंछी हुए प्रवासी,
कभी नहीं आराम किया है.

डालर -पौंड लेकर आते,
प्रेम के दाने जब चुगने आते.
बहेलिये-अपने जाल बिछाते,
प्रवासी पंछी फँसते जाते.

निर्भर नहीं जो किसी कपाट के.
हम पानी पीते घाट -घाट के.
रोज-रोज हम नीड़ बनाते, 
घर के रहे न किसी घाट के,

कभी बवंडर आँधी-पानी,
नीड़ हमारा तोड़ रहे हैं.
जिस घर से निष्काशित हैं ,
अपना नाता जोड़ रहे हैं."

Godt nytt år. नव वर्ष मंगलमय हो.

Welcome to my blog again after some month.
Velkommen til min blog igjen etter mange måneder. lang tid.
नव वर्ष मंगलमय हो. Godt nytt år til alle lesere.



Borte bra hjemme best. Det er flott å komme tilbake hjem. 

सोमवार, 28 जनवरी 2019

रोज-रोज हम नीड़ बनाते - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

रोज-रोज हम नीड़ बनाते



जितने ऊँचे उड़ेे गगन में,
धरती पर विश्राम किया है.
हम तो पंछी हुए प्रवासी,
कभी नहीं आराम किया है.

डालर -पौंड लेकर आते,
प्रेम के दाने जब चुगने आते.
बहेलिये-अपने जाल बिछाते,
प्रवासी पंछी फँसते जाते.

निर्भर नहीं जो किसी कपाट के.
हम पानी पीते घाट -घाट के.
रोज-रोज हम नीड़ बनाते, 
घर के रहे न किसी घाट के,

कभी बवंडर आँधी-पानी,
नीड़ हमारा तोड़ रहे हैं.
जिस घर से निष्काशित हैं ,
अपना नाता जोड़ रहे हैं."