सोमवार, 28 जनवरी 2019

रोज-रोज हम नीड़ बनाते - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

रोज-रोज हम नीड़ बनाते



जितने ऊँचे उड़ेे गगन में,
धरती पर विश्राम किया है.
हम तो पंछी हुए प्रवासी,
कभी नहीं आराम किया है.

डालर -पौंड लेकर आते,
प्रेम के दाने जब चुगने आते.
बहेलिये-अपने जाल बिछाते,
प्रवासी पंछी फँसते जाते.

निर्भर नहीं जो किसी कपाट के.
हम पानी पीते घाट -घाट के.
रोज-रोज हम नीड़ बनाते, 
घर के रहे न किसी घाट के,

कभी बवंडर आँधी-पानी,
नीड़ हमारा तोड़ रहे हैं.
जिस घर से निष्काशित हैं ,
अपना नाता जोड़ रहे हैं."