मंगलवार, 25 मई 2021

25 मई 2021, श्रृंगवेरपुर घाट पर-

 

खोदकर कब्रों को
शवों को हटा रहे हैं.

आक्सीजन की कमी से
जब लोग मर रहे थे.
तब हमारे आका,
मानो तब शतरंज खेल रहे थे.
जब जिन्दा थे ये इंसान
मुर्दे होने से पहले,
सहायता के बदले उन्हें 
आइना दिखा रहे थे।

प्रयागराज नाम बदला,
पर बदल न सका आचरण?
अब खोदकर कब्रों से शवों की,
अब वे निशानी मिटा रहे हैं।

श्रृंगवेरपुर घाट पर जब  60-100
शव रोज दफनाए जा रहे थे।
कोरोना का पीक था
इलाज का तब गाँव में 
नामोंनिशान नहीं था। 
सहायता नहीं मिली थी,
प्रशासन डरा-छिपा हुआ था.
ग्रामवासियों को  जीवन
व्यर्थ सा लगा था।

25 मई 2021 जब इंसानियत मिट गयी थी
प्रयागराज में  शमशान पर गजब हो गया था.
एक दिन पहले तक एक किलोमीटर तक
अपने परिजनों को को दफनाया जहाँ-जहाँ था.
बांस-बल्ली निशानी गाड़कर जो गए थे.
आज (25.05.21) दो बुलडोजर ले प्रशासन ने
नामोंनिशां मिटा दिए थे.
जब परिजनों ने आज आकर देखा
उनके होश उड़ गए थे.

जब रोकना था, तब कहाँ था प्रशासन।
अंतिम संस्कार से वंचित जहाँ मृतक हों.
उस देश के हम वासी, शासन छल रहा है.
अव्यवस्था के कारण, हर तरफ उठा धुँआँ है.

फेसबुक पर हमने
जब गाथा सुनी किसी से
न रो सका तब मैं
हंस ही सका हूँ.
विदेश में रहकर देश की
छवि धूमिल होने से कैसे मैं सँवारूँ.

मरने के बाद भी,
जहाँ शान्ति न मिले शवों को,
वह कभी प्रयागराज का शमशान,
कभी काशी का शमशान-कब्रगाह है.

प्रशासन को खुली छूट
सत्ताधीश से मिलकर
जिन्दा को जेल में और
शवों को हटा रहे हैं
जैसे धरती के ये हैं मालिक
अनजाने में अपनी हस्ती जला रहे हैं.
 
 - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

सोमवार, 24 मई 2021

भारत से: अपनी-अपनी जगह - सुरेशचन्द्र शुक्ल शरद आलोक

अपनी-अपनी जगह 

     सुरेशचन्द्र शुक्ल शरद आलोक speil.nett@gmail.com 

भारत से  निवेदन आंदोलनकारियों को बिना शर्त रिहा किया जाये ताकि संक्रमण न  हो ।  तीनों किसान बिल/कानून संसद तुरंत रद्द  करें।  किसान आन्दोलन  में मरे व्यक्तियों को शहीद का दर्जा दिया जाये?  पिछले सात सालों से चुनावी चन्दे को और खर्च को सार्वजनिक किया जाये।  जनता  में और राजनैतिक पार्टियों में बिना चर्चा कराये कोई बिल  नहीं लाया जाये।  बिल का मसौदा काफी समय पहले संसद को दिया जाए, उस पर बहस हो, संसद में बिना सभी दलों को चर्चा  का अवसर मिले। बाद में प्रस्ताव कलाकार पास कराया जाये।

राजनैतिक पार्टियों को चन्दा की पारदर्शिता कहाँ है? यह देशवासियों के सामने सार्वजनिक किया जाये की चन्दा कहा से आया है?   आवाज उठाने वालों को सजा दी जा रही है क्या यही भारतीय लोकतंत्र  है? संसद में बिल,  प्रस्ताव के  पूर्व जनता में  सार्वजनिक  किया जाना चाहिये. प्रस्ताव पर जनता, पार्टियों के अंदर और संसद में बहस क्यों नहीं कराई जाती?  

जन आन्दोलन में भाग लेने वालों को जो अब बीमार हैं, युवाओं और महिलाओं को जेल में डाल दिया गया है.  यदि उन्हें  संक्रमण हुआ तो वे  दोहरी  सजा  काटेंगे  और संक्रमण से वे मर भी सकते हैं ?

क्या संक्रमण के सवा  के सवा साल में (जनवरी 2020 से 24 मई 2021 तक)  संसद ने संक्रमण को लेकर कितनी बैठकें की हैं. कितनी बहस और चर्चा  हुई है. क्या हर माह सर्वदलीय बैठक और संक्रमण को लेकर कार्य कर रही सरकारी गैर सरकारी के साथ हर हफ्ते बैठक  हुई है. उसे सार्वजानिक  किया गया है?  

मेरा आप सभी पाठकों से देश के नागरिकों से पूछना है कि क्या आप दूसरों के लिए श्रमदान करते हैं? पार्किंग, अपने पार्क, तालाब, नदी, बाजार आदि कैसा हो, इस बारे में रोज आपने श्रमदान के रूप में कितने घंटे खर्च किये हैं? क्या सब कुछ ठीक चल रहा हैं? 

संसद में विपक्ष को बोलने नहीं दिया जाता। सभी कानून और प्रस्ताव जो पास होते हैं उसकी जनता और राजनैतिक पार्टियों में चर्चा नहीं कराई जाती। जो कानून और प्रस्ताव संसद  और राज्य सभा में पास हुए उनको जनता और राजनैतिक पार्टियों को बहुत पहले क्यों नहीं बताया जाता ताकि उसपर सही और पारदर्शिता से चर्चा हो सके. सभी पक्ष को अपनी बात कहने का अवसर मिले और यदि किसी की बात तार्किक देश हिट और उस तबके की है उसे भी सम्मिलित किया जाए जी नहीं हुआ है इसलिए इस लेख की आवश्यकता पड़ी है।

संसद में जनता के आंदोलनों पर कितनी चर्चा हुई. यह चर्चा स्कूलों  और कॉलेजों में कराई गयी.संसद में मैंने चर्चा में कई बार अलोकतांत्रिक तरीके से बहस होते देखा है. एक उदाहरण है जिसे आप देख सकते हैं एक बहुत योग्य युवा सांसद हैं महुआ मोइत्रा, उनके पहले भाषण से लेकर आज तक जितने भाषण हुए हैं उन्हें लोग खड़े होकर विरोध करते हैं. संसद में सञ्चालन बहुत  कमजोर दिखता है. असल में लोकसभा अध्यक्ष उसे चुना जाना चाहिए जिसका बहुत ज्यादा अनुभव हो संसद का. 

सरकार ने संक्रमण के समय संक्रमण सम्बन्धी कितने जनता के लिए फैसले लिए हैं? किसान के तीन क़ानून पर पहले जनता,  किसान,राजनैतिक पार्टियों से न विचार-विमर्श किया गया और न ही संसद में बहस का मौक़ा दिया गया क्यों? क्या कोई साजिश तो  या कोई गुप्त एजेंडा तो नहीं है. पारदर्शिता  का अभाव, संसद में लोकतंत्र के अभाव में भारत की जनता को असहाय छोड़ दिया  है. करोरेटरों  के लिए अनेक निर्णय क्यों लिए गए. संक्रमण की दवा और वैक्सीन को सरकारी कंपनियों को सही समय पर कार्य दिया गया होता और वैक्सीन की रिसर्च और खरीद का एक  इंतजाम किया गया होता तो भारत में दस लाख लोग मरने से बच सकते थे. 

 संक्रमण से मरने वालों का आंकड़ा या दस लाख संख्या विदेश में वैज्ञानिकों और संक्रमण के लिए कार्य कर रहे लोगों की है जो  है.  आप टीवी की रिपोर्ट, जनता द्वारा दिया गया मीडिया और के  डाटा के आधार पर बहुत काम किया जा रहा है. चूँकि भारत में वयवस्था मरने वालों को छिपाने में लगी  है. 

 जिससे भारत का संक्रमण का शोध पिछड़ जाएगा और विदेशी शोध भारत के सम्बन्ध में क्या जा रहा है.

हर चीज की अपनी-अपनी जगह है. जैसे स्कूल और महाविद्यालयों में शिक्षा, बाजार में व्यापार और संसद और विधानसभा और ग्राम पंचायत में समस्याओं के लिए राजनीतिक डिबेट और सभी की भागीदारी।

भारत की सबसेबढ़ा राजनैतिक बहस, विचार-विमर्श का मंच है संसद। क्या आपने इसमें रूचि क्यों नहीं ली है?  जिस विषय पर संसद और विधानसभा में चर्चा होनी है उसकी सूचना और उसपर बहस विचार-विमर्श का अवसर जनता को, जनता के प्रेतनिधि जिनपर बात होनी है उनसे बात की गयी है? वह सहमत नहीं है तो फिर जबरदस्ती संसद में भी बिना बहस और विचार विमर्श के किसी कानून अध्वा प्रस्ताव पास करना चाहे संख्या के हिसाब से सही हो पर लोकतांत्रिक तो नहीं है. इसका जिम्मेदार कौन है.

यह प्रश्न मैंने उपर उठाये हैं, इसका उत्तर क्या होना चाहिए।  भेदभाव की राजनीति, मनमानी और पारदर्शिता को ख़तम करके हम देश का उसकी जनता का नुक्सान नहीं कर रहे हैं? इसे कैसे ठीक किया जाये।

क्या आपको यह उसी तरह दिख रहा है. क्या सभी अपने-अपने स्थान पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं. यदि नहीं तो क्यों? आपको ही इसे तय करना है कि लोग अपने-अपने स्थान पर रहकर कार्य करें और हम उसका सहयोग दें।

हर घर को दो भागों में बाँट दिया गया है पक्ष और विपक्ष।  क्या यह बटवारा सही है और इसका निर्णय कहाँ करना चाहिए और ऐसा क्यों हो रहा है?  क्या बच्चों को राजनीति की शिक्षा और उसका स्तेमाल स्कूल और कॉलेजों में नहीं सीखना चाहिए। 

आप जिस मोहल्ले में रहते हैं, जिस कालोनी या सोसाइटी में रहते हैं वहां रहने वालों की समिति है जिसके आप सभी बराबर के सदस्य हैं. सफाई, बिजली, पानी, सामाजिक और राजनैतिक जागरूक हैं?

राजनीति ऐसा मंच यह विषय है उसके ज्ञान और उसकी प्रेक्टिस की शिक्षा हमको बचपन से सही तरीके से दी जा रही है?  उत्तर है नहीं। स्कूलों में छात्रसंघ के या छात्र संसद के चुनाव होते हैं इसका उत्तर भी है नहीं क्योंकि शाट प्रतिशत स्कूलों में चुनाव नहीं हो रहे हैं.  बालवाड़ी और स्कूलों में माता-पिता और अविभावक का चुनाव उनकी ट्रेनिंग और सूचना और आपसी बैठकों का अभाव क्यों है? स्कूल और महाविद्यालय बिना माता-पिता और अविभावकों के प्रतिनिधियों से तालमेल और विचार-विमर्श करके कार्य कर रहे हैं, इसका उत्तर भी मुझे नहीं में मिला है, जबकि कुछ स्थानों में इसका अपवाद हो सकता है.

स्कूल-कालेज में छात्र-छात्रा, शिक्षक, अविभावक और प्रबंधक चार मुख्य लोग हैं जो स्कूल कालेज के व्यवस्था और शिक्षा से जुड़े हैं. क्या इनमें तालमेल है? आपका ज्यादातर उत्तर होगा नहीं। 

आप स्वस्थ रहें.

सुमित्रा नंदन पन्त - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

सुमित्रा नंदन पन्त

जहाँ नहीं स्वप्नों का है अन्त,
महाकवि सुमित्रा नंदन पन्त।
प्रगतिशील में नहीं स्वीकार,
कोटि नमन हे कवि सुकुमार।।
 
छायावाद के तुम बन आधार,
अध्यात्मवाद से अंतिम द्वन्द्व।
आकाश और झीलों में तैर,
रचे हैं अलंकार और छंद।।
 
- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
   Oslo, 24.05.21

समय पर आये न ऋतुराज? - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

 

समय पर आये न ऋतुराज?
पलाश के फूलों में मकरंद,
आँगन में दाने चुनती चिरई।
द्वार के मुंडेर पर बैठे काक
चिढ़ाती पेड़ पर गिलहरी।
पक्षी चहचहाते करें मजाक।।
समय पर आये न ऋतुराज?
छिप-छिप वृक्ष के पीछे,
बहेलिये सा नयनों का जाल,
बिछाकर अंतस में कितने फूल.
लुटाने को थे बेताब।
बरसती रही गगन से धार.
समय पर आये न ऋतुराज?
भ्रमर न रहने देते शांत बौर
कब बन जाते फूल
पता क्या कोयल को है पता?
पथिक जब रस्ता जाते भूल.
प्रतीक्षा टिटहरी सी है कठिन,
आसमान उठाने को आतुर,
बाट जोहते है पपीहे युगल,
बन रहा रही का परिहास।
अंधियारे में जुगनू की आस.
समय पर आये न ऋतुराज?
 
- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
 
Oslo, 21.05.2021

बुधवार, 19 मई 2021

गंगा माँ ने बुलाया है -

 

गंगा माँ ने बुलाया है

“गंगा माँ जहाँ मुंडन होते हैं
मरने पर अंतिम संस्कार।
ज़िन्दा गंगा माँ अपने हज़ारों मृत बच्चों को 
बेमन प्रश्रय दे रही है।

काश गंगा माँ अस्पताल बना सकती 
तो उसकी संताने ना मरतीं
और माँ असमय मरी संतानों का मुख 
वर्षों देख सकती थी।
किसी को मोक्ष देती है 
तो किसी को कफ़न एकत्र करने 
के लिए बुलाती है।

माँ सब जानती है इसलिए 
जल की तरह एक सा नहीं रहती 
और बदलती रहती है रूप को।

माचिस बन्दर को 
राज्य धृतराष्ट्र को नहीं देना था।

पुलिस वाले कब तक मंत्रियों की रक्षा करते
शमशान पर लाशों के प्रवेश पर रोक 
लगाते हुए कोविड से संक्रमित होते रहेंगे?

जब जनता नहीं होगी तो 
मेरी कविता पढ़ने 
क्या भूत प्रेत आयेंगे?”
  
 -  सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’
              18.05.21

राजा और रंक - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

 राजा और रंक 

- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

 

 


 

शुक्रवार, 7 मई 2021

शेषनारायण सिंह का जाना मेरी निजी क्षति - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

 


 
शेषनारायण सिंह का जाना मेरी निजी क्षति 
- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
श्री राजीव रंजन श्रीवास्तव जी को फोन करने पर पता चला कि प्रसिद्ध पत्रकार शेषनारायण सिंह की कोरोना ने जान ले ली।
मेरे पत्रकारिता में दिल्ली में सहयोगी, मित्र शेष नारायण सिंह जी कोरोना से संक्रमित हुए और  हम सभी को छोड़कर चले गये।  वह कोलकाता गये थे , मेरी उनसे बातचीत तब हुई थी जब वह अभी कोलकाता में चुनाव की रिपोर्टिंग कर रहे थे। मेरी लगभग 15 मिनट बात हुई थी।

मेरा परिचय श्री शेषनारायण जी से  सन 2004 में हुआ था।  वह दो बार नार्वे आ चुके हैं।  वह TV में एक्सपर्ट के रूप में अक्सर आते थे। वह टीवी db देशबंधु, IBN, News 24, NDTV में ऐंकर और राजनैतिक एक्सपर्ट के रूप में आते थे। 
वह राष्ट्रीय समाचार पत्र  देशबंधु के राजनैतिक संपादक थे। सहित वह उर्दू और  अंग्रेजी में भी लेख लिखते थे।
उन्होंने मेरा परिचय पत्रकार अमलेन्दु  उपाध्याय सहित प्रेसक्लब के पदाधिकारियों सहित कई टीवी एंकरों,  से कराया था। 
उनके साथ मैं बीजेपी मुख्यालय, नयी दिल्ली अनेक बार गया हूँ। हर भारत यात्रा में कम से कम दो-तीन बार मिलना होता था। जिसमें प्रेस क्लब में यादगार बैठकें शामिल हैं। 
भारतीय साहित्यिक पत्रिका के संपादकों से पुनः बात ही नहीं कराई बल्कि मेरे साहित्य की तरफ उनका आकर्षण भी बढ़ाया।  इसी के तहत राजीव कटारा जी ने मुझसे कहानी और कवितायें प्रकाशनार्थ मांगी थी।  

जब राष्ट्रपति प्रणब मुकर्जी आये थे तो मेरे पास और भारतीय दूतावास के पास मुझे  राष्ट्रपति जी से मिलाने के लिए राष्ट्रपति भवन से पत्र आया था. और मेरी राष्ट्रपति जी से तीन-चार मिनट बात हुई थी. 

साहित्यकार के रूप में  जो मेरी प्रतिष्ठा भारत में राजेंद्र अवस्थी जी के साथ शुरू हुई थी वह अब शेषनारायण जी के साथ रहकर फल फूल रही थी. उनके साथ भी का असर था कि मेरे ऊपर किसी दल या गुट का ठप्पा नहीं है. 

उन्होंने मेरे ऊपर दो लेख लिखे थे वह मुझपर पुस्तक लिख रहे थे।
उन्होंने मेरा परिचय देशबंधु अखबार से कराया बाद में संपादक श्री राजीव रंजन श्रीवास्तव जी ने मुझे यूरोपीय संपादक बनाया।
एक बड़े पत्रकार और बहुत अच्छे इंसान और अपने निजी मित्र को खोकर बहुत दुःखी हूं। 
अब न आदरणीय ललित सुरजन जी हैं और न ही शेषनारायण जी.
अब केवल उनकी अमिट  स्मृतियाँ शेष हैं.  
 विनम्र श्रद्धांजलि.  ईश्वर आपकी आत्मा को शांति प्रदान करे.

गुरुवार, 6 मई 2021

मेरी प्रवासी डायरी 6 मई (1 )- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

मेरी प्रवासी डायरी 6 मई  (1 )- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

आज ओस्लो में मौसम अच्छा था. आज सूरज निकला हुआ था. आज ओस्लो में तापमान निम्नतम 1 और अधिकतम 10 डिग्री सेंटीग्रेट था. आये दिन अपने प्रिय लेखकों और परिजनों की मृत्यु की खबर मन दहला रही है. जब भी कोई घंटी बजती है तब अजीब हालत होती है कि कहीं कोई बुरी खबर तो नहीं है.
मेरी दिनचर्या में पत्रकारिता और साहित्य लेखन से जुडी है.
कल कामराज संधू, कोलकाता के डॉ अमरनाथ, दिल्ली से नासिरा शर्मा आदि से कुशल क्षेम पूछा। सभी कुशल पूर्वक थे. मुझे तो वैक्सीन की दोनों खुराक के रूप में टीका लग चुका है पर अभी भी बहुत से लोग टीका की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
सामयिक लेख पढ़ा. आम आदमी महँ है कविता लिखी और उसे यू ट्यूब पर पोस्ट किया।
धन, वैक्सीन, आक्सीजन, अस्पतालों में बिस्तर की कमी बहुत बड़ी समस्या है इसको भूलकर लोग प्रदर्शन और अपनी पार्टी के प्रचार में अभी लगे हुए हैं  क्या यह होना चाहिए? भारतीय समाचार पत्र इस समाचार से भरे हैं.
कोविड महामारी का संकट पूरी विश्व में बहुत बड़ा और तेजी से फ़ैल रहा है. बंगाल में भी चुनाव, प्रदर्शन और रैलियों से महामारी बढ़ी है और कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है. 
अभी बंगाल में चुनाव हुए 24 घंटे भी नहीं हुए प्रदर्शन, पार्टी अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री बिना कोरोना टेस्ट की निगेटिव रिपोर्ट लिए बंगाल पहुंचे।  इससे बंगाल में महामारी बढ़ेगी।  विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की घटना पूरे देश में नकारात्मक प्रभाव डालेगी।
डायरी, ओस्लो, 06.05.21

सोमवार, 3 मई 2021

हर देश में दाऊ जी गुप्त के चाहने वाले हैं - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

दाऊ जी गुप्त के चाहने वाले हैं

हर देश में हिंदी सेवी और लखनऊ के मोहल्ले में लोग
 सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

आज तीन मई को शाम पौने चार बजे मैंने लखनऊ में फोन पर डॉ सूर्य प्रसाद दीक्षित जी से बातचीत करके पुराने दिन याद किये। उन्होंने बताया कि अब वह स्वस्थ हैं, कोरोना शरीर को तोड़ देता है। 
आदरणीय दीक्षित जी ने बताया कि दाऊजी गुप्त जी अक्सर लखनऊ विश्वविद्यालय आया करते थे।
लखनऊ के हर मोहल्ले में चाहने वाले हैं
अभी जब मुझे कल साहित्यकार, समाजसेवी और राजनीतिज्ञ डॉ. दाऊ जी गुप्त के निधन का समाचार मिला तो विश्वास नहीं हुआ, पर विश्वास करना पड़ा. हम अपनी स्मृतियों से उन्हें आजीवन नहीं भुला सकते।  श्रद्धेय डॉ. दाऊ जी गुप्त को स्मरण करते ही उनका हँसता चेहरा सामने आ जाता।
मेरे मन मस्तिष्क में अनेक मधुर स्मृतियाँ आत्मीय दाऊ जी गुप्त से जुड़ी  हैं। 
यह भी बताता चलूँ कि लखनऊ में कोई ऐसी नहीं गुजरती जहाँ लोग उन्हें नहीं जानते थे। वे ऐसे कम लोगों में थे जिन्हें लखनऊ वासी चाहे वह उर्दू वाला है, अवधी भाषी है या हिन्दी सभी से उसकी जबान में बात करते। आप अनेक भाषाओं के जानकार थे।
लखनऊ में जहाँ मैं उनके निवास पर अनेक बार मिला वह नाका हिंडोला लखनऊ इसके पास ही थोड़ी दूर पर मेरे अध्यापक/  प्रधानाचार्य डॉ. दुर्गाशंकर मिश्र बिरहाना में रहते थे।  मेरा घर 8 -मोतीझील  ऐशबाग रोड, लखनऊ से मोटरगाड़ी  से मुश्किल से पांच-सात मिनट की दूरी पर है। वह अपने निवास पर चेतना साहित्य परिषद् की तरफ से साहित्यिक गोष्ठी कराते थे जो दशकों आयोजित होती रहीं।

आज तीन मई को शाम पौने चार बजे मैंने लखनऊ में फोन पर डॉ सूर्य प्रसाद दीक्षित जी से बातचीत करके पुराने दिन याद किये। उन्होंने बताया कि अब वह स्वस्थ हैं, कोरोना शरीर को तोड़ देता है। 
आदरणीय दीक्षित जी ने बताया कि दाऊजी गुप्त जी अक्सर लखनऊ विश्वविद्यालय आया करते थे।

'दीप जो बुझते नहीं' का विमोचन लखनऊ विश्वविद्यालय में
सन 1988 की बात है, मेरे चौथे काव्य संग्रह 'दीप जो बुझते नहीं' का हिन्दी विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय में विमोचन था।  श्रद्धेय डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित जी विभागाध्यक्ष थे जिनके शिष्य भारत में अनेक संस्थानों में प्रतिष्ठित पदों को गौर्वान्वित कर रहे हैं.  तब डॉ. दाऊ जी गुप्त जी को भी आमंत्रित किया था।  उन्हें पुस्तक की एक प्रति एक दिन पहले भिजवा दी थी।

'संभावनाओं की तलाश' का विमोचन लखनऊ विश्वविद्यालय में
उसके बाद सं 1994 को मेरे पांचवे काव्यसंग्रह 'संभावनाओं की तलाश' का विमोचन  हिंदी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय में किया गया था। यह कार्यक्रम बहुत महत्वपूर्ण था. इसमें मेरे गोपीनाथ लक्ष्मण दास रस्तोगी इंटर कालेज में प्रधानाचार्य (हाईस्कूल के गुरु) डॉ  दुर्गाशंकर मिश्र, डी ए वी कालेज में मेरे गुरु श्री उमादत्त त्रिवेदी जी  (ससुराल पक्ष से रिश्ते में त्रिवेदी जी का मौसा हूँ।  श्री उमादत्त त्रिवेदी जी जो यहियागंज में रहते थे।
उनकी पत्नी श्रीमती प्रियंवदा त्रिवेदी हनुमान प्रसाद रस्तोगी इंटर कालेज की प्रधानाचार्य रही हैं त्रिवेदी जी के पुत्र सुधांशु त्रिवेदी जी भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता हैं.)  बी एस एन वी डिग्री कालेज में बी ए में मेरे हिन्दी के प्राध्यापक डॉ. ओमप्रकाश त्रिवेदी जी, हिंदी के मूर्धन्य विद्वान डॉ. कुँवर चंद्रप्रकाश सिंह, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के अध्यक्ष प्रसिद्ध कवि लक्ष्मीकांत वर्मा, डॉ. आभा अवस्थी और अन्य थे।

आपको पता है कि यदि आपको पुस्तक का विमोचन करना है तो इंतजाम खुद ही करना पड़ता है। मेरे पास इस कार्यक्रम में श्री लक्ष्मीकान्त वर्मा जी और डॉ. कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह को लाने के लिए कोई यातायात की व्यवस्था नहीं थी। उस समय बड़े टेम्पो चलते थे अतः अलग-अलग दो टेम्पो खाली कराकर उन्हें लाया था। एक अलग तरह का अनुभव था।

इस कार्यक्रम के कुछ  दिन पहले लखनऊ में मेरे पहले कहानी संग्रह 'तारुफी ख़त' जो उर्दू में था का विमोचन चोर वाली गली, लालबाग में एक शायरा के घर पर हुआ था जिसमें विलायत जाफरी जी भी उपस्थित थे। 
दाऊ जी गुप्त को  मेरी पुस्तकों के शीर्षक और दो तीन कवितायें याद थीं। वह जब कार्यक्रम में आते थे तो तैयारी करके आते थे।  जो यादों की डोर पकड़ में आयेगी यानि स्मृतियों में आयेगी उसे उलझे ऊन के गोले सा खोलता चला जाऊँगा और आपके सामने रखूँगा। 

1993 में  चौथा विश्व हिन्दी सम्मेलन
सबसे पहले आपको 1993 में मारीशस ले चलूँगा जब विश्व हिन्दी सम्मेलन में दाऊ जी गुप्त जी भी आये थे।  मेरे परिचित सांसद शंकर दयाल सिंह, विजयेन्द्र स्नातक जी और दाऊ जी गुप्त एक प्रदर्शनी में गये जहाँ हिंदी के लेखकों में कुछ सोर्स लगाकर अपना चित्र लगवाने में सफल हो गए थे वहां प्रेमचंद को कौन पूछता है।  जब विजयेंद्र जी से बात की उन्होंने देखा और कहाँ यह व्यवस्था का काम है फिर उनसे परिचय हुआ. मारीशस में जब मैं कई बार अनेक बिखरे हुए लेखकों के झुण्ड में जाता तो दाऊ जी गुप्त जी भी कभी लखनऊ से आये लगभग 35 लोगों  के बीच तो कभी जागरण के नरेंद्र मोहन और अन्य के साथ तो कभी यूरोपीय हिन्दी के विद्वानों के साथ बातचीत करते मिल जाते थे।
मैं ओस्लो नार्वे से मारीशस इस सम्मेलन  में भाग लेने  एक सप्ताह पहले आ गया था।
एक यादगार यात्रा में हम और दाउ जी गुप्त साथ थे यह अवसर था 1993 में  चौथा विश्व हिन्दी सम्मेलन जो मारीशस में सम्पन्न हुआ था वह यादगार सम्मेलन था।  वहाँ लखनऊ से डॉ. सूर्यप्रसाद दीक्षित, दाऊ जी गुप्त, डॉ. रमा सिंह, डॉ. सरोजिनी अग्रवाल, डॉ. शीला मिश्र, डॉ. विद्याविन्दु सिंह सहित लगभग पैंतीस से अधिक लेखक थे।  डॉ. विद्या निवास मिश्र, डॉ. कामता कमलेश, डॉ. भक्तराम शर्मा, प्रकाशक विजय बेरी जी, धनञ्जय सिंह जी, मेरी फिल्म में काम करने वाली कवियित्री अनीता अनिलाभ और न जाने कितने देश विदेश के लेखकों से मिला जुड़ा आज भी अनेकों से जुड़ा हूँ। ओस्लो नार्वे से मैं मारीशस एक सप्ताह पहले आ गया था।

सम्मेलन में दो कवि सम्मेलन हुए थे एक कवि सम्मेलन विश्व हिन्दी सम्मेलन की पूर्व संध्या पर हुआ था जिसकी  शुरुआत में  मेरी कविताओं से हुई थी  और  जिसका सञ्चालन डॉ. एम के वर्मा कर रहे थे। 
एक दिन पूर्व  इस कवि सम्मेलन में ब्रिटेन के डॉ. एम  के वर्मा जी, दक्षिण अफ्रीका से हरभजन सीताराम और रामनिवास जी और बहुत से लोग थे जिसमें कुछ दिल्ली और मारीशस के लोगों से परिचित हुआ था।

अखबार के प्रथम पृष्ठ पर साक्षात्कार
जिस दिन चौथा विश्व हिन्दी का उद्घाटन दिन था मेरा साक्षात्कार 'दि सन' नामक  फ्रेंच भाषा के अखबार में पहले और अंतिम पृष्ठ में विस्तार से छपा था और एक साक्षात्कार रेडियो में प्रसारित हुआ था. सम्मेलन के विशेषांक में मेरा एक लेख और एक कविता प्रकाशित हुई थी।
यह अखबार प्रधानमंत्री के पक्ष का अखबार था अतः मझे लखनऊ के साहित्यकारों के साथ प्रधानमंत्री जी ने निजी चाय पर बुलाया था जिसका जिक्र डॉ. शीला मिश्रा जी ने भी अपने लेखों में किया है।
मैं 1990 में एक अन्य सम्मेलन में मारीशस आ चुका था अतः जगदीश गोबर्धन जी से मित्रता हो गयी थी जो तब स्वास्थ मंत्री थे पर 1993 में जगदीश गोबर्धन जी कृषि मंत्री थे पर इंतजाम में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। 

जब मारीशस में दाउ जी गुप्त जी मिले मुझसे मिलते ही पूछा कि नार्वे का क्या हाल है. और बातों का सिलसिला शुरू होता तो तो साहित्य और हिन्दी से जुड़े हुए एक-एक क्रम जुड़ने लगते। धीरे-धीरे हम लोगों की बाते सूत/डोरी की तरह बुनते-बुनते एक यादों की चादर तैयार हो जाती।  दाउ  जी गुप्त नार्वे आ चुके थे तब मैं उनसे परिचित नहीं था.
वह नव वर्ष में सुन्दर छापे हुए कार्ड और टाइप राइटर से लिखे पत्र भेजते थे।

यह भी बताता चलूँ कि लखनऊ में कोई ऐसी नहीं गुजरती जहाँ लोग उन्हें नहीं जानते थे. वे ऐसे कम लोगों में थे जिन्हें लखनऊ वासी चाहे वह उर्दू वाला है, अवधी भाषी है या हिन्दी सभी से उसकी जबान में बात करते। आप अनेक भाषाओं के जानकार थे।


ब्रिटेन में साथ
पद्मभूषण डॉ. लक्ष्मी मल सिंघवी जी सन 1991 से 1997 तक ब्रिटेन में भारत के है कमिश्नर थे. वह अपने कार्यकाल में कवि सम्मेलन, हिन्दी सम्मेलन और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम कराते थे. चूँकि मैं नार्वे से हिन्दी की पत्रिका प्रकाशित करता था अतः नर्वे में भारतीय दूतावास के जरिये मेरे पास आमंत्रण आया था.
तीन बार दाऊ जी गुप्त के साथ ब्रिटेन में अनेक कार्यक्रमों में साथ-साथ भाग लेने का अवसर मिला।
विभिन्न नगरों में  यात्रायें साथ-साथ कीं. उनके पास संस्मरणों का खजाना था. वह बहुत बड़े विद्वान थे.

अमेरिका में साथ
मैं विश्व हिन्दी समिति और अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सिटी के आमंत्रण पर यू एस ए गया था. न्यूयार्क में प्रतिष्ठित भारतीय चिकित्सक और कवि डॉ. विजय कुमार मेहता जी के घर पर मैं और डॉ. श्याम सिंह शशि जी रह रहे थे. एक शाम को डॉ. दाउ जी गुप्त जी आये हम सभी एक कमरे में रहे. वह सभी को आदर देते थे वही आदर हम सभी उन्हें देते हैं. सौरभ पत्रिका के प्रकाशन और सम्पादन में भी डॉ. दाऊ जी गुप्त सहयोग देते थे. अनेक कार्यक्रमों में हम लोगों ने साथ भाग लिया।
दिल्ली और लखनऊ के तो अनगिनत प्रसंग हैं.
उन्हें भुलाना आसान नहीं है.