शनिवार, 4 दिसंबर 2021

नार्वे और स्वीडेन में बेघर - सुरेशचन्द्र शुक्ल

स्वीडेन में बेघर  - सुरेशचन्द्र शुक्ल, ओस्लो 

स्वीडन में 33,000 से अधिक लोगों के बिना आवास के रहने का अनुमान है। यह सामाजिक मामलों के स्वीडिश मंत्रालय के तहत एक एजेंसी, राष्ट्रीय स्वास्थ्य और कल्याण बोर्ड के आंकड़े दिखाता है।

देश के नगर मिशनों का मानना ​​है कि यह संख्या उससे कहीं अधिक है।

नार्वे में बेघर

2020 में  नार्वे  में बेघरों की संख्या 3,325 थी।


नार्वे और स्वीडेन में बेघर 

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

Magdalena Andersson स्वीडेन में पहली महिला प्रधानमन्त्री बनी

 

मग्दालेना अन्दर्सन   Magdalena Andersson स्वीडेन में पहली महिला प्रधानमन्त्री बनी 

सुरेशचन्द्र शुक्ल, ओस्लो 

नूशी दादगोस्तर Nooshi Dadgostar  जो वेंंस्त्रे पार्टी  की नेता हैं ने अपना सहयोग और समर्थन देकर  मग्दालेना अन्दर्सन   Magdalena Andersson को प्रधानमन्त्री बनवाया।

इसके पहले केवल सात घंटे के लिए बनी प्रधानमंत्री मग्दालेना अन्दर्सन से समर्थन वापस लेने के बाद हटना पड़ा था.

बहुत-बहुत बधाई। 

इस तरह एक बार फिर स्कैंडिनेवियाई देशों में समाजवादी (सोशल डेमोक्रेट) सरकार बन गयी है. 

मेधा पाटकर को जन्मदिन पर बहुत-बहुत बधाई - Suresh Chandra Shukla

 बंधुवर, 1 दिसम्बर को ऐतिहासिक दिन:

प्रसिद्ध समाज सेवी मेधा पाटकर और

विष्णु सरवदे को जन्मदिन पर

बहुत-बहुत बधाई

मेधा पाटकर नार्वे से महात्मागांधी अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार सहित अनेक सम्मानों से पुरस्कृत हैं मेधा पाटकर को जन्मदिन पर बहुत-बहुत
बधाई
आज ही स्व. सुचेता कृपलानी का भी जन्मदिन है जो भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री रही हैं. आज ही मेरे मित्र विष्णु सरवदे जी का भी जन्मदिन है, उन्हें भी हार्दिक
बधाई

आज ही विजय लक्ष्मी पंडित की पुण्य तिथि है जो संयुक्त राष्ट्र सभा की महिला अध्यक्ष (1953) रहें तथा भारत में पहली महिला मंत्री थीं जो कांग्रेस और जनता पार्टी की सरकार दोनों के साथ रहीं ।

मंगलवार, 30 नवंबर 2021

संसद में बहस बंद है, क्या लोकतंत्र पर खतरा है?

 

संसद में बहस बंद है, क्या लोकतंत्र पर खतरा है?

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' 

संसद में बहस बंद है,
क्या लोकतंत्र पर खतरा है.
फिलीपीन, बर्मा (म्यांमार) और भारत पर 
लोकतंत्र में खतरे के बादल छाये हैं.
कुछ सांसद सत्याग्रह करते 
संसद से बाहर और  जेलों में आये हैं.

शीर्ष पदों पर बैठे नेता 
किसा अभिमान में डूबे हैं?
अपनी आंदोलनकारी जनता को 
दुश्मन जो बड़ा समझते हैं.
सत्ता के नशे में  एरोगेन्ट ये  मतवाले,
सत्ता से हटाए जायेंगे?
जब उनको न्यायालय सजा देंगे,
तब यही आंदोलनकारी उन्हें बचायेंगे?

देश में गिरफ्तारी के डर से 
जब  वे फिर भागे-भागे घूमेंगे?
जिन विदेशियों को  गरियाते हैं,
उन  देशों की शरण में जायेंगे?

जिस पैगासेस और इजराइल 
के बल पर  इठलाते हो?
अपने देशवासियों की जासूसी कराकर, 
लगता क्षद्म राष्ट्रवादी हो?

अपने देश में न घुसने देंगे,
जब शरण लेने वहां पर जाओगे;
उसने भारत के  प्रधानमंत्री के पीछे,
युद्ध का जहाज लगाया था। 

शीर्ष पदों पर बैठे  बैठे 
म्यामार, भारत हो, अफगानिस्तान 
टर्की, इथोपिया, सूडान या हो  नाइजीरियायी 
अपने देश के शहीद आंदोलनकारी की 
संख्या याद नहीं।
यह है याद कहाँ-कहाँ से लेकर  पैसा 
किस बैंक में जमा  कराया है.

फुस्स पड़ाकों  से दगने वाले,
इतिहास याद न करता है?
जिन्दा कौम के नागरिक 
अन्याय भूल न पाता हैं.
जहाँ-जहाँ पर बुझी चिंगारी,
वहां अग्नि पक्षी काम आयेंगे?
एरोगेन्ट और घमंडों के सर क्या,
सत्ता से, समय से पहले हट जायेंगे।

जिन्हें जेल में डाला, किया प्रताड़ित,
जब उनकी अगली पीढ़ी 
सत्ता में जब आयेगी।
क्या वह अपने पुरखों किसान-मजदूरों के 
क्या जख्म भूल पायेगी?

आज हिन्दू-मुस्लिम करने वाले को 
केवल महात्मा गाँधी बचाने आयेंगे।
यदि आज तुरन्त पश्चाताप  करेंगे?
संसद में बहस कराकर,
सरकार से  स्तीफा दे जाएंगे।
यही किसान-मजदूर दुबारा उनको चुनकर लायेंगे।
कार्पोरेटर क्या अपने पिता के हुए हैं?
जो तुम्हारी जान बचायेंगे?

क्या सत्ता जाने वाली है,
लोकतंत्र की बहाली होने वाली है?
एक साल से 
किसान आंदोलन कर रहे 
केन्द्रीय मंत्री नहीं सुन पा रहे,
शक्तिमान जहाँ पर बहरा है.
  
संसद को किसकी हाय लगी,
क्या एजेंटों की सरकार बनी?
किसानों को श्रद्धांजलि दे न सके,
जनता कहती वह मक्कार बनी।

तीन कृषि काले कानूनों को 
वापस लेने पर मजबूर।
हाँ यही लोकतंत्र का पहरी है 
भारत का किसान  और मजदूर।

सरकार आँख में पट्टी बांधे, 
किसके हाथ का खिलौना है?
गुमराह हुए और संसद को गुमराह कर रहे 
प्रधानमंत्री कितना बौना है?

जिन सांसद महिलाओं से,
मार्शल ने दुर्व्यवहार किया।
उन्हीं 12  सांसदों को संसद से 
निलंबित कर अपमान किया।।

देखो गांधी के देश की सत्ता,
जिन गैरज़िम्मेदारों के हाथों में?
देशवासियों की करा रहे  जासूसी,
खतरनाक पैगसस  के  हाथो में. 

कृषि कानून वापस हुए हैं 
पर सोच बदल नहीं पायी है ।
किसान आंदोलनकारी और 
किसान-संघर्ष को बहुत बधाई है.

जागो सांसदों!  संसद में आकर,
अपनी शक्ति दिखाओ तो।
किसान आंदोलन में शहीद किसानों को 
उन्हें सम्मान तो दिलाओ। 

जिसे चुना है उसे बदल दो,
यदि वह लोकतंत्र नहीं बचाता है.
देश के लिए शपथ लेकर वह,
खुद खाता किसे खिलाता है?

अपदस्त करो यदि सरकार भ्रष्ट  हो,
अब लोकतंत्र को वापस लाना है.
हर भारत माँ की संतानों को 
अब अपना देश बचाना है? 

1 दिसंबर, 2021 

सोमवार, 29 नवंबर 2021

सरकार घिर गयी है, न जाने कब गिरेगी? Suresh Chandra Shukla

देश में लोकतंत्र 

क्यों कमजोर हो रहा है?

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'


महामारी बनी हुई हुई है 

लोकतंत्र कमजोर हो रहा है.

सरकार घिर गयी है, 

न जाने कब गिरेगी?


सरकार किसके इशारे पर

देश-धन  लुटा रही है.

किसानों और मजदूरों के हक़ 

छीन रही है.


लोकतंत्र  ख़तम हुआ है,

संवाद कम हुआ है.

किसान आंदोलन ने 

सोते को जगा दिया है.


किसान जब सड़क पर,

श्रमिक भी आ रहे  हैं.

हर गाँव और शहर में,

जन आंदोलन से जुड़ रहे हैं. 


बिना युद्ध के क्यों,

किसान शहीद किये हैं?

विदेशी शक्ति के बस में 

क्या सरकार फंस गयी है?







संसद में यदि चर्चा नहीं, तो लोकतंत्र पर खतरा? -

संसद में यदि  चर्चा नहीं,  

तो लोकतंत्र पर खतरा? 

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' 

संसद में यदि  चर्चा नहीं,  तो लोकतंत्र पर खतरा?  

29 नवम्बर को  भारत में दोनों सदनों (लोकसभा) 

शीतकालीन सत्र की शुरुआत, 

सरकार की मनमानी

तीन घोर काले कृषि कानून की वापसी। 

सरकार इन कानून के पक्ष की प्रशंसा में जुटी।

सरकार की   प्रतिष्ठा गिरी,  देश की प्रतिष्ठा दाँव 

विदेश में भी गिरी?

सरकार ख़ुशी मन रही?


जब काला कृषि कानून वापसी पर 

लगायेंगे राष्ट्रपति;

यदि राष्ट्रपति भी करें मनमानी,

और करें देश के साथ न्याय  

तो क्या राष्ट्रपति उद्योगप्रेमी सरकार को 

कर सकती है बर्खास्त?


सरकार ने संसद में विपक्ष को  नहीं करने दी चर्चा 

भारत देश का लोकतंत्र शर्मसार हो गया.  

सबसे बड़ी  लोकतंत्र संस्था  में 

अभिव्यक्ति की आजादी की हो गयी हत्या।

सत्ताधीश सांसदो ने देश की आस्था को क्यों दिया धक्का।

चर्चा क्यों डरी है सरकार।


किसान को  सड़क पर कुचला गया।

राज्यसभा में  12 सांसदों को निलंबित किया गया,

जिसका इरादा करना है  राज्य सभा में मनमानी।

तानाशाह बन गयी सरकार।

क्या बहादुर किसानों की तरह 

देश का हर वर्ग  आयेगा सड़क पर,

और  समय से पहले करे सकेगी 

अपदस्थ केंद्रीय सरकार। 


सात सौ किसानों का बलिदान।

संसद में सरकार को कर गयी बौना।

अपने ही देश में अपनी सरकार 

लोकतंत्र  के लिए कर रही  है कार्य घिनौना?

29.11.21 






शुक्रवार, 26 नवंबर 2021

26 नवम्बर 2021 किसान आन्दोलन का एक वर्ष


नार्वे की विदेशमन्त्री आनिकेन हुइतफेल्द्त Anniken Huitfeldt के साथ लेखक

संविधान दिवस लोकतन्त्र में आस्था का दिन है आज का दिन,

 (26 नवम्बर 2021 किसान आन्दोलन  का एक वर्ष  लोकतन्त्र में आस्था का दिन है आज का दिन.)

सुरेशचन्द्र शुक्ल

संविधान दिवस पर बहुत-बहुत
बधाई
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, भाई-भाई।
भारत में किसान जन-आंदोलन के एक साल
जिसने दी लोकतन्त्र को मजबूत ढाल।
लोकतन्त्र में हर दिन, हर घंटे उठायें
अपनी आवाज और सवाल।
बिजली, पानी, स्वास्थ, सुरक्षा और शिक्षा का
करो राष्ट्रीयकरण, जनता हो खुशहाल।
किसान सत्याग्रह के एक साल।
सात सौ शहीद किसानों को शत-शत नमन।
लोकतन्त्र के मूल्यों में बढ़ी श्रद्धा
सोये हुए को जगा दिया।

मजदूर की आह - Poem by Suresh Chandra Shukla सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक

 

मजदूर की आह

सुरेशचन्द्र शुक्ल शरद आलोक

जिस मार्ग पर चलाते थे रिक्शा,

वह मार्ग आज क्यों बन्द है।

छीनकर भूमि हमारी

बड़ी चौड़ी सड़कें बनाकर

हमसे ही टोल/ टैक्स ले रहे हैं,

कोविड-19 महामारी के चलते

जब सारे रोज़गार बन्द हो गये हैं।

जब सरकार ने बनाये थे हवाई अड्डे,

हम भी आये थे साथ,

उन हवाई अड्डों को

क्यों अमीरों/ कारपोरेटरों के पास

गिरवी / लीज पर (किराये) पर

दे दिया हैं।

जनता के प्रतिनिधि नेता ने

बिना जनता से पूछे

राष्ट्रीय सम्पत्ति को

हवाई अड्डे को, रक्षा उद्योग को

पहले कर्मचारियों को मालिक बनाकर

सरकार ने समाधान क्यों नहीं खोजा?

हमारा कोआपरेटिव (सहकारिता) बनाकर जनता को

क्यों नहीं सौंप दिया।

हाय हम क्या कर रहे हैं?

किसान मजदूरों को सही मुआवज़ा दे सके

जबरदस्ती धमका, फुसला और बहकाकर

लाभार्थी कहकर अपने किये पर

हम मिट्टी डाल रहे हैं।

क्या आये दिन यदि एयरपोर्ट बनेंगे

कारपोरेटरों को देने के लिए?

चुनाव -चन्दा जनता से छिपाकर,

आज के धृतराष्ट्र सत्यवादी बने

क्या आखेट के पीछे छिपे हैं?

जिस छोटी सी सड़क पर,

गाँव को बिना टैक्स के जोड़ती थी,

गाँव वालों से पूछे बिना,

आज क्यों चौड़ा कर रहे हैं।

जब जमाख़ोरी को मिल रही छूट,

हमारे उगाये टमाटर आदि

हमको ही आज महँगे दामों पर

बेच रहे हैं।

राष्ट्र की सम्पत्ति

बिना जनता के बीच बहस के,

मनमाने ढंग से बिक रही है,

बिना चर्चा के दशकों से बने

हमारे मकानों को

सरकारी बुलडोज़र गिरा रहे हैं?

जनता सब चुपचाप तमाशा

देख रही है।

बेरोजगार युवकों को

अभिभावक क्यों आत्मनिर्भर बनने से

रोक रहे हैं?

अपनी आवाज उठाने से

क्यों युवाओं को रोक रहे हैं।

क्या वे अपने बच्चे को

बिना लाटरी खरीदे उन्हें

निकली लाटरी समझ रहे हैं?

जैसे हर माँ का अपना बेटा/बेटी

किस्मत वाले लगते हैं?

पर क्या एयरकंडीशन में रहने वाले

सड़क और खेत पर मजूरी करते हैं?

क्या हम सड़कों पर संघर्ष करके

लोकतन्त्र को बचा नहीं सकते?

किसानों की तरह युवा और श्रमिक

रोज़गार, भ्रष्टाचार, महंगाई और लोकतन्त्र पर

बात नहीं कर सकते?

प्रदर्शन नहीं कर सकते?

जो सत्ताधारी सत्ताधारी सांसद जनता द्वारा चुने गये,

अपने घरों में चूहों की तरह दुबक कर

बैठ गये हैं?

क्या जनता उन्हें

लोकतन्त्र की चूहेदानी से पकड़कर

संसद से बाहर नहीं कर सकती?


26.11.21