रविवार, 25 अप्रैल 2021

महामारी में असफल: क्या अनफिट प्रधानमंत्री सबसे बड़ा कारण?

महामारी में असफल: अनफिट प्रधानमंत्री हटें या सबको साथ लेकर चलें

- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' 

"लोग मर रहे हैं / हम अपनी आत्ममुग्धता में जुटे हैं /  देश में महामारी का संकट है/  प्रधानमंत्री रैलियां कर रहे हैं / संक्रमण कानूनों की धज्जियां उड़ा रहे थे / अस्पताल चरमरा रहे थे / राम मंदिर का चन्दा एकत्र करा रहे थे / शंराचार्य का काम है भजन-पूजन / उनको नकार रहे हैं/ विरोध करने पर /लोकतंत्र में बुद्धिजीवियों को जेल में दाल रहे हैं/ जनता के पैसों से जहाज और हेलीकाप्टर में मजे उदा रहे हैं/ आक्सीजन बिना जनता मर रही है / अभी भी नेता के चित्रों के साथ क्यों / सरकारी विज्ञापन छाप रहे हैं?  विपक्षी पार्टियों के विरोध की खिल्ली उदा रहे हैं? तत्कालीन प्रदेश सरकार के विरोध के बावजूद / पश्चिम बंगाल में 8 चरणों में अलोकतांत्रिक तरीके से / चुनाव कमीशन से चुनाव करा रहे हैं/ संक्रमण फैलाकर कहाँ का किला गिराया / नेकर नहीं संभल रही क्यों देश संभाल रहे हैं? जनता हिसाब लेगी?/ इतिहास हिसाब लेगा जब तुम्हारे उद्घाटन पत्थर सूने पड़े होंगे और उसपर रोज कौए बीट कर रहे होंगे?

आक्सीजन से अनगिनत लोग मर रहे. लगता है भेदभाव और चीजों और सुविधाओं की कमी से चरमरा और भरभरा गया गया है देश का प्रशासन?

अभी भी अपने प्रचार और आत्ममुग्धता में लिप्त हैं देश के शीर्षस्थ मंत्री और प्रधानमंत्री। 

उदाहरण हैं भारत में आज के समाचार पत्र और रेडियों में आज की बात.

महामारी रोकने विभाग को पूरी जिम्मेदारी मिले और प्रधानमंत्री अलग हों नेतृत्व से वरना देश बर्बादी की तरफ जैसे उनके नेतृत्व में  जा रहा है और भी जाता रहेगा. बर्बादी बढ़ती ही जाएगी। जैसे टूटा नल को ठीक न करने पर पानी बर्बाद हो जाता है? 

आज विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी ने भी कहा है. 

पिछले वर्ष गोरखपुर में 40 बच्चे अस्पताल में मरे थे और तब से आजतक खोखले वायदे पूरे क्यों नहीं किये गए.

सितम्बर 2020 में मध्यप्रदेश में 9 आक्सीजन प्लान्ट पर अंतिम आदेश और निर्माण कार्य शुरू होने की बात की 

उसे क्यों नहीं पूरा किया गया?

आज प्रधानमंत्री पूरे विपक्ष के साथ एक हों. आत्ममुघ्ता से दूर हों. जिसका काम है उसी से कराएं और तुरंत, एक सप्ताह महीने साल, ५ साल और २० साल की प्लानिंग करें पर उनका प्रचार न हो वायदों से दूर हों.

नहीं तो शायद उनके पदच्युत होने पर उनके नाम से बने स्टेडियम के नाम कहीं नए आत्ममुग्ध प्रधानमंत्री अपने नाम न करा लें.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का भी वही हाल है उनके बयां और कार्यशैली लोकतांत्रिक नहीं लगती?

असफल लोगों द्वारा आत्ममुग्ध और आत्मश्लाघा की राजनीति के कारण आज भी  हम पी आर यानि अपने प्रचार में लगे हैं. यही सबसे बड़ा कारण है कि हमारे देश में आक्सीजन और लोकतंत्र की कमी हुई है. जनता के विरोध के बावजूद जबरदस्ती रैलियाँ करना कहाँ की मानवता थी. 

यदि शीर्ष नेता स्तीफा दें तो नए लोग संभालें बागडोर।

 

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

दुःख के बादल छटने वाले हैं - सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’

 

 दुःख के बादल छटने वाले हैं
 
ये दुःख के बादल छटने वाले हैं,
फिर नया सबेरा आने वाला है।
रो- रोकर साँझ अब विदा हो रही,
सुबह भँवरा गुंजन करने वाला है।
 
तुलसी पर दीप जलाकर कमला,
घर आँगन में दाने बिखेर रही है।
जैसे प्रकृति में यौवन वासंती का,
जैसे गौना आने वाला है। 
 
संक्रमण में हमने चिर-परिचित खोये हैं।
अस्पतालों और शमशानों में भरे पड़े हैं।
गौरैया के बच्चों की किलकारी गूँजी है,
दुःख के दिन गये, सुख के दिन आने वाले हैं।
 
देखो दुःख के बादल छटने वाले हैं
फिर नया सबेरा आने वाला है।
 
सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’
20 अप्रैल 2021

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

हे पथिक न निराश हो - A poem by Suresh Chandra Shukla

 

हे  पथिक  न   निराश  हो

हे  पथिक  न   निराश  हो, अँधेरा  छटने  वाला  है.
दीप  कुछ  देर  और जल, तम   न  रहने  वाला  है।
शाख  से  गिरे  पात - पात, नयी कोपलें निकल रहीं,
यह ऋतुओं का खेल है, नया  मौसम  आने  वाला है।

दर्द की कैसी बयार है, विजय समीप,  न  हार मान,
ठहर  गए  दुःख  मेघ क्यों, बरस-बरस न कर गुमान।
बेटी - बेटे  कुछ  और  ठहर,  तूफ़ान  जाने  वाला  है,
हे,  पथिक!  न  निराश हो,  अँधेरा  छटने  वाला  है। 

ओस्लो, 19.04.21

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

कुंभ स्नान और कोरोना - Suresh Chandra Shukla

 

संक्रांति में कुंभ स्नान और कोरोना

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

अफवाह   है, 

कुंभ  में  स्नान  से  कोरोना  भागेगा?

इसीलिए  सरकारी  सहायता  से 

लाखों  श्रद्धालु  को  स्नान  कराया।

हेलीकाप्टर  से  भक्तों  पर  फूल  बरसाकर 

पुण्य  कमाया।

 

अफवाह  है,

कोरोना  पॉजिटिव  को  चाय  पिलाते,

उनके  साथ  खिंचाये  मंत्रियों  के  फोटो 

वायरल  हो  रहे  हैं।

 

कोरोना  पीड़ित  के  साथ  रहकर  भी,

वे  मंत्री  बिना मास्क  चुनावी  रैली  कर

कोरोना  का  प्रसार,  पार्टी  का  प्रचार  कर

चुनाव  आयोग  को  चिढ़ा  रहे  वहाँ ?

मंत्री  शेर हैं  दहाड़  रहे  हैं।

 

क्या  मंत्री  मोटी  खाल  के हो  गये  हैं?

बेचारा  चुनाव  आयोग 

मुँह  में  दाँतों  के  बीच  

जीभ  की  तरह  फंस  गया  है।

इसीलिए  चुनाव आयोग  विपक्षियों  पर  

अपना  गुस्सा  निकाल  रहा  है।

 

ओस्लो  और  बर्लिन  के  प्रवासी

कुंभ  स्नान  को  तरस  रहे  हैं।

इंग्लैंड,  अफ्रीका  के 

नये  कोरोना  वायरस  से  त्रस्त  हैं।

नार्वे  की  प्रधानमंत्री  के 

5  से अधिक  लोगों  के  साथ 

जन्मदिन  मनाये  जाने  के  फोटो  

लीक  होने पर

सार्वजनिक  बार - बार  माफी  मांग  रही  हैं"

 

   - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक', ओस्लो, नार्वे

15.04.21, Oslo

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

आधुनिक युग में - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' Suresh Chandra Shukla

 

आधुनिक युग में:
आधुनिक युग में नहीं छिपता
भ्रष्टाचार और मनुष्य।
कोविड-19 महामारी ने
कोरोना वायरस के जरिये सब सिखा दिया है
,
भ्रष्टाचारी हो सकते हो
पर दुनिया से छिप नहीं सकते हो।

जब तुम इस दुनिया से विदा होंगे?
देश-विदेश में तुम्हारे एकाउन्ट
किसके काम आयेंगे
एक झटके में बंद हो जायेंगे
?
हम ऐसे कानून बनायेंगे।

जेट सिक्योरिटी नहीं बचा सकेगी
कोरोना वायरस से
यदि तुमने सावधानी नहीं बरती
इलाज नहीं किया।

क्या नेता रैलियाँ करके
चुनाव जीतकर गद्दी/कुर्सी पा जायेंगे
?
सोचिये बाद में कितने कोरोना से
कोविड-19 महामारी से मर जायेंगे।
हमारे अंग दूसरों के काम आयेंगे।
तब नेता अपनी पेंशन से जीवन बिताएंगे। 

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक', ओस्लो, नार्वे

माला फेरने से न ईश्वर मिलते हैं न रोटी - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

 

माला फेरने से 
न ईश्वर मिलते हैं न रोटी।
आप किसी से बात करते समय किस बात पर जोर देते हैं। क्या वजन में या भाव में?
जब कोई नजर अंदाज करता है,
अर्थ का अनर्थ निकल जाता है।
जब मंच से या बैठक में 
वह जोर आवाज में कहता है
बड़े आत्मविश्वास से,
कि आप सब सहमत हैं
असहमति का विद्रोह
कब तक मौन बैठेगा
अब तो माला फेरने से
न ईश्वर मिलते हैं न रोटी।
न ही हक़ मिल रहा है
न ही इलाज।

मेरी कविता असहमति से उपजी
जिसे अस्वीकार करने की
कोई गुंजाइश नहीं।
मिनी और लघुकथा
के विवाद में न पड़
आज जब नारे बन रही है कविता चारो तरफ अभाव में
पूर्ति करती दिखती है कविता।
भूख सबको लगती है,
फिर भी किसान उपेक्षित है
आत्महत्या का सिलसिला क्यों जारी है
हताशा और अभाव में क्यों करते हैं
राजनीति में भेदभाव।
अपने पैरों तले खिसकती जमीन,
बेचैन कर देती है और सोचने पर विवश?
डंडे के जोर पर गाय नहीं देती दूध
उसे चारा और सेवा चाहिए।
सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक', ओस्लो, नार्वे 
 

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

चुनाव में नेता ठेंगा दिखा रहे हैं -सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' Suresh Chandra Shukla

 

 चुनाव में नेता क्यों ठेंगा (अंगूठा) दिखा रहे हैं

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

संक्रमण बढ़ रहा है,

खूब रैलियाँ  हो रही हैं.

मंत्री-प्रधानमंत्री सब ठेंगा दिखा रहे हैं.

बिना मास्क पहने 

सभा में भाषण देते,

जाने कहाँ-कहाँ से

प्रचारक बुला रहे हैं.

मुख्यमंत्री खुले आम टीवी पर

अपशब्द कहते फिरते,

महिलाओं और बच्चों को

शिष्टाचार सिखा रहे हैं।

विदेशी राफेल के गीत गाते,

स्वाभिमान भूल गए हैं।

अपने जेट के पराक्रम को

क्यों भुला रहे हैं।

 

दिल्ली में टीका की कमी,

हम निर्यात कर रहे हैं।

एक साल हो गया है,

सरकार गिरा-बना रहे हैं।

संक्रमण हमें है घेरे,

ढपली बजा रहे हैं।

6 साल में कितने

चिकित्सालय खुल गए हैं?

राजनीति में जनता-किसान नदारत,

एक दूसरे पर फब्तियाँ कस रहे हैं।

यह तो बताओ पहले

तुमने क्या काम किये हैं। 

पुराने वायदे अधूरे,

नए वायदे किये हैं।

वायदे तो बस भूलने के लिए होते।

नेता क्यों जनता ठेंगा दिखा रहे हैं?