शनिवार, 23 जनवरी 2016

संस्मरण - Suresh Chandra Shukla

संस्मरण - सुरेशचन्द्र शुक्ल
घर की दीवारों से तस्वीरें हट गयीं - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'


(चित्र में बायें से स्वयं (सुरेशचन्द्र शुक्ल ),  ए स  पी शुक्ल (आई पी एस) और उनके पिता वरष्ठ लेखक, वीरेंद्र मिश्रा और नीरज बाजपेयी 8-मोतीझील ऐशबाग लखनऊ में. चित्र एक दर्जन वर्ष पुराना  है. )
ओस्लो, २३ जनवरी 2016.
लखनऊ में जन्म हुआ, बचपन बीता, सत्य और परिश्रम से जिस शहर ने अपने और औरों के लिए संघर्ष करना सिखाया उस लखनऊ को कोटि-कोटि नमन.
मेरे जिस माता-पिता (श्रीमती किशोरी देवी और श्री ब्रिज मोहन शुक्ल) ने अंगुली पकड़कर चलना सिखाया आज भी उनकी तस्वीर ओस्लो में स्थित अपने पूजा के सिंघासन के पास देखकर बहुत खुशी मिलती है. 
पर इस बार जब मैं अपने बचपन के उस कमरे में 8-मोतीझील ऐशबाग रोड लखनऊ पर गया जहाँ सदा से मेरे मातापिता, बच्चों और भाई की तस्वीर लगी थी वह दीवार से उतर गयी है. यहीं पर प्रदेश और देश के नेता, लेखकगण मुझसे मिलने और कार्यक्रम में भाग लेने आते रहे हैं. यहाँ मेरी पत्रिका 'स्पाइल-दर्पण' का स्थानीय कार्यालय Lucknow भी एक तहखाने के कमरे में स्थित है. 
हमारे चित्र और मेरे माता के चित्र भले ही किसी ने बचपन के लखनऊ के घर से हटा दिए हों या हटवा दिए हों पर इसकी जगह अब हमारे जैसे हिन्दी सेवियों के चित्रों को भारत और नार्वे के उच्च शिक्षण संस्थानों, सामजिक प्रतिष्ठानों  की अपनी दीवारों पर ज़िंदा रहते जो जगह दी जा रही है वह वास्तव में दिल छू लेने वाली बात है.
ओस्लो स्थित मेरे निवास में सिंघासन और भोजन के स्थल पर मेरे आलावा जब मेरे बच्चे जो सभी बालिग़ हैं श्रद्धा से दिये और अगरबत्ती जलाते हैं तो यहाँ दीवार पर टंगा वह अपने बाबा और दादी के चित्र को भी देख लेते हैं. 
हम हों या न हों पर हमारी यादें और बच्चों को सिखायें संस्कार और शिष्टाचार कुछ हद तक उनके साथ रह जायेंगे।
मेरे जीवन पर नामवर शायर मुनव्वर राना की कविता सही उतरती है उसकी पंक्तियाँ कुछ इस तरह से हैं यदि सही न हो तो सुधार लीजियेगा।
"किसी के हिस्से में मकान और किसी को दुकान आयी मेरे हिस्से में माँ आयी." मेरे बड़े बहन-भाइयों  को ज्यादा पता है कि मैं क्या बात कर रहा हूँ. 'बोया पेड़ खजूर का आम कहाँ से होय'. 
आज यही बात पूरे समाज में दोहराई जा रही है. आदमी दूसरों से ईमानदारी की आशा करता है और स्वयं अंदर से बेईमान रहता है. अच्छे समाज के लिए सभी के लिए ईमानदार और सच्चा होना जरूरी है. भेदभाव, बेईमानी आदि हम बचपन से सीखते हैं. खासकर पर्यावरण, कर भुगतान, टिकट लेकर यात्रा करना आदि यह कुछ बातें हैं जो बहुत जरूरी हैं, दूसरों की इज्जत करना। ईमानदारी  से ही आप अच्छे इंसान बनते हैं.

कल और अन्य संस्मरणों  के साथ उपस्थित होंगे।  चाहता हूँ की यह सिलसिला चले. आपसे कुछ-बाते साझा करता चलूँ। धन्यवाद। शुभ रात्रि!


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