शनिवार, 16 अप्रैल 2011

ओस्लो में बैसाखी मनाई गयी-सुरेशचन्द्र शुक्ल

बैसाखी पर ओस्लो में पग दिवस मनाया गया लोगों ने शौख से पगड़ी पहनी स्लो में बैसाखी पर्व धूमधाम से मनाया गया पांच प्यारे के साथ नगर कीर्तन में सम्मिलित आस्थावान लोग ओस्लो में पार्लियामेंट के सामने (कार्ल युहान सड़क पर) लेख और चित्र: सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ओस्लो, नार्वे से' ओस्लो की सड़क पर,/ रंग बिरंगे- केसरिया, / नीले परिधानों मेंबाल युवा वृद्ध, / नारी और पुरुषों का जोश दिला देता है/ अमृतसर की याद।' बोले सोनिहाल.. सत श्री अकाल की/ गूँज भर देती है नव उत्साह। / अपनी संस्कृति के रखवाले कर रहे हैं / मानवता की रक्षा और दे रहे हैं / खालसा पंथ की शिक्षा।/ दिला रहें हैं गुरुनानक का सन्देशऔर/ गुरु गोविन्द सिंह की दीक्षा।/ ओस्लो की सड़क पर / सेन्ट्रल स्टेशन से नेशनल थिएटर तक/ शान्ति और शब्द की शिक्षा।/' ओस्लो, १७ अप्रैल। / आज ओस्लो के सेन्ट्रल स्टेशन से/ बैसाखी के अवसर पर दिन में १२:३० बजे/ विशाल नगर कीर्तन निकलकर / कार्लयुहान सड़क, पार्लियामेंट होता हुआ / यूनिवर्सिटी आउला (नेशनल थिएटर के पास) / में एक विशाल जन सभा में बदल गया। / नगर-कीर्तन के सामने / पुलिस की कार और घोडा चल रहा था। उसके बाद करतब दिखाते युवा सिख कार्यकर्ता और उसके बाद पांच प्यारे / पुरुष और पांच महिलायें/ एक तरह की ध्वजा लिए हुए चल रही थीं। / लोगों में बहुत उत्साह था। / अनेक बैनर सिख धर्म का सन्देश देते हुए / लोगों ने हाथों में पकड़े हुए थे। / यहाँ एक मेले जैसा माहौल था। / एक तरफ कतार में पगड़ी पहनाई जा रही थी। / यह पगड़ी सभी के लिए निशुल्क थीं। / नार्वेजीय युवा लोग बहुत रूचि से पगड़ी पहन रहे थे। / दूसरे पंडाल में भारतीय भोजन / परोसा जा रहा था। / आसमान साफ था। / सूरज चमककर अपनी किरणों से / गर्मजोशी भर रहा था। / विशाल सभा को ओस्लो स्थित / गुरुद्वारा कि प्रधान अमनदीप कौर, / के सबसे बड़े अस्केर, नार्वे में स्थित गुरुद्वारे के मंत्री इंदरजीत सिंह / और भारतीय दूतावास के प्रथम सचिव दिनेश कुमार नंदा तथा नार्वेजीय नेता ऊला एलवेथून ने संबोधित किया और शुभकामनाएं दीं. नंदा जी ने कहा कि जहाँ भी भारतीय जाते हैं वह अपनी पहचान छोड़ देते हैं. वे जहाँ जाते हैं वहाँ के संस्कृति में भी राम जाते हैं और अपनी संस्कृति और भाषा को भी अपनाए रखते हैं. यह मुझे विदेश में अनेक देशों में देखने को मिला. इंदरजीत सिंह ने भी नंदा जी से सहमती जताई और सभी को धन्यवाद दिया. इसा विशाल बैसाखी पर्व में नार्वे में रहने वाले दस हजार भारतीयों में से एक हजार यहाँ उपस्थित थे. नार्वे में दस हजार भारतीय निवास करते हैं जिनमें पांच हजार सिखों की जनसंख्या है.

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

आज बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की जयंती है. बहुब-बहुत बधाई- सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

एक रोचक लेख प्रस्तुत है जो प्रो तुलसी राम जी का लेख है , आशा है कि आपको पसंद आएगा।

अंबेडकर की दलित चेतना

डॉ तुलसीराम (जवाहर लाल विश्व विद्यालय, दिल्ली में प्रोफ़ेसर हैं )

समय बीतने के साथ-साथ बाबासाहेब अंबेडकर के विचारों की प्रासंगिकता बढ़ती ही जा रही है। दलितों तथा गैर दलितों के बीच उनकी तरह-तरह से व्याख्या की जा रही है। अंबेडकर के विचारों के तीन प्रमुख स्रोत थे। पहला उनका अपना अनुभव, दूसरा-महात्मा ज्योतिबा फूले का सामाजिक आंदोलन तथा तीसरा-बुद्धिज्म। इन स्रोतों की जड़ में भारत की अमानवीय जाति व्यवस्था थी। डॉ. अबेडकर को भी छुआछूत तथा जातीय घृणा का शिकार होना पड़ा था, जिससे खिन्न होकर उन्होंने इस खत्म करने का अभियान चलाया। उन्होंने जाति व्यवस्था की ईश्वरीय अवधारणा का तीखा विरोध किया और इसे मानव निर्मित बताया। इस संदर्भ में उनके महात्मा गांधी से वैचारिक मतभेद उभर कर सामने आए। गांधीजी कहते थे कि छुआछूत मानव की देन है इसलिए मानव प्रदत्त छुआछूत से तो लड़ना चाहिए, जबकि ईश्वरीय जाति व्यवस्था के विरुद्ध आवाज नहीं उठानी चाहिए। गांधीजी की इस ईश्वरीय अवधारणा के विरुद्ध अंबेडकर चट्टान की तरह खड़े हो गए। यद्यपि छुआछूत निवारण के अभियान में गांधीजी की भूमिका को अनदेखा नहीं की जा सकती, लेकिन उनकी ईश्वरीय अवधारणा की दलितों ने तीव्र आलोचना की। जाति की ईश्वरीय अवधारणा के चलते डॉ. अंबेडकर ने जाति व्यवस्था को हिंदू धर्म की प्राणवायु बताया और साफ शब्दों में कहा कि ऊंच-नीच के भेदभाव के चलते हिंदू धर्म कभी मिशनरी धर्म नहीं बन पाया, जबकि अन्य धर्म जैसे बौद्ध धर्म अनेक देशों की सीमाएं पार कर गए। जाति व्यवस्था विरोधी, अहिंसक तथा विश्वबुंधत्ववादी होने के कारण डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इन्हीं कारणों से उन्होंने बौद्ध धर्म को दलितों के लिए सबसे उचित धर्म बताया। संक्षेप में डॉ. अंबेडकर का यही सामाजिक चिंतन था। संविधान के माध्यम से उन्होंने भारतीय जनतंत्र को विकासशील बनाया, जिस कारण देश की एकता मजबूत हुई। डॉ. अंबेडकर का राजनीतिक चिंतन भी जाति व्यवस्था से उत्पन्न परिस्थितियों से प्रभावित हुआ था। वह 1920 के दशक से ही दलितों के लिए पृथक मतदान की मांग करने लगे थे। इसके पीछे उनका तर्क था कि ऐसा होने से जाति व्यवस्था के विरोध तथा दलितों के हित में काम करने वाले ही चुनकर विधानसभा तथा लोकसभा में पहुंच सकेंगे अन्यथा दलित स्थापित पार्टियों के दलाल बनकर रह जाएंगे। गांधीजी के प्रबल विरोध और आमरण अनशन के कारण पृथक मतदान की मांग वापस ले ली गई, जिसके बदले मौजूदा आरक्षण व्यवस्था लागू हुई। यह व्यवस्था पूना पैक्ट (1932) के नाम से जानी जाती है। पूना पैक्ट का सबसे अधिक प्रभाव शिक्षा के क्षेत्र में पड़ा। लाखों की संख्या में दलित शिक्षित होकर हर श्रेणी की नौकरियों में शामिल हुए और उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की दिशा बदल दी। लेकिन आरक्षण नीति सही ढंग से लागू न होने के कारण दलित समाज का नुकसान भी हुआ है। डॉ. अंबेडकर की आशंका सही सिद्ध हुई। विधानसभा तथा लोकसभा में चुने हुए प्रतिनिधि दलित मुक्ति के सवाल पर नकारात्मक भूमिका में आ गए। सालों-साल चलती रही इसी भूमिका के कारण काशीराम की बहुजन समाज पार्टी का 1984 में उदय हुआ। काशीराम ने वर्तमान जनतांत्रिक प्रणाली में दलितों की भूमिका को चमचा युग बताया। इसलिए उन्होंने बसपा का जो वैचारिक आधार खड़ा किया वह डॉ. अंबेडकर की आरंभिक राजनीतिक समझ यानी 1920 तथा 30 के दशक के विचारों पर आधारित है। यही कारण है कि उनके क्रियाकलाप में राजनीतिक तीखापान अधिक झलकता है। डॉ. अंबेडकर 1920 तथा 30 के दशक में जाति व्यवस्था के विरुद्ध उग्र रूप धारण किए हुए थे। बाद में उन्होंने सत्ता में भागीदारी के माध्यम से दलित मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने की कोशिश की। काशीराम ने सत्ता में भागीदारी को सत्ता पर कब्जा में बदल दिया। इस उद्देश्य से उन्होंने नारा दिया अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करो। इस नारे के तहत सर्वप्रथम बसपा ने विभिन्न दलित जातियों का सम्मेलन करके उन्हें अपनी तरफ आकर्षित किया। साथ ही उसने पिछड़ी जातियों को अपनी तरफ लाने की कोशिश की जिसका परिणाम था बसपा का 1993 में समाजवादी पार्टी से समझौता। दो साल बाद इस गठबंधन के टूट जाने के बाद बसपा का झुकाव भारतीय जनता पार्टी की तरफ बढ़ा तथा उसके सहयोग से मायावती तीन बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। किंतु 2007 में उत्तर प्रदेश के पिछले आम चुनाव में मायावती के नेतृत्व में बसपा ने दलित-ब्रांाण एकता के नारे के साथ बहुमत हासिल कर लिया। यह बहुमत प्रचंड जातीय धु्रवीकरण के आधार पर मिला था। वैसे भी भारतीय चुनाव प्रणाली में हमेशा जातीय, क्षेत्रीय और सांप्रदायिक धु्रवीकरण आम प्रक्रिया का हिस्सा रहा है। किंतु मंडल कमीशन के लागू होने के बाद जातीय धु्रवीकरण बेहद उग्र रूप में जनता के समक्ष आया है। उत्तर प्रदेश में इस धु्रवीकरण से बसपा को सबसे अधिक फायदा पहुंचा है, जिस कारण वह सत्ताधारी पार्टी बन गई। इस संदर्भ में एक गंभीर सवाल यह उठता है कि जातीय ध्रवीकरण के आधार पर चुनाव जीत कर सत्ताधारी तो बना जा सकता है, किंतु डॉ. अंबेडकर की जाति-उन्मूलन की विचारधारा को मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता। बुद्ध से लेकर अंबेडकर तक ने जाति-विहीन समाज में ही दलित मुक्ति की कल्पना की थी, किंतु आज का भारतीय जनतंत्र पूर्णरूपेण जातीय, क्षेत्रीय एवं सांप्रदायिक जनतंत्र में बदल चुका है। ऐसा जनतंत्र राष्ट्रीय एकता के लिए वास्तविक खतरा है। डॉ. अंबेडकर की उक्ति- जातिविहीन समाज की स्थापना के बिना स्वराज प्राप्ति का कोई महत्व नहीं, आज भी विचारणीय है। (लेखक जेएनयू में प्रोफेसर हैं)

बैसाखी की लाख-लाख बधाई- सुरेशचन्द्र शुक्ल

बैसाखी की लाख-लाख बधाई- सुरेशचन्द्र शुक्ल नार्वे में सभी गुरुद्वारे में बहुत दिनों से बैसाखी की तैयारी चल रही। १६ अप्रैल को ओस्लो में सदा की तरह से विशाल नगर कीर्तन निकलेगा। अनेक वर्षों से धूमधाम से और शान्ति पूर्वक यह त्यौहार मनाया जा रहा है।

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

८ अप्रैल ओस्लो - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

नार्वेजीय लेखक मित्रों के साथ ओस्लो में आज मौसम अच्छा था। दिन में तेज हवाएं चलती रहीं। ग्रीष्म के आगमन के पूर्व मानों बसंत आया हो। सड़कों पर से बर्फ हट चुकी है। कहीं कहीं सड़कों के किनारे बर्फ के ढेरों का आकर तेजी से कम हो रहा है। कहीं कहीं रास्ते और सड़कों की सफाई का कम हो रहा है। मेरे मित्र राज कुमार भट्टी घर आये। उनके साथ मैट्रो लेकर नेशनल थिएटर स्टेशन पर उतर कर राजा के प्रसाद होते हुए लिटरेचर हाउस जा रहे थे। रास्ते में राजमहल के सामने मेरे एक अन्य मित्र प्रोफ़ेसर असीम दत्तोराय जी मिल गए। थोड़ी देर तक साहित्यिक और सांस्क्रतिक बातचीत होती रही। जहाँ लेखकों की बैठक होनी थी। थोड़ी देर हो गयी थी क्योंकि पत्रिका स्पाइल -दर्पण का कुछ सामग्री तैयार करनी थी। मुझे स्मरण है दिल्ली में रहने वाले लेखक और प्रसिद्ध आलोचक डॉ कमल किशोर गोयनका जी ने मुझसे वर्षों पहले कहा था की मुझे अपनी डायरी लिखनी चाहिए। अतः उनका स्मरण हो आया और डायरी लिखने बैठ गया। आज जहाँ मेरा जीवन खुली किताब की तरह है। फिर उसे आप पाठकों तक अपनी बात और दिनचर्या साझा कर रहा हूँ। लेखकों की बैठक में लगभग सौ नार्वेजीय लेखक उपस्थित थे। उसमें मेरे एक लेखक मित्र २० वर्ष बाद मिले जिन्होंने मेरे नार्वेजीय भाषा के काव्य संग्रह 'Mellom linjene' (पंक्तियों के मध्य ) की समीक्षा ओस्लो के समाचार पत्र VG (वेरदेन्स गंग) में २००५ में लिखी थी। मुझे स्मरण है की दिल्ली के मशहूर कार्टून बनाने वाले लेखक सुशील कालरा का साक्षात्कार दिलाने गया था। वे लोग कुछ विशेष होते हैं। आप चाहे जितना भी सहयोग उन्हें दीजिये वह आपको कम ही पत्र लिखते हैं और धन्यवाद भी नहीं देते है। इनमें अपवाद भी हैं। लेखक बैठक और बाद में मिलना-जुलना पार्टी चलती रही। साहित्यिक और निजी विचारों का आदान -प्रदान हुआ। दो लेखकों ने बताया की उनकी पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद छप चुका है। मुझे जानकार ख़ुशी हुई की हम लीग नार्वे में ठीक दिशा में कार्य कर रहे हैं। यहाँ संगीता शुक्ल सिमोन्सेन का हिंदी स्कूल जिसका उद्घाटन उदघाटन प्रो (डॉ) निर्मला एस मोर्य ने किया था बहुत अच्छा चल रहा है। चित्र में बीच में लेखक संगठन की अध्यक्ष इन्ग्विल और अन्य लेखक मित्रों के साथ

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

४ अप्रैल को अज्ञेय जी की पुण्य तिथि है -सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

४ अप्रैल को अज्ञेय जी की पुण्य तिथि थी -सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' अज्ञेय जी को श्रद्धांजलि अवलंब कथा का अन्त/ निशा के ओ कविता- अवली/ अवलंब जिन्हें होना था अवस्त्र हुए/ वृक्षों के ठूंठों पर कर विश्राम/ काक सा देते ठौर विचार, / गूंजने लगते थे पशु पक्षी/ ज्यों आते ही वसंत। / स्वागत कर उपेक्षा का, / नवतंत्र, कवि के मंत्र / गुरुदेव की बात / अकेला चले तुम जीवन पर्यन्त।/ कुछ किया गुरु दिनमान, / एकलव्य को दे धनु बाण/ नहीं होने पाया षड्यंत्र / किसी को लेने दिया न प्राण। / पत्रकारिता को दे नव अर्थ/ मिटाए कितने अवरोध, / अवसाद पा गए अवसान। / अनुबंध लिखे नव शक्ति, / तुम्हारे गायेंगे नवगान। / बिना नव छंद, / बनाकर द्वन्द/ करेंगे प्रस्तुत निश्छल सत्य।/ उसी से उपजेगा कोई अंजान/ जिसे न होगा पाठ का ज्ञान, / निरंतर बढ़ते जाएं पग, / तुम्हारी कविता का जयगान/ और कथा का अंतर्द्वंद / कभी तो उतरेगा केचुल, / साथ रहोगे हमारे स्मृति में / अगीत जिन्हें हम गायेंगे निर्वाद/ पृकृति का वह संगीत निषाद, / जिसे हम चाहेंगे दिन रात/ उसी पर दोरे डालें आज। / ओस्लो, नार्वे, ०५.०४.११

रविवार, 3 अप्रैल 2011

विश्व क्रिकेट कप में भारत की जीत- नार्वे (विदेशों) में जश्न

विश्व क्रिकेट कप में भारत की जीत- नार्वे (विदेशों) में जशन कुछ चित्र



भारतीय क्रिकेट टीम विश्वकप लिए हुए मैदान वानखेड़े स्टेडियम पर


वाइतवेत, ओस्लो में भारत के विश्वकप क्रिकेट में जीतने पर ख़ुशी से ध्वजा फहराते बच्चे


टूर्नामेंट के श्रेष्ठ खिलाडी का पुरस्कार क्लाइव लायड से लेते हुए युवराज सिंह


विश्वकप क्रिकेट में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले तीन खिलाडी बाएँ से जहीर खान, युवराज सिंह और सचिन तेंदुलकर साक्षात्कार देते हुए


थोइएन, ओस्लो में भारत के जीतने की ख़ुशी में जश्न मनाया

मंगलवार, 29 मार्च 2011

अज्ञेय जी, ४ अप्रैल जिनकी पुण्य तिथि है और ७ मार्च उनकी जन्मशती थी -शरद आलोक

'अज्ञेय' (जन्म ७ मार्च १९११ -- मृत्यु अप्रैल १९८७) जी की जन्मशती पर हीरानंद सच्चिदानंद वात्सायन 'अज्ञेय' के बहाने अपनी बात - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' आधुनिक हिंदी साहित्य में एक सशक्त हस्ताक्षर हीरानंद सच्चिदानंद वात्सायन 'अज्ञेय' का जन्म ७ मार्च १९११ को भारत के उत्तर प्रदेश (देवरिया/कुशीनगर) के निकट स्थित एक पुरातत्व शिविर में सन् 1911 में हुआ था। और उनकी मृत्यु ४ अप्रैल १९८७ में हुई थी. अज्ञेय जी से मेरी मुलाकात वह एक अच्छे इंसान थे। अज्ञेय जी से मेरी मुलाकात मेरा अज्ञेय जी से व्यक्तिगत मिलना एक बार हुआ था यह बात सन १९८४ या १९८५ की है जब हिंद पाकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित पश्चिमी देशों के दर्शन की पुस्तकों का विमोचन समारोह था. इस कार्यक्रम में अज्ञेय जी भी मुख्य वक्ताओं में से एक थे. हिंद पाकेट बुक्स के प्रकाशक के नाते दीनानाथ मल्होत्रा जी जो प्रकाशन जगत के सर्वाधिक लोकप्रिय व्यक्तियों में एक हैं कार्यक्रम के सूत्रधार थे. उस समय नार्वे से निकलने वाली प्रथम हिंदी पत्रिका 'परिचय का संपादन कर रहा था. मैंने अपना परिचय और अपना परिचय-पत्र दिया तथा उन्हें बताया, 'अज्ञेय जी हम नार्वे से हिंदी कि पत्रिका निकालते हैं. स्वयं भी हिंदी में कवितायें और कहानियां लिखते हैं." उनसे धर्मवीर भारती जी से अपने पत्राचार की बात भी बताई थी. उसी समय रघुबीर सहाय भी अपनी पुत्री के साथ उपस्थित थे. मुद्रा राक्षस और बहुत संख्या में साहित्यकार और पत्रकार मौजूद थे. अज्ञेय जी ने अपना परिचय पत्र देते हुए मुझे अपने साथ चाय पीने की दावत दी थी. मैंने धन्यवाद कहा. मैं अभी उदीयमान लेखक था. अज्ञेय जी की उदारता देखते नहीं बनती है. कहाँ वह इतने बड़े साहित्यकार और कहाँ मैं एक छोटा सा हिंदी सेवी जो विदेशों (नार्वे) में हिंदी की पत्रिका 'परिचय' का संपादन कर रहा था. कार्यक्रम में मैं अन्य लोगों से मिलता रहा. रघुवीर सहाय जी को बताया, "लखनऊ में आपके परिवार से, विशेषकर माताजी और भाई विजयवीर सहाय जी से मिलना होता है जो स्वतन्त्र भारत में पत्रकार हैं." उन्होंने मुझे अपनी कवितायें भेजने को कहा. मैंने उन्हें अपना दूसरा काव्य संग्रह 'रजनी' भेजा जिसके लिए उन्होंने शुभकामनाएं भी दी थीं. मैं अवस्थी जी के कादम्बिनी के कार्यालय में बैठा था और अज्ञेय जी का कार्ड दिखाते हुए बताया कि मुझे अज्ञेय जी ने चाय पर बुलाया है. तब उनके एक मित्र ने कहा कि कहाँ चक्कर में फंसे हो. मिलकर क्या करोगे। आदि बातें कहीं. मैं उनसे मिलने नहीं जा सका. मैंने दिल्ली के कुछ लेखकों को और उनकी डिप्लोमैटिक भाषा को समझने में असमर्थ था. पहले लखनऊ, उत्तर प्रदेश में अपने विद्यालयों में और 'उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान' तथा 'सूचना केंद्र' की साहित्यिक गोष्ठियों में ही साहित्यकारों से मिल पाया था और उनके विचार और उनकी रचनाएं और व्याख्यान सुने थे. जिसका जिक्र किसी अन्य लेख में करूंगा. दूसरे शब्दों में कहूं कि लखनऊ का एक सीधा-सादा व्यक्ति जिसने अपनी जिन्दगी छात्र और मजदूर के रूप में सन १९७२ से जनवरी २२ जनवरी १९८० तक व्यतीत की थी जो कभी कविता लिखकर और कभी स्थानीय पत्रों में अवैतनिक कार्य करके साहित्य और राजनीति को सीखने कि कोशिश कर रहा था. २६ जनवरी १९८० को नार्वे पहुंचकर नयी दिल्ली, कलकत्ता और मुंबई जैसे नगरों की हलचल और संस्कृति को सीखने का अवसर नहीं मिल पाया. इसी कारण आज भी लखनऊ और ओस्लो, नार्वे की मिली-जुली संस्कृति कि छाप मेरे व्यवहार में समाहित हो गयी है. बीच में एक बड़ा अंतराल है और यह गैप अभी भी महसूस करता हूँ। अज्ञेय जी का जीवन बहुत क्रन्तिकारी रहा है. उन्होंने आजादी की लडाई में जेल की हवा भी खाई है और साहित्य में वह बहुत कुछ दिया जो आधुनिक हिंदी कविता में रिक्त था. अज्ञेय जी ने पत्रकारिता में नए प्रतिमान और मानक स्थापित किये जो हिंदी की पत्रकारिता के लिए बहुत आवश्यक था. अज्ञेय जी के साथ छोटी सी परन्तु महत्वपूर्ण बातचीत हमेशा के लिए यादगार बन गयी. वहाँ ही मेरा परिचय 'हिन्द पाकेट बुक्स' के संस्थापक श्री दीनानाथ मल्होत्रा से हुआ था जिनसे आज भी सम्बन्ध बना हुआ है. जब भी भारत जाता हूँ तो दीनानाथ मल्होत्रा से मिलने जाता हूँ. यह बात अज्ञेय जी के बहाने लिख रहा हूँ। तीसरे विश्व हिंदी सम्मलेन में नार्वे का प्रतिनिधित्व डेनमार्क में मेरे मित्र और हिंदी के विद्वान फिन थीसेन ने ८३ में हुए दिल्ली के विश्व हिंदी सम्मलेन में भाग लिया था अनेक भाषाओं के विद्वान फिन थीसेन ने ’ डेनमार्क में हिंदी’ पर लेख लिखा था जिसे मैंने 'परिचय' में प्रकाशित किया था. फिन थीसेन ने तीसरे विश्व हिंदी सम्मलेन में 'परिचय' भी पहुंचाई थी. विश्व हिंदी सम्मलेन के आयोजक सदस्य श्री शंकर राव लोंढे जी ने मुझे इस सम्बन्ध में पत्र भी लिखा था। जब नार्वे में इंदिरा गाँधी जी आयीं थीं भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी नार्वे आयी थीं. ओस्लो के फोरनेबू हवाई अड्डे पर नार्वे के प्रधानमंत्री कोरे विलोक ने अगवानी की थी. जिनसे मुझे भी मिलने का अवसर मिला था. इंदिरा जी ने ही भारत को महाशक्ति बनाया था. और उनकी हत्या होने के बाद पूरे विश्व में मातम छा गया था. नार्वे में भी इसका असर हुआ था. मैंने पूरी रिपोर्ट लखनऊ के समाचार पत्र ’स्वतन्त्र भारत’ में और अपनी पत्रिका ’परिचय’ में चित्र समेत प्रकाशित कराई थी जिसका जिक्र धर्मवीर भारती जी ने धर्मयुग में किया था. एक गलत पत्र छाप देने के कारण मैंने जब धर्मवीर भारती जी से बातचीत की जो परिचय के सम्बन्ध में था तो उन्हें दुःख हुआ और छमा मांगी और लिखकर पत्र व्यवहार किया. इतने महान लेखक धर्मवीर भारती जी ने मुझ जैसे छोटी पत्रिका के संपादक को पत्र लिखा मैं बहुत बड़ी बात समझता हूँ. धर्मवीर भारती जी से पत्र व्यवहार और कुछ समय तक कभी-कभी फोन से भी संपर्क रहा. उन्हें ’परिचय’ भी भेजता रहा था। अज्ञेय जी अनेक पत्रों से जुड़े रहे उन्होंने देश भी देखा विदेश भी और उनके साहित्य में विस्तार आसानी से देखा जा सकता है. अज्ञेय जी के शब्दों में: “लेखकों को (मोटे तौर पर) दो वर्गों में बांटा जा सकता है। एक वर्ग उनका है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपने को अपना ‘हीरो’ मानकर चलते हैं, जीते हैं और लिखते हैं; दूसरा उनका जो कुछ भी करें, अपनी नजर में अभियुक्त ही बने रहते हैं। मैं कहूं कि मैं इनमें से दूसरे वर्ग का हूं, तो यह न आत्मश्लाघा है, न मुझसे भिन्न वर्ग के लोगों पर व्यंग्य; यह केवल लक्ष्य की पहचान और स्वीकृति है।’’ अज्ञेय जी लिखते हैं: “मैं ‘स्वान्त:सुखाय’ नही लिखता। कोई भी कवि केवल स्वान्त:सुखाय लिखता है या लिख सकता है, यह स्वीकार करने में मैंने अपने को सदा असमर्थ पाया है। अन्य मानवों की भांति अहं मुझमें भी मुखर है, और आत्माभिव्यक्ति का महत्व मेरे लिये भी किसी से कम नही है, पर क्या आत्माभिव्यक्ति अपने-आप मे सम्पूर्ण है? अपनी अभिव्यक्ति-किन्तु किस पर अभिव्यक्ति? इसीलिए ‘अभिव्यक्ति’ में एक ग्राहक या पाठक या श्रोता मै अनिवार्य मानता हूं, और इसके परिणामस्वरुप जो दायित्व लेखक या कवि या कलाकार पर आता है उससे कोई निस्तार मुझे नही दीखा। अभिव्यक्ति भी सामाजिक या असामाजिक वृत्तियों की हो सकती है, और आलोचक उस का मूल्यांकन करते समय ये सब बातें सोच सकता है, किन्तु वे बाद की बातें हैं। ऐसा प्रयोग अनुज्ञेय नहीं है जो ‘किसी की किसी पर अभिव्यक्ति’ के धर्म को भूल कर चलता है। जिन्हें बाल की खाल निकालने में रुचि हो, वे कह सकते हैं कि यह ग्राहक या पाठक कवि के बाहर क्यों हो-क्यों न उसी के व्यक्तित्व का एक अंश दूसरे अंश के लिए लिखे? अहं का ऐसा विभागीकरण अनर्थहेतुक हो सकता है; किन्तु यदि इस तर्क को मान भी लिया जाये तो भी यह स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति किसी के प्रति है और किसी की ग्राहक (या आलोचक) बुद्धि के आगे उत्तरदायी है। जो (व्यक्ति या व्यक्ति-खण्ड) लिख रहा है, और जो (व्यक्ति या व्यक्ति-खण्ड) सुख पा रहा है, वे हैं फ़िर भी पृथक्। भाषा उन के व्यवहार का माध्यम है, और उस की माध्यमिकता इसी में है कि एक से अधिक को बोधगम्य हो, अन्यथा वह भाषा नहीं है। जीवन की जटिलता को अभिव्यक्त करने वाले कवि की भाषा का किसी हद तक गूढ़, ‘अलौकिक’ अथवा दीक्षा द्वारा गम्य हो जाना अनिवार्य है, किन्तु वह उस की शक्ति नही, विवशता है; धर्म नही; आपद्धर्म है।”