शनिवार, 16 अप्रैल 2016

मैं ओस्लो के इतिहास की एक बूँद हूँ   I er en dråpe i Oslos historie- Suresh Chandra Shukla


आकेर्स आवीस ग्रूरूदडालेन के संपादक यालमार Hjalmar, ओस्लो की मेयर मारिआने बोरगेन Marianne borgen, स्वयं मैं (सुरेशचंद्र शुक्ल ) और मेरे पहले पड़ोसी पेर यार Per Jahr  मंच पर स्थानीय इतिहास पर चर्चा के बाद 

ओस्लो, १६ अप्रैल २०१६
हमारे यहाँ कहावत है कि बूँद-बूँद से घड़ा भरता है.  कई बार किसी-किसी इत्र और चीज की एक बूँद बहुत बड़ी मात्रा में द्रव्य को प्रभावित कर सकती है. नार्वे में लिखा हमारा साहित्य भी नार्वे के साहित्य का एक हिस्सा है. 
हमारा योगदान भी उसी तरह है जैसे यहाँ पर जन्म लेने वाले का. कोई अपने जीवन से बहुत जल्दी प्रभाव छोड़ जाता है और किसी को देर लगती है. कभी-कभी तो पूरा जीवन लग जाता है उसके साहित्य की पहचान बन्ने में या यह कहें उसे सभी के सामने आने में.
कई बार बहुत से लेखकों का साहित्य प्रकाशक से छपकर प्रकाश में आ जाता है पर दीर्घायु नहीं होता और किसी लेखक द्वारा काम लिखे और छपने के बाद भी वह दीर्घायु बन सकता है.
यह वक्त / समय ही बताता है यह कहकर हम टाल देते हैं. 
१५ अप्रैल को मेरे घर के पीछे स्थित वाइतवेत सेंटर में वाइतवेत कल्चर सेन्टर की शुरुआत को लेकर एक सप्ताह से कार्य चक्रम चल रहे हैं. कल 

नार्वे में भारतीयों का इतिहास?


यदि हम देखें तो नार्वे में भारतीयों के इतिहास का अभाव है. जिसकी जहाँ बनी उसने वहां पकड़ बनायी, पहुँच बनायी। कुछ लोगों की पहुँच आसानी से हो गयी पर कुछ को बहुत वक्त लगा. कुछ लोगों ने एक समय तो कोशिश की बाद में आयु और समय के साथ शांत होते गये.
१४ अप्रैल को ओस्लो रेडक्रास, हाउसमान्सजाता ७ ओस्लो में आंबेडकर जी की १२५ वीं जयन्ती बहुत धूम-धाम से मनाई गयी. वहां भारतीय दूतावास के सभी कार्यकर्ता राजदूत से लेकर सचिव सभी प्रेम से कार्यक्रम के बाद मिले। बाद में कुछ महत्वपूर्ण राजदूतों और पूर्व राजदूतों से मुलाक़ात हुई. इसके बाद अपने चिर परिचित भारतीयों से बातचीत हुई मेल-मिलाप हुआ कुछ फोटोग्राफी हुई. इसमें मैं जिक्र करना चाहूँगा श्री लाल जो संगीतकार हैं, सुरजीत सिंह जी जो स्वयं और उनका परिवार सामाजिक कार्य में सक्रीय है विशेषकर लवलीन जो एक कलाकार है उसका अभिनय इबसेन के नाटक Fruen fra havet समुद्र की औरत में बॉलीवुड की छाप के साथ बहुत सराहा गया था. कपूर जी भारतीय दूतावास में बहुत पहले कार्यरत रहे हैं और बढ़-बढ़ के बाते करना और बात-बात में भूल जाना आदि उनकी आयु और आदत का परिणाम ही है. ट्रेवल एजेंसी वाले जस्सन, बहुत पुराने सन १९८५-८६ में रहे प्रथम सचिव श्री धवन जी से भेंट कर बहुत खुशी हुई. वह अपने बेटे के साथ थे. मुझे उन्हें पहली नजर में पहचानने में देर न लगी.
मैंने इस अवसर पर शिखा चन्द्र जी को याद किया मैं पत्रकारिता की शिक्षा लेने वाला नार्वे में पहला व्यक्ति था और मैंने भारतीय प्रेस पर और साहित्य पर अलग-अलग दो गोष्ठियों का आयोजन किया था हमारे मेहमान थे भारत से राजेन्द्र अवस्थी जी, सरोजनी प्रीतम जी और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के डॉ सत्यभूषण वर्मा जी.  उस समय शिखा जी ने अपने घर पर पार्टी दी थी तब धवन जी भी वहां विशिष्ट अतिथि थे. 
श्रीलालजी, कपूर, सुरजीत सिंह, जससन और मैं आपस में कुछ आपस में बाते करने लगे और खाने -पीने की चीजों का स्वाद बताने लगे. आप कितनी ही पच्छी पार्टी या बैठक में हों पर यदि आपको यदि कोई चिर परिचित मिल जाता है तो बहुत खुशी होती है जैसे खाने के बाद कुछ मिठाई मिल गयी हो.
श्रीलाल जी ने मुझे बधाई दी कि मेरे साहित्य पर भारत में चार विश्व विद्यालयों में  शोध हो रहा है. मैंने उन्हें धन्यवाद दिया। यहाँ मेरे मन में एक बात जगी की कि क्यों न हर कार्य के चलते मैं यहाँ अपने समकालीन भारतीयों का संछिप्त इतिहास लिखूँ।  लोगों ने समर्थन किया, क्योंकि नार्वे में मैंने ३५ वर्ष पत्रकारिता में बिताएं हैं. मैं पूरे समय का पत्रकार और लेखक हूँ. इतिहास या साहित्य में समय मुझसे क्या लिखवायेगा यह भविष्य ही जाने। 






कोई टिप्पणी नहीं: